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Thread: छीन लूँगा तुझे...........

  1. #11
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    Re: Chheen lunga tujhe...

    Update 11 - Devnagiri

    डॉक्टर प्रकाश ने मुझे चुप रहने को कहा और हम सभी लोग चुप चाप आकर रवि के साथ खाना खाने बैठ गये. हरीराम ने बारी बारी से सबकी प्लेट में खाना परोसना शुरू किया और रवि से पूछा “ साहब जी, दही लेंगे क्या आप” . (जो लोग शराब नहीं पीते उन्हे मैं बता दूं की दही पीने से शराब का नशा कम हो जाता है और अगर बैचैनी हो रही तो बहुत आराम मिलता है ). रवि ने अपना सर हिलाकर मना कर दिया तो डॉक्टर प्रकाश फिर बोल पड़े “क्या हुआ रवि, मेरी किसी बात का बुरा मान गये क्या, अगर मेरी किसी बात से तुम्हे दुख पहुँचा है तो मेरा तुम्हे दुखी करना का कोई इरादा नहीं था, मैं तो बस तुम्हारे साथ शराब पीने का मज़ा ले रहा था और तुम्हे छेड़ रहा था, तुम कहो तो मैं सबके सामने तुमसे माफी माँग लेता हूँ”. मैने डॉक्टर प्रकाश की तरफ हैरान होते हुए देखा तो उन्होने मेरा हाथ दबा कर मुझे अंजान बने रहने का इशारा किया. “मेरी जुड़वा बहन, मेरी ज़िंदगी, मेरा सब कुछ, रश्मि, अकेला छोड़ कर चली गयी मुझे डॉक्टर सहाब”. पूरे घर में सन्नाटा छा गया जब रवि ने टेबल पर रखी एक चम्मच को घूमाते हुए डॉक्टर प्रकाश के सवाल का जवाब दिया जिसे सुनने के लिए उन्होने इतना बड़ा खेल रचा था . “ हर रात आँसू बहा कर ना काटनी पड़े इसी गम मे शराब पीकर चुप चाप सो जाता हूँ, खुद को मौत के हवाले नहीं कर सकता क्यूँ की जब तक ज़िंदा हूँ तब तक अपने दोस्त का साथ निभाने की कसम दी हुई है मैने अविनाश को. इसने अपनी ज़िंदगी में आई हर खुशी खो दी फिर भी लोगो की ज़िंदगी में खुशिया लाता है और खुद को इतना मज़बूत किए हुए है की लोगो को जीना सीखा देता है. मैं इसके जितना मज़बूत नहीं इसलिए इस शराब के सहारे ज़िंदा रहने की कोशिश कर रहा हूँ. अब तो मिल गया ना आपको अपने हर सवाल का जवाब” सब बिल्कुल चुप थे, कोई कुछ नहीं बोल रहा था. रवि उठा और खाना खाए बिना ही उपर की मंज़िल पर बने बेडरूम में सोने चला गया. डॉक्टर प्रकाश ने बस इतना कहा की “सवाल तो अभी और बाकी हैं रवि, पर सही वक़्त आने पर पूछूँगा”. मैने हरीराम को इशारा किया की रवि को बेडरूम तक छोड़ कर आए और उसका ख्याल रखे.


    बड़ी मुश्किल से रवि शांत हुआ था और डॉक्टर प्रकाश ने जाते जाते फिर उसे छेड़ दिया, पर अब मैने ये सोच लिया था की डॉक्टर प्रकाश जो कुछ भी कर रहे हैं, सोच समझकर कर रहे हैं. डॉक्टर प्रकाश ने एक प्लेट में खाना लगाया और प्लेट लेकर रवि के कमरे की तरफ चलने लगे, मैने उन्हे रोका और कहा “सर, आप क्यूँ उसके पीछे पड़े हैं, आप क्या सोचते हैं की आपके कहने से वो खाना खा लेगा. मैं उसे अच्छी तरह जानता हूँ और वैसे भी अब वो शराब के नशे में धुत्त है, थोड़ी देर सोने दो, मैं हरीराम से बोल दूँगा की रात में एक बार उससे खाना पूछ लेगा". डॉक्टर प्रकाश तो जैसे आज ही सब कुछ जान लेना चाहते थे, वो बोले “ चलो जैसा तुम चाहो, खाना खा लिया जाए अब”. मैने कहा “जी सर, बिल्कुल, लाइये मैं मदद कर देता हूँ आपकी, क्या लेंगे आप, चपाती या चावल,वैसे बेहतर यही होगा की आप हरीराम की बनाई हुई हर एक चीज़ थोड़ी थोड़ी चख लें, मैं दावा करता हूँ आप उंगलियाँ चाटते रह जाएँगे, ऐसा जादू है उसके हाथो में”. डॉक्टर प्रकाश को ना जाने क्या हुआ और ज़ोर से हंसते हुए बोले “बेटा अविनाश, एक बात बताओ, ये दौलतगढ़ की हर चीज़ ख़ास है क्या , चौबे का पान हो या हरीराम का खाना, साइकॉलजिस्ट अविनाश हो या मरीज दिवाकर, इंस्पेक्टर रवि हो या उसकी बहन रश्मि”. जब रवि ने रश्मि का नाम लिया तब उतना दिल नहीं दुखा,जितना डॉक्टर प्रकाश ने मज़ाक में उसका नाम लेते हुए कहा. मेरा दिल अंदर से रोने लगा और मैं वहाँ से उठते हुए बोला “सर, बुरा ना माने तो मैं थोड़ी देर अकेला बैठ सकता हूँ, आप खाना खाइए , मैं बाहर सड़क पर टहल लेता हूँ. आपको किसी भी चीज़ की ज़रूरत पड़े तो हरीराम को आवाज़ दे देना". उन्होने कहा “कोई बात नहीं बेटा, तुम चलो मैं खाना खा कर तुम्हे बाहर मिलता हूँ".

    डॉक्टर प्रकाश तो मेरे मन की बैचैनी समझ गये लेकिन मैं ये नहीं समझ पाया की रश्मि का नाम लेना उनका मज़ाक नहीं बल्कि मुझे रश्मि की यादो में उलझा कर रश्मि के बारे में सब कुछ जान लेने की ये उनकी एक और तरकीब का हिस्सा था. यही सोचते हुए मैं अपने घर से बाहर निकल आया और सड़क पे टहलना शुरू कर दिया, रश्मि की यादो मे मैं इतना खो गया की सड़क से गुजर रहे लोगो के बीच मुझे रश्मि ही दिखाई देने लगी. कोई लड़की अपने प्रेमी लड़के के हाथो में हाथ डाले गुजरती तो ऐसा लगता जैसे मैं और रश्मि ही उस सड़क से जा रहे हों. किसी लड़की को अपने प्रेमी से झगड़ते देखता तो ऐसा लगता मानो रश्मि मुझसे झगड़ा कर रही हो, किसी लड़के को अपनी प्रेमिका के साथ हँसी मज़ाक करते देखता तो मानो मैं खुद रश्मि के साथ अठखेलिया कर रहा हूँ. पर एक ही पल में वो सब एक सपने की तरह मेरी आँखो से दूर हो जाता था. इन्ही सब सपनो में लगभग 20-25 मिनट गुजर गयी और तभी डॉक्टर प्रकाश भी खाना खा कर बाहर मेरे पास आए और बोले “अब मन कैसा है, अंदर चलें, कुछ देर बातें करते हैं फिर मैं भी सोने चला जाऊँगा , आज वैसे भी एक पल का भी आराम नहीं मिला”. मैने कहा “चलिए सर, वैसे भी मैं तो ये सोच कर बाहर आया था की इधर उधर ध्यान लगाऊँगा तो शायद, पुरानी यादो से ध्यान हट जाएगा, पर यहाँ आकर तो मैं उल्टा और ज़्यादा गहराइयों में खो गया. चलिए अंदर चलते हैं. वहीं आराम करेंगे.” डॉक्टर प्रकाश कहाँ आराम करने वाले थे, उन्हे तो बस मुझसे रश्मि के बारे में सब कुछ जान लेने की जल्दी थी.

    हम लोग ड्रॉयिंग रूम में आये और डॉक्टर प्रकाश ने आते ही फिर रवि के बारे में बात करना शुरू कर दिया “ तुम्हे क्या लगता है अविनाश, ये रवि सच में अपनी बहन के गम में इतनी शराब पीता है, मुझे तो ये पक्का शराबी लगता है जो अपनी बहन की मौत को अपनी शराब पीने की वजह बताकर लोगो का बेवकूफ़ बनाता है. हज़ारों लोग अपने भाई बहन को खो देते हैं, भाई बहन क्या पूरे परिवार को खो देते हैं, अपने प्यार को खो देते हैं, इसकी बहन क्या बाकी लोगो की बहन से ज़्यादा ख़ास थी जिसके जाने के गम ये बोतल भर भर कर शराब पी जाता है और बाकी लोग आज भी शराब को हाथ तक नहीं लगाते”. डॉक्टर प्रकाश का इशारा मेरी तरफ था और उनकी इतनी कटीली बातें मेरे दिमाग़ को छलनी करने के लिए काफ़ी थी, मुझसे रहा नहीं गया और मैं झिल्लाते हुए बोला “ जी सर, ख़ास थी रश्मि, सारी दुनिया से ख़ास, अपने भाई के बिना खाना नहीं खाती थी, अपने भाई से पूछे बिना घर से बाहर नहीं जाती थी, अपने भाई को कभी दुखी नहीं देख पाती थी, अपने भाई से पूछे बिना किसी से बात तक नहीं करती थी, अपने भाई की हर बात मानती थी और कभी कोई ऐसा काम नहीं किया जिससे उसके भाई को ज़रा भी शर्मिंदगी या दुख पहुँचा हो. जीतने लोग उस मोहल्ले में रहते थे हर किसी की ज़ुबान पर बस यही बात हुआ करती थी की बहन भाई हों तो ऐसे, ना तो अपनी बहन से इतना लाड़ करने वाला ऐसा भाई देखा, और ना ही अपने भाई की इतनी चिंता करने वाली ऐसी बहन देखी. ना तो अपने भाई से कभी झगड़ा किया और ना कभी किसी ज़रूरत को पूरा करने की ज़िद, और ना ही कभी उसके भाई ने अपनी बहन की खुशी में कोई कमी छोडी. पलको पर रखता था अपनी बहन को, मा बाप खोने के बाद ना तो उसकी पढ़ाई में कमी होने दी और ना ही कभी उसकी ज़रूरतो में कोई कटोती की. कुछ बातें जो एक लड़की सिर्फ़ किसी औरत या लड़की से कह सकती है या कोई ऐसी चीज़ की ज़रूरत हो जो वो अपने भाई से नहीं मंगा सकती उसका ख्याल रखते हुए उसने पड़ोस वाले घर की एक औरत को समझा रखा था की उसकी बहन को अगर किसी भी चीज़ की ज़रूरत हो तो बिना पूछे उसे लाकर दे दें और उसके पैसे वो शाम को आते ही दे दिया करता था. इतनी ख़ास थी रश्मि और इतना ही ख़ास है रवि”. मैने बिना रुके रश्मि और रवि के बारे में सब कुछ बता दिया पर डॉक्टर प्रकाश को तो जैसे कुछ फ़र्क ही नहीं पड़ा. उन्होने उंघते हुए कहा “ हर समझदार बहन और हर ज़िम्मेदार भाई ऐसे ही होते हैं” मुझे नहीं लगता इस सब में इतना कुछ ख़ास था की एक इंसान इतनी शराब पीने लगे. ज़रूर पहले से ही शराबी होगा”. डॉक्टर प्रकाश की बात सुनकर मुझे इतना गुस्सा आया पर चाह कर भी अपने गुरु को उस गुस्से का एहसास नहीं करा पाया.

  2. #12
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    Re: Chheen lunga tujhe...

    Update 12 - Devnagiri

    “नहीं सर, रवि पहले बिल्कुल शराब नहीं पीता था, मैं तो काफ़ी समय उसके साथ रहा हूँ, मुझे उसकी एक एक आदत का पता है, रश्मि की मौत के बाद से ही इसने शराब पीना शुरू किया है”. मैने बिकुल शांत रह कर डॉक्टर प्रकाश की बात का जवाब दिया. तभी डॉक्टर प्रकाश ने अपनी अगली तरकीब लगाई “क्या कहा, तुम उसके साथ रहे हो, इसका मतलब जब रवि तुम्हे अपने घर ले गया था तब तुमने वहाँ रहना शुरू कर दिया था”. मैने कहा “हाँ, रवि के घर का दरवाजा खुलने के बाद मैं रवि को मना नहीं कर पाया”. “अच्छा, ऐसा क्या ख़ास था वहाँ, कोई राजशाही हवेली थी या कोई शानदार बंगला” डॉक्टर प्रकाश ने फिर एक तीर छोड़ा जिसके लगते ही मेरे मुह से निकला “घर के अंदर से जो आवाज़ आई थी वो रश्मि की ही थी, जैसे ही रश्मि ने दरवाजा खोला, मैं उसे देखता ही रहा गया. गुलाबी रंग के कपड़ो में दूध जैसा रंग लिए एक लड़की मेरे सामने खड़ी थी. लंबे घने बाल जिनसे गिरती पानी की बूंदे और उन बूँदो पर पड़ती सूरज की रोशनी ऐसे चमक रही थी मानो मोती चमक रहे हों. कानो में लटकी छोटी छोटी झुमकीयाँ उसकी पतली सी गर्दन में लटके गुलाबी रंग के मोतियों के हार की खूबसूरती में चार चाँद लगा रहे थे. उन गहरी नीली आँखों में बसी बेशुमार हया और उसके गुलाब से कोमल होटो पे आई हल्की सी मुस्कान यही बता रही थी की क्या कोई इनसे भी ज़्यादा खूबसूरत हो सकता है. उसके मुस्कुराते चेहरे और फूल सी नाज़ुक उंगलियों के अलावा उसने अपने शरीर को इतनी खूबी से ढक रखा था की देखने वाला पल भर में समझ जाए की कितनी समझ और लिहाज है उस चाँद सी चमकती रूप की मूरत में. उसे देख कर ही पता चल रहा था की वो नहा रही थी इसीलिए दरवाजा खुलने में थोड़ा समय लगा. उसने दरवाजा खोलते ही कहा “ माफ़ करना भैया, थोड़ी देर लग गयी, और हाँ कहाँ है मेरी मिठाई, मुझे यकीन है मेरे भैया का सिलेक्सन हो गया”. उस मासूम से चेहरे पर जो मुस्कुराहट थी वो एक पल में चली गयी जब उसने रवि के चेहरे पर छाई खामोशी को पढ़ लिया. वो बोली “क्या हुआ भैया, आप इतने खामोश क्यूँ हैं, कुछ बोलते क्यूँ नहीं”. रवि ने अपनी आँखों से मेरी तरफ इशारा किया और बोला “आज से ये हमारे मेहमान हैं,अंदर चलो सब बताता हूँ”. जैसे ही रश्मि ने मुझे देखा वो नज़रे झुकाकर अंदर चली गयी. अपने भाई की आवाज़ सुनकर इतनी खुशी से उसने दरवाजा खोला था की उसने ये भी ध्यान नहीं दिया की उसके भाई के साथ कोई और भी बाहर खड़ा है. उसकी एक एक हया मुझे उसकी और खींचे जा रही थी. पर ये खिंचाव अभी प्यार नहीं था. वो तो बस उसकी खूबसूरती और मासूमियत ने मुझे उसकी और खींच लिया था.


    हम अंदर गये जहाँ एक बड़े से आँगन के बीचो बीच बहुत ही सुंदर 2 कुर्सियाँ रखी थी मानो किसी ने उन्हे बड़े मन से सजाया हो, रवि और मैं उन कुर्सियों पर बैठ गये, रश्मि अंदर से पानी लेकर आई और इस बार फिर उसकी समझदारी ने मुझे उसकी और देखने पर मजबूर कर दिया. हल्के गुलाबी रंग की चुन्नी से उसने अपने सर को ढक लिया था, जिसने उसकी खूबसूरती को और बढ़ा दिया. मैं चाह कर भी अपनी नज़रे उससे हटा नहीं पाया और तभी रवि ने कहा “ पानी लोगे दोस्त, यही है वो मासूम ज़िंदगी जिसे बचाने के लिए मैं तुमसे बार बार माफी माँग रहा था. ये मेरी एकलौती और प्यारी बहन रश्मि है , मा और पिताजी को खोने के बाद बस अब यही मेरी सब कुछ है”. रश्मि पानी रख कर वापिस अंदर चली गयी और जाते जाते रवि को अंदर आने का इशारा भी किया. रवि वहाँ से उठा और बोला “ मैं तुम्हारे लिए चाय बनवाता हूँ,तुम यहीं बैठो”. रवि अंदर गया और रश्मि ने बोलना शुरू किया “ कौन हैं ये, क्यूँ माफी माँग रहे थे इनसे, और मा पिताजी का इनसे क्या लेना देना, पहले तो कभी नहीं देखा इन्हे, फिर किसी से मेरी शादी की बात कर आए क्या आप,और आज तो आप बड़े शहर गये थे पुलिस में अपनी भर्ती का पता करने, फिर ये शादी की बात करने वालो को कैसे साथ ले आए, कहाँ है मेरी मिठाई, पहले बताओ आप पुलिस बन रहे हो या नहीं”. रश्मि ने एक साथ अनगिनत सवालो की मूसलाधार बारिश कर दी जिसे रोकने के लिए रवि ने उसके मुह पर हाथ रखा और बोला “चुप हो जा मेरी मा, उसने तेरी बात सुन ली तो उठ कर चला जाएगा, पुलिस में तो मेरी भर्ती हो गयी है,और मैं तेरे लिए मिठाई भी लेकर आ रहा था, पर रास्ते में मेरी कार से इसके मा बाबा का एक्सीडेंट हो गया और उनकी जान चली गयी”. रवि ने जैसे ही रश्मि के मूह से हाथ हटाया, रश्मि का मूह खुला का खुला रह गया. “हाआआअ.... ये क्या हो गया भैया, अब क्या होगा, अब तो आप मुशिबत में आ जाएँगे, आपका पुलिस बनने का सपना कभी पूरा नहीं होगा”. कहते कहते रश्मि की आँखो से आँसू बहने लगे,
    अपने भाई का पुलिस बनने का सपना टूटते हुए सोच कर ही वो रो पड़ी, मानो किसी ने उसके शीशे जैसे नाज़ुक दिल पर पत्थर मार दिया हो. तभी रवि ने उसे संभालते हुए कहा “ सब कुछ ठीक हो गया रश्मि, ये इंसान जो बाहर बैठा है ये इंसान नहीं देवता है. इसने हम दोनो की ज़िंदगी को बर्बाद होने से बचा लिया. इसने पुलिस से मेरी कोई शिकायत नहीं की और कुछ ले दे कर पुलिस ने वो केस ही ख़तम कर दिया”. रश्मि के मायूस चेहरे पर मानो खुशी की लहर दौड़ गयी. वो चाहती थी की अभी दौड़कर मेरा शुक्रिया अदा करे पर वो शर्म और हया की नायाब मूरत अपने भाई से पूछे बिना भला मेरे पास कैसे आती और बिना मुझे जाने किसी गैर इंसान से बात करने की हिम्मत भी कैसे करती, आख़िर यही तो उसकी ख़ासियत थी. पर कहते हैं ना की नेक दिल से कुछ करना चाहो तो देर सवेर हो ही जाता है. रवि ने जैसे ही उसे बताया की मा बाबा को खोने के बाद अब मैं उनके साथ ही रहने वाला हूँ, रश्मि ने मन ही मन सोच लिया की वो एक दिन ज़रूर मुझसे बात करेगी.


    रवि ने रश्मि से कहा की अब रोना बंद करो और जल्दी से 2 कप चाय बना कर ले आओ. रवि मेरे पास आकर बैठ गया और बोला “ देखो दोस्त, ये मेरा छोटा सा परिवार है और मैं चाहता हूँ की अब तुम भी इसे अपना ही परिवार समझो. ना तो मुझे ज़रा भी परेशानी है और ना ही मेरी बहन तुम्हारे यहाँ रहने का बुरा मानेगी”. मैं कुछ बोल पाता उससे पहले ही रश्मि चाय लेकर आ गयी. मैं चाह कर भी उससे नज़रे नहीं हटा पा रहा था, और यही सोच कर ही मैने जल्दी जल्दी अपनी चाय ख़तम की और रवि से कहा “देखो रवि, मैं अंदर से टूट चुका हूँ और मुझे ना जाने क्यूँ ऐसा लग रहा है की मेरा यहाँ रहना ठीक नहीं. मैं चाह कर भी यहाँ नहीं रह पाऊँगा तुम बस मुझे मेरे घर छोड़ दो और मेरे गम की उदासी से अपने हंसते खेलते छोटे से परिवार में खामोसी ना लाओ, मेरा क्या है , कुछ दिन मा बाबा की यादों के साथ काट लूँगा और धीरे धीरे फिर अपनी ज़िंदगी को आगे बढ़ाने की कोशिश करूँगा. तुम मुझे जाने दो
    और मैं वहाँ से खड़ा हो कर बाहर की और चलने लगा. तभी पीछे से एक बहुत धीमी सी आवाज़ आई.
    Last edited by axbafromxb; 30-06-2012 at 10:17 AM.

  3. #13
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    Update 13 - Devnagiri


    “लगता है इन्होने हमे माफ़ नहीं किया,भैया” वो रश्मि की आवाज़ थी, मैं एक पल रुका और फिर बाहर की तरफ जाने के लिए जैसे ही मैने कदम बढ़ाया तो ऐसा लगा मानो किसी ने मेरे पैर वहीं बाँध दिए हों. मैं चलने की कोशिश कर रहा था पर ना जाने क्यूँ मेरा दिल बार बार मुझसे कह रहा था की एक बार रश्मि की तरफ मुड़ कर देख लूँ, मैने धीरे से पीछे मुड़ कर देखा तो रश्मि सामने वाले कमरे की चौखट पर सर लगाए मेरी और देख रही थी, उस मासूम चेहरे पर उदासी के बादल देख कर मुझे ऐसा लगा जैसे वो अभी आँसू बनकर बरसने वाले हैं. उस खूबसूरत चेहरे पर आई मायूसी को देखकर पत्थर से पत्थर दिल भी पिघल जाता. तभी रवि बोल पड़ा “ दोस्त, मैने कहा था ना की तुम्हारे यहाँ रहने से ना मुझे कोई परेशानी है और ना ही मेरी बहन को, अब भी अगर तुम्हे लगता है की हम झूठा दिखावा कर रहे हैं तो तुम चाहो तो हमे छोड़ कर जा सकते हो, हम सोच लेंगे की हुमारी ज़िंदगी में हम दोनो के अलावा के कोई नहीं आएगा”. रवि की इतनी बातें मुझे वहाँ रुकने के लिए मज़बूर करने को काफ़ी थी. मैने कहा “ मेरा सामान, मा बाबा की तस्वीर और मेरी कुछ किताबें मुझे लानी हैं, तुम अगर मेरे साथ चलो तो जल्दी वापिस आ जाएँगे”. इतना कहने भर की देर थी और दोनो भाई बहन के चेहरे खुशी से खिल उठे. रवि ने रश्मि की और देखा और आँखो ही आँखो में दोनो ने एक दूसरे को अपनी खुशी का इज़हार किया. रवि उठा और बोला “ सामान भी आ जाएगा, पहले तुम अपना कमरा देख लो, अगर तुम्हे पसंद आ जाए तो सुबह शाम सफाई करने एक नौकरानी आती है, हम सामान ले आते हैं और रश्मि उसे बोलकर तुम्हारा कमरा साफ़ सुथरा करा देगी, अगर पसंद ना आए तो तुम मेरे कमरे में ही रह सकते हो”. रवि की बातो का मैने एक ही जवाब दिया “ जैसा भी है मुझे पसंद है, जब मुझे यहाँ रहना ही है तो पसंद नापसंद का कोई सवाल ही नहीं पैदा होता, कुछ कमी महसूस होगी तो मैं खुद ठीक कर लूँगा, परिवार का हिस्सा बनाया है तो परिवार की तरह ही रहना पड़ेगा, मेहमानो की तरह नहीं”. इतना सुनकर तो रवि और खुश हो गया और पीछे खड़ी रश्मि भी मुस्कुराने लगी.

    रवि ने कार की चाबी उठाई और बोला “ रश्मि, मैं अपने दोस्त के साथ यूँ गया और यूँ आया. नौकरानी आए तो वो उपर वाला कमरा साफ़ करा देना, बहुत दिनो से बंद पड़ा है, देख लेना अगर बिस्तर,चादर,पर्दे कुछ भी बदलना पड़े तो पापा वाले कमरे की अलमारी से निकल लेना और हाँ ध्यान से पापा का कमरा तुरंत बंद कर देना, ग़लती से भी खुला ना रहे”. रश्मि ने हाँ में सर हिलाया और रवि ने मुझे बाहर चलने का इशारा किया. मैं और रवि मेरे घर की तरफ निकल पड़े और थोड़ी दूर जाकर मैने रवि से पूछा “ इतना सब करने की क्या ज़रूरत है रवि, तुम लोग मुझे अपने साथ रखना चाहते हो वो ठीक है पर उस बेचारी को इतने काम करने के लिए क्यूँ बोल कर आए, मैं खुद वापिस पहुँचकर अपना कमरा साफ़ कर लेता और तुम्हारे साथ मिलकर उसमे सामान भी जमा देता”. रवि ने मेरी ओर देखा और कहा “ वो बेचारी नहीं है दोस्त, वो मुझसे ,तुमसे, हम दोनो से मज़बूत है, उसे घर सजाने का शौक है और उसे इन्ही कामो से खुशी मिलती है. मा पिताजी के जाने के बाद इन्ही सब कामो से अपना दिन काटा करती थी, वरना तुमने देख लिया और कौन है उसके साथ बातचीत करने वाला. मैं तो दिन भर बाहर ही रहता हूँ क्यूँ की शाम को कुछ कमा कर भी लाना होता है, वो दिन भर अकेली ही रहती है तो घर की चीज़ो को इधर उधर सजाने में लगी रहती है. तुम देखना शाम को तुम्हारा कमरा एक दम चमकता हुआ मिलेगा” रवि मुस्कुराया और कार को मेरे घर की तरफ मोड़ दिया. मेरे घर पहुँचते ही मैने रवि से पूछा “ तुम्हारे पापा के कमरे में कुछ कीमती सामान रखा है क्या जो जाते जाते तुमने रश्मि को बोला की तुरंत ताला लगाकर बंद कर दे”. रवि ने कार का दरवाजा बंद किया और बोला “कीमती नहीं,बेशक़ीमती सामान है उस कमरे में, कभी मौका आया तो ज़रूर दिखाऊंगा”. इतना कहकर रवि ने मेरी तरफ घर का दरवाजा खोलने का इशारा किया और अंदर आते ही उसने कहा “ बताओ जल्दी जल्दी, क्या क्या पैक करना है, मैं तुम्हारी मदद करता हूँ, ज़्यादा देर नहीं रुकने दूँगा तुम्हे, क्या पता तुम फिर अपना मन बदल लो”. मैं हल्का सा मुस्कुराया और सामने रखे सूटकेस और एक बड़े से बेग की तरफ इशारा किया. “इसमे कुछ कपड़े और मेरी किताबे रख लेता हूँ , और मा बाबा की तस्वीर, बाकी कुछ नहीं लेना मुझे”. मैं सामान पैक कर रहा था और रवि मेरे कमरे में टंगी तस्वीरे, सर्टिफिकेट्स, इनाम और फोटो एल्ब्म वगेरा देख रहा था. “दोस्त, क्या करते हो तुम, और ये क्या अजीब सी तस्वीरे हैं. मुझे तो कुछ समझ नहीं आ रहा की इनमे क्या बना है , क्या ख़ास है, किसी पैंटिंग में सिर्फ़ हंसता हूँ मुह बना है तो किसी में सिर्फ़ आँखें , किसी में शेर और इंसान आपस में गले मिल रहे हैं तो किसी में सिर्फ़ बिखरे हुए रंग. क्या है ये सब, ऐसा तो कहीं नहीं देखा” और ये मेडल्स, इनाम कहाँ जीते , कुछ बताओ तो सही”. मैं हंसा और बोला “ मैं साइकॉलजी की पढ़ाई कर रहा हूँ और एक अच्छा साइकॉलजिस्ट बनना चाहता हूँ, और ये तस्वीरे हमे बहुत कुछ सिखाती है. इन्हे रख लो, मैं तुम्हारे घर चल कर बता दूँगा की किस तस्वीर के पीछे क्या छुपा है”. रवि ने सारी तस्वीरे उतार ली और तब तक मैने भी अपना सामान पैक कर लिया. मा बाबा की कोई भी फोटो एक साथ नहीं थी क्यूँ की ज़िंदगी भर बहस ही करने वाले 2 लोगो की एक दूसरे के साथ फोटो कैसे हो सकती है. मैने उनकी 2 फोटो उठाई और सीने से लगा ली. सामान कार में रखा और आख़िरी बार अपने उस घर को देखने लगा जिसमे मेरी ज़िंदगी की सारी यादें बसी थी. मैं रोना चाहता था पर आँसू शायद अभी बाहर आने को तैयार नहीं थे. रवि ने कार का दरवाजा खोलते हुए कहा “ बैठो दोस्त, शाम होने लगी है, घर जल्दी पहुँचना है”. मैं रवि की बात को समझ गया और बिना देर किए उसके साथ फिर वहीं चल दिया जहाँ से अब वापिस जाना नामुमकिन था.


    रास्ते में रवि ने मुझसे पूछा “क्या खाना पसंद करोगे दोस्त, आज पहली बार हमारे साथ खाना खा रहे हो, मैं चाहता हूँ की तुम्हारी पसंद का खाना बनवा दूं. पास में ही बाज़ार है तुम कार में ही बैठो मैं ले आता हूँ”. मैने रवि को समझाया “ तुम्हे लगता है की जो तुम खिलाओगे वो मुझे पसंद नहीं आएगा, मैं एक आम इंसान हूँ रवि और मेरी पसंद नापसंद को लेकर इतना परेशान होने की कोई ज़रूरत नहीं. मुझे यकीन है की तुम्हारे घर में जो कुछ भी बना होगा वो अच्छा ही बना होगा”. मुझे पता था की रश्मि आज खुद ही कुछ ना कुछ ख़ास बनाएगी, आख़िर मेरे वहाँ रुकने के फ़ैसले से वो कितना खुश थी वो उसके मुस्कुराते होटो ने बता दिया था. रवि बोला “ चलो तो फिर देखते हैं, मेरी प्यारी बहन ने आज क्या बनाया होगा, मुझे तो अपनी बहन की बनाई हर चीज़ में स्वाद आता है, अब तुम्हे अच्छा लगेगा या नहीं ये तो खाना खाने के बाद ही पता चलेगा”. रवि हंसा और हम वहाँ से सीधा रवि के घर आ गये. एक बार फिर वही सब हुआ जो आज दिन में हुआ था, जब मैं पहली बार यहाँ आया था. रवि ने फिर 5 बार दरवाजे की कुण्डी को खटखटाया और अंदर से फिर वही आवाज़ आई ‘अभी आती हूँ भैया’, फिर कुछ देर बाद दरवाजा खुला और एक बार फिर मैं उसकी खूबसूरती को देखता ही रह गया.

  4. #14
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    Update 14 - Devnagiri

    रश्मि हाँफ रही थी, मानो बहुत तेज़ी से दौड़ते हुए आई हो, रवि बोला “ क्या हुआ रश्मि, पसीने क्यूँ आ रहे हैं तुझे”. रश्मि ने तेज़ी से साँस लेते हुए कहा “ वो भैया, मैं उपर का कमरा साफ़ कर रही थी ना और आपने दरवाजा खटखटाया तो मैं दौड़ते हुए आई, इस लिए बस” . रवि ने पूछा “तू कमरा साफ़ कर रही थी, क्यूँ बिम्ला आई नहीं क्या आज, इसका नाटक फिर शुरू हो गया क्या, 2 दिन आती है 4 दिन छुट्टी मारती है, आने दे इसका हिसाब कर देता हूँ”. रश्मि ने बड़ी माशूमियत से जवाब दिया “ अरे सुनो सुनो भैया, सुनो तो सही, बिम्ला तो आई है, पर मैने उसे कुछ सामान लेने भेज दिया था इसलिए सोचा की आप लोगो के आने से पहले कमरा साफ़ कर दूं, अब आप बिम्ला को डांटना मत शुरू कर देना” . रवि ने कहा “ अरे तो सामान लाकर सफाई कर देती, तू क्यूँ वहाँ धूल मिट्टी खाने चली गयी, इसी बात के लिए पैसे देते हैं क्या नौकरानी को. चल अब अंदर चल और जल्दी से 2 कप चाय और कुछ नाश्ता बना ला, घर जल्दी वापिस आने के चक्कर में हमने तब से कुछ नहीं खाया है. कब तक भूखा रखेगी आज, चलो दोस्त अंदर चलो”. रवि ने मुझे अंदर चलने का इशारा किया पर मैं तो बस रश्मि की चेहरे के बदलते हाव भाव को ही देखे जा रहा था, कभी हँसी , कभी गुस्सा, कभी शर्म और कभी उदासी, एक पल में ना जाने कितनी हलचल दिखा रहा था उसका वो मासूम चेहरा. रवि ने फिर कहा “कहाँ खो गये , अंदर नहीं चलना क्या”. मैने देखा रश्मि तो कब की अंदर जा चुकी थी और मैं पत्थर बना बाहर ही खड़ा था. मैने रवि से कहा “सामान निकाल लें पहले कार से”. रवि ने मेरा हाथ खींचा और अंदर ले जाते हुए बोला “कुछ इस पेट में भी डाल लो पहले, सामान मैं रखवा दूँगा, तुम चलो अंदर, पहले चाय पीते हैं फिर देखते हैं तुम्हारे कमरे का क्या हाल किया है रश्मि ने, मुझे तो लगता है आज रात तुम्हे नीचे ही ना सोना पड़े, नौकरानी को तो इसने शॉपिंग करने भेज दिया”. मैं धीरे से हंसा और वहीं आँगन में बैठा चाय का इंतज़ार करने लगा. पर इंतज़ार कैसा, इंतज़ार तो जैसे इस घर की लोग करते ही नहीं, इंतज़ार करने का सोचा ही था की 2 खूबसूरत नाज़ुक हाथ मेरे सामने चाय का कप लिए खड़े थे और उपर नज़र उठाई तो बस एक ही शब्द सुनाई दिया “ लीजिए”. चाय तो अब वैसे भी ख़ास लगने वाली थी, क्यूँ की कहते हैं ना ‘बनानेवाले का मन, उसकी बनाई हर चीज़ में झलकता है’ और चाय सच में इतनी लाजवाब बनी थी की मैं चाह कर भी तारीफ किए बिना नहीं रहा पाया “ थोड़ी और मिलेगी क्या”. रवि ने मेरी और देखा और ज़ोर ज़ोर से हँसने लगा “ देखा दोस्त, जब इंसान को भूख लगी हो तो कच्ची रोटी भी पकवान लगती है, मैं तो सोच रहा था की ऐसी चाय किसे पसंद आएगी, पर चलो भूखे पेट ही सही कम से कम पी तो ली”. रश्मि ने रवि की ओर घूरते हुए कहा “ पूरा कप ख़तम कर दिया और बोल रहे हो की बेकार बनी है, आज के बाद माँगना कभी, बिम्ला ही बना कर देगी अब तुम्हे चाय, जिन्हे हमारी चाय अच्छी लगी उन्होने और माँग ली”. रवि की और अजीब सा मुह बनाकर , पैर पटकती हुई वो अंदर चली गयी पर मुझे एक कप चाय और नसीब हो गयी.


    चाय ख़तम करते ही रवि ने मुझसे कहा “आओ पहले उपर चल कर तुम्हारे कमरे की हालत देख लेते हैं, कुछ कमी रह गयी होगी तो मैं कुछ मदद कर दूँगा”. भला जिस कमरे को उन खूबसूरत हाथो ने सजाया हो उसमे कोई कमी रह सकती है क्या. जैसे ही रवि ने मेरे कमरे का दरवाजा खोला हम दोनो हैरान निगाहों से बस देखते ही रह गये. कहने को छोटा सा बेड, पर उसपर बिछि वो रंगीन चादर जिसपर ना जाने कितनी तरह की तरह फूल पत्तियाँ छपी हुई थी, मानो मैं किसी बगीचे में बिखरे रन बिरंगे फूलो को देख रहा हूँ. बेड के बगल में रखा वो हरे रंग का फूलदान और उसमे से झाँकता हुआ सुनहरा रंग लिए छोटा सा सूरजमुखी का एक फूल, मानो मुझसे ये कहना चाह रहा हो की आपका इस कमरे में स्वागत है, बेड की दूसरी और रखी एक छोटी सी टेबल और कुर्सी बता रही थी की रश्मि को पता था की मुझे किताबे पढ़नी की एक जगह चाहिए, सामने की दीवार में बनी कपड़े और सामान रखने की अलमारी भी को भी इतनी खूबसूरती से सजाया था की मानो इसमे रखी जाने वाली एक एक चीज़ किसी अनमोल खजाने से कम नहीं होगी. मैं चुप चाप खड़ा हुआ यही सोच रहा था की क्या कोई किसी अंजान आदमी के लिए इतना कुछ कर सकता है वो भी इतने कम समय में. रवि ने मेरी खामोशी को तोड़ते हुए कहा “ कमरा अच्छा नहीं लगा क्या, मुझे पता है थोड़ा छोटा है पर इससे बेहतर कमरा और कोई नहीं है, पापा का कमरा मैं खोल नहीं सकता, अगर तुम्हे पसंद ना हो तो तुम अपना सामान मेरे कमरे में रख लो, वो इससे बड़ा है”. मैं मन ही मन सोच रहा था क्या रवि को इस कमरे की खूबसूरती का ज़रा भी अंदाज़ा नहीं हुआ, क्या कोई सिर्फ़ बड़े कमरे में ही रहना पसंद करता है, किसी ने इतनी मेहनत से इस कमरे की एक एक चीज़ को सजाया है और मैं पल भर में मना करके उसका दिल तोड़ दूं, नहीं, ये मैं नहीं कर सकता. मैने रवि से कहा “ पसंद की बात करते हो, मैने आजतक अपनी ज़िंदगी में इतने सुंदर तरीके से सज़ा कमरा नहीं देखा, मैं अपने आप को खुशनसीब मानता हूँ जो आज से इस कमरे में रखी हर एक चीज़ मेरे साथ रहने वाली है, जल्दी से मुझे मेरा सामान लाने दो , मुझे इनसे बहुत बाते करनी हैं.” पीछे खड़ी रश्मि मेरी बाते सुन रही थी और अपनी मेहनत की तारीफ होते देख खुश भी हो रही थी. रवि हंसते हुए बोला “ किनसे बाते करनी हैं, इन कुर्सी टेबल से , तुम कौन सी दुनिया में रहते हो दोस्त, मुझे कुछ समझ नहीं आता. खैर चलो, तुम्हे पसंद आना चाहिए, आओ मैं तुम्हारा सामान लेकर आता हूँ”.

    रवि और मैं नीचे की और जाने लगे तो एक बार फिर मेरी नज़र रश्मि पर पड़ी और इस बार मैने अपनी आँखों से उसका शुक्रिया अदा किया. हमारे साथ रश्मि भी पीछे पीछे कार तक आ गयी और सामान निकालते वक़्त उसकी नज़र उन तस्वीरो पर पड़ी तो रवि मेरे घर से उठा लाया था, उन्हे देखते ही मानो वो खुशी से पागल सी होने लगी, एक एक तस्वीर को अपने हाथो में उठाकर देखे जा रही और रवि से कह रही थी “ भैया, देखो ना कितनी सुंदर पैंटिंग है, ये वाली भी , और ये भी देखो कितनी अच्छी है ना”. रवि ने अजीब सा मुह बनाते हुए कहा “तू भी मेरे दोस्त से कम अजीब थोड़े ही ना है, इन्हे भी ना जाने इन तस्वीरो में क्या पसंद आया और अब तू भी इन्हे देखकर उच्छल रही है, मुझे तो इनमे कुछ ख़ास नहीं दिखता, तुझे पसंद हो तो इनसे पूछ कर एक दो तस्वीर अपने कमरे में टाँग ले”. रश्मि ने बेसब्री से मेरी ओर देखा और मैने कहा “ आप को जो पसंद हों, सब ले लो, बाकी बची हुई मैं अपने कमरे में लगा लूँगा”. इतना सुनते ही रश्मि ने सारी तस्वीरे उठाई और उन्हे सीधे अपने कमरे में ले गयी. मैने सोचा चलो कल बाज़ार से अपने लिए और तस्वीरे ले आऊंगा इसे खुश रहने दो.


    मैं अपना बाकी सामान लेकर उपर कमरे में चला गया और रवि नीचे अपनी बहन को खाना तैयार करने के लिए बोलने चला गया. मैं अभी भी उस कमरे में बैठा एक एक चीज़ को बड़े गौर से देख रहा था. हर चीज़ उतनी ही खूबसूरत लग रही थी जितनी रश्मि की मासूमियत. किसी भी चीज़ को छूते ही ऐसा लग रहा था कहीं मेरे हाथ लगने से वो गंदी ना जायें. मैने बेग से अपने कपड़े निकाल कर अलमारी में रख दिए और किताबे टेबल पर लगा दी. तभी मेरे हाथ में मा बाबा की तस्वीर आ गयी जिन्हे देखकर मेरी आँखें नम हो चली. मैने एक बार फिर मा बाबा की तस्वीरो को अपने सीने से लगाया और बाहर आने को बेताब आँसुओं को रोक नहीं पाया, रोकता भी कैसे, अभी इतना मौका ही कहाँ मिला था की उन्हे याद कर सकूँ. एक तरफ मा बाबा की यादे रुला रही थी और दूसरी तरफ मन कह रहा था की मेरे रोने से कहीं रश्मि दुखी ना हो जाए. मैने मा बाबा की तस्वीर को वापिस अपने बेग में रख दिया और सोचा की कल सुबह इन्हे फ्रेम कराकर दीवार पर लगा दूँगा. अलमारी से तौलिया और कपड़े निकाले और सीधा बाथरूम में नहाने चला गया. नहा कर निकला तो रवि कमरे में ही बैठा मेरा इंतज़ार कर रहा था और टेबल पर रखी मेरी किताबो के पन्ने पलट रहा था. वो मेरी तरफ देखते हुए बोला “तो आपको, लिखने का भी शौक है”. मैने कहा " बस ऐसे ही कभी खाली होता हूँ तो कुछ लिखने बैठ जाता हूँ, कुछ सुनाने लायक नहीं लिखा है अभी तक” रवि मुस्कुराया और बोला “ खाना तैयार है, कपड़े बदल कर नीचे आ जाओ मैं भी तब तक फ्रेश हो लेता हूँ, फिर हम तीनो साथ खाना खाएँगे और एक दूसरे से कुछ बाते भी कर लेंगे”. इतना कहकर रवि बाहर चला गया और थोड़ी देर बाद मैं भी नीचे आ गया.

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    Update 15 - Devnagiri

    नीचे पहुँचा तो देखा, वहीं आँगन में रखी उन 2 कुर्सियों के बीच अब एक टेबल भी आ चुकी थी, खाना लग चुका था पर ना तो वहाँ रवि दिखाई दे रहा था और ना ही रश्मि. मैने इधर उधर देखा पर जब कोई नहीं दिखाई दिया तो मैं चुप चाप एक कुर्सी पर बैठा रवि के आने का इंतज़ार करने लगा. तभी ज़ोर से आवाज़ आई “भ....ई....या, जल्दी इधर आओ”, रवि ने जवाब दिया “मैं नहा रहा हूँ रश्मि, क्या हुआ, 2 मिनिट रुक जा, अभी आता हूँ” रवि बाथरूम में था और रश्मि को जवाब देने के लिए ही उसने बाथरूम का दरवाजा खोला था जो उसने रश्मि की बात पूरी होने से पहले ही बंद कर दिया, शायद वो बाहर आने की हालत में नहीं था. रश्मि फिर चिल्लाई “आ जाओ ना भैया, जल्दी.....आ....जाओ” उसकी आवाज़ इस तरह धीमी होती गयी जैसे वो रो रही हो. मैं कुछ समझ नहीं पाया और उसकी मदद करने की सोच कर उसकी आवाज़ की तरफ दौड़ा तो देखा वो अलमारी से कुछ सामान निकलना चाह रही थी और एक छिप्कली उसे ऐसा करने से रोक रही थी, मैं मन ही मन ज़ोर से हंसा और उस छिप्कली को बाहर फेंक दिया. उसने मेरी और देखा और बोली “ आपको छिप्कली से डर नहीं लगता, कहीं काट लेती तो”. मैं चुप चाप वहाँ से बाहर आया और उसकी मासूमियत को देख कर हैरान रह गया जो एक और वजह बन गयी रश्मि को चाहने की. इतने में रवि भी वहाँ आ गया और बोला “क्या हुआ, क्यूँ चिल्ला रही थी, फिर कोई चूहा या बिल्ली देख ली क्या”. मैने मन ही मन सोचा की बात सिर्फ़ छिप्कली की ही नहीं इन्हे तो हर जानवर से डर लगता है और रवि की और मुस्कुराते हुए मैने जवाब दिया “ इस बार छिप्कली थी”. रवि की ज़ोर से हँसी छूटी और रश्मि फिर चटपटाती हुई रसोई में खाना लेने चली गयी. रवि और मैं वहीं आँगन में बैठे बाते करने लगे और तभी वो वक़्त आ गया जब हमारे भूख से बेजान पड़े पेट को खाना मिलने की आस दिखाई दी. रवि तो मानो बर्तन समेत ही खाना खाने को बेताब था. पर जब रश्मि ने खाना लगाना शुरू किया तो मैं चौंक गया, उस टेबल पर इतनी जगह नहीं थी जितने तरह के पकवान वहाँ रखे जा रहे थे. मैने रवि की और हाथ से इशारा करके पूछा की ये सब क्या हो रहा है तो रवि ने अपने कंधे सिकोडते हुए कहा “मुझे क्या पता, मैं भी तो तुम्हारे साथ ही आया हूँ, देखते हैं कुछ बनाया भी है या सिर्फ़ खाली बर्तन ही सजाये जा रही है”. खाना परोस कर रश्मि वही खड़ी हो गयी और रवि ने मेरी प्लेट में खाना रखना शुरू किया. पनीर, दाल, राजमा, हरी सब्जी, दही,रायता,मक्खन, सलाद, आचार,चावल, चपाती,पापड़ ,खीर,हलवा,क्या नहीं था वहाँ. उसने थोड़ा थोड़ा सब कुछ बनाया था. मैं हैरान था, ये लड़की क्या है, इतना मासूम दिल, खाना खिलाने का इतना शौक, खाना बनाने का इतना शौक, घर सजाने का इतना शौक, मेहमान की इज़्ज़त करने का इतना शौक, क्या है ये लड़की, और अंदर ही अंदर एक डर भी बढ़ने लगा की अगर मैने इतनी मेहनत से बने इस खाने में से कुछ भी छोड़ा तो कहीं ये बुरा ना मान जाए. अपनी भूख और खाने के स्वाद से ज़्यादा चिंता अब मुझे उसके नाराज़ होने की हो रही थी. पर जैसा मैने पहले भी बताया की ‘बनानेवाले का मन उसकी बनाई हर एक चीज़ में झलकता है, एक बार फिर वही हुआ, उसके हाथ के बने खाने में जादू था, पनीर बता रहा था की वो भी उसके हाथो की तरह मुलायम है, दाल और हरी सब्ज़ी बता रही थी की वो भी उसके मन की तरह साफ़ है, राजमा बता रहा थी वो भी उसके दिल की तरह नाज़ुक है, दही बता रही थी की वो भी उसके ख्वाबो की तरह ताज़ा है, मक्खन बता रहा था की वो उसकी तरह खूबसूरत है, खीर और हलवा बता रहे थे की वो भी उसकी आवाज़ की तरह मीठे हैं,सलाद बता रही थी की वो भी उन्ही हाथो ने सजाई है जिन्होने इस घर की हर एक चीज़ को सजाया है. चावल उसकी हँसी की तरह खिलखिला रहे थे, पापड़ और आचार उसकी चटपटी हरकते बताना चाह रहे थे.


    मुझे खाना परोसने के बाद रवि ने फटाफट अपनी प्लेट में भी खाना रखा और बिना देर किए खाना शुरू कर दिया, मैने देखा रश्मि तो हमारे साथ खाना खा ही नहीं रही, मैने रवि से पूछा “हम दोनो ही खाना खाएँगे क्या, ये नहीं खाएँगी” रवि को कहाँ किसी की फ़िक्र थी उसे तो बस अपने पेट से मतलब था, मुह में चम्मच घुसाए वो बोला “ खा लेगी वो भी, तुम शुरू तो करो”. मैने कहा “यहाँ तो कुर्सी ही 2 है, तो कैसे खा लेंगी, ऐसे अच्छा नहीं लगता, 2 लोग खा रहे हों और तीसरा हमे खड़ा देखता रहे, मैं अपने कमरे से कुर्सी ले आता हूँ”. रश्मि बड़े गौर से मेरी और देख रही थी पर भाई के सामने कहाँ कुछ बोल सकती थी, रवि ने कहा”रश्मि, आओ तुम भी बैठ जाओ, मेरे कमरे में एक स्टूल रखा है वो ले लो ” रवि ने उसकी तरफ देखे बिना ही अपने कमरे की तरफ इशारा कर दिया. रश्मि कुछ नहीं बोली और सीधा रसोई में चली गयी. मैं समझ गया था कि ना तो किसी ने उसके खाने की तारीफ की और ना किसी ने उसे खाने के लिए ठीक से पूछा. मैं चाह कर भी भाई बहन के बीच में नहीं बोल सकता था, पर ना जाने क्यूँ उसके बिना खाना खाने का मन ही नही हो रहा था, मैने बहुत सोचा की कैसे रश्मि को बाहर बुलाऊं कि वो हमारे साथ ही खाना खाये. मैं वहाँ से उठा और रवि के कमरे में रखा स्टूल उठा लाया, मैने अपनी कुर्सी टेबल के दूसरी और रख दी और खुद उस स्टूल पर बैठ कर खाने लगा. रवि समझ गया की उसने क्या ग़लती की, उसने रश्मि को आवाज़ दी “रश्मि, ज़रा पानी तो लाना” उसे पता था की और किसी बहाने से वो बाहर नहीं आएगी . रश्मि पानी का जग लेकर आई तो रवि ने उस खाली पड़ी कुर्सी की तरफ इशारा किया और बोला “ लो महारानी साहिबा, अब तो बैठ जाओ, मैने तो खाना खाना शुरू भी कर दिया , इन्होने अभी एक टुकड़ा भी नहीं तोड़ा है, गुस्सा छोड़ और प्लेट लगा ले, क्या ज़रा ज़रा सी बात पे मुह लटका के खड़ी हो जाती है". रश्मि ने पहले तो रवि की तरफ पूरे गुस्से में देखा , फिर मेरे भूखे पेट पर दया खा कर वो चुप चाप सामने वाली कुर्सी पर बैठ गयी. जब उसने अपनी प्लेट में खाना परोस लिया तो वो मेरी तरफ देखती हुई बोली “शुरू कीजिए”. वो 2 शब्द, मानो किसी ने ख़ास तौर पर मेरे लिए कहे हों, खूबसूरत हाथो से बना खूबसूरत खाना और साथ में खाने वाला इतना खूबसूरत इंसान, फिर किसे भूख रही और किसे स्वाद की चिंता, जो भी प्लेट में रखा था एक एक करके कब ख़तम हो गया, मुझे खुद पता नहीं चला,मैं उठा और हाथ धोने के लिए पानी माँगा, रवि ने सीडीयों के नीचे लगी वॉश-बेसिन की और इशारा किया. रश्मि भी खाना खा कर उठ चुकी थी, मैं हाथ धोकर जैसे ही मुड़ा, वो तौलिया लिए मेरे पीछे ही खड़ी थी पर उसकी आँखे मुझसे कुछ सवाल कर रही थी. तभी मुझे याद आया कि उसके खाने की तारीफ करना तो मैं भूल ही गया, मैने हाथ पोंछे और धीरे से बोला “क्या आप हर रोज़ इतना ही अच्छा खाना बनाती हैं”. रश्मि को अपने सवाल का जवाब मिल चुका था, वो बिना कुछ बोले वापिस रसोई में चली गयी, और मैं आकर रवि के पास ही बैठ गया, उसने सबसे पहले खाना शुरू किया था और अभी तक उसके पेट की माँगे पूरी नहीं हुई थी. टेबल पर लगा सारा खाना निबटाने के बाद रवि डकार लेते हुए बोला “ आअरररर....लगता है थोड़ा ज़्यादा हो गया,बड़े दिनो बाद कुछ अच्छा बनाया तूने, मज़ा आ गया”. मैं समझ गया की ये सब मेहनत ख़ास मेरे लिए ही की गयी थी, मेरा मन अंदर से खिल उठा, पर अभी भी ये प्यार नहीं था.

  6. #16
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    Update 16 - Devnagiri


    पेट भर खाना और दिन भर की भाग दौड़ के बाद अब नींद ने अपना असर दिखाना शुरू कर दिया, मैने रवि से कहा “मैं अपने कमरे में सोने जा रहा हूँ”. मैने टेबल पर रखा पानी का जग और एक ग्लास उठाया और अपने कमरे में सोने चला गया. कपड़े बदले और जैसे ही बेड पर लेटा मुझे पता भी नहीं चला की कब मुझे नींद आ गयी. सुबह जब खिड़की से आती सूरज की रोशनी मेरी आँखों पर पड़ी तो मुझे एहसास हुआ की मैं कितनी गहरी नींद में सोया था. मैं उठा और नहा धो कर जब नीचे आया तो देखा, रवि नये कपड़े,जूते पहने, तैयार होकर टेबल पर नास्ता कर रहा था, पास में रखा एक बड़ा सा बेग साफ़ साफ़ बता रहा था की वो कहीं जाने की तैयारी में है. उसने मुझे नीचे आते देखा और बोला “आओ दोस्त, नास्ता तैयार है, मैने सोचा तुम्हे सोने दूं इसलिए जगाने नहीं आया”. मैं उसके पास जाकर बैठ गया और तभी रश्मि ने मेरे लिए भी एक प्लेट लगा दी. रश्मि के चेहरे पर उदासी और आँखो में आँसू थे. मैं समझ नहीं पा रहा था की ये सब क्या हो रहा था और अपनी बैचनी दूर करने के लिए मैने रवि से पूछा “ कहाँ जा रहे हो तुम लोग और रश्मि क्यूँ उदास है”. ब्रेड पर जेम लगाते हुए रवि बोला “हम नहीं, सिर्फ़ मैं जा रहा हूँ, ये चाहती थी की मैं पुलिस इंस्पेक्टर बनू और जब वो दिन आया है तो मुझे ट्रैनिंग पर जाने से रोक रही है”. मैं चौंक गया, कुछ समझ नहीं आ रहा था की मैं क्या बोलूं, क्या करूँ, एक दिन नहीं हुआ मुझे यहाँ आए और रवि मुझे यहाँ अकेला छोड़ कर ट्रैनिंग पर जा रहा है. मैने कहा “ क्या मतलब तुम जा रहे हो, तुम चले जाओगे तो ये अकेली कैसे रहेगी इतने दिन, तुम्हे ज़रा भी ख्याल नहीं क्या अपनी बहन का”. रवि बोला “अकेली कहाँ रहेगी, तुम हो ना यहाँ, झेल लेना इसे जब तक मैं लौट कर आऊँ”. मैं फिर चौंक गया “ मैं यहाँ कैसे रह सकता हूँ, नहीं ये नहीं हो सकता, तुम होश मे तो हो तुम क्या बोल रहे हो रवि, मैं इस घर में, रश्मि के साथ, कैसे, मेरा मतलब क्यूँ, मैं नहीं रहूँगा, घर में अकेली तुम्हारी बहन, और मैं एक अंजान आदमी, तुम्हारा दिमाग़ तो ठीक है रवि, पागलपन मत करो, जब तक तुम्हारी ट्रैनिंग पूरी ना हो तुम रश्मि को अपने किसी रिश्तेदार के यहाँ छोड़ आओ और मैं अपने घर जा कर रह लूँगा”. रवि ने नास्ता ख़तम किया और हाथ धोते हुए बोला “ कौन रिश्तेदार, किसके यहाँ छोड़ आऊँ अपनी इस फूल सी नाज़ुक बहन को, किसी ने 2 शब्द भी बुरे भले कह दिए तो मैं बर्दास्त कर पाऊँगा क्या. और रही बात समाज और दुनिया की तो खुद से ज़्यादा मुझे अपनी बहन पर भरोसा है, वो अपनी और इस घर की इज़्ज़त को संभालना जानती है, आजतक एक शिकायत नहीं आने दी इसने, और अगर तुम्हे लगता है की मैं कैसे तुम पर भरोसा कर के अपनी अकेली बहन के साथ छोड़ कर जा सकता हूँ तो सुनो, अगर भरोसा ही ना होता तो तुम्हे यहाँ लेकर ही क्यूँ आता. मुझे देर हो रही दोस्त, मुझे निकलना है, अब मुझे इन सब बातो में उलझाकर परेशन ना करो, मैने पूरी रात 100 बार सोच समझकर ही ये फ़ैसला लिया है और मुझे यकीन है की मेरा फ़ैसला ग़लत नहीं”. रवि ने अपनी बात ख़तम की और बेग लेकर बाहर की और चल दिया, रश्मि दौड़ी हुई आई और अपने भाई से लिपट कर रोने लगी. मैं कुछ समझ नहीं पा रहा था, मैं नहीं चाहता था की मेरी वजह से रश्मि पर कोई उंगली भी उठाए. रवि ने रश्मि के सर पर हाथ फेरा और बोला “ मैने कल क्या बताया था तुझे, ये मेरा दोस्त, हमारी ज़िंदगी में मेहमान नहीं देवता बनकर आया है. इन्ही की वजह से आज तेरा भाई पुलिस बनने जा रहा है और तू रो रही है. इन्हे तंग मत करना और इनसे धाबराना भी मत. कुछ पैसे और ज़रूरी समान मैने पापा की कमरे में रख दिया है, जितनी ज़रूरत हो निकल लेना, कुछ कमी पड़े तो पड़ोस वाली आंटी से ले लेना, मैने सुबह ही समझा दिया था की रश्मि जो भी माँगे उसे ला देना , मैं वापिस आते ही सारे पैसे लौटा दूँगा. दोस्त के बारे में भी मैने उन्हे बता दिया है, वो तुम दोनो का ख्याल रखेंगी”. इतना कहकर रवि मेरे गले मिला और मुझसे बोला “अब चलता हूँ, जो भी गुस्सा, नाराज़गी हो वो बाद में उतार लेना”. मैने रवि को रोका और कहा “ बहुत ग़लत किया है तुमने मेरे साथ रवि, इतनी बड़ी ज़िम्मेदारी मैं निभा पाऊँगा या नहीं मुझे नहीं पता, पर कोशिश करूँगा की जब तक तुम लौटकर नहीं आते, तुम्हारी बहन को ज़रा भी परेशान ना होने दूं, और रही बात पैसो की तो उसकी चिंता भी तुम छोड़ दो, मैं अपने आप इंतज़ाम कर लूँगा. तुम बेफ़िक्र होकर जाओ और जल्दी से अपनी बहन का सपना पूरा करके लोटो ”. मेरी इन्ही बातो ने रश्मि के दिल को थोड़ी तस्सली दी थी और रवि को भी. तभी रवि के घर बाहर एक बस आकर रुकी और रवि उसमे बैठ कर अपनी मंज़िल की और चला गया.

    मैं पीछे मुड़ा तो देखा रश्मि अंदर जा चुकी थी, मैं समझ गया कि अभी कुछ देर लगेगी उसके मन को शांत होने में. टेबल पर नाश्ता बचा हुआ था तो मैंने वहीं बैठ कर नाश्ता कर लिया. मैं उठकर जाने लगा तभी रश्मि मेरे लिए चाय बना लाई. उसका मन बहुत उदास था और अभी हम इतने नहीं खुल पाए थे की मैं उससे कुछ सकूँ, थोड़ी देर बाद रश्मि भी चाय लेकर वहीं बैठ गयी. मैने सोचा जब तक इससे कुछ बात नहीं करूँगा ये ऐसे ही गुम्सुम बैठी रहेगी. तो मैने उसका दिल बहलाने के लिए पूछा “बहुत प्यार करती हो आप अपने भाई से, पुलिस इंस्पेक्टर बनते देखना चाहती हो ना”. उसने हाँ में सर हिलाया और कुछ नहीं बोली. मैं मुस्कुराते हुए बोला “ पर पुलिस वाले तो सिर्फ़ चोर,लुटेरो को पकड़ते हैं, छिप्कली या चूहे बिल्ली को नहीं” . रश्मि की हँसी छूट गयी और खिलखिला कर हँसने लगी. उसकी उस हँसी ने मुझे फिर उसके चेहरे को देखते रहने पर मज़बूर कर दिया. ऐसा लग रहा था मानो आसमान में छाए अंधेरे के बादलो में छुपा वो पूनम का चाँद बाहर निकल आया हो. मैं उसके चेहरे को देखे जा रहा था और तभी उसकी नज़र मेरी आँखों पर पड़ी और वो उठ कर चली गयी. ऐसे ही हँसी मज़ाक करते करते दिन बीतने लगे और रश्मि मेरे साथ घुलने मिलने लगी. मुझे भी उसके साथ हँसना बोलना अच्छा लगता था और धीरे धीरे हम दोनो के बीच नज़दीकियाँ बढ़ने लगी. दिन भर काम निबटाने के बाद वो मेरे साथ घंटो बाते करती, हँसती मुस्कुराती और अगर कभी बाते करते करते मैं अपने मा बाबा को याद करता तो वो मेरे हाथ पर अपना नाज़ुक सा हाथ रखते हुए बोलती “मैं हूँ ना”, तो अगर कभी उसे अपने भैया या मा बाप की याद आती तो मैं उसका ध्यान किसी और बातो में लगा देता था. एक दिन शाम को बाज़ार से कुछ ज़रूरी सामान लेकर मैं वापिस लौट रहा था, तभी अचानक ज़ोर की बारिश होने लगी, ना तो ये बारिश का मौसम था और ना ही बारिश होने की कोई उम्मीद थी, इसलिए मैं घर से कोई छाता या रेनकोट लेकर नहीं गया था. अंधेरा होने को था तो मेरे पास इतना समय भी नहीं था कि मैं कुछ देर कहीं रुक कर बारिश बंद होने का इंतज़ार कर सकूँ, तो मैं हिम्मत करके भीगता हुआ ही घर की और चल दिया. गेट पर पहुँच कर मैने देखा की रश्मि बाहर घास पर खड़ी बारिश में भीग रही थी. बारिश में भीगना उसे बहुत पसंद था, और उस बेमौसम बारिश ने हम दोनो को एक दूसरे के इतना करीब ला दिया की मैं ये भी भूल गया की जाते हुए रवि से मैने क्या वादा किया था.

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    Re: Chheen lunga tujhe...

    Update 17 - Devnagiri

    गेट खोलते ही जैसे मैं अंदर गया , रश्मि सफेद रंग के कपड़े पहने, हाथो को फैलाए आसमान की तरफ देख रही थी. उपर से बरसती वो बारिश की तेज बूंदे उसके सुर्ख गुलाबी होटो को छू कर उसके गले के ठीक बीचो आकर रुक जाती थी और फिर इतरा कर इश्स अंदाज़ में नीचे की और फिसल जाती थी मानो मुझे बताना चाह रही हों की वो इस दुनिया की सबसे खूबसूरत चीज़ से आकर मिली हैं. बारिश में भीगे उसके बालो से बहता पानी उसके छोटे छोटे कानो से होकर धीरे धीरे उसके कंधो को छूता हुआ उसके भीगे बदन में समा जाता था. कुछ बूंदे उसकी आँखो पर गिरती तो उन्हे छुपाने के लिए उसकी पलके उन्हे छाता बनकर भीगने से रोक लेती. उपर से लेकर नीचे तक वो बारिश में भीग चुकी थी और उसके भीगे बदन पर पड़ती चाँद की रोशनी उसे और भी खूबसूरत बना रही थी. मैं उसे देख जा रहा था और देखते ही देखते मेरा मन उसे छूने को हुआ, मैं समझ गया की अब मुझे रश्मि से प्यार हो गया है और इससे पहले की रश्मि को इस बात का एहसास हो मैं चुप चाप अंदर चला जाता हूँ. मैने धीरे से अपने कदम अंदर की ओर बढ़ाए तभी रश्मि ने मुझे देख लिया, हर रोज़ जो नज़रे मुझे देख कर शरमा जाती थी आज वो आँखें बिना पलके झपकाए मेरी और देखे जा रही थी. मैं समझ गया की रश्मि आज बारिश में पूरी खो चुकी है और शायद अगले पल जो होने वाला था उसका एहसास मुझे हो गया था, मैने अपने आप को संभालते हुए कहा “रश्मि अंदर चलो, तुम बहुत भीग चुकी हो, ठंड लग जाएगी”. रश्मि शायद मेरे मुह से कुछ और सुनना चाहती थी लेकिन जब उसे लगा की मैं ऐसा कुछ नहीं करूँगा जिससे मेरा वादा टूट जाए तो वो भीगती हुई मेरे पास आई और बोली ‘चलिए’. जैसे ही उसने ‘चलिए’ कहा, आसमान में इतनी ज़ोर से बिजली कडकी की वो काँप गयी और डर के मारे मेरे सीने से लिपट गयी, वही हो गया जिसे रोकने की मैं तमाम कोशिश कर रहा था. रश्मि ने जैसे ही मुझे छुआ उसकी गरम साँसे मेरे गीले हाथ पर महसूस होने लगी, उसकी साँसे बहुत तेज चल रही थी, उसके भीगे बदन पर मेरा हाथ लगा तो मेरा मन भी बैचैन हो गया. मैने उसे अपने सीने से अलग किया और अपने आप को संभालते हुए मैं अंदर की और जाने लगा, रश्मि ने मेरा हाथ रोक लिया, वो जितना भीगती जा रही थी उतनी ही और खूबसूरत लगती जा रही थी, और नज़रे झुकाए मेरी और देखे जा रही थी. मैने एक बार फिर उसे रोकने की कोशिश की और कहा “ रश्मि, मेरा हाथ छोड़ो , ये सब ग़लत है, तुम बारिश में अपने होश खो रही हो और ऐसा ना हो की कहीं मैं भी अपने होश खो बैठूं”. रश्मि ने जो जवाब दिया उससे साफ़ जाहिर हो गया की आज वो नहीं रुकने वाली , बहुत ही मद भरी आवाज़ में वो बोली “ इस बारिश को देखो अविनाश, ये रिमझिम गिरती पानी की बूँदो की लड़ी, ये बिखरे हुए बेताबियों के शरारे, ये मदहोश घड़ी, ये बहकते कदम, ये बरसात यूँ ही नहीं आई, इसे पता है की 2 दिल जो छुप छुप कर बाते करते हैं, उन्हे एक दिन मिलना है. जिस पल का हमे इंतज़ार था वो रात आ चुकी है अविनाश”. रश्मि की ये बाते मुझे उत्तेजित किए जा रही थी. मैं कुछ नहीं बोला और वो एक बार फिर मेरे सीने से चिपक कर बोली “ बहुत दिनो से जल रहे हैं हम इन ख्यालो की आग में जिसे आपने पल पल रोशन किया है, और आज इन बरसते बादलो ने उस आग को और बढ़ा दिया है . इस आग से उठता हुआ धुआँ अब इस जिस्म को जला रहा है अविनाश, कह दो इन बादलो से की बरसाना बंद ना करे, भला कब तक हम आपको पाने के लिए तरसते रहेंगे. जितना तूफान इन गरम सांसो में है उतनी ही आज मेरी चाहत बेईमान हो रही है”. कहते कहते उसने अपने होठ मेरे होटो से लगा दिये और फिर मेरे हाथो को धीरे अपनी कमर की और ले जाने लगी. मैं उससे जितना दूर हटने की कोशिश करता वो उतना ही मेरे होतो के पास आ जाती, धीरे धीरे मैं नीचे बैठ गया और वो मेरे उपर लेट गयी. मैं भी अपने होश खो चुका था और अगले ही पल वो अपना सब कुछ मुझे देने वाली थी. मैने अपने आप को संभाला और वहाँ से उठकर सीधा आँगन में आ कर बैठ गया. रश्मि अभी भी बाहर खड़ी भीग रही थी. मैने आँगन में थोड़ी आग जलाई और रश्मि को बुलाने के लिए जैसे ही उठा, उसने फिर मुझे पीछे से आकर पकड़ लिया. मैने कहाँ “रश्मि छोड़ो मुझे, समझने की कोशिश करो तुम, हम ये सब नहीं कर सकते, तुम्हे याद है ना”. पर रश्मि पे मानो आज मुझमे खोने का भूत सवार था, मेरा हाथ अपने सर के उपर रखते हुए उसने पूछा “ क्या आप मुझसे प्यार नहीं करते, एक बार ना बोल दीजिए, मैं कभी आपसे दोबारा नहीं पूछूंगी ”. मैं समझ गया था की ये जानती है मैं इसकी झूठी कसम नहीं खखाऊंगा , मैने बस इतना कहा “हाँ, करता हूँ प्यार तुमसे”. रश्मि की आँखे खिल उठी और वो बोली “तो फिर मुझे ऐसे बैचैन करके आपको क्या मिलेगा, मैं आपकी होना चाहती हूँ अविनाश, अभी इसी वक़्त”. मैं चुप खड़ा था, कुछ जवाब नहीं था मेरे पास, उसने मेरा हाथ पकड़ा और मुझे अपने पापा की कमरे में ले गयी. जहाँ रवि की बताई वो बेशक़ीमती चीज़ वो आज मुझे दिखना चाहती थी.

    रश्मि ने उस कमरे का ताला पहले ही खुला छोड़ रखा था, इसका मतलब ये सब वो पहले से ही सोच कर बैठी थी. हम दोनो बुरी तरह भीगे हुए थे, वो ठंड से काँप रही थी लेकिन उसे आज किसी चीज़ की फ़िक्र नहीं थी. उसने अलमारी खोली और शादी का एक लाल जोड़ा निकाल कर मेरे सामने रख दिया,मैं कुछ समझ नहीं पाया कि वो क्या कहना चाहती है. फिर अलमारी की दराज में से उसने चूड़ीयाँ, कंगन, नथ, झुमके, टीका, चुकटी ,पायल, हार और वो सारे जेवर निकले जो एक दुल्हन अपनी शादी वाले दिन पहनती है. मैं कुछ पूछ पाता उससे पहले ही वो खुद बोल पड़ी “ ये है वो सामान जिसकी चिंता भैया को हमेशा रहती है, ये सब चीज़े मा ने मेरे लिए संभाल कर रखी थी और मरते वक़्त भैया से कहा था की जब मेरी शादी हो तो इसी जोड़े में हो”. मैं हैरान परेशान उसकी और देखे जा रहा था. अपनी परेशानी दूर करने के लिए मैने रश्मि से पूछा “ तो ये सब मुझे क्यूँ दिखा रही हो, वो भी आज , इस वक़्त, ऐसी हालत में”. मेरी बात पूरी भी नहीं हो पाई और रश्मि ने मेरी आँखो पर एक पट्टी बाँध दी और बोली “जब तक मैं पट्टी ना खोलूं, यहीं बैठे रहना”. ये सब क्या हो रहा है, रश्मि क्या करना चाहती है, मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा था, मन में बस यही उधेड़ बुन चल रही थी की कहीं रश्मि बहक ना जाए , वरना मैं रवि से कैसे आँखे मिला पाऊँगा . काफ़ी देर इंतज़ार करने के बाद मुझे कमरे में पायलो की छम छम की आवाज़ सुनाई दी और मेहंदी की खुसबू से महकते हुए हाथ मेरी आँखों के पास आए, उसने मेरी आँखो से पट्टी हटाई और बोली अब धीरे धीरे अपनी आँखें खोलो. मैने ठीक वैसा ही किया और जैसे जैसे मेरी नज़रे उपर उठती गयी सामने एक बहुत ही खूबसूरत दुल्हन मेरे सामने खड़ी थी. उसके पैरो में लगी मेहंदी, पैरो की उंगलियों में बहुत ही सुंदर चुकटीयां , एडियों में चमकती हुई पायल, कई तरह कि नक्काशी जड़ा लाल रंग का लहंगा , हथेलियों पर रची मेहंदी, हाथो में सजी चूड़ियाँ और सोने के कंगन, सितारो जड़ी लाल रंग की चुनरी, कानो में लटके झुमके , होटो पर लगी लाली, नाक में पिरोइ हुई बड़ी सी गोल नथ, आँखों में लगा काजल, माथे पर लगी बिंदी और सर पर सज़ा टीका, और इन सब में चार चाँद लगता हुआ रश्मि का हुस्न. मैं चौंक गया, आँखें फटी रह गयी, दिल और दिमाग़ दोनो सुन्न रह गये. मुझे लगा जैसे मैं कोई सपना देख रहा हूँ और तभी...

    क्रमश:

    आज का अपडेट मेरे लिए एक चुनौती से कम नहीं था, आज की अपडेट में मैने जो कुछ भी लिखा है उसे लिखने की हज़ारो कोशिशे मैं पिछ्ले कई महीनो से कर रहा हूँ पर कभी कामयाबी हाथ नहीं लगी. और आज ‘छीन लूँगा तुझे’ कहानी भी उसी जगह पहुँच गयी जहाँ फिर से मुझे वही लिखना पड़ रहा है जो कभी नहीं लिख पाया. मैने अपनी ओर से इस अपडेट को जितना मुमकिन हुआ बेहतर लिखने की कोशिश की है, अगर आप लोगो को ये अपडेट पसंद नहीं आई तो मैं उसके लिए आपसे क्षमा चाहता हूँ.

  8. #18
    नवागत
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    Re: छीन लूँगा तुझे...........

    कहानी की जितनी तारिफ की जाए उतनी कम है।रेपो कबूल करे+++++++++++++

  9. #19
    नवागत axbafromxb's Avatar
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    Re: छीन लूँगा तुझे...........

    Quote Originally Posted by Monu119 View Post
    बहुत ही रोचक कहानी है मित्र / आपकी लेखनी की जादू पिरोई हुई है साफ झलकता है / ,
    मेरे ओर से आप को बहुत बहुत धन्यवाद मित्र / रेपो का एक छोटा सा तोहफा भेज रहा मित्र काबुल कीजियेगा .
    एक लेखक के लिए उसकी कहानी को पढ़ लिया जाना ही अपने आपमें एक तोहफा है.

    Quote Originally Posted by Mukul00 View Post
    कहानी की जितनी तारिफ की जाए उतनी कम है।रेपो कबूल करे+++++++++++++
    धन्यवाद मित्र.
    Last edited by Ranveer; 01-07-2012 at 11:09 PM. Reason: शिकायत ।

  10. #20
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    Re: छीन लूँगा तुझे...........

    दोस्त वाकई आप एक मंजे हुए कहानीकार हो / आप की कहानी रोंगटे खड़ा कर देने बाली है मित्र / आपने सही वक्त पर इस कहानी को फोरम पर पर्काषित करके सदा के लिए यादगार लह्में दिए हो दोस्त / इसके लिए आप आभारी के पात्र है / मैं आप को सलाम कहता हूँ दोस्त / रेपो स्वीकार करें / धन्यवाद
    चापलूसी का जहरीला प्याला आपको तब तक नुकसान नहीं पहुंचा सकता, जब तक कि आपके कान उसे अमृत समझकर पी न जाएं।

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