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Thread: शहीद दिवस: 23 मार्च

  1. #1
    कांस्य सदस्य satya_anveshi's Avatar
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    शहीद दिवस: 23 मार्च

    23 मार्च ग्रेगोरी कै***र के अनुसार वर्ष का 82 वाँ (लीप वर्ष मे 83 वाँ) दिन है। साल मे अभी और 283 दिन बाकी है।


    क्या यही सब बताने के लिए मैंने यह सूत्र बना डाला? जी नहीं, आज कुछ खास है; शहीद दिवस। शहीद दिवस प्रतिवर्ष 30 जनवरी और 23 मार्च को मनाया जाता है। 30 जनवरी के दिन बापू को हमसे दूर कर दिया गया था तो आज के दिन भारत माँ के तीन वीर सपूतों, सरदार भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को फाँसी दे दी गई थी।
    वैसे तो साल के सभी 365 दिन देश के वीर बेटों को नमन करना चाहिए लेकिन कुछ दिन ऐसे होते हैं जब मन में देशभक्ति की भावना हिलोरे ले रही होती है और आज का दिन भी इन्हीं में से एक है।
    आइए नमन करें देश के महान सपूतोँ को जिन्होंने हमारे खातिर अपने प्राण न्यौछावर कर दिए।
    - Sherly

  2. #2
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    Re: शहीद दिवस: 23 मार्च

    सबसे पहले इन तीनों क्रांतिकारियों के जीवन चित्र पर एक दृष्टि डालते हैं। यह सब काम हो जाने के बाद अंत में हम सदस्य मिलकर चर्चा करेंगे आज देश को किस तरह के भगत सिंह की जरूरत है?
    क्या आज कोई है जो भगत सिंह बन सकता है?
    क्या हमने कुर्बानियों को भुला दिया है?
    अब कैसे आएगा भगत सिंह दोबारा?
    ये सब चर्चा होगी लेकिन पहले सूत्र में इन तीन महान क्रांतिकारियों के बारे में मुझे कुछ कह लेने दीजिए। आप भी जानकारी बाँट सकते हैं और अपने विचार रख सकते हैं पर कृपया यह ध्यान रखिएगा कि सूत्र विवादित न हो जाए।
    - Sherly

  3. #3
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    Re: शहीद दिवस: 23 मार्च

    सबसे पहले भगत सिंह जी के बारे में-
    यह सरदार भगत सिंह का अंतिम फोटो है जो उन्होंने असेंबली में बम फेंकने से कुछ दिन पहले दिल्ली के कश्मीरी गेट स्थित एक स्टूडियो से खिंचवाया था। मुफ्त ज्ञानकोष विकिपीडिया कहता है कि भगतसिंह का यह प्रसिद्ध हुलिया उनके २१वें वर्ष की वास्तविक तस्वीर से कहीं अलग था। फेल्ट हैट व क्लीन शेव वाला रूप उन्होंने गिरफ्तारी से बचने के लिये अपनाया था।


    वैसे तो आप सभी जानते ही होंगे भगत सिंह जी के बारे में लेकिन फिर भी एक बार जानकारी देना मेरा फर्ज बनता है।


    पूरा नाम
    शहीद-ए-आज़म अमर शहीद सरदार भगतसिंह
    अन्य नाम
    भागां वाला
    जन्म
    27 सितंबर , 1907
    जन्म भूमि
    लायलपुर , पंजाब
    मृत्यु
    23 मार्च , 1931 ई.
    मृत्यु स्थान
    लाहौर, पंजाब
    मृत्यु कारण
    शहीद
    अविभावक
    सरदार किशन सिंह
    आंदोलन
    भारतीय स्वतंत्रता संग्राम
    जेल यात्रा
    असेम्बली बमकाण्ड ( 8 अप्रैल , 1929 )
    विद्यालय
    डी.ए.वी. स्कूल
    शिक्षा
    बारहवीं
    प्रमुख संगठन
    नौज़वान भारत सभा, कीर्ति किसान पार्टी एवं हिन्दुस्तान समाजवादी गणतंत्र संघ
    रचनाएँ
    आत्मकथा दि डोर टू डेथ (मौत के दरवाजे पर), आइडियल ऑफ़ सोशलिज्म (समाजवाद का आदर्श), स्वाधीनता की लड़ाई में पंजाब का पहला उभार
    - Sherly

  4. #4
    कांस्य सदस्य satya_anveshi's Avatar
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    Re: शहीद दिवस: 23 मार्च

    अब भगत सिंह के जीवन को थोड़ा करीब से देखते हैं विकिपीडिया की नजर से-


    जन्म और परिवेश:

    भगत सिंह का जन्म 27 सितंबर, 1907, शनिवार सुबह 9 बजे लायलपुर ज़िले के बंगा गाँव (चक नम्बर 105 जो अब पाकिस्तान में है) में हुआ था। हालांकि उनके बाप-दादों का पैतृक निवास आज भी भारतीय पंजाब के नवाँशहर ज़िले के खटकड़कलाँ गाँव में स्थित है। उनके पिता का नाम सरदार किशन सिंह और माता का नाम विद्यावती कौर था। यह एक सिख परिवार था जिसने आर्य समाज के विचार को अपना लिया था। अमृतसर में 13 अप्रैल, 1919 को हुए जलियाँवाला बाग हत्याकाण्ड ने भगत सिंह की सोच पर गहरा प्रभाव डाला था। लाहौर के नेशनल कॉलेज़ की पढ़ाई छोड़कर भगत सिंह ने भारत की आज़ादी के लिये नौजवान भारत सभा की स्थापना की थी। काकोरी काण्ड मेँ 4 क्रान्तिकारियों को फाँसी व 16 अन्य को कारावास की सजाओं से भगत सिंह इतने अधिक उद्विग्न हुए कि पण्डित चन्द्रशेखर आजाद के साथ उनकी पार्टी हिन्दुस्तान रिपब्लिकन ऐसोसिएशन से जुड़ गये और उसे एक नया नाम दिया हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन। इस संगठन का उद्देश्य सेवा,त्याग और पीड़ा झेल सकने वाले नवयुवक तैयार करना था। भगत सिंह ने राजगुरु के साथ मिलकर 17 दिसम्बर 1928 को लाहौर में सहायक पुलिस अधीक्षक रहे अंग्रेज़ अधिकारी जे० पी० सांडर्स को मारा था। इस कार्रवाई में क्रान्तिकारी चन्द्रशेखर आज़ाद ने उनकी पूरी सहायता की थी। क्रान्तिकारी साथी बटुकेश्वर दत्त के साथ मिलकर भगत सिंह ने अलीपुर रोड दिल्ली स्थित ब्रिटिश भारत की तत्कालीन सेण्ट्रल एसेम्बली के सभागार में 8 अप्रैल 1929 को अंग्रेज़ सरकार को जगाने के लिये बम और पर्चे फेंके थे। बम फेंकने के बाद वहीं पर दोनों ने अपनी गिरफ्तारी भी दी।
    Last edited by satya_anveshi; 23-03-2012 at 11:50 AM.
    - Sherly

  5. #5
    कांस्य सदस्य satya_anveshi's Avatar
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    Re: शहीद दिवस: 23 मार्च

    क्रांतिकारी गतिविधियाँ:

    उस समय भगत सिंह करीब १२ वर्ष के थे जब जलियाँवाला बाग हत्याकाण्ड हुआ था। इसकी सूचना मिलते ही भगत सिंह अपने स्कूल से १२ मील पैदल चलकर जलियाँवाला बाग पहुँच गये। इस उम्र में भगत सिंह अपने चाचाओं की क्रान्तिकारी किताबें पढ़ कर सोचते थे कि इनका रास्तासही है कि नहीं ? गांधी जी का असहयोग आन्दोलन छिड़ने के बाद वे गान्धी जी के अहिंसात्मक तरीकों और क्रान्तिकारियों के हिंसक आन्दोलन में से अपने लिये रास्ता चुनने लगे। गान्धी जी के असहयोग आन्दोलन को रद्द कर देने के कारण देश के तमाम नवयुवकों की भाँति उनमें भी रोष हुआ और अन्ततःउन्होंने देश की स्वतन्त्रता के लिये क्रान्ति का मार्ग अपनाना अनुचित नहीं समझा। उन्होंने जुलूसों में भाग लेना प्रारम्भ किया तथा कई क्रान्तिकारी दलों के सदस्य बने। बाद में वे अपने दल के प्रमुख क्रान्तिकारियों के प्रतिनिधि भी बने। उनके दल के प्रमुख क्रान्तिकारियों में चन्द्रशेखर आजाद, भगवतीचरण व्होरा, सुखदेव , राजगुरु इत्यादि थे।
    Last edited by satya_anveshi; 23-03-2012 at 12:03 PM.
    - Sherly

  6. #6
    कांस्य सदस्य satya_anveshi's Avatar
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    Re: शहीद दिवस: 23 मार्च

    एसेम्बली में बम फेंकना:
    भगत सिंह यद्यपि रक्तपात के पक्षधर नहीं थे परन्तु वे कार्ल मार्क्स के सिद्धान्तों से पूरी तरह प्रभावित थे। यही नहीं, वे समाजवाद के पक्के पोषक भी थे। इसी कारण से उन्हें पूँजीपतियों की मजदूरों के प्रति शोषण की नीति पसन्द नहीं आती थी। उस समय चूँकि अँग्रेज ही सर्वेसर्वा थे तथा बहुत कम भारतीय उद्योगपति उन्नति कर पाये थे, अतः अँग्रेजों के मजदूरों के प्रति अत्याचारसे उनका विरोध स्वाभाविक था। मजदूर विरोधी ऐसी नीतियों को ब्रिटिश संसद में पारित न होने देना उनके दल का निर्णय था। सभी चाहते थे कि अँग्रेजों को पता चलना चाहिये कि हिन्दुस्तानी जाग चुके हैंऔर उनके हृदय में ऐसी नीतियों के प्रति आक्रोश है। ऐसा करने के लिये ही उन्होंने दिल्ली की केन्द्रीय एसेम्बली में बम फेंकने की योजना बनायी थी।
    भगत सिंह चाहते थे कि इसमें कोई खून खराबा न हो और अँग्रेजों तक उनकी 'आवाज़' भी पहुँचे। हालाँकि प्रारम्भ में उनके दल के सब लोग ऐसा नहीं सोचते थे पर अन्त में सर्वसम्मति से भगत सिंह तथा बटुकेश्वर दत्त का नाम चुना गया। निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार 8 अप्रैल, 1929 को केन्द्रीय असेम्बली में इन दोनों ने एक ऐसे स्थान पर बम फेंका जहाँ कोई मौजूद न था, अन्यथा उसे चोट लग सकती थी। पूरा हाल धुएँ से भर गया। भगत सिंह चाहते तो भाग भी सकते थे पर उन्होंने पहले ही सोच रखा था कि उन्हें दण्ड स्वीकार है चाहें वह फाँसी ही क्यों न हो; अतः उन्होंने भागने से मना कर दिया। उस समय वे दोनों खाकी कमीज़ तथा निकर पहने हुए थे। बम फटने के बाद उन्होंने "इंकलाब! - जिन्दाबाद!! साम्राज्यवाद! - मुर्दाबाद!!" का नारा लगाया और अपने साथ लाये हुए पर्चे हवा में उछाल दिये। इसके कुछ ही देर बाद पुलिस आ गयी और दोनों को ग़िरफ़्तार कर लिया गया।
    Last edited by satya_anveshi; 23-03-2012 at 01:18 PM.
    - Sherly

  7. #7
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    Re: शहीद दिवस: 23 मार्च

    जेल के दिन और फाँसी:
    जेल में भगत सिंह ने करीब 2 साल रहे। इस दौरान वे लेख लिखकर अपने क्रान्तिकारी विचार व्यक्त करते रहे। जेल में रहते हुए उनका अध्ययन बराबर जारी रहा। उनके उस दौरान लिखे गये लेख व सगे सम्बन्धियों को लिखे गये पत्र आज भी उनके विचारों के दर्पण हैं। अपने लेखों में उन्होंने कई तरह से पूँजीपतियों को अपना शत्रु बताया है। उन्होंने लिखा कि मजदूरों का शोषण करने वाला चाहें एक भारतीय ही क्यों न हो, वह उनका शत्रु है। उन्होंने जेल में अंग्रेज़ी में एक लेख भी लिखा जिसका शीर्षक था 'मैं नास्तिक क्यों हूँ?' जेल में भगत सिंह व उनके साथियों ने 64 दिनों तक भूखहड़ताल की। उनके एक साथी यतीन्द्रनाथ दास ने तो भूख हड़ताल में अपने प्राण ही त्याग दिये थे।
    23 मार्च 1931 को शाम में करीब 7 बजकर 33 मिनट पर भगत सिंह तथा इनके दो साथियों सुखदेव व राजगुरु को फाँसी दे दी गई। फाँसी पर जाने से पहले वे राम प्रसाद 'बिस्मिल' की जीवनी पढ़ रहे थे जो सिन्ध (वर्तमान पाकिस्तान का एक सूबा) के एक प्रकाशक भजन लाल बुकसेलर ने आर्ट प्रेस, सिन्ध से छापी थी। कहा जाता है कि जेल के अधिकारियों ने जब उन्हें यह सूचना दी कि उनके फाँसी का वक्त आ गया है तो उन्होंने कहा था- "ठहरिये! पहले एक क्रान्तिकारी दूसरे से मिल तो ले।" फिर एक मिनट बाद किताब छत की ओर उछाल कर बोले - "ठीक है अब चलो ।"
    फाँसी पर जाते समय वे तीनों मस्ती से गा रहे थे -
    मेरा रँग दे बसन्ती चोला, मेरा रँग दे;
    मेरा रँग दे बसन्ती चोला। माय रँग दे बसन्ती चोला।।
    फाँसी के बाद कहीं कोई आन्दोलन न भड़क जाए इसके डर से अंग्रेजों ने पहले इनके मृत शरीर के टुकड़े किए तथा फिर इसे बोरियों में भर कर फिरोजपुर की ओर ले गये जहाँ घी के बदले मिट्टी का तेल डालकर ही इनको जलाया जाने लगा । गाँव के लोगों ने आग जलती देखी तो करीब आए । इससे डरकर अंग्रेजों ने इनकी लाश के अधजले टुकड़ों को सतलुज नदी में फेंका और भाग गये। जब गाँव वाले पास आये तब उन्होंने इनके मृत शरीर के टुकड़ो कों एकत्रित कर विधिवत दाह संस्कार किया । और भगत सिंह हमेशा के लिये अमर हो गये। इसके बाद लोग अंग्रेजों के साथ-साथ गान्धीजी को भी इनकी मौत का जिम्मेवार समझने लगे। इस कारण जब गान्धीजी कांग्रेस के लाहौर अधिवेशनमें हिस्सा लेने जा रहे थे तो लोगों ने काले झण्डों के साथ गान्धीजी का स्वागत किया। एकाध जग़ह पर गान्धीजी पर हमला भी हुआ।
    - Sherly

  8. #8
    कांस्य सदस्य satya_anveshi's Avatar
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    Re: शहीद दिवस: 23 मार्च

    व्यक्तित्व:


    सुखदेव, राजगुरु तथा भगत सिंह के फाँसी दिए जाने की ख़बर - लाहौर से प्रकाशित द ट्रिब्युन के मुख्य पृष्ठ पर।



    जेल के दिनों में उनके लिखे खतों व लेखों से उनके विचारों का अन्दाजा लगता है । उन्होंने भारतीय समाज में लिपि (पंजाबी की गुरुमुखी व शाहमुखी तथा हिन्दी और अरबी एवम् उर्दू के सन्दर्भ में विशेष रूप से), जाति और धर्म के कारण आयी दूरियों पर दुःख व्यक्त किया था। उन्होंने समाज के कमजोर वर्ग पर किसी भारतीय के प्रहार को भी उसी सख्ती से सोचा जितना कि किसी अंग्रेज के द्वारा किये गये अत्याचार को।
    भगत सिंह को हिन्दी, उर्दू, पंजाबी तथा अंग्रेजी के अलावा बांग्ला भी आती थी जो उन्होंने बटुकेश्वर दत्त से सीखी थी। उनका विश्वास था कि उनकी शहादत से भारतीय जनता और उद्विग्न हो जायेगी और ऐसा उनके जिन्दा रहने से शायद ही हो पाये। इसी कारण उन्होंने मौत की सजा सुनाने के बाद भी माफ़ीनामा लिखने से साफ मना कर दिया था। पं० राम प्रसाद 'बिस्मिल' ने अपनी आत्मकथा में जो-जो दिशा-निर्देश दिये थे, भगत सिंह ने उनका अक्षरश: पालन किया। उन्होंने अंग्रेज सरकार को एक पत्र भी लिखा, जिसमें कहा गया था कि उन्हें अंग्रेज़ी सरकार के ख़िलाफ़ भारतीयों के युद्ध का प्रतीक एक युद्धबन्दी समझा जाये तथा फाँसी देने के बजाय गोली से उड़ा दिया जाये। फाँसी के पहले 3 मार्च को अपने भाई कुलतार को भेजे एक पत्र में भगत सिंह ने लिखा था -
    उन्हें यह फ़िक्र है हरदम, नयी तर्ज़-ए-ज़फ़ा क्या है?
    हमें यह शौक है देखें, सितम की इन्तहा क्या है?
    दहर से क्यों ख़फ़ा रहें, चर्ख का क्या ग़िला करें।
    सारा जहाँ अदू सही, आओ! मुक़ाबला करें।।
    इन जोशीली पंक्तियों से उनके शौर्य का अनुमान लगाया जा सकता है। चन्द्रशेखर आजाद से पहली मुलाकात के समय जलती हुई मोमबती पर हाथ रखकर उन्होंने कसम खायी थी कि उनकी जिन्दगी देश पर ही कुर्बान होगी और उन्होंने अपनी वह कसम पूरी कर दिखायी।
    - Sherly

  9. #9
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    Re: शहीद दिवस: 23 मार्च

    जय हिन्द!
    जय भारत माता!
    बेन भाई! आपको शत-शत नमन आपने ये सूत्र बनाकर महान कार्य किया है।
    Last edited by Badtameez; 23-03-2012 at 03:05 PM. Reason: ....................

    मैंने जानबूझकर अपना पासवर्ड भूला दिया हैं।

  10. #10
    कर्मठ सदस्य kajal pandey's Avatar
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    Re: शहीद दिवस: 23 मार्च

    सूत्र की बधाई के साथ आपको ++++++++++


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