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Thread: जीवन में भाग्य और पुरूषार्थ....................

  1. #11
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    Re: जीवन में भाग्य और पुरूषार्थ....................


    ये निर्भर करता है इन्सान के भाग्य पर—जिसे चाहे तो आप luck कह लीजिए या मुक्कदर या किस्मत या फिर कुछ भी । यह ठीक है कि इन्सान द्वारा किए गए कर्मों से ही उसके भाग्य का निर्माण होता है । लेकिन कौन सा कर्म, कैसा कर्म और किस दिशा में कर्म करने से मनुष्य अपने भाग्य का सही निर्माण कर सकता है—ये जानने का जो माध्यम है, उसी का नाम ज्योतिष है..............


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  2. #12
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    Re: जीवन में भाग्य और पुरूषार्थ....................


    ये ठीक है कि पुरूषार्थ की भूमिका भाग्य से कहीं अधिक महत्वपूर्ण है लेकिन सिर्फ इतना कह देने भर से भाग्य का महत्व किसी भी तरह से कम नहीं हो जाता..............


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  3. #13
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    Re: जीवन में भाग्य और पुरूषार्थ....................


    बहुत से ऎसे भी लोग हैं जो कि भाग्य जैसे किसी शब्द को ही पूरी तरह से नकार देते हैं । उन्होने अपने मन में कुछ ऎसी धारणाऎँ बना रखी हैं कि भाग्य को स्वीकार कर लेने से इन्सान में कर्म करने के प्रति निष्क्रियता आ जाती है । जब कि वास्तव में ऎसा नहीं है..............


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  4. #14
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    Re: जीवन में भाग्य और पुरूषार्थ....................


    चलिए विषय को आगे बढाते हुए हम इसी को जानने का प्रयास करते हैं कि भाग्य और पुरूषार्थ वास्तव में क्या हैं ? इसे समझने के लिए हमें कर्मफल की कार्यप्रणाली को जानना होगा क्यों कि भाग्य और पुरूषार्थ का ये सारा रहस्य इन्ही कर्मों में समाहित है। जैसा कि आप सब जानते हैं कर्मों को तीन श्रेणियों में विभाजित किया जाता है—संचित कर्म, क्रियामाण कर्म और प्रारब्ध(भाग्य)......... .....


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  5. #15
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    Re: जीवन में भाग्य और पुरूषार्थ....................


    जो कर्म अब हम लोग कर रहे हैं वे वर्तमान में क्रियामाण हैं,जो बिना फलित हुए अर्थात जिनका अभी हमें कोई फल प्राप्त नहीं हुआ है वो हैं हमारे संचित कर्म। इन्ही संचित कर्मों में से जो पक कर फल देने लगते हैं उन्हे प्रारब्ध कहा जाता हैं..............


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  6. #16
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    Re: जीवन में भाग्य और पुरूषार्थ....................


    सबसे पहले हम संचित कर्मों का विचार करते हैं। ये वे कर्म हैं जिनका फल हमें इस जन्म में भोगने को नहीं मिलता बल्कि किसी अन्य जन्म में प्राप्त होता है। इन कर्मों को हम वंशशास्त्र की परिभाषा में रिसेसिव्स करैक्टर्स (recessive characters) की श्रेणी में रख सकते हैं..............


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  7. #17
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    Re: जीवन में भाग्य और पुरूषार्थ....................


    ये वे करैक्टर्स हैं , जो कि हमारे इस जन्म में सुप्त रहते हैं और अगले या ओर आगे किसी जन्म में “जीन्स’” के योग्य संयोग से दृ्ष्टिगोचर हो सकते हैं । वैदिक ज्योतिष में किसी व्यक्ति की जन्मकुंडली का पंचम भाव (fifth house) तथा पंचमेश उसके संचित किए गये कर्मों को सूचित करता है..............


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    Re: जीवन में भाग्य और पुरूषार्थ....................


    कर्म का दूसरा विभाग है “प्रारब्ध” । ये वें कर्म हैं जिनका फल हमें अपने इस जन्म में ही भोगना होता है । शास्त्रों में इन्ही को उत्पति कर्म भी कहा गया है । modern science (बायोलाजी) की विचारसारिणी से इसका मेल मिलाया जा सकता है ।

    “gemetes”(sperm & ovum) के मिलने पर अर्थात गर्भधारण के समय ही उस जीव के भाग्य का निर्माण हो जाता है ओर उसे बदलने की शक्ति उस जीव के हाथ में नहीं होती । (at the time of the union of the gametes is decided the fate of the zygote or the individual as also the gametes it will produce & it is beyond the power of the zygote to alter it )..............


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    Re: जीवन में भाग्य और पुरूषार्थ....................


    अर्थात जब गेमिटस (sperm & ovum) या शुक्रशोणित मिलते हैं, तो उनके अन्दर के क्रोमोसोम्स पर “जीन्स” के संयोग पर उस व्यक्ति के भाग्य का निर्णय हो जाता है और चूँकि ये “जीन्स” बाद में किसी भी तरह से बदले नहीं जा सकते, इस कारण उस मनुष्य के भाग्य का निर्णय इसी मिलन में हो जाता है । इन्ही को उपर्युक्त विवेचन में प्रारब्ध या उत्पत्ति कर्म ये संज्ञाएं दी गई हैं । इससे स्पष्ट है कि प्रयत्न के बिना जो सुख-दुख इत्यादि हमें अवश्यमेव भोगने पडते हैं, वे सारे प्रारब्धाधीन ही हैं..............


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  10. #20
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    Re: जीवन में भाग्य और पुरूषार्थ....................


    वास्तव में देखा जाए तो प्रारब्ध कोई स्वतन्त्र शक्ति नहीं है । मनुष्य के कर्म अर्थात गर्भधारणा के समय स्त्री-पुरूष से प्राप्त “जेनीज” का संयोग और उसकी आधिभौतिक तथा अधिदैविक परिस्थिति, इन कारणों से जो भोग हमें भोगने पडते हैं, तथा बिना किसी विशेष प्रयत्न के उनकी अनिवार्यता—— सिर्फ इतना ही अर्थ प्रारब्ध (भाग्य) शब्द से अपेक्षित है। क्यों कि बुद्धि, ज्ञानार्जन, सुख-दुख, गुणावगुणों का उदय, अनुवांशिक कर्म, तथा हमें अपने जीवन में प्राप्त होने वाली समस्त परिस्थितियाँ—-इसी एक शब्द “प्रारब्ध”(भाग्य) में ही समाहित हो जाती हैं..............

    Last edited by Shri Vijay; 29-10-2013 at 09:37 PM.

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