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Thread: छीन लूँगा तुझे...........

  1. #1
    नवागत axbafromxb's Avatar
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    Jun 2012
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    छीन लूँगा तुझे...........



    On public demand, World's best writer is here to give you the goose bumps with every update of this story.

    All characters appearing in "Chheen Lunga Tujhe " are fictitious. Any resemblance to real persons, living or dead, is purely coincidental.

    Here is how i am gonna write and update this Story :


    मुँह में लिए (माचिस की तिल्ली :D ) वो फिर चल पड़ा उस शहर की तरफ जहाँ से उसे फिर वो खुश्बू आ रही थी जो आज से 35 साल पहले आया करती थी, जब वो एक पान की दुकान के बगल में अपना क्लीनिक कम आफ़िस चलाया करता था. वो अपने शहर का सबसे मशहूर साइकॉलजिस्ट था पर वो खुश्बू उसे जीने नहीं देती थी और वो चाह कर भी अपने आप को उस खुश्बू से दूर नहीं कर सकता था. इतना नाम और शौहरत के बाद भी उसने कभी किसी लड़की को नहीं चाहा था.
    संलग्न चित्र संलग्न चित्र  
    Last edited by axbafromxb; 26-06-2012 at 10:48 AM.

  2. #2
    नवागत axbafromxb's Avatar
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    Re: Chheen lunga tujhe...

    Update 1 & 2 - Devnagiri.


    “आह, उहह, आह , पा..नी पा...नी ”, अविनाश को जब होश आया तो वो दौलतगढ़ शहर से कुछ मील दूर एक घने और डरावने जंगल में बने टूटे हुए खंडहर में कराह रहा था. पूरे शरीर पे चोटो के नीले निशान बने हुए थे और गला प्यास से सूख रहा था. आँखें खुल नहीं रही थी और दूर दूर तक उसकी आवाज़ सुनने वाला कोई नहीं था. उठने की नाकामयाब कोशिश करने के बाद हाथो ने हिलना भी बंद कर दिया था. पूरे जंगल में सिर्फ़ उसके कराहने की आवाज़ सुनाई दे रही थी जो बाद में धीरे धीरे झींगुरो और कीड़े मकोड़ो की “कीर्र कीर्र” में दबती चली गयी. अविनाश की आँखें फिर बंद होने लगी और तभी अचानक ज़ोर से बिजली कडकी और अजीब सा दिखने वाला लंबा चौड़ा हटटा कट्टा इंसान अविनाश के पास आया. दिखने में एक दम सीधा साधा और हाथ में एक छड़ी लिए वो ना जाने कौन था जो उस जंगल में अविनाश की ज़िंदगी बचाने आया था. कुछ देर अविनाश की तरफ देखने के बाद उसने अपनी नज़रें आसमान की तरफ उठाई और ज़बरदस्त बारिश शुरू हो गयी. बारिश की बूँदें जैसे ही अविनाश के चेहरे पे पड़ी मानो उसके मर चुके शरीर में दोबारा जान आ गयी, उसने अपनी आँखें खोली और सबसे पहले बारिश के पानी से अपनी प्यास बुझाने लगा. वो अजीब सा दिखने वाला फरिश्ता अभी भी अविनाश की तरफ देखे जा रहा था मानो कुछ कहना चाह रहा हो पर अविनाश की हालत इस लायक नहीं थी की वो कुछ बात कर सके.

    कुछ देर इंतज़ार करने के बाद उस फरिश्ते ने खंडहर की गीली मिट्टी को उठाके चूमा और उसका लेप अविनाश के माथे पे लगा दिया, पलक झपकते ही अविनाश के शरीर की सारी चोटे ठीक होने लगी और अविनाश ने आँखें खोलते हुआ पूछा “ आप कौन हैं , भाई और मैं यहाँ कैसे आया”
    वो फरिश्ता अविनाश को देखे जा रहा था और अविनाश अपने सवाल किए जा रहा था “ रश्मि कहाँ है, कहाँ ले गये उसे वो लोग “ जो ज़ुबान 2 पल पहले एक बूँद पानी के लिए तरस रही थी उस फरिश्ते के छूते ही उसमे इतनी जान आ गयी की अब रुकने का नाम ही नहीं ले रही थी.

    “कितना प्यार करते हो उसे” ये पहला सवाल था जो
    उस फरिश्ते के मुँह से निकला था और जिसका जवाब अविनाश ने बिना कुछ सोचे समझे दे दिया “ अपनी जान से भी ज़्यादा”. “जान तो तुम्हारी जा चुकी है, पर तुम्हारी मोहब्बत अभी भी ज़िंदा है” फरिश्ते ने अजीब सा जवाब दिया. “आप कहना क्या चाहते हैं, क्या मैं मर चुका हूँ” “क्या अब कभी मैं रश्मि से नहीं मिल पाऊंगा ” अविनाश की आँखें भर आई थी और ज़ुबान फिर काँपने लगी थी. “इंसानी रूप में तो अब तुम कभी उसे नहीं मिल पाओगे, अगर तुम चाहो तो मैं तुम्हे अपने जैसा बना सकता हूँ” अविनाश को कुछ समझ नहीं आ रहा था की वो फरिश्ता कौन है और क्या कह रहा है.

  3. #3
    नवागत axbafromxb's Avatar
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    Re: Chheen lunga tujhe...

    Update 3 - Devnagiri

    “ इंसानी रूप में मैं रश्मि से नहीं मिल सकता, इसका क्या मतलब हुआ ? आप क्या कह रहे हैं मुझे कुछ समझ में नहीं आ रहा है” अविनाश ने अपनी बेचेनी जताते हुए पूछा. “मैं तुम्हारी तरह इंसान नहीं हूँ अविनाश, हमारी अलग एक दुनिया है जो तुम इंसानो की दुनिया की सोच और समझ से कहीं आगे है. जब भी कोई नेक दिल इंसान किसी मुसीबत में होता है तो मैं या मेरे साथी उसकी मदद करने यहाँ आ जाते हैं. पिछले 3 दिन से तुम यहाँ बेहोश पड़े थे पर मौत चाह कर भी तुम्हे अपने साथ नहीं ले जा रही थी, मानो कुछ ऐसा बाकी रह गया हो जो सिर्फ़ तुम्हारे हाथो होना तय हो”. अविनाश के सारे सवालो को एक जवाब में समेटते हुए वो फरिश्ता बोला.

    “मेरी रश्मि आज भी मुझे बुला रही है, मैं जानता हूँ उसे लिये बिना मैं नहीं मर सकता. पर अभी कुछ देर पहले तो आपने कहा की मैं मर चुका हूँ और इंसानी रूप में मैं अपनी रश्मि से नहीं मिल सकता. फिर कैसे पूरा होगा वो ज़रूरी काम जिसने मेरी मौत तक को मुझसे मिलने नहीं दिया” अविनाश ने ओर बेचैन होते हुए पूछा.


    “ तुम्हारे शरीर के एक एक हिस्से को उन दरिंदो ने इतनी बुरी तरह से तोड़ डाला है की अब इस इंसानी रूप में तुम यहाँ से हिल भी नहीं सकते, मैने जो लेप तुम्हारे माथे पे लगाया था वो सिर्फ़ तुम्हे इन चोटो से हो रहे दर्द को मिटाने के लिये था” फरिश्ते ने अविनाश के सवाल का जवाब देते हुए कहा.


    “ तो आप कहना क्या चाहते हैं, ठीक से समझाइये ना मुझे. मैं नहीं जानता की आप किस दुनिया से आए हैं पर मुझे इतना यकीन है की आप मुझे मेरी रश्मि से मिलवा सकते हैं. मेरी जान आपने बचाई है तो मुझपे एक एहसान ओर कर दीजिए, मेरी रश्मि को मुझसे मिलवा दीजिए. एक बार उसे सीने से लगा लूँ फिर चाहो तो आप अपने हाथो से मुझे मौत दे दीजिएगा.” अविनाश ने भीगी आँखो से गिडगिडाते हुए कहा.


    “उस लड़की में ऐसा क्या है जिसके लिए मौत भी तुम्हे अपने साथ ले जाने में नाकाम रही ? इतनी मोहब्बत क्यूँ करते हो उससे ? “ फरिश्ते ने अविनाश के दिल को टटोलना शुरू किया.


    “ रश्मि सिर्फ़ मेरी मोहब्बत नहीं मेरी ज़िंदगी भी है, उसके लिए ही आजतक जिया था और उसी के लिए मरने की कसम भी खाई थी. उसकी एक मुस्कान से मेरा दिन बदल जाता था और उसकी एक झलक से मेरी रात कट जाती थी. लोग अपने महबूब को चाँद जैसा कहते हैं, मेरी रश्मि से तो चाँद भी शरमाता था, जब कोई नहीं होता था तस्सली देने वाला तो उसकी बातें ही मेरे दिल पे हाथ रख कर बोलती थी मैं हूँ ना “ बारिश बंद हो चुकी थी और अविनाश की साँसे उसका साथ छोड़ रही थी तभी अविनाश ने अपनी बात को रोक कर फरिश्ते से पानी माँगा और बेहोश हो गया.


    फरिश्ता भी अविनाश की बातो में खो चला था और उस सच्चे आशिक़ की अपनी महबूबा के लिए दीवानगी देख कर वो खामोश निगाहों से अविनाश को पानी पिलाने लगा. “डरो मत अविनाश, जब तक मैं तुम्हारे पास हूँ तुम्हे कुछ नहीं होगा” फरिश्ते को अभी रश्मि के बारे में बहुत कुछ जानना था. उसने अपनी छड़ी को अविनाश के दिल पे फिरना शुरू किया और धीरे धीरे फिर अविनाश को होश आने लगा.



    कहते हैं सच्चे प्यार में इतनी ताक़त होती है की मौत भी उन्हे जुदा नहीं कर पाती, अब तक सिर्फ़ सुना था अब हक़ीकत होता दिख रहा था. होश में आते ही अविनाश की आँखों ने फरिश्ते को शुक्रिया कहा और फरिश्ते ने भी पलक झपकाते हुए अविनाश को अपनी बात आगे बढ़ने का इशारा किया. “और क्या ख़ास था तुम्हारी रश्मि में, क्यूँ उसके प्यार में ऐसी हालत हुई तुम्हारी” फरिश्ता सब कुछ जानते हुए अंजान बन कर अविनाश के दिल की आवाज़ सुनना चाहता था.


    “हर आशिक़ के लिए उसका महबूब ख़ास होता है, पर मेरी रश्मि उन ख़ास लोगो से बिल्कुल अलग थी. शर्म और हया की जीती जागती मूरत और फूल की कोमल पंखुड़ी जैसी उसकी पलके बिना कुछ कहे ही हज़ार बात कह जाती थी. ओढ़ने पहनने से लेकर, मिलने और बतलाने तक हर चीज़ का लहज़ा ख़ास था उसमे. उसे देखने और मिलने वाला ऐसा कोई इंसान नहीं था जो उसकी तारीफ किये बिना रह पाया हो.”


    मिट्टी के लेप से अविनाश का दर्द ख़तम हो गया था और फरिश्ते की छड़ी ने अब उसकी साँसे लोटा दी थी. अविनाश अपनी कहानी में डूबता जा रहा था और फरिश्ता अविनाश के चेहरे पे आती हुई खुशी को पढ़ रहा था. अविनाश ने अपनी बात को आगे बढ़ते हुए कहा “ रश्मि के बारे में जितना भी कहूँगा वो उसकी ख़ासियत को बयान करने में कम ही पड़ेगा. आप बस इतना जान लीजिए की वो इस बेरहम दुनिया में अकेली ऐसी लड़की थी जिसने मुझे जीने का मकसद सिखा दिया था. प्यार नाम की चीज़ मेरी ज़िंदगी में कभी नहीं थी और जो लड़कियाँ मेरी ज़िंदगी में आई थी वो प्यार करने के लायक ही नहीं थी. रश्मि से मिलने के बाद ही मुझे प्यार का एहसास हुआ था और ये ज़ालिम दुनिया मुझे उससे दूर करने में लगी थी.” फरिश्ते ने अविनाश की मुस्कुराती आँखों को साथ देते हुए एक हल्की सी हँसी का इशारा किया जिससे अविनाश फिर रश्मि की यादो में खोने लगा.

    अविनाश का दर्द जा चुका था और दिल ओर दिमाग़ रश्मि में खो चुके थे, उसका शरीर अब झट से उठकर अपनी रश्मि को मिलने को बेताब हो रहा था पर उसका चल पाना तो दूर उठ पाना भी नामुमकिन था. लोहे के बड़े बड़े डॅंडो से उसके शरीर को तोड़ा था उन दरिंदो ने और एक एक हड्डी के दस दस टुकड़े हुए थे इतनी बेरहमी से मारा था अविनाश को. अविनाश की बैचानी को फरिश्ता जान गया था पर वो पहले की तरह खामोश हो कर अविनाश की मोहब्बत की गहराई को महसूस कर रहा था. फरिश्ते ने अविनाश का एक हाथ अपने हाथ में लिया और अपने लंबे से कपड़ो की लंबी सी जेब में एक तेल की शीशी निकाली और उसकी बेजान उंगलियों पे उस तेल की मालिश करने लगा. शायद फरिश्ते को पता चल गया था की अविनाश की उंगलियाँ कुछ इशारा करना चाह रही थी. मालिश करते करते फरिश्ते ने फिर अविनाश को अपनी बात आगे बढ़ने का इशारा किया.

    “और क्या बताऊँ मैं आपको रश्मि के बारे में, किसी इंसान को दिल से मोहब्बत करने के लिए इतनी खूबी कम हैं क्या, जो ओर जानना चाहते हैं आप” अविनाश ने सवालिया आँखो से पूछा. फरिश्ते ने बड़े प्यार से उसके हाथ को पलटा और कहा “ ऐसी तो हज़ार लड़कियाँ मिल जाएँगी, ऐसी क्या इससे भी कहीं ज़्यादा खूबियों वाली लड़कियाँ देखी हैं मैने तुम्हारी दुनिया में” ये सुनते ही अविनाश को ना जाने क्या हुआ और उसमे अपना हाथ उठा कर अपनी उंगली से अपनी पेंट में रखे पर्स की तरफ इशारा किया. मिट्टी से दर्द, छड़ी से साँसे और अब उस फरिश्ते के तेल ने उसके हाथो में जान डाल दी थी. अविनाश समझ भी नहीं पाया की कैसे उसका बेजान पड़ा हाथ अचानक पहले की तरह काम करने लगा.


    फरिश्ते ने अविनाश की जेब से पर्स निकाला जिसमे रश्मि की एक बहुत ही खूबशूरत पर चोंका देने वाली तस्वीर थी . उस तस्वीर को देखकर कोई भी इंसान ये नहीं सोच सकता था की जिस रश्मि से अविनाश इतनी मोहब्बत करता है उसकी ऐसी तस्वीर उसके पर्स में होगी. “कैसी है मेरी रश्मि” अविनाश ने फरिश्ते से पर्स को अपनी और घुमाने का इशारा करते हुए कहा. फरिश्ता कभी उस तस्वीर को देखता तो कभी अविनाश की चेहरे पे आई खुशी के पीछे छीपी उस अनसुनी सच्चाई को जिसे सुनने के लिए फरिश्ते की बैचनी बढ़ने लगी थी. फरिश्ते ने वो तस्वीर अविनाश को दिखाए बिना ही अपने पास पड़े एक थैले में रख ली. अविनाश समझ नहीं पा रहा था की फरिश्ते ने उसे उसकी रश्मि की एक झलक तक क्यूँ नहीं देखने दी. बेचैन शरीर उठ कर वो तस्वीर फरिश्ते के थैले से निकालने को तड़पने लगा पर सिर्फ़ हाथो में जान आई थी बाकी शरीर तो अभी भी बेजान पड़ा था. उसने अपने हाथो उपर उठाया और एक बार रश्मि की झलक दिखाने के लिए फरिश्ते से विनती करने लगा. फरिश्ते ने बड़े खामोश अंदाज़ में उसे ऐसा करने से मना कर दिया और अविनाश को उस तस्वीर का सच बताने के लिए एक सवाल किया.

  4. #4
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    Re: Chheen lunga tujhe...

    Update 4 - Devnagiri

    “कब से जानते हो रश्मि को” फरिश्ते ने पूछना शुरू किया “कहाँ देखा था उसे पहली बार”. अविनाश को लगा की रश्मि की उस खूबशूरत तस्वीर ने फरिश्ते को अब रश्मि के बारे में सब कुछ जान लेने के लिए बेचेन कर दिया है लेकिन सच्चाई तो कुछ ओर ही थी, फरिश्ते ने उस तस्वीर में जो कुछ देखा उसका तो अविनाश को अंदाज़ा भी नहीं था. “वो दिन भला मैं कैसे भूल सकता हूँ, जब पहली बार उस हुस्न का दीदार हुआ था” अविनाश ने अपनी और रश्मि की पहली मुलाकात के बारे में बताना शुरू किया “ दौलतगढ़ शहर का सबसे भीड़ भाड़ वाला इलाक़ा कहे जाने वाले सदर बाज़ार के सबसे बड़े चौराहे पे मेरा क्लिनिक है, पेशे से मैं एक साइकॉलजिस्ट हूँ और उपरवाले की दया से दौलतगढ़ और उसके आस पास के छोटे बड़े सभी गाँव शहर के लोग मुझे एक अच्छा साइकॉलजिस्ट मानते हैं, कुछ लोग मुझे मेरे बात करने के तरीके से पसंद करते हैं तो कुछ मेरे इलाज़ करने के. कुछ लोग सिर्फ़ इसलिए आते हैं की मेरी फीस कम है और कुछ लोग इसीलिए आते हैं कि मैने कभी किसी को निराश नहीं किया. मेरे क्लिनिक के बगल में बड़ी मशहूर पान की दुकान है जिसका पान खाने लोग दूर दूर से आया करते हैं. मैं ना तो पान ख़ाता हूँ और ना ही कोई बीड़ी सिगरेट या तंबाकू का शौक है. शाम को घर लौट ते वक़्त मैं रोज़ाना 10 मिनिट उस पान वाले से बाते करता था क्यूँ कि पूरे शहर में किसके साथ क्या हुआ इसकी पूरी जानकारी उसके पास होती थी, पान बनाते बनाते वो लोगो से मसखरी भी किया करता था जिसका कभी किसी ने बुरा भी नहीं माना, बात करते करते माचिस की एक तिल्ली मैं दांतो में दबा लेता था, धीरे धीरे ये मेरी आदत सी बन गयी और पहचान भी, जिसके चलते एक माचिस हमेशा मेरे कोट की जेब में रहने लगी. सुबह क्लिनिक आते वक़्त मेरा ड्राइवर मुझे छोड़ दिया करता था पर शाम को मैं पैदल ही घर जाया करता था. सदर बाज़ार बेहद खूबसूरत था और उन गलियों से गुजरते वक़्त तरह तरह लोग और उनके चेहरे पढने की आदत थी मुझे , आख़िरकार एक साइकॉलजिस्ट जो ठहरा. कोई औरत किसी सब्ज़ी वाले को इसलिए डाँट रही होती थी की 3 दिन पहले ली हुई सब्ज़ी आज सड़ी हुई क्यूँ निकली ,तो कोई बुज़ुर्ग चस्मे वाले से इस लिए लड़ रहे होते थे की ये कैसा चस्मा बनाया इसमे तो कुछ दिखता ही नहीं. कोई मर्द अपनी पत्नी से इसलिए लड़ रहा होता की बच्चो को साथ क्यूँ लेकर आई तो कोई लड़का लड़की एक दूसरे को अपने हाथो से गोलगप्पे खिला कर खुश हो रहे होते. वहीं कुछ ग़रीब औरतें आते जाते लोगो से कुछ खाने को माँग रहे होती तो कोई अपाहिज फूटपाथ के कोने पे बैठा लोगो से कुछ पैसे देने को गिडगिडा रहा होता. और जब इतना सुंदर बाज़ार हो तो आप समझ सकते हैं की हर गली चोराहे पे मनचले आवारा लड़के भी अपनी हाज़िरी लगाए बिना नहीं रह सकते. दौलतगढ़ सिर्फ़ नाम का दौलतगढ़ नहीं था, एक से बढ़कर एक रहीस और नामी गिरामी हस्तियाँ रहती थी यहाँ, दौलत तो जैसे सच में बरसती थी और जहाँ दौलत हो वहाँ अय्यासी तो सबसे पहले आती है और उससे भी पहले आते हैं अय्यासी के ठिकाने . कुल मिलाकर सब कुछ था उस बाज़ार में जो एक बड़े और मशहूर शहर के बाज़ार में होना चाहिए.


    उस बाज़ार की आख़िरी गली को पार करते ही एक अजीब सी खुशबू आया करती थी, ऐसी खुशबू जो ना आप सोच सकते हैं और ना ही मैं बता सकता हूँ. वो खुशबू ना तो किसी पकवान की लगती थी और ना किसी फूल की, ना ही किसी इत्र की और ना ही किसी तेल की. लेकिन उस खुशबू को सूंघते ही मेरा मन बैचैन हो जाता था और घर पहुँचते पहुँचते वो खुशबू मुझे और बैचैन कर देती थी. मैने आस पास के लोगो से भी उस खुश्बू के बारे में पूछ्ने की कोशिश की पर सबने एक ही जवाब दिया “ हमे तो ऐसी कोई खुशबू नहीं आती ” और ऐसे जवाब मुझे और बेचैन कर दिया करते थे. महीनो बीत जाने के बाद भी मैं उस खुशबू का राज़ नहीं जान पाया क्यूँ की वो खुशबू सिर्फ़ मुझे ही महसूस होती थी और अगर बार बार इसका ज़िक्र मैं लोगो से करता तो लोग समझने लगते की मुझे खुद एक साइकॉलजिस्ट की ज़रूरत है और धीरे धीरे मैने उस खुशबू की तरफ ध्यान देना ही छोड़ दिया और जब वो खुशबू मुझे ज़्यादा परेशान करने लगी तो मैने उस रास्ते से जाना ही बंद कर दिया. कुछ दिन अजीब तो लगा पर धीरे धीरे नये रास्ते की आदत हो गयी. एक दिन शाम को वापिस घर जाते वक़्त जब मैं उस पान की दुकान पे गया तो वो पान वाला बोला की “अविनाश बाबू कुछ दिन पहले आप एक अंजानी खुशबू के बारे में बात कर रहे थे ना, एक अजीब सा दिखने वाला आदमी आज हमारी दुकान पे पानी पीने के लिए रुका था और वो भी कुछ ऐसी ही खुश्बू के बारे में बोल रहा था, हमे लगा की कोई पागल है और कहीं आपको ऐसा कहते सुना होगा इस लिए बोल रहा है, पर बाद में हमे पता चला की वो आदमी तो इस बाज़ार में पहले कभी नहीं आया, इसलिए सोचा की आपको बता दें शायद आपको कुछ मदद मिल जाए”


    पान वाले की बातो ने मुझे और मुश्किल में डाल दिया और मुझे लगने लगा की अब तक जिसे मैं अपना भ्रम मान रहा था उसमे ज़रूर कुछ सच्चाई है , मैने बैचैन होते हुए पूछा “ और कुछ बोला क्या उस आदमी ने, कुछ तो याद होगा, कुछ ऐसा जो तुम्हारे हिसाब से कुछ ख़ास ना हो पर मेरे लिए ख़ास हो सकता है, याद करो, ज़रा दिमाग़ पे ज़ोर डालो की क्या क्या कहा था उसने” मैं एक साथ ना जाने कितने सवाल कर डाले और पान वाले को मज़बूर कर दिया की वो कुछ याद करने की कोशिश करे और कुछ देर सोचने के बाद वो बोला “ हाँ अविनाश बाबू, जाते जाते उसने ये ज़रूर कहा था की ‘वो आएगी एक दिन’ पर मुझे लगा की पागल है कुछ भी बोल रहा है, बस और ज़्यादा कुछ याद नहीं आ रहा है साहब”.

    ये सुनने के बाद तो मेरा मन और बेचैन हो उठा, पहले मुझे लगा की शायद की “वो खुशबू एक दिन यहाँ भी आएगी या कोई औरत होगी जो ऐसे सामान बेचती होगी जिसमे ऐसी खुशबू आती हो” मन बेचैन हो उठा था तो मैने सोचा आज फिर उस पुराने रास्ते से ही घर जाता हूँ शायद आज कुछ जानकारी मिल जाए और मैं चल पड़ा उस गली की और जहाँ से अब जाना बंद कर दिया था. सोचा आज आख़िरी बार और कोशिश कर ली जाए उसके बाद कभी इस तरफ मुड़ कर नहीं देखूँगा. वहाँ से गुजरते हर मर्द और औरत से मैने फिर उस खुश्बू के बारे में जानने की कोशिश और साथ ही साथ उस पागल आदमी के बारे में भी जिसकी बाते पान वाले ने सुनी थी. रात हो गयी और पूरा बाजार भी लगभग बंद हो चला था पर किसी ने ना तो उस खुशबू के बारे में कुछ बताया और ना ही उस पागल आदमी के. मैं फिर उदास मन लिए अपने घर की और चल दिया और जैसा हर बार होता था आज भी चैन से नींद नहीं आ रही थी. सोच लिया था की वो आख़िरी कोशिश है अब कभी उस खुसबू के बारे में कुछ जानने की कोशिश भी नहीं करूँगा. पर वो खुशबू मेरा पीछा इतनी जल्दी नहीं छोड़ने वाली थी. अभी तो सिर्फ़ शुरुआत थी आगे जो होना बाकी था वो तो मैने सपने में भी नहीं सोचा था.
    Last edited by axbafromxb; 26-06-2012 at 10:58 AM.

  5. #5
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    Re: Chheen lunga tujhe...

    Update 5 - Devnagiri

    एक और बेचैन करवटें बदलती हुई रात गुजरने के बाद मैं तैयार होकर अपने क्लिनिक जाने के लिए जैसे ही कार में बैठा किसी ने मुझे आवाज़ दी “अविनाश” मैने चारो तरफ मुड़ कर देखा पर वहाँ कोई नहीं था, मुझे लगा रात को ठीक से ना सोने पाने की वजह से मुझे भ्रम हुआ होगा और ज़्यादा ध्यान ना देते हुए मैं अपने क्लिनिक पहुँच गया. मेरा एक बहुत पुराना मरीज दिवाकर सुबह 9 बजे से मेरे क्लिनिक के बाहर मेरा इंतज़ार कर रहा था. पिछले 3 महीनो से मैं दिवाकर का इलाज कर रहा था, बड़ी ही अजीब तरह की मानसिक परेशानी थी उसे. दिन भर वो बिल्कुल ठीक रहता था, अच्छे कपड़े पहनना, सबसे ठीक से बात करना, अच्छा खाना खाना और एक बहुत बड़ी कंपनी में अच्छी नौकरी भी थी उसके पास पर रात को ठीक 9 बजे उसे ना जाने क्या हो जाता था उसके चेहरे पे पसीने आ जाते थे और वो एक कोने में चुप चाप डरा हुआ सा बैठ जाता था. कोई कुछ भी सवाल करे वो कुछ जवाब नहीं देता था, उसकी आँखों में अजीब सा डर और चेहरे पे आते पसीने बस यही बता पाते थे की कोई चीज़ उसे इतना डरा देती है की वो कुछ बोल नहीं पाता है. फिर धीरे धीरे उसकी आँखें बंद होने लगती हैं और वो वहीं बैठा बैठा सो जाता है. रात को उसके घरवाले उसे उसके बेड पर लिटा देते थे और सुबह उठते ही वो सब कुछ भूल जाता था. कुछ दिन तो उसके घरवालो ने सोचा की शायद धीरे धीरे वो ठीक हो जाएगा पर जब उसके साथ ये सब रोज़ाना होने लगा तो वो लोग उसे मेरे क्लिनिक ले आए.

    मैने उससे कुछ सवाल किए पर उन जवाबो में ऐसा कुछ नहीं था जिससे मैं उसे एक मानसिक मरीज का नाम दे सकता था, मैने कुछ दवाइयाँ लिखी पर उन दवाइयो से कुछ फ़र्क महसूष नहीं हुआ. ऐसा ठीक 9 बजे ही क्यूँ होता है मुझे भी समझ नहीं आ रहा था पर उसकी ऐसी हालत अब मुझसे भी नहीं देखी जाती थी तो मैने उसे रात को 9 बजे से पहले ही सोने की सलाह दी और उसकी दवाइयो की बदल कर नींद की गोलियाँ दे दी. शाम को 8 बजते ही उसके घरवाले उसे खाना और दवाई खिला कर सुला देते थे और 9 बजे से पहले ही उसे नींद आ जाती थी. अब उसकी हालत ठीक होने लगी थी नींद की दवा के नशे में वो सोया रहता था पर सुबह उठने में उसे बहुत परेशानी होने लगी थी. मैने सोच रखा था की कुछ दिन की परेशानी से अगर उसका डर चला जाए तो बाद में उसकी दवा बंद कर दूँगा. 15-20 दिन तक सब कुछ ठीक चलता रहा और मैने उसकी दवा बंद करके उसे कुछ दिन के लिए किसी अच्छी,खूबशूरत और सुहानी जगह पे जाने की सलाह दी. उसके घरवालो को भी लगा की शायद शहर से दूर किसी हरी भरी जगह पे इसका हवा पानी बदलेगा तो इसे नींद की गोली लेकर सोना नहीं पड़ेगा.

    पर होना तो कुछ और ही था, वो लोग उसे एक खूबसूरत पहाड़ियों वाली जगह पर ले गये और पहले ही दिन से उसकी नींद की गोली देनी बंद कर दी. जैसे ही रात के 9 बजे,उसकी हालत फिर बिगड़ गयी और वो फिर होटेल के एक कोने में सहमा सा बैठा अपने घरवालो को घूरने लगा. अपने शहर से दूर उस अंजान जगह पर उनका साथ देने वाला कोई नहीं था, किसी को कुछ समझ नहीं आ रहा था की अब क्या करें तभी होटेल के चौकीदार ने उन्हे बताया की इसपर ज़रूर किसी आत्मा का साया है और वो एक तांत्रिक को जानता है जो अभी के अभी इसे ठीक कर सकता है. उनके पास उसकी बातो पे भरोसा करने के अलावा और कोई दूसरा रास्ता भी नहीं था. उन्होने अपने ड्राइवर को उस चौकीदार के साथ जाकर तांत्रिक को होटेल में लाने के लिए भेज दिया. पहले जब भी दिवाकर की ऐसी हालत होती थी तो थोड़ी देर में वो अपने आप सो जाता था पर आज 2 घंटे बीत जाने के बाद भी दिवाकर उस कोने में बैठा काँप रहा था और उसके घरवाले तांत्रिक के आने की राह देख रहे थे

    रात के 11:30 बजे वो चौकीदार उस तांत्रिक को लेके होटेल पहुँचा और जैसे ही तांत्रिक दिवाकर के पास पहुँचा दिवाकर ने उसका हाथ पकड़ कर मरोड़ना शुरू कर दिया और बोला “चले जाओ” , इससे पहले की तांत्रिक कुछ समझ पता दिवाकर ने उसे छोड़ दिया और वहीं बेहोश हो गया. तांत्रिक की जान में जान आई और उसने दिवाकर को बेड पर लिटाया और उस आत्मा का पता लगाने के लिए अपना टोना टोटका करने लगा. पूरी रात बीत गयी पर तांत्रिक को कुछ हासिल नहीं हुआ. तांत्रिक समझ चुका था की उसकी टक्कर किसी चलती फिरती आत्मा या भूत से नहीं किसी बहुत ही ताकतवर साए से है और जो उसे यहाँ से चले जाने को बोलकर ये चेतावनी देकर ज़िंदा छोड़ गया की अगर दोबारा कोशिश की तो जान से हाथ धोना पड़ेगा. तांत्रिक ने दिवाकर के घरवालो से माफी माँगते हुए कहा की “मैं जानता हूँ की आप की क्या हालत है और मैं चाह कर भी आपकी कोई मदद नहीं कर सकता, ना ही मैं किसी ऐसे आदमी को जानता हूँ जो आप लोगो को इस परेशानी से छुटकारा दिला सके.”

    ये कहकर वो तांत्रिक वहाँ से लौट गया, पर जाते जाते उसने अपने नाख़ून से दिवाकर के माथे पर एक निसान बना दिया. शायद उस तांत्रिक के दिमाग़ में कुछ चल रहा था जिसे वो किसी को बताना नहीं चाहता था. दिवाकर के घरवाले उसी वक़्त वापिस घर आ गये और अगले दिन से दिवाकर बिल्कुल ठीक रहने लगा. धीरे धीरे दिवाकर के माथे से वो निसान गायब होता जा रहा था . और कल रात वो निसान बिल्कुल मिट गया और दिवाकर की हालत पहले की तरह बिगड़ने लगी.दिवाकर के घरवालो ने मुझे फोन किया और मैने कहा आज मेरी तबीयत भी ठीक नहीं है आप दिवाकर को वही नींद की दवा देकर सुला दो और सुबह होते ही दिवाकर को मेरे क्लिनिक ले आना. उन्होने ठीक वैसा ही किया और सुबह 9 बजे ही दिवाकर को मेरे क्लिनिक ले आए.

    मैने दिवाकर को अपने कॅबिन में बुलाया और पूछा “क्या हुआ दिवाकर तुम तो बिल्कुल ठीक हो गये थे और पहाड़ियों पे घूमने भी गये थे, तो वापिस क्यूँ आ गये, पहाड़ी अच्छी नहीं लगी या यहाँ किसी लड़की की याद आ रही थी जो वहाँ मन नहीं लगा तुम्हारा” मैने उसके मन को जानने के लिए उसके साथ मज़ाक करना शुरू किया पर दिवाकर बिल्कुल चुप बैठा था, उसकी नज़रें नीचे देख रही थी और वो कोई जवाब नहीं दे रहा था, काफ़ी देर तक उससे सवाल करने के बाद मुझे ऐसा लगा की दिवाकर कहीं ओर ही खोया हुआ है और मैने धीरे से पूछा “ कौन है वो” उसके बाद जो जवाब मिला उसे सुनकर मेरा पूरा शरीर काँप गया. दिवाकर ने जवाब दिया “ अविनाश” बिल्कुल वही आवाज़ जो मैने आज सुबह कार में बैठते ही सुनी थी. इतना कहकर दिवाकर को नींद आ गयी तो मैने उसके घरवालो को कहा की इसे यहीं सोने दो और आज आप लोग भी यहीं पे रुके रहो. जब ये दोबारा सो कर उठेगा तो मैं इससे फिर बात करूँगा.

    इतना कहकर मैं क्लिनिक से बाहर आ गया और थोड़ी दूर बने एक कॉफी हाउस में कॉफी पीने बैठ गया. मैं कुछ समझ नहीं पा रहा था की ये सब मेरे साथ क्या हो रहा है और क्यूँ हो रहा है. पहले वो अंजानी खुशबू , फिर पागल आदमी और अब ये आवाज़. जिन बातो पर मैं चाह कर भी विश्वास नहीं कर सकता वो सब मेरे साथ ही हो रहा है. दूर दूर से लोग अपनी मन की बेचैनी का इलाज़ करवाने के लिए मेरे पास आते हैं पर मैं अपनी बेचैनी, अपनी परेशानी किसे बताऊं, किसी को ग़लती से भी बता दिया तो लोग मेरे क्लिनिक पर भी ये सोच कर आना बंद कर देंगे की जो खुद परेशान रहता है वो किसी का क्या इलाज़ करेगा. कॉफी आ चुकी थी और ठंडी भी हो चुकी थी, तभी किसी ने मेरे कंधे पर हाथ रखा और आवाज़ आई “ अविनाश बेटा, क्या सोच रहे हो” मैने सर उठा कर देखा तो मेरे पास वो इंसान खड़ा था जिसके यहाँ होने की ना तो कोई उमीद थी और ना ही कोई वजह पर मानो मेरे मन को ऐसा लगा की यही वो इंसान है जो मेरी परेशानी को समझ सकता है और उसका रास्ता भी निकाल सकता है.

  6. #6
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    "डॉक्टर प्रकाश , सर आप यहाँ कैसे” मैने खड़े होते हुए पूछा “बैठिए ना सर, मैं कॉफी ऑर्डर करता हूँ” मैने वेटर को आवाज़ दी और कहा “ पहले 2 ग्लास ठंडा पानी लेके आओ फिर सर के लिए एक कप गरमा गर्म चाय विदाउट शुगर और मेरे लिए कॉफी”. डॉक्टर प्रकाश को देख कर मैं इतना खुश था की मानो मेरी सारी परेशानियाँ आज ख़त्म होने वाली हों. “सर, आपने बताया नहीं आप यहाँ कैसे” मैने डॉक्टर प्रकाश से फिर वही सवाल दोहराया. “ तुमने बताने कहाँ दिया बेटा, मुझे कुछ कहने का मौका ही कहाँ दे रहे हो” डॉक्टर प्रकाश ने मज़किया अंदाज़ में जवाब दिया. “माफ़ करना सर, आपके यहाँ आने से मैं कितना खुश हूँ आप अंदाज़ा भी नहीं लगा सकते. अब आप बताइए यहाँ कैसे आना हुआ” .डॉक्टर प्रकाश बोले “3 महीने पहले 4 लोग हमारे शहर विलासनगर के जंगल में बेहोश पड़े मिले थे, पुलिस ने उन लोगो को विलासनगर हॉस्पिटल में भरती कराया था जहाँ उनका इलाज़ चल रहा था.उनमे से 3 लोग दौलतगढ़ के आस पास के ही थे और किसी बहुत बड़ी कंपनी में काम करते थे और उसी कंपनी के काम से ये लोग उस जंगल में गये थे. उन तीन लोगो को तो डॉक्टर बचा नहीं पाए और उनके परिवार वालो में से किसी ने भी उस चौथे आदमी को कभी नहीं देखा था. लेकिन चौथा आदमी कुछ दिन बाद होश में आ गया था, पर ना तो वो कुछ बोलता और ना ही कुछ खाता पीता था. डॉक्टर्स को लगा की ये ज़रूर किसी सदमे में है और शायद एक अच्छा साइकॉलजिस्ट इसे उस सदमे से बाहर ला सकता है, उन्होने मुझे हॉस्पिटल में बुलाया और मैने उस आदमी के कई तरह के टेस्ट भी करवाए लेकिन कोई फायदा नहीं हो रहा था. मैं रोज़ हॉस्पिटल जाता और उससे 1 घंटे तक अलग अलग तरह के सवाल करके उससे कुछ जानने की कोशिश किया करता. कल सुबह जब मैं हॉस्पिटल पहुँचा तो उसकी हालत बहुत ज़्यादा खराब हो चुकी थी और वो अपनी आख़िरी साँसे गिन रहा था. पर ना जाने क्या हुआ कल पहली बार उसने खुद मुझे अपने पास बुलाया और कुछ कहने की कोशिश करने लगा, उसकी ज़ुबान लड़खड़ा रही थी और मैं कुछ समझ नहीं पा रहा था की वो क्या कहना चाहता है तभी उसने मेरी जेब की तरफ इशारा किया और उसमे से कुछ पैसे निकालने को कहा. मैने जैसे ही वो पैसे उसे दिखाए उसने अपनी शरीर की पूरी ताक़त लगते हुए धीरे से कहा “अविनाश” और उसने वहीं अपना दम तोड़ दिया. मैं कुछ समझ नहीं पाया की पैसे और अविनाश का आपस में क्या रिश्ता है. लेकिन कहते हैं ना छोटी से छोटी चीज़ भी कभी कभी बहुत काम आती है वहीं हुआ मेरे साथ. मैं जब हॉस्पिटल से बाहर आ रहा था तो कुछ लोग हॉस्पिटल के डॉक्टर्स से झगड़ा कर रहे थे की उनके जिस मरीज का इलाज करने से उन्होने मना कर दिया उसे दौलतगढ़ के एक डॉक्टर ने बिल्कुल ठीक कर दिया है. मैने ऐसे ही मज़ाक में पूछ लिया की “ कौन है भाई वो डॉक्टर जो विलासनगर के इतने नामी डॉक्टर्स से भी ज़्यादा अच्छा साइकॉलजिस्ट है” तो उनके मुह से एक ही नाम निकला “डॉक्टर अविनाश”. उस आदमी ने मरते वक़्त भी अविनाश का नाम लिया और अब इन लोगो ने भी. पहले मुझे लगा की इत्तेफ़ाक होगा पर जब दिमाग़ पर थोड़ा ज़ोर डाला तो मैं समझ गया की वो मरता हुआ आदमी जो पैसो की तरफ इशारा कर रहा था उसका मतलब “दौलत” था और “अविनाश” का मतलब दौलतगढ़ का डॉक्टर अविनाश. दौलतगढ़ का अविनाश तो मेरा सबसे होनहार असिस्टेंट था,बस बिना देर किये मैं सीधा तुमसे मिलने चला आया”. डॉक्टर प्रकाश ने अपनी बात और चाय दोनो ख़तम करते हुए मुझे अपने आने की वजह बताई.

    मैने मन ही मन सोचा की अभी तो मेरी अपनी ही परेशानियाँ ख़तम नहीं हुई थी और उपर से उस मरते हुए आदमी ने मेरा नाम लेके एक और नयी परेशानी खड़ी कर दी. पर मुझे भी डॉक्टर प्रकाश की मदद करने और मदद लेने के अलावा कोई दूसरा रास्ता नज़र नहीं आ रहा था. “पर आपने तो बताया की उस चौथे आदमी की पहचान नहीं हो पाई थी, और ना ही दौलतगढ़ के उन तीन लोगो के परिवार वालो को उस आदमी के बारे में कुछ पता था तो फिर उसने क्यूँ मेरा नाम लिया. हो सकता है दौलतगढ़ में कोई और अविनाश हो या वो पैसे दिखा कर वो कुछ और कहना चाहता हो.” मैने डॉक्टर प्रकाश से सवाल किया. “ हो सकता है अविनाश की तुम ठीक कह रहे हो पर इन 2 दिनो में जो कुछ मेरे साथ हुआ उसी से अंदाज़ा लगा कर मैं तुम्हारे पास चला आया, वैसे भी तुमसे मिलने तो आना ही था, आख़िर यहाँ के सबसे नामी और मशहूर साइकॉलजिस्ट जो बन गये हो”. अविनाश मुस्कुराया और बोला “नहीं सर, ऐसी कोई बात नहीं, आप खबर भिजवा देते तो मैं खुद आपसे मिलने चला आता, आपको तकलीफ़ उठाने की क्या ज़रूरत थी” मैने अपने गुरु को इज़्ज़त देते हुए जवाब दिया. “अरे नहीं अविनाश, अभी किसी को नहीं पता है की उस मरते हुए आदमी ने जो पैसे और अविनाश का नाम लिया था उसका कोई रिश्ता दौलतगढ़ के डॉक्टर अविनाश से है, वरना तुम जानते हो की पुलिस के लिए तो इतना सुराग बहुत था तुम्हे परेशान करने के लिए”. मैने कहा “ वो तो आप सही कह रहे हैं सर, पर आप नहीं जानते की आपने यहाँ आकर मुझपे कितना बड़ा एहसान किया है, मैं पिछ्ले कई दिनो से इतना परेशान हूँ की मैं अपनी परेशानी किसी को बता भी नहीं सकता. एक आप ही हैं जो मेरी परेशानी समझ सकते हैं और शायद उसका कोई रास्ता भी निकाल सकते हैं”. डॉक्टर प्रकाश ने मेरे कंधे पे हाथ रखा और बोले “ परेशान होने से परेशानी दूर नहीं होती बेटा, परेशानी को परेशान करके ही उसे दूर किया जाता है और ये बात इतने बड़े साइकॉलजिस्ट को बताने की मुझे ज़रूरत नहीं होनी चाहिए. आओ तुम्हारे घर चलते हैं वहीं बैठ कर आराम से बात करेंगे” डॉक्टर प्रकाश ने अपनी कार की और इशारा करते हुए अपने साथ चलने को कहा. मैने उन्हे बताया की जिस चीज़ ने मुझे परेशान किया हुआ है वो तो अभी मेरे क्लिनिक में मेरा इंतेज़ार कर रही है और मैने डॉक्टर प्रकाश को मेरे साथ मेरे क्लिनिक चलने को कहा. हम दोनो जब क्लिनिक पहुँचे तो दिवाकर अभी भी सो रहा था और उसके घरवाले उसके पास ही बैठे थे.


    क्लिनिक की उपरी मंज़िल पर मैने एक गेस्ट रूम बनाया हुआ है जहाँ मैं अक्सर लंच करने के बाद थोड़ी देर आराम कर लिया करता था. मैने डॉक्टर प्रकाश को गेस्ट रूम में बिठाया और उन्हे कहा की आप चाहें तो यहाँ नहा सकते हैं, आराम कर सकते हैं. उसके बाद मैं आपको बहुत कुछ बताना चाहता हूँ. डॉक्टर प्रकाश ने अपने जूते उतारे और बेड के सिराने से अपनी कमर लगा कर बैठ गये और बोले “ अविनाश, तुम बैठो और पहले अपनी परेशानी मुझे बताओ, आराम तो मैं शाम को होटेल जाकर भी कर लूँगा”. “होटेल क्यूँ सर , आप मेरे गुरु हैं, मेरे मेहमान हैं, और वैसे भी अब जब तक मेरी परेशानी दूर नहीं हो जाती आप मेरे साथ मेरे घर पर ही रहेंगे” मैने ज़िद करते हुए बोला. डॉक्टर प्रकाश ने कहा ही मैं ज़्यादा दिन यहाँ नहीं रुक सकता, तुम जानते हो मैं भी तुम्हारी तरह लोगो की सेवा करता हूँ. मैने कहा आप पहले मेरी परेशानी जान लीजिए उसके बाद जैसा आपको ठीक लगे वैसा आप कर सकते हैं. डॉक्टर प्रकाश ने हंसते हुए कहा “ अभी भी पहले की तरह ज़िद्दी ही हो, सामने वाले को अपनी बातो में फँसना खूब आता है तुम्हे, तुम्हारी पत्नी तो तुमसे कभी नाराज़ नहीं होती होगी क्यूँ की उससे ज़्यादा ज़िद तो तुम करते होंगे” मैने शरमाते हुए कहा “अभी शादी नहीं की सर, कभी इस बारे में सोच ही नहीं पाया” और फिर डॉक्टर प्रकाश को मैने वो सब बताना शुरू किया जो पिछ्ले कुछ दिनो से मुझे परेशान कर रहा था, वो अंजान खुश्बू, वो अंजान पागल आदमी , वो अंजान आवाज़ और दिवाकर की अंजान बीमारी, एक एक करके मैं उन्हे सारी बातें बताता गया और जैसे ही मैने उन्हे बताया की आज सुबह दिवाकर के मुह से वहीं अंजान आवाज़ सुनाई दी तो अचानक नीचे से किसी की ज़ोर ज़ोर से चिल्लाने की आवाज़ आई. मैं और डॉक्टर प्रकाश नीचे की तरफ दौड़े.

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    Update 7 - Devnagiri

    वो दिवाकर की मा की चींख थी, नीचे जाकर देखा तो दिवाकर की मा क्लिनिक के बाहर ज़ोर ज़ोर से चिल्ला रही थी “कहाँ ले जा रहे हो मेरे दिवाकर को”. मैं दौड़ते हुए दिवाकर की मा के पास गया और उनसे पूछा की आप क्यूँ चिल्ला रही हैं. “वो ले गये मेरे बेटे को” दिवाकर की मा ने रोते हुए जवाब दिया . मैने चौंकते हुए पूछा “ दिवाकर तो अंदर लेटा था ना, क्या हुआ उसे, कौन लोग ले गये उसे, ये क्या कह रही हैं आप”. इससे पहले की दिवाकर की मा कुछ जवाब देती पिछे से डॉक्टर प्रकाश ने आवाज़ दी “अविनाश, उन्हे अंदर ले आओ, बैठ कर बात करते हैं”. मैने दिवाकर की मा का हाथ थामा और उन्हे अंदर ले आया. “बोलिए आंटी, कौन थे वो लोग और कहाँ ले गये दिवाकर को” . उनकी आखों से आँसू रुकने का नाम नहीं ले रहे थे , कंपकपाती आवाज़ में उन्हे बताया की “पता नहीं डॉक्टर साहब , वो चार लोग थे और उन्होने काले रंग के कपड़ो से अजीब सा भेश बनाया हुआ. उनका चेहरा भी ठीक से दिखाई नहीं दे रहा था. उन सबकी आँखें भी बहुत डरावनी थी. वो अचानक से अंदर आए और दिवाकर को उठा कर ले जाने लगे. मैं रोकना चाहा तो मेरे मुँह पे हाथ रख कर मेरी आवाज़ बंद कर दी और दिवाकर को खींचते हुए एक लंबी सी काली कार में डाल दिया, मैने उन्हे बड़े चौराहे से सीधे हाथ की तरफ मुड़ते हुए देखा था”. दिवाकर की मा रोये जा रही थी. मैने डॉक्टर प्रकाश से कहा “सर, मैं सबसे पहले पुलिस को खबर देता हूँ, अभी ज़्यादा दूर नहीं गये होंगे वो लोग” डॉक्टर प्रकाश ने पहले तो मुझे रोका फिर दिवाकर की मा की हालत देखते हुए उन्होने मुझे इज़ाज़त दे दी.


    मैने तुरंत पुलिस स्टेशन में फोन मिलाया और उन्हे सारी बात बता दि.पुलिस स्टेशन से जवाब मिला की इंस्पेक्टर साहब जल्दी से जल्दी क्लिनिक पहुँच जाएँगे. फिर मैने दिवाकर के छोटे भाई को तुरंत क्लिनिक आने के लिए फोन किया ,उसे लगा शायद फिर से दिवाकर की हालत बिगड़ गयी है उसने मेरी बात सुने बिना ही ये बोलकर फोन काट दिया की बस 5 मिनिट में क्लिनिक पहुँच रहा है. मैं दिवाकर की मा को चुप कराने की कोशिश कर रहा था और डॉक्टर प्रकाश ना जाने किस सोच में डूबे थे. रोते रोते दिवाकर की मा बेहोश होने लगी लेकिन तब तक दिवाकर का छोटा भाई वहाँ पहुँच गया उसने अपनी मा को पानी पिलाया और चुप होने को समझाने लगा. मैने उसे सारी बात बताई और कहा की पुलिस के आने तक अपनी मा के पास ही रहे और उनका ख्याल रखे. डॉक्टर प्रकाश ने मुझे मेरे कॅबिन में चलने का इशारा और मैं दिवाकर की मा को ये दिलासा देकर कॅबिन में आ गया की अभी पुलिस आने वाली है और आपके बेटे को कुछ नहीं होगा.



    डॉक्टर प्रकाश बोले “अविनाश, ये सब जो हो रहा है , जैसा दिख रहा है, इन सबके पीछे ज़रूर कोई बहुत बड़ी साजिश चली जा रही है और मुझे लगता है इसका सुराग पुलीश नहीं हमें ही मिलकर ढूँढना पड़ेगा. दिवाकर का अपहरण तो सिर्फ़ तुम्हारा ध्यान इन सबसे हटाने के लिए किया गया है जिससे तुम पुलिस के सवाल जवाब में फँसे रहे हो और पिछ्ले दिनो में जो भी तुम्हारे साथ हुआ है उन सबसे तुम्हारा ध्यान हट जाए.” मैं कुछ समझ नहीं पाया की डॉक्टर प्रकाश क्या कहना चाहते हैं तो मैने उनसे कहा की आप खुल के बताइए की अब हमे क्या करना है. डॉक्टर प्रकाश ने दिवाकर के छोटे भाई और उसकी मा को मेरे कॅबिन में बुलवाया और दिवाकर के छोटे भाई से पूछा “ बेटा, क्या नाम है तुम्हारा” . “जी मेरा नाम वैभव है, मैं दिवाकर भैया का छोटा भाई हूँ वो मुझसे 4 साल बड़े हैं”. “ वैभव बेटा, क्या क्या जानते हो अपनी भाई के बारे में” डॉक्टर प्रकाश ने सवाल किया. “जी, सब कुछ, दिवाकर भैया के बारे में एक एक बात का मुझे पता है. वो क्या करते हैं, कहाँ जाते हैं, किससे मिलते हैं,सब कुछ, यहाँ तक की मा और पापा को भी नहीं पता होता की भैया कब कहाँ जाते हैं पर मुझे ज़रूर बताकर जाते हैं.” वैभव ने बेझिझक जवाब दिया. डॉक्टर प्रकाश की आँखें वैभव का चेहरा पढ़ रही थी और वो वैभव से सवाल किए जा रहे थे “फिर तो तुम्हे ये भी पता होगा की वो कौन लोग थे जो दिवाकर को उठा कर ले गये, तुम्हे तो सब पता है ना की दिवाकर की किससे दोस्ती है और किससे दुश्मनी” ओर प्रकाश ने बहुत ही गंभीर सवाल किया. “दुश्मनी, ये आप क्या कह रहे हैं, मेरे भैया की तो किसी से कोई दुश्मनी नहीं है, इतने अच्छे इंसान का भला कोई दुश्मन हो सकता है. स्कूल, कॉलेज और डी.जी.बी में भी किसी से आजतक उनका झगड़ा नहीं हुआ. वो तो बेहद सीधे और ईमानदार इंसान है. उनका कोई दुश्मन नहीं हो सकता” वैभव बिना रुके अपने भाई की तारीफ़ किए जा रहा था तभी डॉक्टर प्रकाश ने उसे टोका और बोले “आजकल ईमानदार और अच्छे लोगो के ही सबसे ज़्यादा दुश्मन होते हैं, जानते हो ना, और ये डी.जी.बी क्या है”. “डी.जी.बी मतलब दौलतगढ़ बायोटेक लिमिटेड. जहाँ मेरे भैया काम करते हैं,यहाँ से थोड़ी दूर जंगल के पास ही बहुत बड़ी कंपनी है जिसमे इंसान और पेड़ पौधो पे रिसर्च की जाती है, बड़े बड़े वैज्ञानिक वहाँ काम करते हैं और मेरे भैया भी पिछ्ले 2 साल से वहाँ एक वैज्ञानिक को असिस्ट कर रहे हैं, पर पिछ्ले कुछ दिनो से उनकी तबीयत बहुत खराब चल रही है तो कंपनी ने उनके ठीक होने तक उन्हे छुट्टी दे दी थी”.

    वैभव एक एक बात का जवाब बिना रुके दिए जा रहा था. तभी अचानक क्लिनिक के बाहर एक गाड़ी आकर रुकी जिसमे से एक लंबा कद ,गोरा रंग और मज़बूत शरीर लिए आँखों पे काला चस्मा लगाए पुलिस की वर्दी पहने और हाथ में इंस्पेक्टर का डंडा हिलाते हुए एक नौजवान मेरे कॅबिन के अंदर दाखिल हुआ, जिसे देखकर पहले तो मैं चौंक गया और फिर साथ ही साथ चेहरे पे हँसी पे भी आ गयी और मैने कहा “ रवि... तू...यहाँ... मेरी आँखो का धोखा है या तू सच में रवि है.” वो बोला “जी डॉक्टर साहब मैं रवि ही हूँ आपका सबसे पुराना, एकलौता कमीना दोस्त इंस्पेक्टर रवि. कल ही यहाँ पोस्टिंग हुई और आज आपने फोन करके यहाँ बुला लिया. सोचा था तुझे सर्प्राइज़ दूँगा पर यहाँ तो सब उल्टा ही हो गया” रवि मुझे चिड़ाते हुए बोला. “ बोलो क्यूँ फोन किया था, क्या लफड़ा हुआ है इधर,किसके अपहरण की रिपोर्ट लिखवा रहा था फोन पर.” रवि कुछ ही पल में अपने पुलिस वाले ढंग में बाते करने लगा. मैने कहा “रवि यार, बताना तो तुझे बहुत कुछ था पर फिलहाल जो बताना है वो ये है कि मेरे एक मरीज दिवाकर को कुछ लोग जबरन उठा कर ले गये हैं, मैं और मेरे गुरु डॉक्टर प्रकाश उपर गेस्ट रूम में बाते कर रहे थे और जब तक हम नीचे आए तब तक वो लोग दिवाकर को ले जा चुके थे. उनकी गाड़ी, उनका हुलिया सब दिवाकर की मा जी को ही पता है, उनके अलावा यहाँ नीचे कोई और नहीं था, ये वैभव दिवाकर का छोटा भाई है और इसे मैने पुलिस में फोन करने के बाद यहाँ बुलाया है, बाकी तुम खुद इनसे पूछ लो और हाँ ये लोग पिछ्ले कई महीनो से परेशान है तो ज़रा प्यार से ही बात करना,तुम पुलिस वाले कभी भी शुरू हो जाते हो ये सब जानते हैं”. रवि पहले मुस्कुराया और फिर मेरी तरफ घूरते हुए बोला की “ अगर तू मेरा दोस्त ना होता तो अभी बता देता की पुलिस वाले कैसे शुरू होते हैं, शाम को मिलता हूँ तुझसे तेरे घर ” और इतना कहकर वो दिवाकर की मा और छोटे भाई को अपने साथ पुलिस स्टेशन ले गया.

    उसके जाते ही डॉक्टर प्रकाश ने मुझसे कहा “अविनाश बेटा, ये वही रवि है क्या जिसकी बहन की अनसुलझी मौत ने तुम्हे आज इतना बड़ा साइकॉलजिस्ट बना दिया . याद है वो पहला दिन था जब तुम मुझसे मिलने आए थे और उस लड़की को बचाने के लिए तुम मुझसे ही लड़ बैठे थे.

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    Update 8 - Devnagiri

    डॉक्टर प्रकाश ने जैसे ही रवि की बहन का ज़िक्र किया मेरी आँखें नम होने लगी, मैने अपने आप को संभालते हुए उनसे कहा “ चलिए सर, घर चलते हैं. ना तो आज मेरा यहाँ मन लग रहा है और वैसे भी कुछ देर में शाम होने वाली है, रवि भी शाम को घर पर मिलने के लिए बोलकर गया है और वो ज़रूर आएगा. मैं तो शाम को पैदल ही घर वापिस जाता हूँ आप अपनी कार से मेरे घर पहुँचिए मैं नौकर को बोलकर आपके रहने और खाने पीने का इन्तेजाम करा देता हूँ. डॉक्टर प्रकाश बोले,” अगर तुम्हे ऐतराज़ ना हो तो मैं भी तुम्हारे साथ पैदल ही चलता हूँ, रास्ते में कुछ बातें भी हो जाएँगी और आज मैं भी वो जगह देख लूँगा जहाँ तुम्हे वो अंजानी खुश्बू आती है.” मैने सोचा था की कुछ पल अकेले रहूँगा तो फिर से अपने आप को मज़बूत कर लूँगा पर फिर मैने सोचा की चलो हो सकता है डॉक्टर प्रकाश को उस जगह पर कुछ ऐसा मिल जाए जो मैं नहीं ढूंढ पाया. डॉक्टर प्रकाश ने अपने ड्राइवर को बुलवाया और उसे समझाया की वो कार लेकर मेरे घर चला जाए और उनका सामान उनके कमरे में रख दे. ड्राइवर कार लेकर निकल गया और मैं और डॉक्टर प्रकाश घर की ओर चलने के लिए जैसे ही आगे बढ़े डॉक्टर प्रकाश ने बगल वाली पान की दुकान की तरफ इशारा करते हुए कहा “अविनाश, आज पान खाने का मन हो रहा है. बहुत तारीफ़ सुनी है तुम्हारे मुह से इसकी,ज़रा देखें तो क्या ख़ास बात है इसके पान में.” मैं समझ गया की डॉक्टर प्रकाश ज़रूर उस पान वाले से कुछ बातचीत करना चाहते हैं. मैं मना भी कैसे कर सकता था आख़िर गुरु हैं मेरे.

    जैसे ही हम दोनो पान की दुकान पे पहुँचे डॉक्टर प्रकाश ने कहा “ अरे सुनो, क्या नाम है तुम्हारा, बढ़िया से 2 पान लगाओ देखें तो सही तुम्हारा पान विलासनगर वाले चौरसिया से कितना अच्छा है. “ हमरा नाम हरिओम चौबे है साहिब, और वो बुडबक चौरसिया तो चार दिन से पान बनाना सीखा है, हमरे तो बाप दादा भी इसी जगह पर पिछ्ले ना जाने कितने सालो से दौलतगढ़ के लोगो को पान खिला रहे हैं. बताइए पत्ता कौन सा लगवाएँगे बनारसी या दौलतगढ़ का इशपेसल.” डॉक्टर प्रकाश ने उसे टोकते हुए कहा “ दौलतगढ़ का स्पेशल पान का पत्ता, इस इलाक़े में तो पान की खेती होती ही नही, कब से बेवकूफ़ बना रहे हो लोगो को”. चौबे पहले तो सकपकाया फिर अपनी बात को मजबूत करते हुए बोला “खेती भले ही ना होती हो साहिब, पर हम खुद जाके दूर जंगल से ये पान के पत्ते तौड कर लाते हैं. ससुरा कोई हिम्मत नहीं करता उधर जाने की और वहाँ सिर्फ़ एक ही पान का पेड़ है, ये लंबा चौड़ा, बहुतेही ख़ास पेड़ लगता है वो, और एक दम ख़ास स्वाद आता है उसके पत्ते में, आप खाईएगा तो पता चलेगा आपको. जो भी खाता है बार बार माँगता है, इसी ने तो हमका भर्ल्ड फेमस बनाया है दौलतगढ़ में.” जैसे ही उसने अपनी बात पूरी की डॉक्टर प्रकाश ने मेरी और देखा और आँखों ही आँखों में कुछ समझने का इशारा किया, मैं भी उनके इशारे को समझ गया और चुपचाप उनकी बाते सुनता रहा. डॉक्टर प्रकाश ने कहा “एक काम करो चौबे, एक बनारसी पान बना दो और एक अपना ख़ास दौलतगढ़ इशपेसल, दोनो ख़ाके देखूँगा और सुबह बताऊँगा की किसमे ज़्यादा स्वाद है.” चौबे गुनगुनाते हुए पान बनाने लगा और बोला “ अविनाश बाबू , ये साहिब आपके रिस्तेदार हैं क्या, बहुतेही होशियार मालूम दिखते हैं, आपकी तरह डाक्टर हैं का”. मैने कहा “ जल्दी जल्दी पान लगाओ चौबे, ये मेरे रिस्तेदार ही नहीं मेरे गुरु, मेरे भगवान, सब कुछ हैं. इनसे मसखरी ना करना, मुझे बुरा लगेगा. पॅयन दो और हमे निकलने दो, पैदल घर जाना है देर हो जाएगी”. चौबे ने फटाफट हाथ चलाए और पान लिफाफे में डालते हुए बोला “ माफी देना साहिब, हमका
    मालूम नहीं था, आप बुरा ना मानीएगा. और जब ये आपके इतने ख़ास हैं तो हमारी तरफ से ये दोनो पान मुफ़त आपके लिए. दौलतगढ़ में आपका स्वागत है साहिब, लीजिए आपके पान”. चौबे ने आख़िर में मसखरी कर ही दी पर डॉक्टर प्रकाश ने उसकी बात का बुरा नहीं माना. उनका ध्यान तो पान के पत्ते और उस जंगल के पेड़ पर था. मैने चौबे से माचिस की एक तिल्ली ली और दांतो में दबाकर डॉक्टर प्रकाश के साथ उस गली की और चल दिया जहाँ वो खुसबू मुझे परेशान किया करती थी.जैसे ही मैं और डॉक्टर प्रकाश उस गली के मोड़ पर पहुँचे वो खुश्बू फिर मुझे महसूस होने लगी. मैने डॉक्टर प्रकाश से कहा “सर, वो खुसबू मुझे इस वक़्त महसूस हो रही है, क्या आपको कोई ऐसी खुसबू आ रही है जो एक दम अंजानी हो, पहली कभी महसूस ना की हो". डॉक्टर प्रकाश का जवाब भी वही था जो सब लोगो से मिला करता था “नहीं अविनाश, मुझे भी ऐसा कुछ महसूस नहीं हो रहा है जिसे मैं कुछ खास या अंजाना कह सकूँ”. थोड़ा आगे बढ़े पर वो खुश्बू सिर्फ़ मुझे ही महसूस हो रही थी, डॉक्टर प्रकाश उस गली की एक एक मकान, दुकान, पेड़ पौधे, गमले और यहाँ तक की दीवारो पे चिपके पोस्टर तक को गौर से देख और सूंघ रहे थे. पर उन्हे कुछ भी अंजानी खुसबू महसूस नहीं हुई. एक और निराशा के साथ मैं डॉक्टर प्रकाश के साथ घर की तरफ बढ़ने लगा. खुसबू से मेरा मन बैचैन होता जा रहा था और मैं समझ गया था की आज की रात भी करवटें बदल बदल कर ही कटेगी क्यूंकी सुबह होने से पहले तो ये खुसबू मेरे दिमाग़ से जाएगी नहीं.


    इधर हम दोनो मेरे घर की और बढ़ रहे थे उधर इंस्पेक्टर रवि पुलिस स्टेशन में दिवाकर की मा और उसके छोटे भाई वैभव से पूछताछ कर रहा था. जो बातें वैभव ने हमे बताई वो सब सुनने के बाद रवि ने उनसे सवाल किया “ किस साइंटिस्ट को अस्सिट करा रहा था तुम्हारा भाई, क्या नाम है उसका”. वैभव अपनी मा की तरफ देखते हुए बोला “ सर, वो तो मुझे भी नहीं पता, भैया की कंपनी का एक सख़्त क़ानून है की वो डी.जी.बी में हो रही रिसर्च के बारे में किसी को कुछ नहीं बता सकते. ना ही कंपनी में कुछ अंदर ले जा सकते है और ना ही बाहर ला सकते हैं. ना फोन, ना पेन,ना पर्स, ना लंच. यहाँ तक की डी.जी.बी में अंदर जाने से पहले यूनिफॉर्म भी गेट पर बने चेंजिंग रूम में ही बदल कर जानी होती है. बहुत ही सख़्त क़ानून हैं डी.जी.बी के पर तन्खवा बहुत अच्छी होने की वजह से लोग उनके सारे क़ानून मान लेते हैं. सबका यही सोचना है की उन्हे तो कंपनी में काम करने से मतलब है वैसे भी अंदर जाने के बाद तो खाने पीने से लेकर काम करने तक सबका ख्याल कंपनी बहुत अच्छे से रखती है.” वैभव ने डी.जी.बी से जुड़ी बहुत की ख़ास बात रवि को बताई. रवि ने कहा “ ह्म्*म्म, तो दिवाकर किसके साथ काम कर रहा था, क्या काम कर रहा था, तुम्हे कुछ नहीं पता. किसी पर शक़ भी नहीं है तुम्हे, फिर कौन लेकर जा सकता उसे डी.जी.बी के अलावा. और जब डी.जी.बी ने उसे छुट्टी दे रखी है तो फिर उसे इस तरह क्यूँ उठा के ले जाएँगे कंपनी के लोग. याद करो , दिमाग़ पर ज़ोर डालो, कुछ ऐसा हुआ हो जो दिखने या सुनने में ख़ास ना हो पर शायद कुछ काम आ जाए. कब से बीमार है तुम्हारा भाई”. पुलिस वाले ने अपनी रटी रटाई बात दोहराई जो वो हर गवाह या मुलज़िम से दोहराते हैं. वैभव बोला “ सर, बीमार तो भैया 3 महीने से हैं, पर ऐसा कुछ ख़ास याद नहीं जो मैने आपको बताया ना हो”. वैभव बिल्कुल शांत हो गया, रवि भी कुछ देर चुप रहा और बोला “ यहाँ दस्तख़त कर दो, मैं पूरी कोशिश करता हूँ तुम्हारे भाई को ढूँढने की, जब भी फोन करूँ पुलिस स्टेशन आ जाना और अपनी मा का ख्याल रखना. डॉक्टर अविनाश मेरा दोस्त है इसलिए तुम्हे ज़्यादा परेशन नहीं होने दूँगा. जाओ और शहर से बाहर बिल्कुल मत जाना. कुछ भी खबर मिले, कुछ भी ख़ास याद आए, तुरंत मुझे फोन करना. याद रखो, तुमसे ज़्यादा दिवाकर को कोई नहीं जानता. अब जाओ और अपनी परेशानी मुझ पर छोड़ जाओ.” रवि ने उन्हे घर भेज दिया और गाड़ी ले कर सीधा मेरे घर की और निकल पड़ा.

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    मैं और डॉक्टर प्रकाश घर की तरफ बढ़ रहे थे तभी डॉक्टर प्रकाश ने सवाल किया “रवि को कब से जानते हो तुम” मैं समझ गया की डॉक्टर प्रकाश फिर रवि की बहन के बारे पूछ्ने वाले हैं पर मैं कब तक उनके सवाल को टरकाता , यहाँ नहीं तो घर जाकर डॉक्टर प्रकाश यही सवाल ज़रूर पूछ्ते तो मैने सोचा रवि के सामने बताने से अच्छा है रास्ते में ही उनके सारे सवालो के जवाब देता चलूं. “मा और बाबा का एक्सीडेंट रवि की कार से ही हुआ था सर” ये सुनते ही डॉक्टर प्रकाश चौंक गये “क्या कह रहे हो अविनाश, तुम दोनो की बातो से तो ऐसा लग रहा था जैसे की तुम दोनो बचपन के दोस्त हो”. डॉक्टर प्रकाश कुछ कह पाते मैं बोल पड़ा “ पुलिस में चुन लिए जाने की खबर सुनकर रवि खुशी से झूम रहा था, अपने सारे दोस्तो को ये खबर देने के लिए वो अपने घर से शहर की तरफ आ रहा था, रास्ते में उसने मिठाई ली और जैसे ही उसने अपनी कार बड़े चौराहे की तरफ मोडी, सामने से मा और बाबा आपस में कुछ बहस करते हुए आ रहे थे, उनका ध्यान सामने से आती कार की तरफ नहीं था , रवि ने पूरी कोशिश की उन्हे बचाने की पर होनी को कौन रोक सकता था. रवि की आंखे बंद हो गयी और उस एक्सीडेंट ने मा और बाबा की हर रोज़ होने वाली बहस को हमेशा के लिए ख़तम कर दिया. मा और बाबा को टक्कर मारते हुए रवि की कार एक पुरानी बंद बड़ी दुकान से टकराकर बंद हो गयी. रवि को भी काफ़ी चोट लगी थी पर वो फिर भी दौड़ता हुआ मा बाबा के पास आया और आस पास के लोगो की मदद से उन्हे हॉस्पिटल भी ले गया. पर मा और बाबा की ज़िंदगी तो उस बहस के साथ ही ख़तम हो गयी थी. डॉक्टर उन्हे नहीं बचा पाए, मेरी ज़िंदगी में आए इस अंधेरे के साथ साथ रवि को भी अपनी ज़िंदगी बर्बाद होती नज़र आने लगी.


    हॉस्पिटल से मुझे मा और बाबा की मौत की खबर मिली, जैसे ही मैं हॉस्पिटल पहुँचा रवि मेरे पास दौड़ते हुए आया और बोला “ मैं हूँ तुम्हारे मा बाप की मौत का ज़िम्मेदार, मुझे माफ़ कर दो , 2 ज़िंदगी चली गयी मेरे हाथो और अगर पुलिस ने मुझे सज़ा दे दी तो एक और मासूम ज़िंदगी इस दुनिया से चली जाएगी. मुझे बचा लो भाई, मैं सारी ज़िंदगी तुम्हे भगवान की तरह पूजुंगा” मैं कुछ समझ पाता, कुछ देख पाता, कुछ बोल पाता, उससे पहले ही रवि ने मुझे रोक लिया और मैं सोचता रह गया की पहले अपने मा बाबा से लिपट कर अपने रोके हुए आँसुओ को बहने दूं या फिर इस आदमी की बातो का जवाब दूं जिसने मेरे मा और बाबा को मुझसे छीन लिया. मैने रवि को अपने आप से दूर किया और सीधा मा बाबा के बेजान शरीर से लिपट लिपट कर रोने लगा. सारी ज़िंदगी जिन्होने मुझे पढ़ाने लिखाने के लिए ग़रीबी
    के दिन झेले, ज़िंदगी भर दोनो यही बहस करते रहे की उनके बेटे को कभी किसी बात का दुख ना हो, किसी चीज़ की कमी ना हो, ग़लत लोगो के साथ ना रहे, अच्छी लड़की से शादी हो, और आज जब उनका बेटा उनके सारे दुख मिटाने के लायक बना तो वो मुझे अकेला छोड़ कर चले गये. मैं रोए जा रहा था और रवि दूर खड़ा मेरे आँसू रुकने का इंतेज़ार कर रहा था. तभी पुलिस के 2 सिपाही आए और रवि से पूछताछ करने लगे. रवि डरा हुआ था और उन्हे कोई जवाब दिए बिना सिर्फ़ मेरी और देखे जा रहा था. मैं चाहता था की मेरे मा बाबा की जान लेने वाले को बुरी से बुरी सज़ा मिले पर ना जाने क्यूँ मुझे ऐसा लगा की उसने मेरे मा बाबा को जान बूझ कर नहीं मारा. मैं वहाँ से उठा और पुलिस वालो से कहा की रवि के खिलाफ मुझे कोई शिकायत नहीं लिखवानी है. रवि मेरे पैरो में गिर पड़ा और बोला की “मैने उन्हे बचाने की बहुत कोशिश की थी, पर वो लोग अपनी बातो में इतने उलझे थे की ना तो उन्हे मेरी कार दिखाई दी और ना ही हॉर्न सुनाई दिया. मैने जान बूझ कर कुछ नहीं किया, वो सिर्फ़ एक एक्सीडेंट था जो मेरी कार से होना लिखा था". पुलिस ने रवि और मेरे ब्यान लिख कर मा बाबा की लाश मेरे हवाले कर दी. उनके शरीर को आख़िरी विदाई देने के बाद जैसे ही मैं शमशान घाट से बाहर निकला रवि वहीं खड़ा मेरा इंतज़ार कर रहा था.

    मैने उसे एक नज़र देखा और अपने घर की और चल दिया, तभी पीछे से आवाज़ आई “ लगता है तुमने मुझे माफ़ नहीं किया ‘दोस्त’, रोज़ रोज़ मरने से तो अच्छा था तुम मुझे पुलिस से ही ना बचाते, जब तक तुम मुझे माफ़ नहीं करोगे मैं चैन से नहीं जी पाऊंगा . मेरे लिए ना सही एक मासूम ज़िंदगी के लिए मुझे माफ़ कर दो”. वो पहला दिन था जब उसने मुझे दोस्त कह कर बुलाया था. मैं रुक गया और सोचने लगा की कुछ देर पहले जिसने मेरे मा बाबा को मुझसे छीना वो मुझे दोस्त कह रहा है. “मैं जानता हूँ, तुम्हारे मा बाप के अलावा के इस दुनिया में तुम्हारा कोई नहीं है और मा बाप को खोने का दुख क्या होता है ये मैं बचपन से ही जानता हूँ. 10 साल पहले मेरे मा बाप भी मुझे ऐसे ही छोड़ कर चले गये थे. मेरा साथ देने वाला कोई नहीं था पर मैं चाहता हूँ की तुम मेरे दोस्त बन कर मेरे साथ मेरे घर पर रहो. वैसे भी तुम अपने घर में अकेले कैसे रह पाओगे. तुम्हारा साथ पाकर मुझे भी अच्छा लगेगा और तुम भी अपने आप को अकेला महसूस नहीं करोगे” रवि ने एक साथ ही अपने मन की सारी बाते कह डाली. मैं वहीं खड़ा उसकी सारी बातें सुनता रहा तभी रवि ने मेरी ओर हाथ बढ़ाया और कहा “चलोगे ना मेरे साथ, मेरे दोस्त”. मैं चुप चाप उसकी कार में बैठ गया और उसने बिना कुछ बाते किए सीधा अपने घर के बाहर कार को रोका और कहा. “आओ दोस्त, आज से ये तुम्हारा अपना घर है. यहाँ की हर चीज़ को अपना समझना और बेझिझक जो मर्ज़ी माँग लेना. शायद मेरी ये दोस्ती तुम्हे पसंद आए और मैने जो पाप किया है उसके लिए तुम मुझे हमेशा के लिए माफ़ कर दो”. मैं कार से उतरा और रवि से कहा “मैं नहीं जानता की मेरे मा बाबा की मौत के लिए तुम कितने ज़िम्मेदार हो पर मैं ये ज़रूर जानता हूँ की तुम एक अच्छे इंसान हो. माफ़ तो मैने तुम्हे उसी वक़्त कर दिया था जब पुलिस वाले तुमसे बात कर रहे थे और मैं अपने मा बाबा से लिपट कर रो रहा था. रोते रोते मुझे ऐसा एहसास हुआ की जैसे मेरे मा बाबा कह रहे हों की उसे बचा लो, जैसे वो कहना चाहते थे की ग़लती तुम्हारी नहीं उनकी थी. अब तुम अपने दिल से ये बोझ निकाल दो की मैने तुम्हे माफ़ नहीं किया. और मुझे अकेला छोड़ दो, मैं अपने घर जाना चाहता हूँ,वहाँ मेरे मा बाबा की यादें बसी हैं. यहाँ मैं चाह कर भी खुश नहीं रह पाऊंगा और एक ज़िंदा लाश के साथ तुम भी कभी खुश नहीं रह पाओगे”. रवि ने मेरे कंधे पर हाथ रखा और बोला “दोस्त, परेशानी तो तब होगी जब तुम दुखी रहोगे, मैं वादा करता हूँ की कुछ दिनो में मैं तुम्हारे चहरे पे खुशी लाने में कामयाब रहूँगा. तुम अंदर चलो, कुछ देर आराम करो. फिर मैं खुद तुम्हे तुम्हारे घर ले चलूँगा पर तुम्हे वहाँ रहने नहीं दूँगा.” इतना कहकर रवि ने दरवाजे पे लगी कुण्डी को 5 बार खटखटाया और अंदर से आवाज़ आई “ अभी आती हूँ, भैया”. कुछ पल के बाद दरवाजा खुला और जब मैने उस लड़की की और देखा तो.... चलिए सर, घर आ गया, बाकी बातें अंदर बैठ कर करेंगे, रवि भी आता ही होगा, कहीं उसने हमे उसकी बहन के बारे में बात करते सुन लिया तो फिर शराब में डूब जाएगा. ना जाने अभी छोड़ी भी है या नहीं. डॉक्टर प्रकाश समझ गये की मैं जानबूझ कर बात को घुमा रहा हूँ. पर उन्हे यकीन था की जल्द ही वो मुझसे रवि की बहन के बारे में सब कुछ जान लेंगे. घर के बाहर डॉक्टर प्रकाश का ड्राइवर खड़ा था और हमारे आने का इंतज़ार कर रहा था. उसने डॉक्टर प्रकाश से कहा “ सर, अगर आप इजाज़त दें तो यहीं पास में मेरी ससुराल है, मैं आज रात वहाँ हो आऊँ”. वो शरमा रहा था और डॉक्टर प्रकाश मुस्कुराते हुए बोले . “क्यूँ अशोक, शाली बहुत याद करती है या शलज. चल तू कार लेजा, मेरा सारा सामान,दवाइयाँ और फाइल्स मेरे कमरे में रख जा और हाँ याद रहे,सुबह जल्दी आ जाना और कार का भी ध्यान रखना, वरना बहुत डाँट पड़ेगी.” इतना कहकर मैं और डॉक्टर प्रकाश अंदर आ गये.

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    मैने डॉक्टर प्रकाश को उनका कमरा दिखाया और कहा “आप आराम कीजिए मैं भी तब तक नहा लेता हूँ, अगर आप को किसी भी चीज़ की ज़रूरत पड़े तो ‘हरीराम’ को आवाज़ दे दीजिएगा,हरीराम ही इस घर का अकेला नौकर है और वफ़ादार भी. हरीराम ज़रा इधर आओ.” मैने हरीराम को आवाज़ दी और वो फटाफट चला आया “ जी बाबू जी, बुलाया आपने”. मैने उसे समझाया “हरीराम, ये हमारे सबसे ख़ास मेहमान हैं, इनकी सेवा में कोई कमी नहीं होनी चाहिए, ये जब भी आवाज़ दें, जो भी चीज़ माँगे, एक पल की भी देरी नहीं होनी चाहिए. वैसे ये सब बताने की तुम्हे ज़रूरत नहीं क्यूंकी आजतक तुमने कभी शिकायत का मौका नहीं दिया”. हरीराम “जी बाबू जी, मैं अभी साहब जी के लिए चाय बना के लाता हूँ” कह कर रसोई की तरफ चल दिया, इतने में डॉक्टर प्रकाश बोले “चीनी मत डालना, मैं फीकी चाय पीता हूँ”. मैं भी अपने कमरे में जाकर लेट गया और धीरे धीरे मुझे नींद आने लगी तो मैने सोचा अगर सो गया तो फिर रात भर नींद नहीं आएगी, नहा लूँगा तो थकान दूर हो जाएगी. मैं बिस्तर से उठा, कपड़े उतारे और बाथरूम में जाकर शावर के नीचे आँखें बंद करके नहाने लगा. कोशिश सिर्फ़ उस खुश्बू से अपना ध्यान हटाने की थी की अचानक नहाते नहाते मुझे ऐसा लगा जैसे रवि की बहन मेरे सामने खड़ी रो रही है. मैं डर गया और जैसे ही आँखें खुली वहाँ कोई नहीं था. मैं समझ गया की पुरानी यादें,वो खुसबू और आज दिन भर हुई परेशानी ने मेरा मन बैचैन कर दिया है. मैने कपड़े पहने और हरीराम को चाय लाने के लिए बोलकर ड्रॉयिंग रूम में बैठ गया, चाय पीते पीते मैं फिर ना जाने कहाँ खो गया और डॉक्टर प्रकाश कब मेरे पास आकर बैठ गये मुझे एहसास तक नहीं हुआ. उन्होने मेरे हाथ से गिरते हुए चाय के कप को संभाला और कहा “ बेटा, कहाँ खोए हुए हो. क्यूँ परेशान हो रहे हो.” मैं कप को टेबल पर रखते हुए बोला “ नहीं नहीं सर, कुछ नहीं बस ऐसे ही मा बाबा की याद आ गयी”. डॉक्टर प्रकाश बोले “मा बाबा की या रवि की बहन की” . मैं पहले तो चुप रहा फिर बोला “हाँ सर, उसकी भी.” तभी डॉक्टर प्रकाश ने अपने मन की बात फिर दोहराई “तो बताओ ना क्या हुआ जब तुम रवि के साथ उसके घर पर गये”. मैं बताने ही वाला था की इतने में रवि हाथ में शराब की बोतल लिए मुस्कुराता हुआ ड्रॉयिंग रूम में आ गया और बोला. “देखा, टाइम पर आ गया ना, तू तो पिएगा नहीं , आप मेरा साथ देंगे क्या श्रीमान” उसने डॉक्टर प्रकाश की और इशारा किया. मैने उसे टोका और कहा “ ये डॉक्टर प्रकाश हैं रवि, जाने माने साइकॉलजिस्ट, मेरे गुरु, इनसे ऐसा मज़ाक, तू पागल हो गया है क्या”. रवि ने अपने पुलिस वाले अंदाज़ में कहा “ अरे तेरे गुरु हैं पर मेरे तो मेहमान ही हैं ना बस, और मेहमानो की खातिरदारी में कोई कमी नहीं होनी चाहिए. आप अविनाश की बातो को छोड़िये और दौलतगढ़ की सबसे मशहूर शराब का आनंद लीजिए , अगर आप कहें तो मैं अविनाश को बाहर भेज देता हूँ” रवि खिलखिला के हंसा और इतने में हरीराम 2 काँच के ग्लास और पनीर ले आया. शायद रवि आते ही सबसे पहले सीधा रसोई में गया था और हरीराम को सब समझा आया था.


    “रवि तू पागलपन मत कर, डॉक्टर प्रकाश तेरे साथ शराब पीएँगे क्या, और वैसे भी मुझे ये सब पसंद नहीं, तू दूसरे कमरे में जाकर पी, मैं और डॉक्टर प्रकाश यहीं बैठे हैं. जब तेरी बोतल ख़तम हो जाए तो बता देना , साथ में ही डिनर कर लेंगे.” मैने रवि को गुस्से से धमकाते हुए कहा, पर वो कहाँ मानने वाला था. रवि ने ग्लास उठाया और शराब डालते हुए बोला “ देख अविनाश, तुझे नहीं पीनी तो तू दूसरे कमरे में जाकर बैठ जा मैं और डॉक्टर साहब तो यही पीएँगे, बताइए सिर कितनी डालूं”. डॉक्टर प्रकाश मेरी और रवि की बहश का मज़ा ले रहे थे और जब रवि नहीं माना तो उन्हे बोलना ही पड़ा “देखो रवि, मैं जानता हूँ अविनाश शराब नहीं पीता और ना ही किसी शराब पीने वाले को पसंद करता है, रही बात मेहमान-नवाज़ी की तो मैं तुम्हे मना नहीं करूँगा. वैसे भी शराब पीने के बाद इंसान सच ही बोलता है और मुझे भी तुमसे कुछ बाते पूछनी हैं. मेरे लिए छोटे पेक ही बनाना , जितना हो सकेगा तुम्हारा साथ देता रहूँगा”. मैं चौंक गया, चौंक क्या गया मेरे मुह से तो आवाज़ तक नहीं निकली, मैं यही सोच रहा था की डॉक्टर प्रकाश को आजतक शराब पीते नहीं देखा और जब पीने बैठे हैं तो वो भी रवि जैसे पक्के शराबी के साथ, और रवि से कुछ बाते पूछना चाहते हैं, ये ज़रूर उसकी बहन के बारे में बात करेंगे और मुझे पक्का यकीन है की शराब की बोतल ख़तम होने से पहले यहाँ ज़रूर कुछ ना कुछ हंगामा खड़ा होने वाला है. मैं बस यही सोच रहा था की कैसे डॉक्टर प्रकाश को शराब और रवि से बाते करने से रोकूँ.

    “सर, आप कहाँ इसके चक्कर में पड़ रहे हैं, ये खुद तो दारू पीकर चैन से सो जाएगा और आप पूरी रात नशे में परेशान रहेंगे. इसे यहीं पीने दो और हम दूसरे कमरे में चलते हैं”. मैने डॉक्टर प्रकाश को आख़िरी बार रोकने की कोशिश की पर आज तो लग रहा था मानो दौलतगढ़ की हर मशहूर चीज़ को चखने का मन बनाए थे डॉक्टर प्रकाश. उन्होने ग्लास उठाया और बोले “ तुम चिंता बहुत करते हो अविनाश, इतना बड़ा साइकॉलजिस्ट अगर ऐसे छोटी मोटी बातों पे परेशन होता रहेगा तो मरीज़ो को कैसे ठीक करेगा. तुम आराम से हमारेसाथ बैठ कर बातें करो अगर तुम्हे लगे की हम नशे में बडबडा रहे हैं तो हरीराम को बोलकर खाना लगवा देना. अब तो खुश हो तुम”. मैने अपने सर पे हाथ मारा और कहा “जैसी आपकी मर्ज़ी सर, इस पागल के चक्कर में आप आ ही गये. रवि ने मेरी तरफ बड़े ही कमीने अंदाज़ में आँख मारी और डॉक्टर प्रकाश के ग्लास से अपना ग्लास टकरा कर बोला “चियर्स,ड्र. साहब”. दोनो लग गये उस कम्बखत नशे की बोतल को अपने गले में उतारने. डॉक्टर प्रकाश ने पीना शुरू किया तो मैं देखता ही रह गया, एक घूँट में पूरी शराब इस तरह ख़तम किए जा रहे थे मानो इन से ज़्यादा पीने वाला पूरी दुनिया में कोई ना हो. इधर रवि उनके ग्लास में शराब डालता उधर उनका ग्लास ख़तम. डॉक्टर प्रकाश को नशा होने लगा और उधर रवि भी धीरे धीरे नशे में ढलता जा रहा था.

    तभी डॉक्टर प्रकाश ने रवि से सवाल किया “ तु...म्म दोनो की दोस्त..त.त..दोस्ती कितनी पूरा..आ...आनी पुरानी है रवि.” डॉक्टर प्रकाश की ज़ुबान पे शराब ने अपना असर दिखना शुरू कर दिया था. उन्हे पता नहीं था की शराब अब उन्हे क्या बुलवा रही है. रवि भी पूरे मूड में था “अरे पुरानी मत पूछिये, ये पूछिये की कितनी पक्की दोस्ती है हमारी. साला पूरे दौलतगढ़ में कोई अविनाश को टच..च.च..ग्लास छूट गया, सॉरी ,
    साला कोई टच तो करके दिखाए, ज़िंदा गाड़ दूँगा वहीं के वहीं. मेरा ज़िगरी है मेरा दोस्त, ये कमीना मुझे दारुबाज़ समझता है, जबकि इसे पता है की मैं दारू किस लिए पीता हूँ, फिर भी मुझे रोकता रहता है. आप इसके दिमाग़ का इलाज़ करिए डॉक्टर साहब्ब्ब्ब, और दारू लेंगे आप” रवि का नशा उसके सर चढ़ने लगा. डॉक्टर प्रकाश भी अब पूरे नशे में दिखने लगे. “ क़िस्स्सस्स खु...शी में पीते हो इतनी दा...रू, हाँ” डॉक्टर प्रकाश का ऐसा ढंग देखकर मुझे हैरानी भी हो रही थी और हँसी भी आ रही थी. इस उमर में डॉक्टर प्रकाश को ये क्या पीने की सूझी. मैं पहले तो गुस्सा हो रहा था, फिर उन दोनो की हरकतों पे हंस रहा था पर साथ ही साथ मुझे ये चिंता हो रही थी की जैसे ही डॉक्टर प्रकाश रवि की बहन का ज़िक्र करेंगे ये बोतल फोडनी शुरू कर देगा और फिर ना जाने क्या क्या नाटक करेगा. रवि ने फिल्मी अंदाज़ में जवाब दिया “ कौन साला, खुशी में दारू पीता है जनाब, यहाँ तो गम भुलाने के लिए पीते हैं बस.वरना ज़ालिम नींद ही नहीं आती, क्या करें”. डॉक्टर प्रकाश ने कहा “कैसा गम्मम्म भाई, कोई छोड़ कर चली गयी क्या तुम्हे, जिसके गम ने इतना पीने पर मज़बू..बूर......मज़बूर कर दिया”. इतना सुनने की देर थी और रवि के चेहरे का रंग बदल गया. मैं समझ गया की मामला हद से बाहर होने वाला है,और अब अगर इनमे से कोई भी कुछ बोला तो ना तो रवि ही काबू में आएगा और ना ही डॉक्टर प्रकाश को मैं संभाल पाऊंगा . मैने तुरंत हरीराम को आवाज़ दी और कहा “2 मिनिट के अंदर खाना टेबल पर होना चाहिए, जल्दी जाओ”. हरीराम खुद कितना समझदार है इसका अंदाज़ा इसी से लगा लीजिए की मेरे कहने की मेरे बुलाने की देर थी और उसने जवाब दिया “खाना, लगा दिया है साहब, 2 मिनिट भी नहीं रुकना पड़ेगा आपको. आइए रवि बाबू, आइए डॉक्टर साहब. उसने बड़ी चालाकी से माहोल को ऐसा संभाला की मुझे कुछ करने की ज़रूरत ही नहीं पड़ी. मैं मन ही मन हरीराम का शुक्रिया अदा कर रहा था की आज उसने मेरे घर में होने वाले हंगामे को रोक लिया. हरीराम ने रवि का हाथ पकड़ा और उसे डाइनिंग टेबल तक ले गया, उधर मैं उठा और डॉक्टर प्रकाश की मदद करने के लिए जैसे ही उनकी तरफ हाथ बढ़ाया , वो मुस्कुराए और बगल में रखे फूलदान की तरफ इशारा किया. मैने सोचा की ये नशे में फूलदान को कुछ और समझ रहे हैं, पर जैसा मैं सोच रहा था वैसे कुछ नहीं था, उन्होने तो एक घूँट भी शराब नहीं पी थी, बड़ी चालाकी से धीरे धीरे अपनी शराब को उन्होने बगल में खड़े फूलदान में उडेल दिया था. जब भी रवि मेरी तरफ देखता था या उसकी नज़र डॉक्टर प्रकाश से हटती थी, वे अपनी शराब उस फूल दान में उडेल देते थे. मैं हँसने लगा और डॉक्टर प्रकाश भी मुस्कुराने लगे.

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