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Thread: अनदेखी जगह: अनछुए पहलू

  1. #261
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    Re: अनदेखी जगह: अनछुए पहलू

    मंदिर की स्थापना : दतिया शहर में प्रवेश करते ही पीताम्बरा पीठ है। यहां पहले कभी श्मशान हुआ करता था, आज विश्वप्रसिद्ध मंदिर है। मां पीताम्बरा पीठ की स्थापना एक सिद्ध संत, जिन्हें लोग स्वामीजी महाराज कहकर पुकारते थे ने 1935 में की थी। श्री स्वामी जी महाराज ने बचपन से ही संन्यास ग्रहण कर लिया था। श्री स्वामी जी वहां एक स्वतंत्र अखण्ड ब्रह्मचारी संत थे। स्वामी जी प्रकांड विद्वान व प्रसिद्ध लेखक थे। उन्हेंने संस्कृत हिन्दी में कई किताबें लिखीं।
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  2. #262
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    Re: पीताम्बरा पीठ : दतिया (म.प्र.)

    मां के हाथों में मुदगर, पाश, वज्र एवं शत्रुजिव्हा है। यह शत्रुओं की जीभ को कीलित कर देती हैं। मुकदमे आदि में इनका अनुष्ठान सफलता प्राप्त करने वाला है। इनकी आराधना करने से साधक को विजय प्राप्त होती है। शुत्र पूरी तरह पराजित हो जाते हैं। यहां के पंडित तो यह तक कहते हैं कि, जो राज्य आतंकवाद व नक्सलवाद से प्रभावित हैं, वह मां पीता बरा की साधना व अनुष्ठान कराएं, तो उन्हें इस समस्या से निजात मिल सकती है।
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  3. #263
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    Re: पीताम्बरा पीठ : दतिया (म.प्र.)

    धूमावती का एकमात्र मंदिरः मां पीता बरा पीठ के प्रांगण में मां भगवती धूमावती देवी का देश का एक मात्र मंदिर है। ऐसा कहा जाता है कि मंदिर परिसर में मां धूमावती की स्थापना न करने के लिए अनेक विद्वानों ने श्री स्वामी जी को मना किया था। तब स्वामी जी ने कहा कि मां का भयंकर रूप तो दुष्टों के लिए है, भक्तों के प्रति ये अति दयालु हैं। समूचे विश्व में धूमावती माता का यह एक मात्र मंदिर है।
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  4. #264
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    Re: पीताम्बरा पीठ : दतिया (म.प्र.)

    जब मां पीताम्बरा पीठ में मां धूमावती की स्थापना हुई थी, उसी दिन महाराज जी ने अपने ब्रह्मलीन होने की तैयारी शुरू कर दी थी। ठीक एक वर्ष बाद मां धूमावती जयन्ती के दिन श्री स्वामी जी महाराज ब्रह्मलीन हो गए। मां धूमावती की आरती सुबह-शाम होती है, लेकिन भक्तों के लिए मां धूमावती का मंदिर शनिवार को सुबह-शाम 2 घंटे के लिए खुलता है। मां धूमावती को नमकीन (मंगोडे, कचौडी व समोसे) का भोग लगता है।
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  5. #265
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    Re: पीताम्बरा पीठ : दतिया (म.प्र.)

    चीनी सेना वापस भेजीः मां पीताम्बरा बगलामुखी का स्वरूप रक्षात्मक एवं स्त भनात्मक है। मां पीताम्बरा पीठ मंदिर के साथ एक ऐतिहासिक सत्य जुड़ा हुआ है। सन् 1962 में चीन ने भारत पर हमला कर दिया था। उस समय देश के प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू थे। भारत के मित्र देशों रूस तथा मिश्र ने भी सहयोग देने से मना कर दिया था। तभी किसी योगी ने पंडित जवाहरलाल नेहरू से स्वामी जी से मिलने को कहा। पंडितजी दतिया आए और स्वामीजी से मिले। श्री स्वामी जी राष्ट्रहित में एक यज्ञ करने की योजना बनाई। यज्ञ में सिद्ध पंडितों, तांत्रिकों व प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू को यज्ञ का यजमान बनाकर यज्ञ प्रारंभ किया। यज्ञ के नौंवे दिन जब यज्ञ का समापन होने वाला था तथा पूर्णाहुति डाली जा रही थी, उसी समय संयुक्त राष्ट्रसंघ का पंडित जवाहरलाल नेहरू को संदेश मिला कि चीन ने आक्रमण रोक दिया है। यह यज्ञशाला आज भी यहां बनी हुई है।
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  6. #266
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    अमरप्रेम कथा का साक्षी:मांडू का किला

    इंदौर से करीब 110 किमी दूर विंध्याचल की पहाडिय़ों में करीब 2000 फीट की ऊंचाई पर मप्र के धार जिले में बसा मांडू रानी रूपमती ओर राजा बाज बहादुर के अमरप्रेम कथा का साक्षी है। मांडू की हसीन वादियों के बीच स्थित रानी रूपमती का किला बाज बहादुर के प्यार और स्नेह को दर्शाता है। करीब तीन 3500 फीट की ऊंचाई पर स्थित यह किला राजा बाज बहादुर ने अपनी प्रेयसी के लिए निर्माण करवाया था। ऐसी मान्यता है कि रानी रूपमती नर्मदा नदी के दर्शन किए बिना अन्न का एक निवाला भी ग्रहण नहीं करती थीं। इसी बात को ध्यान में रखते हुए राजा ने अपनी रानी के लिए इस किले का निर्माण करवाया। इस किले से नर्मदा नदी रजत रेखा (चांदी की लाइन) के रूप में दिखाई देती है। रानी रूपमती प्रतिदिन स्नान के बाद यहां पहुंचती और नर्मदा जी के दर्शन उपरांत अन्न ग्रहण करती थीं।
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  7. #267
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    Re: अमरप्रेम कथा का साक्षी:मांडू का किला

    करीब तीन 3500 फीट की ऊंचाई पर स्थित यह किला राजा बाज बहादुर ने अपनी प्रेयसी के लिए निर्माण करवाया था।
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  8. #268
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    Re: अमरप्रेम कथा का साक्षी:मांडू का किला

    रानी रूपमती के महल का ऊपरी हिस्सा जहां से मांडू का सौंदर्य स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। शाहजहां भी इसी सौंदर्य के कायल हुए थे।
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  9. #269
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    Re: अमरप्रेम कथा का साक्षी:मांडू का किला

    मांडू में प्रवेश करने के लिए 12 दरवाजाओं से होकर गुजरना होता। पहले दरवाजे को दिल्ली दरवाजा कहा जाता है। इनका निर्माण सुरक्षा की दृष्टि से करवाया गया था।
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  10. #270
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    Re: अमरप्रेम कथा का साक्षी:मांडू का किला

    यहां की हसीन वादियों को देखकर इसका नाम बदल करदिलावर गोरी खां ने शादियाबाद रख दिया था। इसका मतलब था आनंद की नगरी।
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