PDA

View Full Version : हो गई है पीर पर्वत



anita
17-05-2017, 01:32 AM
हो गई है पीर पर्वत-सी पिघलनी चाहिए
इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए

आज यह दीवार, परदों की तरह हिलने लगी
शर्त थी लेकिन कि ये बुनियाद हिलनी चाहिए

हर सड़क पर, हर गली में, हर नगर, हर गाँव में
हाथ लहराते हुए हर लाश चलनी चाहिए

सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं
मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए

मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही
हो कहीं भी आग, लेकिन आग जलनी चाहिए

anita
17-05-2017, 01:33 AM
इस ग़ज़ल के आखिरी दो शेर भारत के ना जाने कितने आन्दोलनों का हिस्सा बने और ना जाने कितने लोगो ने चिल्ला चिल्ला कर इनके साथ नारे लगाये