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View Full Version : आनंद / भाग २ / कामायनी



anita
23-05-2017, 12:34 AM
तब वृषभ सोमवाही भीअपनी घंटा-ध्वनि करता,बढ चला इडा के पीछेमानव भी था डग भरता।
हाँ इडा आज भूली थीपर क्षमा न चाह रही थी,वह दृश्य देखने को निजदृग-युगल सराह रही थी

चिर-मिलित प्रकृति से पुलकितवह चेतन-पुरूष-पुरातन,निज-शक्ति-तरंगायित थाआनंद-अंबु-निधि शोभन।
भर रहा अंक श्रद्धा कामानव उसको अपना कर,था इडा-शीश चरणों परवह पुलक भरी गदगद स्वर

बोली-"मैं धन्य हुई जोयहाँ भूलकर आयी,हे देवी तुम्हारी ममताबस मुझे खींचती लायी।
भगवति, समझी मैं सचमुचकुछ भी न समझ थी मुझको।सब को ही भुला रही थीअभ्यास यही था मुझको।

हम एक कुटुम्ब बनाकरयात्रा करने हैं आये,सुन कर यह दिव्य-तपोवनजिसमें सब अघ छुट जाये।"
मनु ने कुछ-कुछ मुस्करा करकैलास ओर दिखालाया,बोले- "देखो कि यहाँकोई भी नहीं पराया।

हम अन्य न और कुटुंबीहम केवल एक हमीं हैं,तुम सब मेरे अवयव होजिसमें कुछ नहीं कमीं है।
शापित न यहाँ है कोईतापित पापी न यहाँ है,जीवन-वसुधा समतल हैसमरस है जो कि जहाँ है।

चेतन समुद्र में जीवनलहरों सा बिखर पडा है,कुछ छाप व्यक्तिगत,अपना निर्मित आकार खडा है।
इस ज्योत्स्ना के जलनिधि मेंबुदबुद सा रूप बनाये,नक्षत्र दिखाई देतेअपनी आभा चमकाये।

वैसे अभेद-सागर मेंप्राणों का सृष्टि क्रम है,सब में घुल मिल कर रसमयरहता यह भाव चरम है।
अपने दुख सुख से पुलकितयह मूर्त-विश्व सचराचरचिति का विराट-वपु मंगलयह सत्य सतत चित सुंदर।

सबकी सेवा न परायीवह अपनी सुख-संसृति है,अपना ही अणु अणु कण-कणद्वयता ही तो विस्मृति है।
मैं की मेरी चेतनतासबको ही स्पर्श किये सी,सब भिन्न परिस्थितियों की हैमादक घूँट पिये सी।

जग ले ऊषा के दृग मेंसो ले निशी की पलकों में,हाँ स्वप्न देख ले सुदंरउलझन वाली अलकों में
चेतन का साक्षी मानवहो निर्विकार हंसता सा,मानस के मधुर मिलन मेंगहरे गहरे धँसता सा।

सब भेदभाव भुलवा करदुख-सुख को दृश्य बनाता,मानव कह रे यह मैं हूँ,यह विश्व नीड बन जाता"
श्रद्धा के मधु-अधरों कीछोटी-छोटी रेखायें,रागारूण किरण कला सीविकसीं बन स्मिति लेखायें।

वह कामायनी जगत कीमंगल-कामना-अकेली,थी-ज्योतिष्मती प्रफुल्लितमानस तट की वन बेली।
वह विश्व-चेतना पुलकित थीपूर्ण-काम की प्रतिमा,जैसे गंभीर महाह्नद होभरा विमल जल महिमा।

जिस मुरली के निस्वन सेयह शून्य रागमय होता,वह कामायनी विहँसती अगजग था मुखरित होता।
क्षण-भर में सब परिवर्तितअणु-अणु थे विश्व-कमल के,पिगल-पराग से मचलेआनंद-सुधा रस छलके।

अति मधुर गंधवह बहतापरिमल बूँदों से सिंचित,सुख-स्पर्श कमल-केसर काकर आया रज से रंजित।
जैसे असंख्य मुकुलों कामादन-विकास कर आया,उनके अछूत अधरों काकितना चुंबन भर लाया।

रूक-रूक कर कुछ इठलाताजैसे कुछ हो वह भूला,नव कनक-कुसुम-रज धूसरमकरंद-जलद-सा फूला।
जैसे वनलक्ष्मी ने हीबिखराया हो केसर-रज,या हेमकूट हिम जल मेंझलकाता परछाई निज।

संसृति के मधुर मिलन केउच्छवास बना कर निज दल,चल पडे गगन-आँगन मेंकुछ गाते अभिनव मंगल।
वल्लरियाँ नृत्य निरत थीं,बिखरी सुगंध की लहरें,फिर वेणु रंध्र से उठ करमूर्च्छना कहाँ अब ठहरे।

गूँजते मधुर नूपुर सेमदमाते होकर मधुकर,वाणी की वीणा-धवनि-सीभर उठी शून्य में झिल कर।
उन्मद माधव मलयानिलदौडे सब गिरते-पडते,परिमल से चली नहा करकाकली, सुमन थे झडते।

सिकुडन कौशेय वसन की थीविश्व-सुन्दरी तन पर,या मादन मृदुतम कंपनछायी संपूर्ण सृजन पर।
सुख-सहचर दुख-विदुषकपरिहास पूर्ण कर अभिनय,सब की विस्मृति के पट मेंछिप बैठा था अब निर्भय।

थे डाल डाल में मधुमयमृदु मुकुल बने झालर से,रस भार प्रफुल्ल सुमनसब धीरे-धीरे से बरसे।
हिम खंड रश्मि मंडित होमणि-दीप प्रकाश दिखता,जिनसे समीर टकरा करअति मधुर मृदंग बजाता।

संगीत मनोहर उठतामुरली बजती जीवन की,सकेंत कामना बन करबतलाती दिशा मिलन की।
रस्मियाँ बनीं अप्सरियाँअतंरिक् में नचती थीं,परिमल का कन-कन लेकरनिज रंगमंच रचती थी।

मांसल-सी आज हुई थीहिमवती प्रकृति पाषाणी,उस लास-रास में विह्वलथी हँसती सी कल्याणी।
वह चंद्र किरीट रजत-नगस्पंदित-सा पुरष पुरातन,देखता मानसि गौरीलहरों का कोमल नत्तर्न

प्रतिफलित हुई सब आँखेंउस प्रेम-ज्योति-विमला से,सब पहचाने से लगतेअपनी ही एक कला से।
समरस थे जड*़ या चेतनसुन्दर साकार बना था,चेतनता एक विलसतीआनंद अखंड घना था।