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Thread: प्रेतकन्या

  1. #1
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    प्रेतकन्या

    प्रेतकन्या
    दोस्तों ये कहानी अंतर्जाल से ली गई है.

    14 एप्रिल को अपने बाबा का जन्मदिन है
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  2. #2
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    Re: प्रेतकन्या

    ये बात लगभग बीस साल पुरानी होगी । संजय मेरा दोस्त था ।
    हम दोनों एक ही कालेज में थे । पर मैं उससे एक क्लास आगे था ।
    इसके बाबजूद मेरी उससे मित्रता थी । संजय और उसका परिवार
    किसी अन्य प्रदेश से थे ।और नौकरी की वजह से उत्तर प्रदेश में रहने
    के लिये आ गये थे ।
    जाने क्या वजह थी । संजय मुझे बहुत दिनों से दिखायी नहीं दिया था ।
    शायद इसकी एक वजह ये भी हो सकती थी कि मैं स्वयं कालेज के बाद
    अपने शोध हेतु वन क्षेत्र के एक निर्जन और गुप्त स्थान पर चला जाता था ।
    और प्रायः घर और शहर में कम ही रहता था ।
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  3. #3
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    Re: प्रेतकन्या

    लेकिन उस दिन जब मैं बाजार में था । मुझे संजय की मम्मी
    रजनी आंटी की आवाज सुनायी दी - हेय प्रसून ! क्या ये तुम
    हो..जरा सुनो ।
    मैंने स्कूटर रोक दिया । रजनी आंटी मेरे करीब आ गयी । वे
    बेहद उदास नजर आ रही थी ।

    - संजय कैसा है । और आजकल दिखायी नहीं देता ? मैंने
    आंटी से पूछा ।

    - मैंने उसी के बारे में बात करने के लिये तुझे रोका है । तुमने
    एक बार बताया था कि तुम वनखन्डी गुफ़ा में रहने
    वाले बाबा
    से परिचित हो । और अक्सर वहाँ आते जाते भी रहते हो ।
    प्लीज प्रसून ! मैं बाबाजी से मिलना चाहती हूँ । तुम्हारे दोस्त
    की खातिर । अपने बेटे की खातिर ।
    मामला सीरियस था । आंटी डरी हुयी सी प्रतीत होती थी ।
    मुझे आश्चर्य था कि आज वे बाबाजी के बारे पूछ रही थी ।
    और कभी इस पूरे परिवार ने मेरी हंसी इस बात को लेकर बनायी
    थी कि दृश्य जगत के अलावा भी कोई अदृश्य जगत है ।
    - आप मुझे कुछ तो हिंट दें । मैंने कहा - बाबा.. यूं एकाएक
    किसी से नहीं मिलते । और आप जिस वजह से बाबा से मिलना
    चाहती हैं । वह उचित है भी । या नहीं ?
    आंटी ने मुझे भीङ से हटकर एक तरफ़ आने का इशारा किया ।
    और एकान्त में आते ही बोली - प्रसून ! तीन महीने से संजय
    कुछ अजीब......मेरे बेटे को किसी तरह उससे बचा लो ?
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  4. #4
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    Re: प्रेतकन्या

    मामला वाकई गम्भीर था । मैंने पूछा - संजय अक्सर कहाँ मिलता है ?
    इत्तफ़ाकन वो जगह मेरे प्रतिदिन के आवागमन मार्ग के बीच में ही थी । पर ये बात अलग थी कि संजय जहाँ जाता था । वो उस रास्ते से आधा किलोमीटर हटकर थी ।
    मैं तुरन्त स्कूटर से उसी टायम संजय के पास पहुँचा । वो आराम से मुझे एक आम के पेङ के नीचे बैठा नजर आया । और अपलक सामने बहती नदी की धारा को देख रहा था । मैं यह देखकर चौंक गया कि कुछ ही दिनों में उसका हष्टपुष्ट शरीर हड्डियों का ढांचा सा रह गया था ।

    उसने स्कूटर की आवाज सुनकर एक बार मुझे देखा । और फ़िर उसी तरह नदी की धारा को देखने लगा । जैसे मुझे पहचानता भी न हो । पर अबकी बार मुझे कोई आश्चर्य नहीं हुआ । मैंने स्कूटर स्टेंड पर खङा करके एक सिगरेट सुलगाई । और लगभग टहलता हुआ संजय के पास पहुँचा ।
    - हाय संजय ! हाउ आर यू । मैंने मुस्कराते हुये कहा ।
    - तुम यहाँ क्यों आये हो । वह नफ़रत से बोला - मैं पहले ही काफ़ी परेशान हूँ ।
    - आई नो डियर..आइ नो । मैंने उसकी निगाह का अनुसरण करते हुये कहा - शीरीं आयी नहीं क्या.. अभी तक.?
    - हेय..व्हाट आर यू सेयिंग ? वह चिढकर बोला - तुम सब मेरे दुश्मन हो ।..माय मदर..फ़ादर..।

    - सब जानता हूँ बेटा । मैंने मन ही मन कहा ।
    मैंने मन ही मन बाबा को याद किया । और झन्नाटेदार चाँटा उसके गाल पर मारा । वह लगभग लङखङाता हुआ सा जमीन पर गिरने को हुआ । मैंने उसे संभाल कर पेङ के सहारे से बैठाया । और वापस आकर स्कूटर का हार्न बजाया ।
    उस सुनसान स्थान पर वो हार्न एक डरावनी आवाज की तरह दूर तक गूँज गया । कुछ ही क्षणों में दूर एक पेङ की ओट में छिपी रजनी आंटी मुझे अपनी तरफ़ आती नजर आयी । मैं इतमीनान से सिगरेट के कश लगाने लगा ।
    - हमें अभी इसे लेकर बाबाजी की गुफ़ा पर जाना होगा । मैंने आंटी की तरफ़ देखते हुये कहा - अफ़सोस आपको ये सब मुझे पहले ही बताना था ।
    आंटी ने लगभग सुबकते हुये दूसरी तरफ़ देखा । मैंने सहारा देकर संजय को स्कूटर पर बैठाया । और आंटी से कहा कि वह पीछे बैठकर संजय को सहारा देती रहें । वह इस वक्त अपने होश में नहीं हैं ।
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  5. #5
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    Re: प्रेतकन्या

    मैंने स्कूटर दौङा दिया । निर्जन वन का वह क्षेत्र आम आदमी को डराबने अहसासों से रूबरू कराता था । पर मेरे लिये तो वह रोज की परिचित जगह थी । मैं महसूस कर रहा था कि रजनी आंटी भयभीत हो रहीं हैं । और संजय तो अपने होश में ही नहीं था ।
    आधा घंटे के सफ़र के बाद हम वनखन्डी गुफ़ा के सामने पहुँच गये । मेरे लिये बेहद परिचित वह स्थान किसी भी आदमी के रोंगटे खङे करने के लिये काफ़ी था । वातावरण अजीव अजीव बेहद धीमी आवाजों के साथ डराबना संगीत सा सुना रहा था । दूर दूर तक कोई नजर नहीं आ रहा था ।
    - प्रसून ! मुझे आंटी की भयभीत आवाज सुनायी दी ।
    - डरो मत । मैंने उनकी तरफ़ बिना देखे ही कहा । और गुफ़ा के दरबाजे पर प्रवेश आग्या हेतु सम्बोधन सूचक बोला - अलख बाबा अलख ।
    - तेरा कल्याण हो..। अन्दर से बाबा की रहस्यमय आवाज आयी - इस औरत को बोल । डरे नहीं । इसका
    पुत्र ठीक होगा ।
    बिना कुछ बताये बाबा रजनी आंटी के बारे में बोल रहे हैं । इसकी उन पर क्या प्रतिक्रिया हुयी । ये देखे बिना मैंने संजय को सहारा दिया । और अन्दर गुफ़ा में आंटी के साथ प्रवेश किया । आंटी भयवश लगभग मुझसे सटी हुयी थी । हम लोग अन्दर जाकर बैठ गये ।
    आंटी बेहद हैरत से गुफ़ा का मुआयना कर रही थी । मुझे उनकी हैरत की वजह मालूम थी । वो ये कि बेहद भीतरी इस गुफ़ा में हमेशा दूधिया प्रकाश फ़ैला रहता था । पर वह प्रकाश किस चीज से हो रहा है । ये कहीं से पता नहीं चलता था । और बाहर से जंगल जितना ही डराबना था । अन्दर उतनी ही शान्ति सकून का माहौल था । गुफ़ा में डराबना अहसास कराने वाली कोई चीज नहीं थी ।
    बाबा एक बङे चबूतरे पर कम्बल के आसन पर बैठे थे । उनकी बङी बङी तेजयुक्त आँखो में मानव मात्र के लिये स्नेह था । उनकी लम्बी लम्बी जटायें दाङी आदि उनके व्यक्तित्व को भव्यता प्रदान कर रही थी ।
    - इसको आराम से लिटा दो । बाबा ने संजय की तरफ़ इशारा करके कहा ।
    मैंने संजय को आराम से लिटा दिया । रजनी आंटी अपलक बाबाजी को देख रही थी । बाबा के लिये जो धारणा उनके मन में थी । कि बाबा डराबनी वेशभू्षा.. डराबने माहौल में रहते होंगे । वह बाबा को देखते ही जाती रही । आगे जो होने वाला था । वह बाबाजी के सानिध्य में काफ़ी समय से रहने के कारण मैं कुछ कुछ जानता था ।
    - बाबाजी ! रजनी आंटी ने कुछ बोलने की कोशिश की ।
    - शान्त..बेटी ..शान्त.। बाबा ने बीच में ही हाथ उठाकर कहा - ये बताने की आवश्यकता नहीं है कि इसे क्या परेशानी है । और कैसे हुयी । और क्या होगा ?
    फ़िर बाबा मुझसे एक गुप्त भाषा में बात करने लगे । जिसका मतलब ये था कि मुझसे एक गलती हो गयी थी । वो ये कि मुझे किसी एक हिम्मती पुरुष को साथ लाना था । जो तमाम कार्यक्रम के क्रियान्वन के दौरान रजनी को संभाले रहता ।
    दरअसल एक विशेष ट्रान्स विधि द्वारा मुझे बाबाजी के साथ " किनझर " नामक प्रेतलोक में जाना था । जहाँ की एक प्रेतकन्या संजय को ले गयी थी । अब ये बङी रहस्यमय हकीकत थी कि संजय यहाँ एक चलती फ़िरती लाश के रूप में नजर अवश्य आता था । पर वास्तव में वह प्रेतलोक का वासी हो चुका था ।
    और बाबाजी के अनुसार वह अगले छह महीने में मर जाने वाला था । क्योंकि उसने ये रास्ता खुद ही चुना था । और एक प्रेत कन्या के रूपजाल में आसक्त होकर वह धीरे धीरे प्रेत देही हो रहा था ।
    ये सामान्य ओझाओं के झाङ फ़ूंक का मामला न था । दरअसल मुझे " माध्यम " बनकर बाबा के साथ किनझर जाना था । और संजय के विगत तीन महीने का प्रेतकन्या के साथ गुजारा समय संजय के दिमाग को अपने दिमाग से कनेक्ट करके मिटाना था ।
    इसको इस तरह से समझ सकते हैं कि किसी टेप की रील को बैक स्थिति में लाकर खाली करना । या किसी कापी में लिखे गये अनपयुक्त मैटर को इरेजर द्वारा मिटाना । तब संजय अपनी पूर्व स्थिति में उसी तरह से आ जाता । मानों गहरी नींद के बाद जागा हो । और इस तरह वो मरने से वच जाता ।
    अब समस्या ये थी कि मैं और बाबाजी जब किनझर प्रेतलोक की यात्रा पर जाते । तो हमारे शरीर निर्जीव के समान हो जाते । और संजय पहले ही बेहोशी जैसी अवस्था में पङा हुआ था । तब पीछे अकेली रह जातीं रजनी आंटी । जो निश्चय ही उस बियाबान जंगल में बारह घन्टे तक नहीं रह सकती थी ।
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  6. #6
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    Re: प्रेतकन्या

    जबकि प्रेतकन्या से उलझने में पन्द्रह या बीस घन्टे भी लग सकते थे । अगर मान लो । उन्हें भी एक विशेष मूर्क्षावस्था में कर दिया जाता । तो गुफ़ा में मौजूद चारों शरीर मृतक के समान होते । और कोई दुर्घटना ( किसी जंगली जानवर या आकस्मिक आपदा से हुआ शारीरिक नुकसान ) हो जाने पर शरीर किसी भी कीमत पर प्राप्त नहीं किया जा सकता था । अतः शरीरों की रक्षा करने वाले किसी जिगरवाले इंसान का होना जरूरी था । इसलिये एक बार तो बाबाजी ने तय किया कि किसी आदमी का बन्दोबस्त करके ही किनझर जायेंगे ।
    मैं बङे असमंजस में था कि क्या करूँ क्या न करूँ । दरअसल मैं अब अकेले ही किनझर जाने की सोच रहा था । क्योंकि इससे पूर्व भी मैंने बाबाजी से कई बार कहा था कि मैं किसी सुदूरलोक की यात्रा पर अकेले जाने का अनुभव प्राप्त करना चाहता हूँ । और बाबाजी ने कहा भी था कि वे मुझे ऐसा मौका अवश्य देंगे । पर यहाँ मामला दूसरा था । मेरी थोङी सी गलती संजय को मौत के मुँह में ले जा सकती थी ।
    और यह भी संभव था कि मैं वहाँ से वापस न आ पाता । क्योंकि किसी शक्तिशाली प्रेत से मुकाबले में यदि मैं हार जाता । और उन्हें पता चल जाता कि मैं एक मानव हूँ । तो वो मुझे दिमागी परिवर्तन करके प्रेत बना देते । और इस तरह की फ़ीडिंग से मैं खुद को प्रेत ही समझने लगता । इस तरह के रिस्क की ढेरों बातें थी । जिनको ज्यों का त्यों समझाना मुश्किल है । पर कहने का अर्थ यही है कि इस तरह मैं संजय और अपनी दोनों की जान जोखिम में डाल रहा था । और बाबाजी इसके लिये तैयार नहीं थे ।
    - ओ . के । मैंने अंग्रेजी में कहा - सिम्पल सी बात है । मैं अकेला ही चला जाता हूँ ।
    फ़िर मैंने आंटी को जो हमारे वार्तालाप को बङे अजीव भाव से सुन रही थीं ( क्योंकि वो भाषा उनके पल्ले ही नहीं पङ रही थी ) को समझाया कि कोई दो तीन घन्टे ( जबकि मुझे अच्छी तरह से मालूम था कि किनझर से मेरी वापसी अगली सुबह तक ही हो पायेगी । पर मैं इसलिये निश्चित था । क्योंकि एक तो बाबाजी प्रथ्वी पर ही रुक रहे थे । अतः आंटी यदि घबराती भी । तो वो उन्हें मूर्क्षा में भेज देंगे । और आंटी को ऐसा प्रतीत होगा । मानों उन्हें स्वाभाविक नींद आ गयी हो । दूसरे ये एक इंसान । मेरे दोस्त की जिन्दगी का सवाल भी था । तीसरे मैं अकेला जाने का बेहद इच्छुक था । क्योंकि बाबाजी के साथ तो मैं सैकङों बार अंतरिक्ष यात्रा पर गया था । ) तक मैं ध्यान में जाऊँगा । और आप फ़िक्र न करें । संजय ठीक हो जायेगा ।
    आंटी ने किंकर्तव्यबिमूढ अवस्था में सिर हिला दिया । बाबाजी हल्के से मुस्कराये । उन्हें मेरा साहस अच्छा लग रहा था ।
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  7. #7
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    Re: प्रेतकन्या

    मैं लेट गया । और गहरी सांस लेते हुये मृतप्राय सा होने लगा । बाबाजी भी धीरे धीरे मेरे साथ आने लगे । दरअसल बाबाजी ने तय किया था कि प्रथ्वी के बृह्माण्ड की सीमा तक वे मेरे साथ आयेंगे । ऐसी हालत में नीचे रजनी आंटी को लगेगा कि वे कुछ सोच रहे हैं । और अगर वो उस हालत में उनसे कोई बातचीत भी करती हैं । तो बाबाजी आसानी से उसका जबाब देते रहेंगे ।
    लेकिन अगर बाबाजी बृह्माण्ड की सीमा पार करते हैं । तो उसी समय उनका शरीर निर्जीव समान हो जायेगा । और मुझे बृह्माण्ड सीमा पर छोङकर बाबाजी ज्यों ज्यों वापस गुफ़ा के पास आते जायेंगे । उनका शरीर सचेत प्रतीत होने लगेगा । मानों किसी सोच से बाहर आये हों ।
    मुझे इस विचार से हँसी आ गयी कि आम मनुष्यों के लिये ये किसी गङबङझाला से कम नहीं था । पर ये भी सत्य है कि अलौकिक रहस्यों को जानना । और उनमें प्रविष्ट कर पाना । बच्चों का खेल नहीं होता ।
    बृह्माण्ड की सीमा आते ही मैंने " अलख बाबाजी अलख " कहा । और गहन सुदूर अंतरिक्ष में छलांग लगा दी ।
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  8. #8
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    Re: प्रेतकन्या

    बाबाजी के मच्छर भिनभिनाने जैसी आवाज में सुनायी दे रहे शब्द " तेरा कल्याण हो.. .तेरा कल्याण हो " लगातार मेरे साथ चल रहे थे ।
    वास्तव में ये एक प्रकार की कनेक्टिविटी थी । अब ऐसी ही आवाज में जब तक बाबाजी को मेरे शब्द " अलख बाबाजी अलख " और मुझे तेरा कल्याण हो सुनाई देते रहते । तब तक मैं बाबाजी के सम्पर्क में था । शब्द बन्द हो जाने का मतलब साफ़ था कि सम्पर्क टूट गया । बाबाजी तेजी से वापस गुफ़ा की तरफ़ जाने लगे । और मैं अंतरिक्ष की गहराईयों में बढ रहा था ।
    अंतरिक्ष में किसी भी लोकवासी या अन्य जीव की आवाज प्रथ्वी की तरह भारी ( बेसयुक्त ) और क्लियर न होकर एक भिनभिनाहट या छनछनाहट युक्त होती है । इस बात को इस तरह समझे कि टीवी मोबायल फ़ोन या अन्य किसी खराव प्रसारण में जब कभी मुख्य आवाज हल्की और उसके साथ छनछनाहट की आवाज अक्सर सुनाई देती है । कुछ कुछ वैसी ही मिलती जुलती आवाज अंतरिक्ष में परस्पर सम्पर्क का माध्यम होती है ।
    और अंतरिक्ष की एक निश्चित सीमा पार करते ही किसी भी सामान्य आदमी की आवाज स्वतः ही हल्की और वैसी ही छनछनाहटयुक्त हो जाती है । आप कल्पना करें कि प्रथ्वी पर करोंङो लोग मोबायल पर बात कर रहे हों । और बो सभी आवाजें आपको बिना किसी मोबायल या यन्त्र के इकठ्ठी सुनाई दें । वस ऐसी स्थिति होती है ।
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  9. #9
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    Re: प्रेतकन्या

    जब ये आवाजें बेहद हल्की या ना के बराबर हों । तो हम किसी भी लोक से उस समय दूर हैं । और आवाज जितनी क्लियर होती जाय । उतना ही हम किसी लोक के नजदीक हैं । दूसरी बात अंतरिक्ष की यात्रा में अधिक परिश्रम नहीं होता । और न ही किसी प्रकार का खतरा होता है कि हम गिर जायेंगे । या टकरा जायेंगे । लेकिन अन्य अंतरिक्ष जीवों से मुकाबला या दोस्ती का गुण होना अनिवार्य होता है । अन्यथा कदम कदम पर खतरा ही समझो ।
    तब जब मैं कई लाख योजन की ऊँचाईयों पर पहुँच चुका था । और इस प्रकार के विचारों के बीच अपना सफ़र तय कर रहा था कि प्रथ्वी पर भी कितना रहस्यमय जीवन है । मेरे परिवार के लोग या अन्य परिचित कोई भी तो नहीं जानता कि मैं अंतरिक्ष की अनंत ऊँचाईयों पर अक्सर भृमण करता हूँ । बाइचान्स अगर मुझे यहाँ कुछ हो जाय । तो यही कहावत सटीक बैठेगी कि जमीन निगल गयी । या आसमान खा गया । और बाबाजी के सम्पर्क में होने से सौ के लगभग मैं ऐसे लोगों को जानता था । जो आराम से अदृश्य लोकों का भृमण करते थे । पर उन्हें आम लोग नहीं जानते थे ।
    ऐसे ही विचारों के बीच मेरे दिमाग में मानों विस्फ़ोट सा हुआ । जल्दबाजी में मैं प्रेतकन्या का हुलिया ( जो कि मुझे बाबाजी द्वारा अपने दिमाग में फ़ीड कराना था ) और वास्तविक नाम का पता करना भूल गया था ।
    संजय की मम्मी ने तो लङकी ( अपनी समझ से ) का नाम शीरीं बताया था । जो कि संजय बङबङाता था । पर ये एकदम झूठा भी हो सकता था । और उस वक्त तो मेरे छक्के ही छूट गये । जब मुझे पता चला कि विचारों के भंवरजाल में डूबकर मैं कनेक्टिविटी लाइन से कब अलग हो गया । इसका मुझे पता ही नहीं चला । अलख..बाबा..अलख..बार बार ये शब्द पुकारता हुआ मैं सम्पर्क जोङने की कोशिश करने लगा । पर तेरा कल्याण हो । मुझे दूर दूर तक सुनायी नहीं दिया ।
    अब ये सांप के मुँह में छंछूदर बाली बात हो रही थी । अतः मेरे सामने दो ही रास्ते थे कि वापस प्रथ्वी पर जाऊँ । या रास्ता बदलकर किसी अन्य जान पहचान वाले प्रेतलोक पर उतरकर सहायता लूँ । तब मुझे लूढा याद आया ।
    लूढा सरल स्वभाव का प्रेत था । जो एक सच्चे साधु का तिरस्कार करने से प्रेतभाव को प्राप्त हुआ था । लूढा से सम्पर्क वाक्य था..तो तू ही बता दे..। इसके प्रत्युत्तर में अगर मुझे ये सुनाई पङ जाता कि ..वो जो कोई नही जानता..। तो लूढा से मेरी कनेक्टिविटी जुङी समझो ।
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  10. #10
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    Re: प्रेतकन्या

    अतः मैं बार बार कहने लगा । तो तू ही बता दे..पर कोई लाभ न हुआ । लूढा वहाँ से पता नहीं कहाँ था । और मेरी यात्रा के चार घन्टे पूरे हो चुके थे । और तभी मेरी कनेक्टिविटी में एक नया वाक्य आने लगा..। लेकिन तू जो है.. ।
    पर ये सम्पर्क अस्पष्ट था । और इसकी वजह मैं अच्छी तरह से जानता था । दरअसल प्रेतलोकों से अंतरिक्ष यात्री की कनेक्टिविटी में मेरे शब्द इस कोड से मेल खा रहे थे । पर इसका एकदम सही अन्य कोड क्या था । ये मुझे नहीं पता था । तभी मेरे पास कोड के साथ भीनी भीनी तेज खुशबू आने लगी । और मैं एक अग्यात लोक में उतर गया ।
    अभी मेरे लिये ये कहना मुश्किल था कि ये प्रेतलोक है । या अन्य प्रकार के जीवों का लोक ।
    - स्वागत..हे.. मैंने तुम्हें यहाँ उतारा है । कौन हो तुम । और किस प्रयोजन से अंतरिक्ष में हो ?
    - अंतरिक्ष क्या किसी के बाप की जागीर है.. और तू.. मुझे इस तरह उतारने वाली कौन भला ?
    कहते हुये मैंने उस प्रेतकन्या को देखा । अब मैं अपने पूर्व अनुभवों से जान गया था कि ये भी कोई अन्य प्रेतलोक है ।
    दरअसल इन लोकों में प्रथ्वी की तरह मर्दानगी वाला सिद्धांत चलता है । यदि आपने सभ्यता का प्रदर्शन किया । तो आपको डरपोक माना जायेगा । और ये भी पहचान हो जायेगी कि आप पहली बार यहाँ आये है । न सिर्फ़ नये बल्कि अंतरिक्ष के लिये अजनबी भी । और ये दोनों बातें बेहद खतरनाक हैं ।
    प्रेतकन्या एक सफ़ेद घांघरा पहने थी । और कमर से ऊपर निर्वस्त्र थी । उसके बेहद लम्बे बाल हवा में लहरा रहे थे ।
    - तुम वाकई सख्त और बङे..। उसने मेरे कमर के पास निगाह फ़ेंकते हुये होठों पर जीभ फ़िरायी - जिगर
    वाले हो । आओ..मेरे जैसा सुख पहुँचाने वाली । यहाँ दूसरी नहीं है । क्या तुम..। उसने पुनः अपने उन्नत
    उरोजों को उभारते हुये कहा - भोग करना चाहोगे ।
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