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View Full Version : इन पांच रचनाओं ने हर दौर को अपना कायल बना लिया



ChachaChoudhary
28-05-2011, 09:55 AM
साहित्य और सिनेमा के बारे में अक्सर ये बात कही जाती है कि हम जिस लायक होते हैं हमें उसी स्तर का साहित्य और सिनेमा देखने को मिलता है। आज भारतीय सिनेमा दुनिया की सबसे बड़ी फिल्म इंडस्ट्री है जहां हर साल औसतन एक हजार फिल्में बनती हैं।
इस श्रृंखला में हम आपको भारतीय सिने जगत की ऐसी दस फिल्मों से रूबरू कराने जा रहे हैं जिन्होने न सिर्फ उस दौर को आइना दिखाने का क ाम किया है बल्कि, भारतीय सिनेमा को वह बुलंदी दी जिसने आने वाले दौर के फिल्म निर्माताओं के सामने आदर्श का काम किया। पेश है ऐसी ही पांच फिल्मों की झलकियां.....

ChachaChoudhary
28-05-2011, 09:56 AM
प्यासा (1957) :
यह फिल्म 19 फरवरी 1957 को रिलीज हुई। गुरू दत्त, वहिदा रहमान, माला सिन्हा और जॉनी वॉकर अभिनीत इस फिल्म के निर्माता और निर्देशक खुद गुरू दत्त ही थे। यह फिल्म एक असफल और मजबूर लेखक की कहानी को बयां करती है।

ChachaChoudhary
28-05-2011, 09:57 AM
मदर इंडिया (१९५७) :
साहूकार के चंगुल में फंसे एक परिवार की दिल छू लेने वाली इस कहानी को फिल्म के निर्माता-निर्देशक महबूब खान ने खुद ही लिखा था। नरगिस, सुनील दत्त, राजेंद्र कुमार और राज कु मार अभिनीत यह फिल्म 25 अक्टूबर 1957 को रिलीज की गई।

ChachaChoudhary
28-05-2011, 09:59 AM
जागते रहो (१९५६) :
गांव से काम की तलाश में गांव से शहर आए एक किसान की मजबूरी और शहर के तथाकथित बड़े लोगों के जीवन के छुपे हुए पहलुओं को उजागर करने वाली इस फिल्म में राज कपूर ने मुख्य भूमिका अदा की थी।

ChachaChoudhary
28-05-2011, 10:01 AM
दो बीघा जमीन (१९५३) :
एक किसान की दो बीघा जमीन पर साहूकार की बुरी नजर और उसे बचाने के लिए एक गरीब किसान के संघर्ष को बयां करने वाली इस फिल्म की कहानी सलिल चौधरी ने लिखी थी। फिल्म के निर्माता-निर्देशन बिमल रॉय थे जबकि इस फिल्म में बलराजी साहनी, निरूपा राव, जगदीप, मीना कुमारी और रतन कुमार ने मुख्य भूमिकाएं निभाई थीं।

ChachaChoudhary
28-05-2011, 10:02 AM
नया दौर (१९५७) :
आजादी के बाद आए औद्योगीकरण और उससे गरीब खासतौर तांगेवालों के जीवन पर पड़ने वाले प्रभाव को दिखाने वाली इस फिल्म में दिलीप कुमार, वैजयंतीमाला और जीवन ने मुख्य भूमिकाएं निभाई थी। फिल्म का निर्माण और निर्देशन बी आर चोपड़ा ने किया था।

fullmoon
28-05-2011, 10:23 AM
ये पांचो फ़िल्में एक से बढ़कर एक हैं.

मैंने इसमें से जागते रहो नहीं देखी.

लेकिन देखने की बहुत तमन्ना है.

अगर आप इन पांचो फिल्मों की कहानी के बारे में सविस्तार कुछ लिखें ,

तो सूत्र बहुत ही रोचक हो जाएगा.

badboy123455
28-05-2011, 10:36 AM
मेने तो सिर्फ नया दौर देखि हे अब सारी देखुगा

ChachaChoudhary
28-05-2011, 01:33 PM
मेने तो सिर्फ नया दौर देखि हे अब सारी देखुगा



ये पांचो फ़िल्में एक से बढ़कर एक हैं.

मैंने इसमें से जागते रहो नहीं देखी.

लेकिन देखने की बहुत तमन्ना है.

अगर आप इन पांचो फिल्मों की कहानी के बारे में सविस्तार कुछ लिखें ,

तो सूत्र बहुत ही रोचक हो जाएगा.


बहुत बहुत धन्यवाद आप का की आपने सूत्र का परिक्षण किया .......
फुल्ल्मून जी मेरी लेखनी में आप जैसी जादूगरी तो नहीं है फिर भी एक छोटी सी कोशिश कर सकता हूँ ..... उम्मीद है आप सभी मित्रो को पसंद आएगी ....
इसी कड़ी में सबसे पहेले प्यासा की कहानी प्रस्तुत कर रहा हूँ ..........

ChachaChoudhary
28-05-2011, 01:35 PM
आज़ादी के 10 वर्ष बाद 1957 में रिलीज फिल्म "प्यासा" संघर्षरत कवि विजय (गुरुदत्त) की कहानी है,जो श्रेष्ठ होते हुए भी अपनी कृतियों को स्थान नहीं दिला पाए| विजय की रचनाएँ अमीरों के अत्याचारों का विरोध व गरीबों के समर्थन में हैं|पर प्रकाशकों ने उनका महत्व न समझा और स्वयं उनके भाई उनके लेखन को व्यर्थ समझते हैं तथा उनकी रचनाओं को एक कबाड़ी को बेच देते हैं| ये रचनाएं संयोग से गुलाबो (वहीदा रहमान) खरीदती है तथा इन पंक्तियों को गुनगुनाती है| समाज के ढर्रे से त्रस्त विजय घर छोड़ देता है और उसका अधिकांश समय सड़कों पर ही गुजरता है| एक संयोगवश गुलाबो की भेंट विजय की मित्र मीना से होती है जिसने विजय की गरीबी के कारण एक प्रकाशक घोष बाबू (रहमान)से शादी कर ली| परन्तु वह अपने वैवाहिक जीवन से खुश नहीं है और वापस विजय के जीवन में आना चाहती है,परन्तु विजय को मंज़ूर नहीं|

ChachaChoudhary
28-05-2011, 01:36 PM
दूसरी ओर विजय को एक दुर्घटना में चोट लगती है और वह एक संयोगवश मृत समझ लिया जाता है| गुलाबो अपने कुछ अन्य प्रभावशाली परिचितों की सहायता से विजय की रचनाएं प्रकाशित करा देती है|ये कवितायेँ घोष इस आशा से प्रकाशित करता है कि वह विजय की मृत्यु से उपजी सहानुभूति का लाभ उठाकर धन कमा लेगा पर उसके भाई(महमूद) घोष के पास जाते है वो पैसा हथियाने के लिए|

ChachaChoudhary
28-05-2011, 01:36 PM
परन्तु विजय जीवित है और उसका इलाज़ एक मानसिक रोग अस्पताल में चल रहा है| एक दिन नर्स से अपनी ही प्रकाशित रचना सुन कर तथा अपनी प्रसिद्धि का समाचार जान कर विजय सामान्य हो जाता है|परन्तु कोई उसका विश्वास नहीं करता तथा उसको पागलों वाले कमरे में ही रखा जाता है|घोष को जब यह पता चलता है तो वह विजय के मित्र श्याम व भाईयों को अपने रचे षड्यंत्र में शामिल कर लेता है तथा सब मिल कर उसको पहचानने से मना कर देते हैं|फिर शुरू होती है विजय की दुनिया के सामने अपना अस्तित्व साबित करने की कशमकश|

ChachaChoudhary
28-05-2011, 01:39 PM
अबरार अली की लिखी यह कहानी एक सन्देश समेटे हुए है और ये सन्देश अपने उत्कृष्ट अभिनय के माध्यम से गुरुदत्त,वहीदा रहमान ,जोनी वाकर ,रहमान व माला सिन्हा ने प्रस्तुत किया है|
गुरु दत्त का निर्देशन ठोस है और उन्होंने बेहद उम्दा पटकथा दी है| फिल्म का चरम दिल छु लेने वाला है और पूरे फिल्म की जान है| गुरु दत्त ने एक बेहतरीन और भावुक चरम से दुनिया की सच्चाई सामने रखने की कोशिश की है|

फिल्म में संगीत ठोस है और फिल्म की थीम पर जचता है| एस. डी. बर्मन का संगीत तथा मोहम्मद रफ़ी के गाये कुछ गीत आज भी उतने ही पसंद किये जाते हैं|

फिल्म में संवाद भी अबरार अल्वी के हैं,जो फिल्म की जान हैं|
"अपने शौक के लिए प्यार करती है और अपने आराम के लिए प्यार बेचती है"
संवाद विजय के साथ हुई बेवफ़ाई बयान करती है|
वही
"तो मै यहाँ क्या कर रहा हूँ मैं जिन्दा क्यों हूँ ,गुलाबो"
निराश हताश विजय की दुर्दशा दिखाती है|
हालाँकि फिल्म एक दृष्टि से बहुत ही धीमे चलती है और कुछ स्थानों पर थोड़ी बोरियत सी लगती है| पर गीत, संगीत, अभिनय, संवाद शेष सभी कसोटियों पर खरी उतरती है|

Chandrshekhar
28-05-2011, 02:38 PM
मित्रों भारतीय सिनेमा की अमर फिल्म प्यासा को इस लिंक पे आप फ्री ओन लाइन देख सकते है,डाउन लोड करने की जरूरत नही है.....

http://www.desifun.co.uk/watch-online-movie/pyaasa.htm

sushilnkt
28-05-2011, 02:40 PM
मस्त हे रे भाई अब इस को देख डाला तो जिगाला ला

fullmoon
28-05-2011, 04:37 PM
दोस्त,

बहुत ही शानदार सूत्र.

फिल्म की कहानी कहने से इस सूत्र में जान आ गयी.

मेरी एक गुजारिश है,इन पांच फिल्मों की कहानी के बाद भी ये सूत्र बंद मत कीजियेगा.

कुछ और इंडियन फिल्म industry की milestone फिल्म्स की जानकारी देते रहिएगा.

और इस बेहतरीन सूत्र के लिए reputation .....

pradip1981
28-05-2011, 05:11 PM
आज़ादी के 10 वर्ष बाद 1957 में रिलीज फिल्म "प्यासा" संघर्षरत कवि विजय (गुरुदत्त) की कहानी है,जो श्रेष्ठ होते हुए भी अपनी कृतियों को स्थान नहीं दिला पाए| विजय की रचनाएँ अमीरों के अत्याचारों का विरोध व गरीबों के समर्थन में हैं|पर प्रकाशकों ने उनका महत्व न समझा और स्वयं उनके भाई उनके लेखन को व्यर्थ समझते हैं तथा उनकी रचनाओं को एक कबाड़ी को बेच देते हैं| ये रचनाएं संयोग से गुलाबो (वहीदा रहमान) खरीदती है तथा इन पंक्तियों को गुनगुनाती है| समाज के ढर्रे से त्रस्त विजय घर छोड़ देता है और उसका अधिकांश समय सड़कों पर ही गुजरता है| एक संयोगवश गुलाबो की भेंट विजय की मित्र मीना से होती है जिसने विजय की गरीबी के कारण एक प्रकाशक घोष बाबू (रहमान)से शादी कर ली| परन्तु वह अपने वैवाहिक जीवन से खुश नहीं है और वापस विजय के जीवन में आना चाहती है,परन्तु विजय को मंज़ूर नहीं|


बहुत सुंदर सोच है यार

BHARAT KUMAR
29-05-2011, 06:13 AM
चोधरी साब! अति उत्तम! फुल मून जी के बाद इतने अच्छे से सूत्र में कहानी पेश करने में आपका ही नाम है ! सूत्र आगे बढाएं! और मेरा भी यही विचार है कि सूत्र को पांच फिल्मों तक सीमित न रखते हुए विस्तृत करलें बंधू!

मेरी तरफ से शुभकामनाएं!

draculla
29-05-2011, 07:30 AM
चाचा चौधरी जी आपके इस बढ़िया सूत्र के धन्यवाद/
यह फिल्म मैंने पूरी नहीं देखी है/
लेकिन अब लगता है की इसे देखनी पड़ेगी/
इस सूत्र के लिए + रेप
आगे भी अच्छे फिल्मो की कहानी बताते जाये.

ChachaChoudhary
31-05-2011, 10:10 AM
मस्त हे रे भाई अब इस को देख डाला तो जिगाला ला



दोस्त,

बहुत ही शानदार सूत्र.

फिल्म की कहानी कहने से इस सूत्र में जान आ गयी.

मेरी एक गुजारिश है,इन पांच फिल्मों की कहानी के बाद भी ये सूत्र बंद मत कीजियेगा.

कुछ और इंडियन फिल्म industry की milestone फिल्म्स की जानकारी देते रहिएगा.

और इस बेहतरीन सूत्र के लिए reputation .....



बहुत सुंदर सोच है यार


चोधरी साब! अति उत्तम! फुल मून जी के बाद इतने अच्छे से सूत्र में कहानी पेश करने में आपका ही नाम है ! सूत्र आगे बढाएं! और मेरा भी यही विचार है कि सूत्र को पांच फिल्मों तक सीमित न रखते हुए विस्तृत करलें बंधू!

मेरी तरफ से शुभकामनाएं!


चाचा चौधरी जी आपके इस बढ़िया सूत्र के धन्यवाद/
यह फिल्म मैंने पूरी नहीं देखी है/
लेकिन अब लगता है की इसे देखनी पड़ेगी/
इस सूत्र के लिए + रेप
आगे भी अच्छे फिल्मो की कहानी बताते जाये.

सबसे पहेले सभी मित्रो का शुक्रिया की आपने इस सूत्र को इतना पसंद किया ,,,,,,,, फुल्ल्मून जी जिस पायदान पर खड़े है मैं तो उसकी निचली सीढ़ी पर भी नहीं खड़ा हूँ ....... फुल्ल्मून जी जैसा कोई नहीं है .......

ChachaChoudhary
31-05-2011, 10:12 AM
आज की कड़ी में प्रस्तुत है .... "दो बीघा जमीन" की कहानी .......


दो बीघा ज़मीन 1953 में बनी फ़िल्म है। यह बंगाली फ़िल्म निर्देशक बिमल रॉय द्वारा निर्देशित है। बलराज साहनी-निरूपा रॉय इस फ़िल्म में मुख्य भूमिका निभाई है। फ़िल्म के विषय में कहा जाता है की यह एक समाजवादी फ़िल्म है और भारत के समानांतर सिनेमा के प्रारंभिक महत्त्वपूर्ण फ़िल्म में एक है। जिसमें दो बीघा भूमि का क्षेत्र है। इस फ़िल्म से संगीतकार सलिल चौधरी भी विमल दा से जुड़ गये।

दो बीघा ज़मीन की कहानी सलिल चौधरी की ही लिखी हुई थी। भारतीय किसानों की दुर्दशा पर केंन्द्रित इस फ़िल्म को हिन्दी की महानतम फ़िल्मों में गिना जाता है। इटली के नव यथार्थवादी सिनेमा से प्रेरित विमल दा की दो बीघा ज़मीन एक ऐसे ग़रीब किसान की कहानी है जो शहर चला जाता है। शहर आकर वह रिक्शा खींचकर रुपया कमाता है ताकि वह रेहन पड़ी ज़मीन को छुड़ा सके। ग़रीब किसान और रिक्शा चालाक की भूमिका में बलराज साहनी ने जान डाल दी है। व्यावसायिक तौर पर दो बीघा ज़मीन भले ही कुछ ख़ास सफल नहीं रही लेकिन इस फ़िल्म ने विमल दा की अंतर्राष्ट्रीय पहचान स्थापित कर दी। इस फ़िल्म के लिए उन्होंने कांत फ़िल्म महोत्सव और कार्लोवी वैरी फ़िल्म समारोह में पुरस्कार जीता। इस फ़िल्म ने हिन्दी सिनेमा में विमल राय के पैर जमा दिये। दो बीघा ज़मीन को राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय स्तर एवं फ़िल्म फ़ेयर अवार्ड 1953 में शुरू किये गये थे। दो बीघा ज़मीन के लिए बिमल राय को सर्वश्रेष्ठ निर्देशन का पहला फ़िल्म फ़ेयर अवार्ड दिया गया।

ChachaChoudhary
31-05-2011, 10:12 AM
कहानी में शंभु किसान (बलराज साहनी), उसकी पत्नी पारो (निरूपा राय) व पुत्र कन्हैया (रतन कुमार) मुख्य पात्र है। फ़िल्म की कहानी में गाँव में भयानक अकाल पड़ने के बाद बारिश होती है जिससे सभी खुश हो जाते हैं। गाँव का जमींदार हरमन सिंह शहर के ठेकेदार से गाँव में ज़मीन बेचने का सौदा कर लेता है। वह शम्भु, (जो दो बीघा ज़मीन का मालिक है) से भी ज़मीन बेचने के लिए कहता है।

हरमन सिंह को बहुत विश्वास था कि वह शम्भु की ज़मीन ख़रीद लेगा। शम्भु ने जमींदार से कई बार पैसा उधार लिया था जिसे वह चुका नहीं पाया था। हरमन सिंह ने शम्भु से उस ॠण के बदले में अपनी ज़मीन देने के लिए कहा। शम्भु ने उसे अपनी ज़मीन देने से मना कर दिया क्योंकि वह ज़मीन उसकी जीविका थी। हरमन सिंह दुखी हो गया। हरमन सिंह ने अगले ही दिन शम्भु से उधार लिया पैसा चुकाने के लिए कहा।

ChachaChoudhary
31-05-2011, 10:13 AM
शम्भु वापस आकर अपने पिता व बेटे की सहायता से ॠण की रकम 65 रुपये निकालता है। शम्भु अपने घर सब कुछ बेचकर पैसो की व्यवस्था करता है और पैसे चुकाने जमींदार के पास जाता है। वहाँ शम्भु यह जानकर हैरान हो जाता है कि ॠण कि राशि 235 रुपये है। लेखाकर से हुई भूल को निपटाने के लिए शम्भु अदालत जाता है व लेखाकार से हुई भूल को बताता है। वहाँ शम्भु मुकदमा हार जाता है। अदालत फैसला सुनाता है कि शम्भु तीन महीने के अन्दर अपना ॠण चुका दे अन्यथा उसकी ज़मीन की नीलामी कर दी जायेगी।

ChachaChoudhary
31-05-2011, 10:14 AM
शम्भु पैसा वापस करने के लिए कलकत्ता जाता है वहाँ वह एक रिक्शा चालक बन जाता है तथा उसका बेटा कन्हैया एक मोची बन जाता है। तीन महीने बीत जाते हैं। ॠण चुकाने का दिन क़रीब आने पर शम्भु ज़्यादा पैसा कमाने के लिए बहुत तेजी से रिक्शा खींचता है। रिक्शा से पहिया निकल जाता है व शम्भु की दुर्घटना हो जाता है। अपने पिता की हालत को देखकर कन्हैया चोरी करना चालू कर देता है। जब शम्भु को कन्हैया के बारे में पता चलता है तो वह उसे बहुत बुरा भला कहता है। इधर शम्भु की पत्नी को शम्भु और कन्हैया के बारे में सोचकर चिन्ता होती है। वह उन दोनों को ढूढ़ने के लिए शहर आ जाती है वहाँ उसका कार से दुर्घटना हो जाती है। शम्भु सारा जमा किया हुआ पैसा उसके इलाज में लगा देता है।

ChachaChoudhary
31-05-2011, 10:14 AM
गाँव में शम्भु की ज़मीन की नीलामी हो जाती है क्योंकि शम्भु पैसा चुकाने में असमर्थ हो जाता है। ज़मीन जमींदार हरमन सिंह के पास चली जाती है और वहाँ कारख़ाने का काम चालू हो जाता है। शम्भु और उसका परिवार गाँव में अपनी ज़मीन देखने आता है। वहाँ ज़मीन की जगह कारख़ाना देखकर बहुत दुखी हो जाता है तथा मुठ्ठी भर गंदगी कारख़ाने पर फैंकता है। वहाँ कारख़ाने के सुरक्षा कर्मी उसे बाहर निकाल देते हैं। फ़िल्म खत्म हो जाती है तथा शम्भु व उसका परिवार वहाँ से चला जाता है।

ChachaChoudhary
31-05-2011, 10:16 AM
बलराज साहनी और निरूपा रॉय के मुख्य भूमिका वाली इस कहानी में एक ऐसे किसान की मजबूरियाँ दिखाई गई हैं जो अपनी दो बीघा ज़मीन बचाने के लिए लड़ रहा है। फ़िल्म शहरों की तरफ पलायन के विषय को भी उभारकर लाई। बाइसिकल थीव्ज से प्रेरित बिमल रॉय को यकीन नहीं था कि लंदन से लौटे अंग्रेज बलराज साहनी वास्तव में किसान शंभू की भूमिका के साथ न्याय भी कर पाएंगे लेकिन जब उन्हें शम्भू की भूमिका मिली तो बलराज ने अपने किरदार को उतारने में कोई कसर नहीं छोड़ी। कई-कई दिन वो भूखे रहे। यहाँ तक कि इसे समझने के लिए उन्होंने रिक्शा चालकों के बीच वक़्त बिताया। परीक्षित साहनी बताते हैं कि उनकी माँ और बुआ को बलराज साहनी रिक्शे पर बैठाकर नंगे पैर घंटों रिक्शा खींचा करते थे ताकि वे फ़िल्म में अपनी भूमिका को सही तरह से निभा सकें।

ChachaChoudhary
31-05-2011, 10:17 AM
1953 में एक अनजान से डायरेक्टर ने दर्शकों के सामने रखा अपना शाहकार...दो बीघा ज़मीन। इस फ़िल्म ने न केवल सबसे अच्छी फ़िल्म के लिए पहला फ़िल्मफेयर पुरस्कार पाया बल्कि डायरेक्टर बिमल रॉय को पहला बेस्ट डायरेक्टर का खिताब भी दिया गया। 1953 में प्रदर्शित हुई इस फ़िल्म की अखबारों में धज्जियाँ उड़ाई गईं। बिमल रॉय इससे काफ़ी निराश हो गए। यहाँ तक कि उन्होंने नए-नए स्थापित फ़िल्मफेयर पुरस्कार समारोह में जाने से मना कर दिया। ये भी अजीबोग़रीब है कि उस रात घोषित 5 में से दो पुरस्कार दो बीघा ज़मीन को मिले। यही फ़िल्म अंतर्राष्ट्रीय कांत फ़िल्म महोत्सव में पुरस्कार जीतने वाली पहली भारतीय फ़िल्म भी बनी।

fullmoon
31-05-2011, 10:44 AM
फुल्ल्मून जी जिस पायदान पर खड़े है मैं तो उसकी निचली सीढ़ी पर भी नहीं खड़ा हूँ ....... फुल्ल्मून जी जैसा कोई नहीं है .......


ऐसा नहीं है दोस्त,

मुझे आपकी लेखन शैली ने काफी प्रभवित किया है.

कम से कम पोस्ट में आप फिल्म की पूरी कहानी और उससे जुडी सारे विवरण जिस प्रकार से पोस्ट कर रहे हैं,वो काबिलेतारीफ है.

मैं आपके इस सूत्र के updates का इंतज़ार करता रहता हूँ,

और इस फोरम के मेरे कुछ प्रिय सूत्रों में से एक है आपका सूत्र.

इसलिए अगली फिल्म अगर हो सके तो "जागते रहो" पेश करें,

इसके बारे में जानने की बहुत उत्सुकता है.

एक बात कहूँ तो आप कहेंगे की फिर सलाह देने लग गया ,

लेकिन फिल्म संबधित चित्रों की कमी अभी खल रही है

अगर आपको असुविधा ना हो तो फिल्म सम्बंधित कुछ चित्र भी डाल दें,साथ में.

Nisha.Patel
31-05-2011, 11:47 AM
मदर इंडिया (१९५७) :
साहूकार के चंगुल में फंसे एक परिवार की दिल छू लेने वाली इस कहानी को फिल्म के निर्माता-निर्देशक महबूब खान ने खुद ही लिखा था। नरगिस, सुनील दत्त, राजेंद्र कुमार और राज कु मार अभिनीत यह फिल्म 25 अक्टूबर 1957 को रिलीज की गई।

और कहा जाता हे की इस फिल्म के बाद नरगिस और सुनील दत्त की लोकप्रियता रातोरात बढ़ गयी थी

चाचा जी एक अच्छे सूत्र के लिए बधाई हो

Sameerchand
31-05-2011, 12:41 PM
आज की कड़ी में प्रस्तुत है .... "दो बीघा जमीन" की कहानी .......


दो बीघा ज़मीन 1953 में बनी फ़िल्म है। यह बंगाली फ़िल्म निर्देशक बिमल रॉय द्वारा निर्देशित है। बलराज साहनी-निरूपा रॉय इस फ़िल्म में मुख्य भूमिका निभाई है।
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दो बीघा ज़मीन को राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय स्तर एवं फ़िल्म फ़ेयर अवार्ड 1953 में शुरू किये गये थे। दो बीघा ज़मीन के लिए बिमल राय को सर्वश्रेष्ठ निर्देशन का पहला फ़िल्म फ़ेयर अवार्ड दिया गया।




चाचाजी सच में यह पाँच फिल्मे भारतीय सिनेमा इतिहास की माइल स्टोन है. आपने इस सूत्र में इन फिल्मो का नाम लेकर इन फिल्मो को फिर से देखने की चाहत जगा दी.

इन पांचो फिल्मो में से एक फिल्म "दो बीघा जमीन" मैंने नहीं देखि है और इसका लिंक भी कही उपलब्ध नहीं है. ऑनलाइन मुझसे देखा नहीं जाता,समय के आभाव के कारन. अगर इसका डाउनलोड लिंक उपलब्ध करा दे तो बहुत मेहरबानी.

इस बेहतरीन सूत्र के लिए बहुत बहुत बधाई.

ChachaChoudhary
01-06-2011, 10:08 AM
ऐसा नहीं है दोस्त,

मुझे आपकी लेखन शैली ने काफी प्रभवित किया है.

कम से कम पोस्ट में आप फिल्म की पूरी कहानी और उससे जुडी सारे विवरण जिस प्रकार से पोस्ट कर रहे हैं,वो काबिलेतारीफ है.

मैं आपके इस सूत्र के updates का इंतज़ार करता रहता हूँ,

और इस फोरम के मेरे कुछ प्रिय सूत्रों में से एक है आपका सूत्र.

इसलिए अगली फिल्म अगर हो सके तो "जागते रहो" पेश करें,

इसके बारे में जानने की बहुत उत्सुकता है.

एक बात कहूँ तो आप कहेंगे की फिर सलाह देने लग गया ,

लेकिन फिल्म संबधित चित्रों की कमी अभी खल रही है

अगर आपको असुविधा ना हो तो फिल्म सम्बंधित कुछ चित्र भी डाल दें,साथ में.



और कहा जाता हे की इस फिल्म के बाद नरगिस और सुनील दत्त की लोकप्रियता रातोरात बढ़ गयी थी

चाचा जी एक अच्छे सूत्र के लिए बधाई हो




चाचाजी सच में यह पाँच फिल्मे भारतीय सिनेमा इतिहास की माइल स्टोन है. आपने इस सूत्र में इन फिल्मो का नाम लेकर इन फिल्मो को फिर से देखने की चाहत जगा दी.

इन पांचो फिल्मो में से एक फिल्म "दो बीघा जमीन" मैंने नहीं देखि है और इसका लिंक भी कही उपलब्ध नहीं है. ऑनलाइन मुझसे देखा नहीं जाता,समय के आभाव के कारन. अगर इसका डाउनलोड लिंक उपलब्ध करा दे तो बहुत मेहरबानी.

इस बेहतरीन सूत्र के लिए बहुत बहुत बधाई.


बहुत बहुत धन्यवाद् ........ मित्रो ........ आपकी प्रतिक्रिया पढ़ कर अच्छा लगा ......... इसी प्रकार से होसला अफजाई करते रहे ........
फुल्ल्मून जी चित्र माला इसलिए नहीं डाल पा रहा क्यू की मेरे पास थोडा समय का आभाव है ........ अगर आप मेरी इसमें मदद कर सके तो बड़ी मेहरबानी होगी

ChachaChoudhary
01-06-2011, 10:10 AM
जागते रहो का कथानक मैं प्रस्तुत कर रहा हूँ ....... उम्मीद है इस से आपकी ये फिल्म देखने की उत्सुकता बड़ा देगा .........

ChachaChoudhary
01-06-2011, 10:10 AM
इस फिल्म का निर्माण 1956 में हुआ था। शम्भु मित्र ने ही जागते रहो की कहानी और पटकथा पर भी काम किया था। इस फिल्म को कार्लोवी वेरी फेस्टिवल में दिखाया और सराहा गया था। जागते रहो, दो भाषाओं में बनी थी, हिन्दी में यही नाम और बंगला में एक दिन रात्रे। कोलकाता में फिल्मांकित इस फिल्म के माध्यम से महानगरीय जीवन में क्षीण होती व्यवहारिकता, मानवीयता, रिश्ते-नाते और एक-दूसरे को निहारने तक का परस्पर संदिग्ध भाव, उसके पीछे छिपे डर, द्वेष, नफरत, लालच को यथार्थपरकता के साथ चित्रित किया गया था।

ChachaChoudhary
01-06-2011, 10:11 AM
जागते रहो सामाजिक व्यंग्य की नदी पर हास्य की लहरें बहाती हुयी लाती है और भ्रष्टाचार की खम ठोक कर जम चुकी चटटानों को परत दर परत खुरचने और रेत बनाने का काम करती जाती हैं। जागते रहो सिर्फ वही नहीं है जो साफ साफ परदे पर दिख रहा है बल्कि यह रुपक की भाषा में काम करती है। शायद बिल्कुल ऐसा न होता हो या न हो सकता हो पर फंतासी के स्तर पर विचरती हुयी parables की प्रकृति लेकर भी यह घनघोर यथार्थवादी स्वभाव की फिल्म के रुप में सामने आती है।

ChachaChoudhary
01-06-2011, 10:12 AM
फिल्म की कहानी में शहर में रोजी-रोटी की आस में आने वाले एक देहाती की कथा है जो प्यासा है। उसे पानी पीना है। पहली ही नजर में उसे चोर समझ लिया जाता है फिर वह सदैव भागता और बचता ही रहता है। इस भागमभाग में वह कई घरों में हाँफता, सहमा छुपता पनाह लेता है और हर घर में उसे एक कहानी मिलती है। एक कमरे में प्रेमी-प्रेमिका के एकान्त के बीच, एक कमरे मेें अपनी ही पत्नी के जेवर चुराने लगा एक पति और सूने रास्ते पर वेश्या का गाना सुनकर आता एक शराबी जो गा रहा है, जिन्दगी ख्वाब है, ख्वाब में झूठ क्या और भला सच है क्या। श्रेष्ठ कलाकार मोतीलाल पर यह गाना फिल्माया गया है।

ChachaChoudhary
01-06-2011, 10:13 AM
भ्रष्टाचार से ग्रसित भारत है एक बड़े शहर में बसी वह इमारत, जहाँ गावँ से आया भूखा प्यासा एक गरीब अनाम आदमी (राज कपूर) पुलिस के डर से घुस जाता है और इस ऊँची इमारत में रहने वाले लोगों के काले कारनामे अपनी आँखों से देख पाने का मौका अनायास ही पा जाता है।

यह सफेदपोशों के शान से रहने की इमारत है क्योंकि उन्होने पैसे देकर मकान खरीदे हैं इस इमारत में रहने के लिये। यहाँ अवैध शराब बनाने वाले रहते हैं, यहाँ नकली नोटों को छापने वाले सेठ (नीमो) रहते हैं, यहाँ काला बाजारिये भी रहते हैं और नकली दवाइयाँ बनाने वाले भी। अनाम घुसपैठिया न चाहते हुये भी इस इमारत में भिन्न भिन्न लोगों की कारगुजारियों का गवाह बनता है।

ChachaChoudhary
01-06-2011, 10:14 AM
वह देखता है एक युवती को उसके ही घर में उसके प्रेमी के साथ प्रेमालाप करते हुये जबकि युवती का पिता घर में ही दूसरे ही कमरे में मौजूद है। पिता अपनी पुत्री के प्रेमी को बिल्कुल भी पसंद नहीं करता है। फिल्म बड़ी दिलचस्प स्थितियाँ दिखाती है जब इमारत के लोग अंजान घुसपैठिये को ढ़ूँढ़ते हुये इस युवती के घर के बाहर जमा हो जाते हैं। युवती और उसका प्रेमी इस अंजान और तथाकथित चोर को लोगों के हवाले नहीं कर सकते क्योंकि ऐसा करने से उनका राज भी खुल जायेगा।

ऐसी ही परिस्थितियों से अनाम व्यक्त्ति रुबरु होता रहता है और लोगों की कमजोरियाँ ही उसका बचाव भीड़ से करती रहती हैं। अनाम व्यक्त्ति की लुकाछिपी वाली यात्रा के दौरान बड़े दिलचस्प चरित्र उससे टकराते रहते हैं।

ChachaChoudhary
01-06-2011, 10:15 AM
इन चरित्रों के द्वारा फिल्म लोगों की व्यवहारगत कमियों और बुराइयों पर कटाक्ष करती चलती है। जैसे कि एक महाश्य अपने पड़ोसी को चटखारे लेकर बताते हैं कि इमारत में रहने वाले फलाने व्यक्ति की पुत्री का इश्क इमारत में ही रहने वाले एक युवा से चल रहा है। कुछ समय बाद परिस्थितियाँ कुछ ऐसी बन जाती हैं कि उनका पड़ोसी समझता है कि इन महाश्य की पत्नी का भी कोई अन्य आशिक है।

लोगों की दूसरों के जीवन में बिना मतलब दखल देने जैसी सामान्य बुराई पर भी फिल्म खूब फोकस करती है।

ChachaChoudhary
01-06-2011, 10:16 AM
ऐसे युवा (इफ्तिखार) हैं जिन्हे भीड़ का नेता बनने का शौक है। गैर कानूनी काम करने वाले ध्रमात्मा और सफेदपोश बने रहते हैं क्योंकि उन्हे कानूनी व्यवस्था पकड़ नहीं पायी और सामाजिक व्यवस्था उन्हे उनके धन के कारण सम्मान देती आ रही है।

फिल्म की बहुत बड़ी खूबी है कि परदे पर किरदार के रुप में कलाकार आते रहते हैं और अपना एक अलग प्रभाव छोड़ते जाते हैं चाहे वे प्रदीप कुमार हों, इफ्तिखार हों, कृष्ण धवन हों, नाना पालसीकर हों, राशिद खान हों या नीमो हों, सबने बड़े प्रभावी ढ़ंग से अपनी भूमिकायें निभाई हैं।

ChachaChoudhary
01-06-2011, 10:17 AM
राज कपूर में भूमिका और कथानक की गहराई समझने की बुद्धिमत्ता कूट कूट कर भरी थी तभी उन्होने न सिर्फ इस अनूठी फिल्म में काम किया बल्कि इसे अपने बैनर आर के बैनर तले निर्मित भी किया और निर्देशन की भूमिका सौंपी इप्टा के शम्भू और अमित मित्रा को। कुछ देर बाद ही इसे याद रख पाना मुश्किल हो जाता है कि परदे पर राज कपूर कहीं मौजूद भी हैं। मुश्किल से दो संवाद पाने वाली यह भूमिका उनके अभिनय जीवन की अविस्मरणीय भूमिका है। और यह उनके अभिनय के लिहाज से अविस्मरणीय नहीं कही जायेगी पर उनके परदे पर उपस्थित रहने की वजह से। कुछ दृष्य़ों में लगेगा कि वे नाटकीय हो रहे हैं और ऐसा तो वे और फिल्मों में काम करते समय नहीं करते हैं पर जैसे जैसे फिल्म आगे बढ़ती है राज कपूर खो जाते हैं और मुसीबत का मारा वह अनाम गरीब चरित्र परदे पर रह जाता है जिसके सामने परेशानियाँ आती रहती हैं और जो अंजाने में ही उस इमारत में रह रहे लोगों और अपराधियों के भेद खोलता चला जाता है।

ChachaChoudhary
01-06-2011, 10:19 AM
लोगों से बचते बचाते, भागते दौड़ते राज कपूर थक जाते हैं, पहले वे नीमो के गुण्डों के हाथ पड़ जाने से डर के मारे वे सब काम करने को तैयार हो जाते हैं जो नीमो उन्हे कहते हैं। नीमो को अपनी खाल बचाने के लिये और दुनिया के सामने अपने को सफेद्पोश बनाये रखने के लिये एक मुर्गा चाहिये जो उन्हे इमारत में अनाम घुसपैठिये चोर के रुप में कुख्यात हो चुके राज कपूर में दिखायी दे जाता है। वे अपने सारे काले धंधों की कालिख इस व्यक्त्ति पर पोत कर खुद को पाक दामन सिद्ध कर सकते हैं। वे नकली नोट बनाने वाले फर्मे और बहुत सारे नकली नोट राज कपूर के शरीर के साथ बाँधकर उन्हे खिड़की से बाहर जाकर पाइप के सहारे नीचे जाने के लिये विवश कर देते हैं। भीड़ राज कपूर को देख लेती है और उन पर पत्थरों की बरसात हो जाती है। डर कर राज कपूर छत पर चढ़ जाते हैं जहाँ भीड़ उन्हे घेर लेती है, नीमो के आदेशानुसार उनके गुण्डे भी राज कपूर को मारने के लिये पहुँच जाते हैं क्योंकि राज कपूर का जिंदा रहना उन लोगों के जीवन के लिये खतरनाक साबित होगा।

ChachaChoudhary
01-06-2011, 10:21 AM
भीड़ से घिरे अकेले निहत्थे खड़े राज कपूर के चारों तरफ मौत खड़ी है। एक अनाम चोर और अपराधी के रुप में मरना इस देहाती को मंजूर नहीं है और उनमें कहीं से आकर साहस का संचार हो जाता है वे पास पड़ी लाठी उठा कर भीड़ को ललकारते हैं। राज कपूर का मोनोलॉग फिल्म की रीढ़ की हडडी है। वे बताते हैं भीड़ को कि पानी की तलाश में उन्हे इस इमारत में आना पड़ा और उन्होने यहाँ रहने वाले सफेदपोशों के काले कारनामे देखे। वे एक किसान के बेटे हैं जो काम की तलाश में शहर आये हैं न कि कोई चोर। उनके संवाद देश को रसातल में गिरने से बचाने के लिये एक चेतावनी हैं पर भीड़ ने किसकी सुनी है? वहाँ से भी उन्हे भागना पड़ता है।
रोचक बात यह है कि फिल्म की शुरुआत में ही प्यासे राज कपूर को एक पुलिस वाले की वजह से डरकर उस इमारत में दाखिल होना पड़ता है पर वहाँ लोग उन्हे चोर समझ बैठते हैं और भाग-दौड़ में वे मौका आने पर भी पानी नहीं पी पाते।

नरगिस को एक विशेष भूमिका में रखा गया है। वे अंत में राज कपूर को पानी पिलाती हैं।

एक रात में बीती घटनाओं पर आधारित फिल्म की कथा एक आधुनिक कहानी लगती है और राधू कर्माकर के कैमरे ने स्टाइलिश अंदाज में इमारत में चल रही उथल पुथल को पकड़ा है

fullmoon
01-06-2011, 12:01 PM
इस फिल्म की कहानी इतने रोचक और समीक्षात्मक अंदाज़ से प्रस्तुत करने के लिए आप बधाई के पात्र हैं.

सच में इस फिल्म को देखने की उत्सुकता बढ़ा दी आपने.

आपकी अगली फिल्म का इंतजार रहेगा.

Mr. laddi
02-06-2011, 03:18 AM
चाचा जी नमस्कार
रेप + लेना चाहेंगे कहीं डाक्टर ने मना तो नहीं किया है
बढिया पेशकश
मुझे अच्छी मूवी का कलेक्शन करना बहुत अच्छा लगता है इससे मुझे मदद मिलेगी
मेरे पास हिंदी पंजाबी और इंग्लिश डब या बिना का इतना कलेक्शन है की अगर रोज एक फिल्म देखू तो दो साल निकल जाये
धन्यवाद

ChachaChoudhary
02-06-2011, 10:16 AM
इस फिल्म की कहानी इतने रोचक और समीक्षात्मक अंदाज़ से प्रस्तुत करने के लिए आप बधाई के पात्र हैं.

सच में इस फिल्म को देखने की उत्सुकता बढ़ा दी आपने.

आपकी अगली फिल्म का इंतजार रहेगा.


चाचा जी नमस्कार
रेप + लेना चाहेंगे कहीं डाक्टर ने मना तो नहीं किया है
बढिया पेशकश
मुझे अच्छी मूवी का कलेक्शन करना बहुत अच्छा लगता है इससे मुझे मदद मिलेगी
मेरे पास हिंदी पंजाबी और इंग्लिश डब या बिना का इतना कलेक्शन है की अगर रोज एक फिल्म देखू तो दो साल निकल जाये
धन्यवाद
फुल्ल्मून जी ....... laddi जी ....... जब आप जैसे विद्वानों की प्रतिक्रिया मिलती है तो उत्साह और बढ़ जाता है ....... आप इसी प्रकार सूत्र पर आकर और अपनी विशिष्ट शैली में उत्साहवर्धन करते रहे

ChachaChoudhary
02-06-2011, 10:35 AM
आज प्रस्तुत है
"नया दौर" की कथावस्तु
कुछ रोचक जानकारी के साथ

ChachaChoudhary
02-06-2011, 10:36 AM
औद्योगिक क्रांति के परिप्रेक्ष्य में वर्ष 1957 में बनी फ़िल्म ‘नया दौर’ में मशीन और मनुष्य के बीच की लड़ाई और फिर मनुष्य की जीत को दिखा गया है।
फ़िल्म में दिलीप कुमार एक ऐसे तांगे वाले की भूमिका में हैं जो एक संपन्न व्यापारी को चुनौती देता है। यह व्यापारी तांगों की जगह सड़कों पर बसों की स्वीकार्यता बढ़ाने के प्रयास में ग़रीब तांगे वालों के हितों की अनदेखी करता है।

ChachaChoudhary
02-06-2011, 10:37 AM
यह फ़िल्म 1957 में जब श्वेत-श्याम में प्रदर्शित हुई थी तो इसके गीत संगीत और कहानी में बुने गए आज़ादी के बाद मानव और मशीन के संघर्ष के बीच दोस्ती, प्रेम, त्याग और आज़ादी के बाद आम आदमी के होने की गाथा एक नई सिनेमा की भाषा की प्रतीक थी। लेकिन आज भी इसके मायने नहीं बदले हैं। हालाकि इसकी कहानी हमारे समाज और देश की मुख्यधारा के उसी सिनेमा की है जिसमें शंकर (दिलीप कुमार) और कृष्णा (अजीत) नाम के दोस्तों की कहानी है जो एक दूसरे पर जान देते हैं लेकिन उनके बीच जब एक लड़की रजनी (वैजयंती माला) आ जाती है तो न केवल उनकी दोस्ती के मायने बदल जाते हैं बल्कि गांव के जमींदार (नासिर हुसैन) के शहर से पढकर लौटे बेटे (जीवन) के गांव में आरा मशीन और लॉरी लाने के बाद तो वे एक दूसरे के दुश्मन भी हो जाते हैं।

ChachaChoudhary
02-06-2011, 10:38 AM
साहिर के लिखे और ओ.पी. नैयर के संगीत वाले नाया दौर फ़िल्म के गीत आज पचास साल बाद भी पुराने नहीं पड़े हैं और आज भी यह गाने सदाबहार है। हर एक गीत के बोल सुनने में जितने सरल है उनका अर्थ उतना ही गूढ़ है। हर गाना एक अलग ही अंदाज़ में गाया गया है। सुप्रसिद्ध दिवंगत संगीतकार ओ.पी. नैयर का संगीत इस फ़िल्म में चार चांद लगा देता है। कोई भी गाना जैसे साथी हाथ बढाना साथी हाथ बढ़ाना साथी रे, या फिर ये देश है वीर जवानों का। एक क्या इस फ़िल्म के तो सारे गाने ही बहुत अधिक लोकप्रिय हुए थे।

ChachaChoudhary
02-06-2011, 10:39 AM
उड़े जब-जब जुल्फें तेरी, या रेशमी सलवार कुर्ता जाली का। देश भक्ती, शरारत या छेड़-छाड़ या प्यार का इज़हार इन गानों में वो सभी कुछ है और सुनने में इतने मीठे की बस। और आज भी यह गीत गाए बजाए और गुनगुनाए जा रहे हैं

ChachaChoudhary
02-06-2011, 10:39 AM
माँग के साथ तुम्हारा मैंने माँग लिया संसार तांगे पर फ़िल्माए गए गानों का सरताज और सबसे लोकप्रिय गीत है। दिलीप कुमार और वैजयंती माला तांगे पर जा रहे हैं। इस गाने में साहिर लुधियानवी के बोल और ओ.पी. नैयर का संगीत है।

ChachaChoudhary
02-06-2011, 10:42 AM
फिल्म निर्माण की मुश्किलें

निर्देशक सईद मिर्जा और अज़ीज़ मिर्जा के वालिद अख्तर मिर्जा की लिखी इस बेहद "हट के" कहानी को महबूब खान, एस मुख़र्जी और एस एस वासन जैसे निर्देशकों ने सिरे से नकार दिया. कहा गया कि यह एक बढ़िया डोक्यूमेंट्री फ़िल्म तो बन सकती है पर एक फीचर फ़िल्म...कभी नही. बी आर ने इसी कहानी पर काम करने का फैसला किया. पर जब उन्होंने दिलीप कुमार के साथ इस फ़िल्म की चर्चा की तो उन्होंने कहानी सुनने से ही इनकार कर दिया.

ChachaChoudhary
02-06-2011, 10:43 AM
बी आर अगली पसंद, अशोक कुमार के पास पहुंचे. अशोक कुमार का मानना था कि उनका लुक शहरी है और वो इस गाँव के किरदार के लिए वो नही जमेंगें, पर उन्होंने बी आर की तरफ़ से दिलीप कुमार से एक बार फ़िर बात की. इस बार दिलीप साहब राजी हो गए. आधुनिकता की दौड़ में पिसने वाले एक आम ग्रामीण की कहानी को फ़िल्म के परदे पर लेकर आना आसान नही था.

ChachaChoudhary
02-06-2011, 10:43 AM
कुछ हफ्तों तक कारदार स्टूडियो में शूट करने के बाद लगभग १०० लोगों की टीम को कूच करना था आउट डोर लोकेशन के लिए जो की भोपाल के आस पास था. उन दिनों मधुबाला और दिलीप साहब के प्रेम के चर्चे इंडस्ट्री में मशहूर थे. तो फ़िल्म की नायिका मधुबाला के पिता ने मधुबाला को शूट पर भेजने से इनकार कर दिया, यूँ भी उन दिनों आउट डोर शूट जैसी बातों का चलन नही था. बी आर ने कोर्ट में मुकदमा लड़ा, अपील में तर्क दिया कि फ़िल्म की कहानी के लिए यह आउट डोर बहुत ज़रूरी है.

ChachaChoudhary
02-06-2011, 10:45 AM
दिलीप ने बी आर के पक्ष में गवाही दी जहाँ उन्होंने मधुबाला से अपने प्यार की बात भी कबूली. मुकदमा तो जीत लिया पर मधुबाला को कानूनी दांव पेचों से बचने के खातिर केस को वापस लेना पड़ा, और इस तरह फ़िल्म में मधुबाला के स्थान पर वैजंतीमाला का आगमन हुआ. महबूब खान की "मदर इंडिया" के लिए लिबर्टी सिनेमा १० हफ्तों के लिए बुक था. पर फ़िल्म तैयार न हो पाने के कारण उन्होंने बी आर की "नया दौर" को अपने बुक किए हुए १० हफ्ते दे दिए, साथ में हिदायत भी दी कि चाहो तो ५ हफ्तों के लिए ले लो, तुम्हारी इस "ताँगे वाले की कहानी" को पता नही दर्शक मिले या न मिले. और यही महबूब खान थे जिन्होनें, जब फ़िल्म "नया दौर" ने अपनी सिल्वर जुबली मनाई तो बी आर को उनकी फ़िल्म के प्रीमियर के लिए मुख्य अतिथि होने का आग्रह किया.

ChachaChoudhary
02-06-2011, 10:46 AM
फ़िल्म के कलाकारों की अभिनय की बात करें तो कोई भी किसी से कम नही, वो चाहे दिलीप कुमार हो या वैजयंती माला या अजीत। दिलीप कुमार की तो यही ख़ास बात थी की वो भूमिका में बिल्कुल डूब जाते थे। वैजयंती माला की सुन्दरता और बड़ी-बड़ी आँखें मट्काना ही उनकी ख़ासियत नहीं थी बल्कि वो अभिनय भी बहुत अच्छा करती थी। और गाँव का माहौल बिल्कुल सादगी भरा है। जीवन अपनी कारस्तानियों से (मतलब ख़ून चूसने वाले जमींदार) बाज नहीं आते थे। जीवन जैसे लोग हर गाँव में हमेशा मौजूद रहते है पहले भी थे और आज भी है। और शायद हमारे गांवों की हालत आज भी वैसी ही है।

ChachaChoudhary
04-06-2011, 09:14 AM
क्या बात है मित्रो ?
कोई प्रतिक्रिया नहीं !
लगता है कुछ कमी रह रही है शायद
कुछ बताओ तो सही दोस्तों
अगर कुछ गलत है तो उसको आपके सहयोग से ही
सही किया जा सकता है

SUNIL1107
05-06-2011, 09:43 PM
एक श्रेष्ठ प्रयास की बधाई हो चाचाजी

Kamal Ji
05-06-2011, 10:20 PM
क्या बात है मित्रो ?
कोई प्रतिक्रिया नहीं !
लगता है कुछ कमी रह रही है शायद
कुछ बताओ तो सही दोस्तों
अगर कुछ गलत है तो उसको आपके सहयोग से ही
सही किया जा सकता है

बहुत ही सराहनीय कदम है
ऐसे सूत्रों को तो इस फोरम में विशेष स्थान मिलना चाहिए
अग्र आपके पास या किसी अन्य सदस्य के पास दो बीघा जमीन और जागते रहो का
पिकचर देखने के लिए कोई लिंक हो वह भी देने कि कृपा करें
धन्यवाद.
अनु .

ChachaChoudhary
09-06-2011, 11:34 AM
दोस्तों आज प्रस्तुत है मदर इण्डिया का कथानक

ChachaChoudhary
09-06-2011, 11:35 AM
वास्तविक जीवन में अपने परिवार के सम्पूर्ण कष्ट अपने प्राणों पर भी झेल कर अपना जीवन हँसते हँसते न्योछावर करने वाली नारी की गाथाएं बहुत सारी फिल्मों का प्रधान विषय रही हैं| महबूब खान की फिल्म "मदर इण्डिया" एक ऐसी ही महिला की कहानी है,जिसके संघर्ष तो इतने थे कि उनका अंत ही नहीं था ,परन्तु फिर भी वह अग्रसर थी अपने कर्तव्य पथ पर बिना अपने आदर्शों से कोई समझौता करे| कहा जाए तो स्वाधीनता के एक दशक बाद रिलीस हुई इस फिल्म में नरगिस दत्त का किरदार पूरे हिन्दुस्तान का प्रतीक था|

ChachaChoudhary
09-06-2011, 11:35 AM
फिल्म के प्रारम्भ में नायिका राधा (नर्गिस) एक नहर का उद्घाटन करती है,और इन सुखद क्षणों में वह पुरानी यादों में डूब जाती है, जब शामू(राजकुमार) के साथ नवविवाहिता के रूप में इस गाँव में आई थी| उनके विवाह के लिए राधा की सास को ज़मींदार सुखीलाल (कन्हैया लाल) से क़र्ज़ लेना पड़ा था| क़र्ज़ चुकाने के लिए शामू के परिवार का सब कुछ बिक जाता है| शामू अपने दोनों हाथ दुर्घटना में गँवा बैठता है और गाँव वालों के तानों से तंग आकर घर छोड़ देता है|

ChachaChoudhary
09-06-2011, 11:36 AM
राधा अब अपने दो छोटे छोटे पुत्रों बिरजू (सुनील दत्त) व रामू (राजिन्द्र कुमार) के साथ खेतों में मेहनत ,मजदूरी करती है| बिरजू व रामू का स्वभाव एक दूसरे के विपरीत है| एक तरफ जहाँ रामू शांत है वहीं बिरजू उत्तेजित स्वाभाव का है| बिरजू का एक ही मकसद है- अपने और अपनी मा पर हुए अत्याचारों का बदला सुखिलाल से लेना| सुखी लाल को जान से मार कर वह सुखिया की बेटी को उठाने जाता है जो विवाह के मंडप में बैठी है| वही राधा ऩे गाँव वालों के सामने प्रण किया था कि यदि बिरजू ऩे सुखिया की बेटी के साथ कुछ भी गलत किया तो वह स्वयं बिरजू को मार देगी|

ChachaChoudhary
09-06-2011, 11:37 AM
भारतीय सिनेमा में मील का पत्थर इस फिल्म पर जिस दृष्टि से भी विचार किया जाय,खरी उतरती है| कहानी में वास्तविकता नज़र आती है, सूदखोरों के चंगुल में फंस कर किसी भी विवश परिवार का इस स्तिथि में पहुंचना कुछ आश्चर्यजनक नहीं| एक के बाद एक नायिका के मन में उठ रहा तूफ़ान ,परिवार की बदहाली व बच्चों की भूख देखकर कशमकश में फंसी नायिका का अभिनय लाजवाब है|

ChachaChoudhary
09-06-2011, 11:37 AM
सभी प्रमुख पात्र अपने किरदार को जीवंत बनाते हैं| नायिका प्रधान इस फिल्म में जितना अवसर अन्य पात्रों को मिला है, उतनी ही खूबसूरती से अपना कार्य पूर्ण करने में सफल हुए हैं|फिल्म देखकर पता चलता है कि नर्गिस केवल तन से ही खूबसूरत नहीं अत्यधिक प्रतिभाशाली भी हैं| सुनील दत्त ऩे इस फिल्म से ही स्वयं को एक बहुत बड़ा कलाकार प्रमाणित किया| फिल्म का चरम दर्शनीय था और फिल्म की सफलता का मुख्य कारण रहा| एक हिन्दुस्तानी नारी के लिए अपनी लाज अपने बच्चों से ज़्यादा प्यारी है- इस तथ्य को महबूब ख़ान ने बहुत संजीदगी हे दर्शकों के सामने पेश किया है|

ChachaChoudhary
09-06-2011, 11:39 AM
फिल्म का एक महत्वपूर्ण सजीव पक्ष है फिल्म का संगीत| फिल्म में संगीत नौशाद का है और गीत शकील बदायुनी के| फिल्म में गीत बहुत सारे हैं जिनमें प्रमुख हैं:
'"नगरी नगरी द्वारे " लता मंगेशकर

"दुनिया में हम आये हैं" लता मंगेशकर,मीना मंगेशकर,उषा मंगेशकर

"ओ गाडी वाले" मोहम्मद रफ़ी,शमशाद बेगम

"दुःख भरे दिन बीते रे" शमशाद बेगम,मोहम्मद रफ़ी,मन्नाडे,आशा भोंसले

"होली आई रे कन्हाई" शमशाद बेगम

"पी के घर आज प्यारी" शमशाद बेगम

"ओ मेरे लाल आजा" लता मंगेशकर

"ओ जाने वालों जाओ न" लता मंगेशकर

"न मै भगवान् हूँ" मन्ना डे

"घूंघट नहीं खोलूँगी सैयां" लता मंगेशकर

ChachaChoudhary
09-06-2011, 11:40 AM
सुनील दत्त का रोल प्रारम्भ में किसी विदेशी कलाकार द्वारा सम्पन्न होना था परन्तु बाद में सुनील दत्त को लिया गया|

ChachaChoudhary
09-06-2011, 11:41 AM
भारतीय सिनेमा में यह प्रथम फिल्म थी जो विदेशों में पसंद की गयी तथा विदेशी भाषा फिल्म केटेगरी में पुरस्कार के लिए` नामित हुई|

ChachaChoudhary
09-06-2011, 11:41 AM
फिल्म महबूब ख़ान की ही फिल्म औरत(1940) पर आधारित थी|

ChachaChoudhary
09-06-2011, 11:42 AM
फिल्म की थीम “मा”ने बॉलीवुड में और फ़िल्मो को प्रेरित किया जिसमे प्रमुख थी “दीवार”जो अमिताभ बच्चन के फिल्मी पेशे मे मील का पत्थर साबित हुई|

SHASWAT_BHARDWAJ
09-06-2011, 08:15 PM
बहुत बेहतर ढंग से प्रस्तुत किया है मित्र आपने .
रेपो स्वीकार करें

jjojjy18
09-06-2011, 08:26 PM
चाचा चौधरी कि जय हो !

Sameerchand
09-06-2011, 10:48 PM
चाचा जी, आपके लिखने और प्रश्तुत करने का ढंग लाजवाब है.....कहने के अंदाज में जान दाल देते है....ऐसा महसूस होता है की सामने फिल्म चल रही हो.

इस बेहतरीन सूत्र के लिए बधाई और रेप++.

sangita_sharma
11-06-2011, 05:04 PM
श्रेष्ट सूत्र रेपो स्वकार करे में पुरानी मूवी नहीं देखती लेकिन ये पांचो देख डाली ३ दिनों में वाकई शानदार हे

ChachaChoudhary
14-06-2011, 09:54 AM
बहुत बेहतर ढंग से प्रस्तुत किया है मित्र आपने .
रेपो स्वीकार करें



चाचा चौधरी कि जय हो !



चाचा जी, आपके लिखने और प्रश्तुत करने का ढंग लाजवाब है.....कहने के अंदाज में जान दाल देते है....ऐसा महसूस होता है की सामने फिल्म चल रही हो.

इस बेहतरीन सूत्र के लिए बधाई और रेप++.



श्रेष्ट सूत्र रेपो स्वकार करे में पुरानी मूवी नहीं देखती लेकिन ये पांचो देख डाली ३ दिनों में वाकई शानदार हे

आप सबका धन्यवाद
आप के उत्साहवर्धन के लिए
सूत्र तो वैसे इन ५ फिल्मो के लिए ही बनाया था
लेकिन अब आगे और भी
भारतीय सिनेमा की क्लासिक फिल्मो से
रूबरू होंगे इस सूत्र में .................

ChachaChoudhary
14-06-2011, 10:06 AM
रज्जी जी स्वागत है सूत्र में
आपके कमेंट्स के लिए शुक्रिया

ChachaChoudhary
14-06-2011, 10:08 AM
आज प्रस्तुत है दोस्तों
एक ऐसी फिल्म का कथानक
जो मेरी दिल के एकदम करीब है
और इस फिल्म के गाने .......
आज भी उतने ही लोकप्रिय है
जितने उस दौर में थे

amol05
14-06-2011, 10:47 AM
चाचू सूत्र बदिया तो नहीं कह सकता................................ लेकिन बहुत बदिया जरूर कह सकता हू, लगे रहो तुम्हारी उधर रही अभी डी नहीं जा रही

ChachaChoudhary
14-06-2011, 11:56 AM
]'आपके पावं देखे .. बहुत हसीन है, इन्हे ज़मीन पे मत उतारीएगा मैले हो जायेंगे'

ये संवाद आज भी किसी
हसीना के दिल को
छु जाते है [/COLOR]

ChachaChoudhary
14-06-2011, 11:58 AM
जी हाँ अपने बिलकुल
ठीक समझा
आज जिस फिल्म की बात होगी
वो है "पाकीजा"

ChachaChoudhary
14-06-2011, 11:58 AM
ऐसे और नज़ाने कितने इस जैसे संवादों से बनी है यह फिल्म, पाकीज़ा| फिल्म जिससे बनने में 14 साल लगे, भारत में रंगीन फिल्में बनाने की नयी तकनीक आ गयी, जिसके बनने के दौरान कलाकारों के किरदार बदले गये, जिसके दौरान संगीत निर्देशक का निधन हो गया और फिल्म के रिलीस के 3 हफ्ते बाद फिल्म की मुख्य अभिनेत्री का भी निधन हो गया जो फिल्म को अमर कर गया|

ChachaChoudhary
14-06-2011, 11:59 AM
पाकीज़ा की कहानी एक पाक दिल तवायफ़ साहिबजान (मीना कुमारी) की है, जो नरगिस (मीना कुमारी) और शहाबुद्दीन (अशोक कुमार) की बेटी है| जब शहाबुद्दीन का परिवार एक तवायफ़ (नरगिस) को अपनाने से इनकार कर देता है तो नरगिस एक कब्रिस्तान में आकर रहने लगती है और वहीं अपनी बेटी साहिबजान को जन्म देके गुज़र जाती है| साहिबजान अपनी खाला, नवाब जान के साथ दिल्ली के कोठे पे पालती है और मशहूर तवायफ़ बनती है|

ChachaChoudhary
14-06-2011, 12:00 PM
]17 साल बाद शहाबुद्दीन को जब इस बात की खबर मिलती है तो वो अपनी बेटी को लेने उसके कोठे पहुँचता है लेकिन उसे वहाँ कुछ नसीब नही होता| एक सफ़र के दौरान साहिबजान की मुलाक़ात सलीम (राज कुमार) से होती है और सलीम का एक खत साहिबजान के ख्यालों को पर दे जाता है| सलीम उसे अपने साथ निकाह करने के लिए कहता है और साहिबजान को मौलवी साहब के पास ले जाता है| नाम पूछे जाने पर सलीम, साहिबजान का नाम पाकीज़ा बतलाता है जो साहिबजान को अपना अतीत याद करके पे मजबूर कर देता है और वो उसे छोड़ कर वापिस कोठे पे आजाती है|

ChachaChoudhary
14-06-2011, 12:01 PM
एक दिन साहिबजान के पास सलीम की शादी पे मुज़रा करने का न्योता आता है और वो उसे काबुल कर लेती है| लेकिन वो इस बात से अंजान होती है की यह वही हवेली है जिसके दरवाजे से कभी उसकी मा नरगिस को दुतकार कर निकाला गया था| सलीम, शहाबुद्दीन का भतीजा है और साहिबजान को आज उसके प्यार और परिवार के सामने नाचना है| 'तीरे नज़र देखेंगे, ज़ख़्म-ए-जिगर देखेंगे'

ChachaChoudhary
14-06-2011, 12:01 PM
अमरोही एक दिल को छु जाने वाली कहानी कहते है जो इंसान की सबसे पुरानी हसरत की बात करती है - प्यार| मीना कुमारी ने जाते जाते एक ऐसे किरदार को अंजाम दिया जिसने उन्हे अमर कर दिया| पाकीज़ा जैसी फिल्म के कलाकारों की क्या बात की जाए, अशोक कुमार, मीना कुमारी, राज कुमार और वीना सपरू, सभी ने किरदारों को ऐसा जीया है की क्या कहानी और क्या सच्चाई यह बतलाना नामुमकिन है| फिल्म का एक-एक दृश्य इतनी बारीकी से फिल्माया गया है की वह आपको एक अलग दुनिया में ले जाता है| फिल्म का सबसे मजबूत पहलू उसके संवाद और उसके गाने है| फिल्म के संवाद कमाल अमरोही ने लिखे जो शायरी से कम नही है, जिसका एक-एक लफ्ज़ मुस्लिम समाज की बारीक़ियाँ दिखता है|

ChachaChoudhary
14-06-2011, 12:02 PM
फिल्म के गानों में प्रमुख है 'ठाड़े रहियो', 'चलते चलते' और 'इन्ही लोगों ने' जिसे कैफ़ी आज़मी और मजरूह सुल्तानपुरी की कलम ने लिखा और लता मंगेशकर की आवाज़ ने सजाया है| फिल्म के बाकी गाने भी अपनी शायरी और संगीत से आपको बाँध लेते है|

ChachaChoudhary
14-06-2011, 12:03 PM
फिल्म को कमाल अमरोही ने 1956 में अपनी पत्नी मीना कुमारी के साथ बनाना शुरू किया और फिल्म के नायक का किरदार अशोक कुमार को दिया| लेकिन 14 साल में काफ़ी कुछ बदल गया और अशोक कुमार की जगह वो किरदार राज कुमार को दिया गया|

ChachaChoudhary
14-06-2011, 12:04 PM
फिल्म के बनने के दौरान ही मीना कुमार और कमाल अमरोही का तलाक़ हो गया और फिल्म के संगीत निर्देशक गुलाम मोहम्मद का निधन, जिस वजह से फिल्म डब्बा बंद हो गयी| लेकिन जब सुनील दत्त और नरगिस ने फिल्म के कुछ भाग देखे तो उन्होने मीना कुमारी को फिल्म पूरी करने के लिए मनाया और संगीत के लिए नौशाद साहब को लाया गया|

ChachaChoudhary
14-06-2011, 12:04 PM
कहते है की मीना कुमारी उस वक़्त काफ़ी शराब पीने की वजह से बीमार रहती थी, और इसलिए तब के सारे दृश्यों में उन्हे बैठे हुए दिखाया गया है| फिल्म का आखरी गाना 'तीरे नज़र देखेंगे', पद्मा खन्ना पे फिल्माया गया है और मीना कुमारी के दृश्यों को काफ़ी नज़दीक से लिया गया है|

ChachaChoudhary
14-06-2011, 12:06 PM
और अंत में इस फिल्म को
अगर एक लाइन में बयां करना हो तो
पाकीज़ा एक प्यार से लिखी हुई वो गज़ल जैसी है, जिसे मीना कुमारी की पलकों पे लिखा गया है और उनकी घूँघरू की आवाज़ पे गाया गया है|

BHARAT KUMAR
15-06-2011, 04:32 AM
जानी, आपका सूत्र देखा, बेहद लाजवाब है! इसे रुकने मत दीजियेगा; दिल टूट जायेगा!
]'आपके पावं देखे .. बहुत हसीन है, इन्हे ज़मीन पे मत उतारीएगा मैले हो जायेंगे'

ये संवाद आज भी किसी
हसीना के दिल को
छु जाते है [/COLOR]

ChachaChoudhary
17-06-2011, 05:05 PM
जानी, आपका सूत्र देखा, बेहद लाजवाब है! इसे रुकने मत दीजियेगा; दिल टूट जायेगा!

भारत जी आपका बहुत धन्यवाद सूत्र
पर आने और विचार रखें के लिए

मित्रो आप सब को ये सूत्र कैसा लग रहा है
प्रतिक्रिया जरुर देवें

Kamal Ji
17-06-2011, 05:33 PM
और अंत में इस फिल्म को
अगर एक लाइन में बयां करना हो तो
पाकीज़ा एक प्यार से लिखी हुई वो गज़ल जैसी है, जिसे मीना कुमारी की पलकों पे लिखा गया है और उनकी घूँघरू की आवाज़ पे गाया गया है|



क्या बात की है चचा जानी.......................
और आपका अंदाज़े बयाँ सुब्हान अल्लाह .....................

simply_deep
08-03-2012, 01:36 PM
महान फिल्मो का महान चित्रण...

Bagula Bhagat2
12-04-2018, 12:02 AM
हर शब्द पढ़ा है आपके सूत्र का


बहुत ही अच्छा सूत्र और उत्कृष्ट एवं रुचिकर शैली


अपडेट्स की प्रतीक्षा रहेगी