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Poll: क्या संस्कृत भाषा का भी हिंदी की तरह प्रचार प्रसार करना चाहिए ...?

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Thread: संस्कृत जाने - भारतीय विज्ञान को जाने

  1. #1
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    संस्कृत जाने - भारतीय विज्ञान को जाने

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    दोस्तों क्या आप जानते हैं की संस्कृत ही वो भाषा है जिससे दुनिया की लगभग सभी भाषाओ का जन्म हुआ है !
    और सबकी जननी आज खुद दम तोड़ रही है !
    मझे खुसी है के हम अपनी रास्ट्र भाषा के प्रचार और प्रसार में लगे हुए हैं ! और हम इसमें बहुत हद तक कामयाब भी हो गये हैं !
    पर अब समय आ गया है! हमे उस भाषा को बचने का भी बीड़ा उठाना है जिससे हमारी रास्ट्र भाषा का जनम हुआ है !
    तो में आप लोगो से सहयोग चाहता हूँ के आपको जितना और जो भी पता है संस्कृत भाषा के बारे में वो यहाँ पर जरुर बताये !
    ताकि दुसरे सदस्य भी इस भाषा के बारे में जान सके ! और उसके बाद हम यहाँ सीखेंगे संस्कृत भाषा !
    आप सब से पूर्ण सहयोग की आशा है ! ये समझो के ये मेरी नहीं स्वयं हिंदी भाषा की पुकार है के हमे हिंदी भाषा की जननी को जरुर बचाना है !


    Sanskrit is the divine Language and it is the Language of GOD.Sanskrit Bhasha bharat ki ek puratan bhasha hai, kaha jata hai ki iska vyakaran sab bhashao me sabse shudh hai. Yaha aap log Sanskirit bhasha ke bare me jaane aur padhe.
    Last edited by anita; 07-01-2016 at 11:32 AM.
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  2. #2
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    Re: संस्कृत भाषा - एक बुझता दिया !

    तो दोस्तों सुरुआत करते हैं इस भाषा की बेसिक जानकारी के साथ !
    आधुनिक विद्वानों के अनुसार संस्कृत भाषा का अखंड प्रवाह पाँच सहस्र वर्षों से बहता चला आ रहा है। भारत में यह आर्यभाषा का सर्वाधिक महत्वशाली, व्यापक और संपन्न स्वरूप है। इसके माध्यम से भारत की उत्कृष्टतम मनीषा, प्रतिभा, अमूल्य चिंतन, मनन, विवेक, रचनात्मक, सर्जना और वैचारिक प्रज्ञा का अभिव्यंजन हुआ है। आज भी सभी क्षेत्रों में इस भाषा के द्वारा ग्रंथनिर्माण की क्षीण धारा अविच्छिन्न रूप से वह रही है। आज भी यह भाषा,
    अत्यंत सीमित क्षेत्र में ही सही, बोली जाती है। इसमें व्याख्यान होते हैं और भारत के विभिन्न प्रादेशिक भाषाभाषी पंडितजन इसका परस्पर वार्तालाप में प्रयोग करते हैं। हिंदुओं के सांस्कारिक कार्यों में आज भी यह प्रयुक्त होती है। इसी कारण ग्रीक और लैटिन आदि प्राचीन मृत भाषाओं (डेड लैंग्वेजेज़) से संस्कृत की स्थिति भिन्न है।
    यह मृतभाषा नहीं, अमरभाषा है।
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  3. #3
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    Re: संस्कृत भाषा - एक बुझता दिया !

    ऋक्संहिता की भाषा को संस्कृत का आद्यतम उपलब्ध रूप कहा जा सकता है। यह भी माना जाता है कि ऋक्संहिता के प्रथम और दशम मंडलों की भाषा प्राचीनतर है। कुछ विद्वान् प्राचीन वैदिक भाषा को परवर्ती पाणिनीय (लौकिक) संस्कृत से भिन्न मानते हैं। पर यह पक्ष भ्रमपूर्ण है। वैदिक भाषा अभ्रांत रूप से संस्कृत भाषा का आद्य उपलब्ध रूप है। पाणिनि ने जिस संस्कृत भाषा का व्याकरण लिखा है उसके दो अंश हैं -

    (1) (जिसे अष्टाव्यायी में छंदप् कहा गया है) और
    (2) भाषा (जिसे लोकभाषा या लौकिक भाषा के रूप में माना जाता है)।
    आचार्य पतंजलि के व्याकरण महाभाष्य नामक प्रसिद्ध शब्दानुशासन के आरंभ में भी वैदिक भाषा और लौकिक भाषा के शब्दों का उल्लेख हुआ है। संस्कृत नाम दैंवी वागन्वाख्याता महर्षिभि: वाक्य में जिसे देवभाषा या संस्कृत कहा गया है वह संभवत: यास्क, पाणिनि, कात्यायन और पंतजलि के समय तक छंदोभाषा (वैदिक भाषा) एवम् लोकभाषा के दो नामों, स्तरों व रूपों में व्यक्त थी।
    बहुत से विद्वानों का मत है कि भाषा के लिए संस्कृत शब्द का प्रयोग सर्वप्रथ वाल्मीकि रामायण के सुंदरकांड (30 सर्ग) में हनुमन् द्वारा विशेषणरूप में (संस्कृता वाक्) किया गया है।
    भारतीय परंपरा की किंवदंती के अनुसार संस्कृत भाषा पहले अव्याकृत थी, अर्थात उसकी प्रकृति एवम् प्रत्ययादि का विश्लिष्ट विवेचन नहीं हुआ था। देवों द्वारा प्रार्थना करने पर देवराज इंद्र ने प्रकृति, प्रत्यय आदि के विश्लेषण विवेचन का उपायात्मक विधान प्रस्तुत किया। इसी संस्कार विधान के कारण भारत की प्राचीनतम आर्यभाषा का नाम संस्कृत पड़ा। ऋक्संहिताकालीन साधुभाषा तथा ब्राह्मण, आरण्यक और दशोपनिषद् नामक ग्रंथों की साहित्यिक वैदिक भाषा का अनंतर विकसित स्वरूप ही लौकिक संस्कृत या पाणिनीय संस्कृत कहलाया। इसी भाषा को संस्कृत,संस्कृत भाषा या साहित्यिक संस्कृत नामों से जाना जाता है।
    भाषाध्वनि-विकास की दृष्टि से संस्कृत का अर्थ है - संस् (सांस् या श्वासों ) से बनी (कृत्)। आध्यात्म एवम् सम्प्रक-विकास की दृष्टि से संस्कृत का अर्थ है - स्वयं से कृत् या जो आरम्भिक लोगों को स्वयं ध्यान लगाने एवम् परसपर सम्प्रक से आ गई। कुछ लोग संस्कृत को एक संस्कार (सांसों का कार्य) भी मानते हैं।
    देश-काल की दृष्टि से संस्कृत के सभी स्वरुपों का मूलाधार पूर्वतर काल में उदीच्य, मध्यदेशीय एवम् आर्यावर्तीय विभाषाएं हैं। पाणिनिसूत्रों में विभाषा या उदीचाम् शब्दों से इन विभाषाओं का उल्लेख किया गया है। इनके अतिरिक्त कुछ क्षेत्रों में प्राच्य आदि बोलियाँ भी बोली जाती थीं। किन्तु पाणिनि ने नियमित व्याकरण के द्वारा भाषा को एक परिष्कृत एवम् सर्वग्य प्रयोग में आने योग्य रूप प्रदान् किया। धीरे - धीरे पाणिनिसंमत भाषा का प्रयोगरूप और विकास प्राय: स्थायी हो गया। पतंजलि के समय तक आर्यावर्त (आर्यनिवास) के शिष्ट जनों में संस्कृत प्राय: बोलचाल की भाषा बन गई। गादर्शात्प्रत्यक कालकवनाद्दक्षिणे हिमवंतमुत्तरेण वारियात्रमेतस्मि ्नार्यावर्तें आर्यानिवासे..... (व्याकरण महाभाष्य, 6।3।109) उल्लेख के अनुसार शीघ्र ही संस्कृत समग्र भारत के द्विजातिवर्ग और विद्वत्समाज की सांस्कृतिक, विचाराकार एवम् विचारादान्प्रदान की भाषा बन गई।
    Last edited by Manavji; 28-07-2012 at 09:16 PM.
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  4. #4
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    Re: संस्कृत भाषा - एक बुझता दिया !

    ऐतिहासिक भाषाविज्ञान की दृष्टि से संस्कृत भाषा आर्यभाषा परिवार के अंतर्गत रखी गई है। आर्यजाति भारत में बाहर से आई या यहाँ इसका निवास था - इत्यादि विचार अनावश्यक होने से यहाँ नहीं किया जा रहा है। पर आधुनिक भाषाविज्ञान के पंडितों की मान्यता के अनुसार भारत यूरोपीय भाषाभाषियों की जो नाना प्राचीन भाषाएँ, (वैदिक संस्कृत, अवस्ता अर्थात् प्राचीनतम पारसी ग्रीक, प्राचीन गॉथिक तथा प्राचीनतम जर्मन, लैटिन, प्राचीनतम आइरिश तथा नाना वेल्ट बोलियाँ, प्राचीनतम स्लाव एवं बाल्टिक भाषाएँ, अरमीनियन, हित्ती, बुखारी आदि) थी, वे वस्तुत: एक मूलभाषा की (जिसे मूल आर्यभाषा, आद्य आर्यभाषा, इंडोजर्मनिक भाषा, आद्य-भारत-योरोपीय भाषा, फादरलैंग्वेज आदि) देशकालानुसारी विभिन्न शाखाएँ थी। उन सबकी उद्गमभाषा या मूलभाषा का आद्यआर्यभाषा कहते हैं। कुछ विद्वानों के मत में-वीरा-मूलनिवासस्थान के वासी सुसंगठित आर्यों को ही "वीरोस" या वीरास् (वीरा:) कहते थे।

    वीरोस् (वीरो) शब्द द्वारा जिन पूर्वोक्त प्राचीन आर्यभाषा समूह भाषियों का द्योतन होता है उन विविध प्राचीन भाषाभाषियों को विरास (संवीरा:) कहा गया है। अर्थात् समस्त भाषाएँ पारिवारिक दृष्टि से आर्यपरिवार की भाषाएँ हैं। संस्कृत का इनमें अन्यतम स्थान है। उक्त परिवार की "केंतुम्" और "शतम्" (दोनों ही शतवात्तक शब्द) दो प्रमुख शाखाएँ हैं। प्रथम के अंतर्गत ग्रीक, लातिन आदि आती हैं। संस्कृत का स्थान "शतम्" के अंतर्गत भारतईरानी शाखा में माना गया है। आर्यपरिवार में कौन प्राचीन, प्राचीनतर और प्राचीनतम है यह पूर्णत: निश्चित नहीं है। फिर भी आधुनिक अधिकांश भाषाविद् ग्रीक, लातिन आदि को आद्य आर्यभाषा की ज्येष्ठ संतति और संस्कृत को उनकी छोटी बहिन मानते हैं। इतना ही नहीं भारत-ईरानी-शाखा की प्राचीनतम अवस्ता को भी संस्कृत से प्राचीन मानते हैं। परंतु अनेक भारतीय विद्वान् समझते हैं कि "जिद-अवस्ता" की अवस्ता का स्वरूप ऋक्भाषा की अपेक्षा नव्य है। जो भी हो, इतना निश्चित है कि ग्रंथरूप में स्मृतिरूप से अवशिष्ट वाङ्मय में ऋक्संहिता प्राचीनतम है और इसी कारण वह भाषा भी अपनी उपलब्धि में प्राचीनतम है। उसकी वैदिक संहिताओं की बड़ी विशेषता यह है कि हजारों वर्षों तक जब लिपि कला का भी प्रादुर्भाव नहीं था, वैदिक संहिताएँ मौखिक और श्रुतिपरंपरा द्वारा गुरुशिष्यों के समाज में अखंड रूप से प्रवहमान थीं। उच्चारण की शुद्धता को इतना सुरक्षित रखा गया कि ध्वनि ओर मात्राएँ, ही नहीं, सहस्रों वर्षों पूर्व से आज तक वैदिक मंत्रों में कहीं पाठभेद नहीं हुआ। उदात्त अनुदात्तादि स्वरों का उच्चारण शुद्ध रूप में पूर्णत: अविकृत रहा। आधुनिक भाषावैज्ञानिक यह मानते हैं कि स्वरों की दृष्टि से ग्रीक, लातिन आदि के "केंतुम्" वर्ग की भाषाएँ अधिक संपन्न भी हैं और मूल या आद्य आर्यभाषा के अधिक समीप भी। उनमें उक्त भाषा की स्वरसंपत्ति अधिक सुरक्षित हैं। संस्कृत में व्यंजनसंपत्ति अधिक सुरक्षित है। भाषा के संघटनात्मक अथवा रूपात्मक विचार की दृष्टि से संस्कृत भाषा को विभक्तिप्रधान अथवा "श्लिष्टभाषा" (एग्लुटिनेटिव लैंग्वेज) कहा जाता है।
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    Re: संस्कृत भाषा - एक बुझता दिया !

    संस्कृत देवभाषा है। यह सभी भाषाओँ की जननी है। विश्व की समस्त भाषाएँ इसी के गर्भ से उद्भूत हुई है। वेदों की रचना इसी भाषा में होने के कारण इसे वैदिक भाषा भी कहते हैं। संस्कृत भाषा का प्रथम काव्य-ग्रन्थ ऋग्वेद को माना जाता है। ऋग्वेद को आदिग्रन्थ भी कहा जाता है। किसी भी भाषा के उद्भव के बाद इतनी दिव्या एवं अलौकिक कृति का सृजन कहीं दृष्टिगोचर नहीं होता है।ऋग्वेद की ऋचाओं में संस्कृत भाषा का लालित्य, व्याकरण, व्याकरण, छंद, सौंदर्य, अलंकर अद्भुत एवं आश्चर्यजनक है। दिव्य ज्ञान का यह विश्वकोश संस्कृत की समृद्धि का परिणाम है। यह भाषा अपनी दिव्य एवं दैवीय विशेषताओं के कारण आज भही उतनी ही प्रासंगिक एवं जीवंत है।
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    Re: संस्कृत भाषा - एक बुझता दिया !

    संस्कृत का तात्पर्य परिष्कृत, परिमार्जित,पूर्ण, एवं अलंकृत है। यह भाषा इन सभी विशेषताओं से पूर्ण है। यह भाषा अति परिष्कृत एवं परिमार्जित है। इस भाषा में भाषागत त्रुटियाँ नहीं मिलती हैं जबकि अन्य भाषाओँ के साथ ऐसा नहीं है। यह परिष्कृत होने के साथ-साथ अलंकृत भी है। अलंकर इसका सौंदर्य है। अतः संस्कृत को पूर्ण भाषा का दर्जा दिया गया है। यह अतिप्राचीन एवं आदि भाषा है। भाषा विज्ञानी इसे इंडो-इरानियन परिवार का सदस्य मानते है। इसकी प्राचीनता को ऋग्वेद के साथ जोड़ा जाता है। अन्य मूल भारतीय ग्रन्थ भी संस्कृत में ही लिखित है।
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    Re: संस्कृत भाषा - एक बुझता दिया !

    संस्कृत का प्राचीन व्याकरण पाणिनि का अष्टाध्यायी है। संस्कृत को वैदिक एवं क्लासिक संस्कृत के रूप में प्रमुखतः विभाजित किया जाता है। वैदिक संस्कृत में वेदों से लेकर उपनिषद तक की यात्रा सन्निहित है, जबकि क्लासिक संस्कृत में पौराणिक ग्रन्थ, जैसे रामायण, महाभारत आदि हैं। भाषा विज्ञानी श्री भोलानाथ तिवारी जी के अनुसार इसके चार भाग किये गए हैं — पश्चिमोत्तरी, मध्यदेशी, पूर्वी, एवं दक्षिणी।
    संस्कृत की इस समृद्धि ने पाश्चात्य विद्वानों को अपनी ओर अक्स्र्षित किया। इस भाषा से प्रभावित होकर सर विलियम जोन्स ने २ फरवरी, १७८६ को एशियाटिक सोसायटी, कोल्कता में कहा- "संस्कृत एक अद्भुत भाषा है।
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    Re: संस्कृत भाषा - एक बुझता दिया !

    यह ग्रीक से अधिक पूर्ण है, लैटिन से अधिक समृद्ध और अन्य किसी भाषा से अधिक परिष्कृत है।
    इसी कारण संस्कृत को सभी भाषाओँ की जननी कहा जाता है। संस्कृत को इंडो-इरानियन भाषा वर्ग के अंतर्गत रखा जाता है और सभी भाषाओँ की उत्पत्ति का सूत्रधार इसे माना जाता है।
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    Re: संस्कृत भाषा - एक बुझता दिया !

    समस्त विश्व की भाषाओँ को ११ वर्गों में बाँटा गया है :-

    ०१) इंडो इरानियन- इसके भी दो उपवर्ग है – एक में इंडो-आर्यन जिसमें संस्कृत एवं इससे उद्भूत भाषाएँ हैं, दूसरे वर्ग में ईरानी भाषा जिसमें अवेस्तन, पारसी एवं पश्तो भाषाएँ आती हैं।
    ०२) बाल्टिक : इसमें लुथी अवेस्तन लेटवियन आदि भाषाएँ आती हैं।
    ०३) स्लैविक : इसमें रसियन, पोलिश, सर्वोकोशिया, आदि भाषाएँ सम्मिलित हैं।
    ०४) अमैनियम : इसके अंतर्गत अल्बेनिया आती हैं।
    ०५) ग्रीक :
    ०६) सेल्टिक : इसके अंतर्गत आयरिश, स्कॉटिश गेलिक, वेल्स एवं ब्रेटन भाषाएँ आती है।
    ०७) इटालिक : इसमें लैटिन एवं इससे उत्पन्न भाषाएँ सम्मिलित हैं।
    ०८) रोमन : इटालियन, फ्रेंच, स्पेनिश, पोर्तुगीज, रोमानियन एवं अन्य भाषाएँ इसमें सम्मिलित हैं।
    ०९) जर्मनिक : जर्मन, अंग्रेजी, डच, स्कैनडीनेवियन भाषाएँ आती है इस वर्ग में।
    १०) अनातोलियन : हिटीट पालैक, लाय्दियाँ, क्युनिफार्म, ल्युवियान, हाइरोग्लाफिक ल्युवियान और लायसियान।
    ११) लोचरीयन (टोकारिश) : इसे उत्तरी चीन में प्रयोग किया जाता है, इसकी लिपि ब्राह्मी लिपि से मिलती है।

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  10. #10
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    Re: संस्कृत भाषा - एक बुझता दिया !

    भाषाविद मानते हैं कि इन सभी भाषाओँ की उत्पत्ति का तार कहीं-न-कहीं से संस्कृत से जुड़ा हुआ है; क्योंकि यह सबसे पुरानी एवं समृद्ध भाषा है। किसी भी भाषा की विकासयात्रा में उसकी यह विशेषता जुडी होती है कि वह विकसित होने की कितनी क्षमता रखती है। जिस भाषा में यह क्षमता विद्यमान होती है, वह दीर्घकाल तक अपना अस्तित्व बनाये रखती है, परन्तु जिसमें इस क्षमता का आभाव होता है उनकी विकासयात्रा थम जाती है। यह सत्य है कि संस्कृत भाषा आज प्रचालन में नहीं है परन्तु इसमें अगणित विशेषताएं मौजूद हैं। इन्हीं विशेषताओं को लेकर इसपर कंप्यूटर के क्षेत्र में भी प्रयोग चल रहा है। कंप्यूटर विशेषज्ञ इस तथ्य से सहमत है कि यदि संस्कृत को कंप्यूटर की डिजिटल भाषा में प्रयोग करने की तकनीक होजी जा सके तो भाषा जगत के साथ-साथ कंप्यूटर क्षेत्र में भी अभूतपूर्व परिवर्तन देखें जा सकते हैं। जिस दिन यह परिकल्पना साकार एवं मूर्तरूप लेगी, एक नए युग का उदय होगा। संस्कृत उदीयमान भविष्य की एक महत्वपूर्ण धरोहर है।
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