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Thread: लघु कथाये

  1. #101
    कांस्य सदस्य garima's Avatar
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    . एहसान
    बात बहुत पुरानी है।
    .
    आठ-दस साल पहले की है ।
    मैं अपने एक मित्र का पासपोर्ट बनवाने के लिए दिल्ली के पासपोर्ट ऑफिस गया था।

    उन दिनों इंटरनेट पर फार्म भरने की सुविधा नहीं थी। पासपोर्ट दफ्तर में दलालों का बोलबाला था
    .
    और खुलेआम दलाल पैसे लेकर पासपोर्ट के फार्म बेचने से लेकर उसे भरवाने, जमा करवाने और पासपोर्ट बनवाने का काम करते थे।

    मेरे मित्र को किसी कारण से पासपोर्ट की जल्दी थी, लेकिन दलालों के दलदल में फंसना नहीं चाहते थे।

    हम पासपोर्ट दफ्तर पहुंच गए, लाइन में लग कर हमने पासपोर्ट का तत्काल फार्म भी ले लिया।
    .
    पूरा फार्म भर लिया। इस चक्कर में कई घंटे निकल चुके थे, और अब हमें िकसी तरह पासपोर्ट की फीस जमा करानी थी।

    हम लाइन में खड़े हुए लेकिन जैसे ही हमारा नंबर आया बाबू ने खिड़की बंद कर दी और कहा कि समय खत्म हो चुका है अब कल आइएगा।

    मैंने उससे मिन्नतें की, उससे कहा कि आज पूरा दिन हमने खर्च किया है और बस अब केवल फीस जमा कराने की बात रह गई है, कृपया फीस ले लीजिए।

    बाबू बिगड़ गया। कहने लगा, "आपने पूरा दिन खर्च कर दिया तो उसके लिए वो जिम्मेदार है क्या? अरे सरकार ज्यादा लोगों को बहाल करे। मैं तो सुबह से अपना काम ही कर रहा हूं।"

    मैने बहुत अनुरोध किया पर वो नहीं माना। उसने कहा कि बस दो बजे तक का समय होता है, दो बज गए। अब कुछ नहीं हो सकता।

    मैं समझ रहा था कि सुबह से दलालों का काम वो कर रहा था, लेकिन जैसे ही बिना दलाल वाला काम आया उसने बहाने शुरू कर दिए हैं।
    .
    पर हम भी अड़े हुए थे कि बिना अपने पद का इस्तेमाल किए और बिना उपर से पैसे खिलाए इस काम को अंजाम देना है।

    मैं ये भी समझ गया था कि अब कल अगर आए तो कल का भी पूरा दिन निकल ही जाएगा, क्योंकि दलाल हर खिड़की को घेर कर खड़े रहते हैं, और आम आदमी वहां तक पहुंचने में बिलबिला उठता है।

    खैर, मेरा मित्र बहुत मायूस हुआ और उसने कहा कि चलो अब कल आएंगे।

    मैंने उसे रोका। कहा कि रुको एक और कोशिश करता हूं।

    बाबू अपना थैला लेकर उठ चुका था। मैंने कुछ कहा नहीं, चुपचाप उसके-पीछे हो लिया। वो उसी दफ्तर में तीसरी या चौथी मंजिल पर बनी एक कैंटीन में गया, वहां उसने अपने थैले से लंच बॉक्स निकाला और धीरे-धीरे अकेला खाने लगा।

    मैं उसके सामने की बेंच पर जाकर बैठ गया। उसने मेरी ओर देखा और बुरा सा मुंह बनाया। मैं उसकी ओर देख कर मुस्कुराया। उससे मैंने पूछा कि रोज घर से खाना लाते हो?

    उसने अनमने से कहा कि हां, रोज घर से लाता हूं।

    मैंने कहा कि तुम्हारे पास तो बहुत काम है, रोज बहुत से नए-नए लोगों से मिलते होगे?

    वो पता नहीं क्या समझा और कहने लगा कि हां मैं तो एक से एक बड़े अधिकारियों से मिलता हूं।

    कई आईएएस, आईपीएस, विधायक और न जाने कौन-कौन रोज यहां आते हैं। मेरी कुर्सी के सामने बड़े-बड़े लोग इंतजार करते हैं।

    मैंने बहुत गौर से देखा, ऐसा कहते हुए उसके चेहरे पर अहं का भाव था।

    मैं चुपचाप उसे सुनता रहा।

    फिर मैंने उससे पूछा कि एक रोटी तुम्हारी प्लेट से मैं भी खा लूं? वो समझ नहीं पाया कि मैं क्या कह रहा हूं। उसने बस हां में सिर हिला दिया।

    मैंने एक रोटी उसकी प्लेट से उठा ली, और सब्जी के साथ खाने लगा।

    वो चुपचाप मुझे देखता रहा। मैंने उसके खाने की तारीफ की, और कहा कि तुम्हारी पत्नी बहुत ही स्वादिष्ट खाना पकाती है।

    वो चुप रहा।

    मैंने फिर उसे कुरेदा। तुम बहुत महत्वपूर्ण सीट पर बैठे हो। बड़े-बड़े लोग तुम्हारे पास आते हैं। तो क्या तुम अपनी कुर्सी की इज्जत करते हो?

    अब वो चौंका। उसने मेरी ओर देख कर पूछा कि इज्जत? मतलब?

    मैंने कहा कि तुम बहुत भाग्यशाली हो, तुम्हें इतनी महत्वपूर्ण जिम्मेदारी मिली है, तुम न जाने कितने बड़े-बड़े अफसरों से डील करते हो, लेकिन तुम अपने पद की इज्जत नहीं करते।

    उसने मुझसे पूछा कि ऐसा कैसे कहा आपने? मैंने कहा कि जो काम दिया गया है उसकी इज्जत करते तो तुम इस तरह रुखे व्यवहार वाले नहीं होते।

    देखो तुम्हारा कोई दोस्त भी नहीं है। तुम दफ्तर की कैंटीन में अकेले खाना खाते हो, अपनी कुर्सी पर भी मायूस होकर बैठे रहते हो,
    .
    लोगों का होता हुआ काम पूरा करने की जगह अटकाने की कोशिश करते हो।

    मान लो कोई एकदम दो बजे ही तुम्हारे काउंटर पर पहुंचा तो तुमने इस बात का लिहाज तक नहीं किया कि वो सुबह से लाइऩ में खड़ा रहा होगा,

    और तुमने फटाक से खिड़की बंद कर दी। जब मैंने तुमसे अनुरोध किया तो तुमने कहा कि सरकार से कहो कि ज्यादा लोगों को बहाल करे।

    मान लो मैं सरकार से कह कर और लोग बहाल करा लूं, तो तुम्हारी अहमियत घट नहीं जाएगी?
    .
    आगे
    Last edited by garima; 23-10-2018 at 05:23 PM.
    मंच तुम आँखों की पलको से हो गए हो,
    के मिले बिना सुकून ही नहीं आता...!!!

  2. #102
    कांस्य सदस्य garima's Avatar
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    हो सकता है तुमसे ये काम ही ले लिया जाए
    फिर तुम कैसे आईपीएस ,आईएएस,विधायको से मिलोगे?
    भगवान ने तुम्हे मौका दिया है लोगो से रिश्ते बनाने का
    लेकिन अपना दुर्भाग्य देखो तुम इसका लाभ उठाने के बजाय रिश्ते बिगाड़ रहे हो।
    मेरा क्या है कल आ जाऊंगा,परसो फिर आ जाऊंगा
    ऐसा तो नही है कि आज काम नही हुआ तो कभी नही होगा तुम नही करोगें कल कोई और करेगा।
    अब तुम्हारे पास मौका था किसी को अपना एहसानमंद बनाने का।उससे तुम चूक गए।
    वो कहना छोड़ के मेरी बात सुनने लगा मैन कहा पैसे तो तुम बहुत कम लोगे लेकिन रिश्ते नही कमाये तो सब बेकार हैक्या करोगे पैसो का?
    अपना व्यवहार ठीक नही रखोगे तो तुम्हारे घर वाले भी तुमसे दुखी रहेंगे यार दोस्त तो नही है। ये तो मैं देख ही चुका हूं
    मुझे देखो अपने दफ्तर में कभी अकेले कहना नही खाता।
    यह भी भूख लगी तो तुम्हारे साथ कहना खाने आ गया अर्रे अकेले खाना भी
    कोई जिंदगी है
    मेरी बात सुनकर वो रुआंसा हो गया।उसने कहा आपने बात सही कही है साहब।
    मैं अकेला हु। पत्नी झगड़ा करके मायके चली गई है
    बच्चे भी मुझे पसंद नही करते ।
    माँ है वो भी मुझसे ज्यादा बात नही करती । सुबह चार- पांच रोटी बना देती है और मैं तन्हा कहना खाता हूं। रात में घर जाने का भी मन नही करता समझ नही आता गड़बड़ी कहा है?
    मैने हौले से कहा खुद को लोगो से जोड़ो किसी की मदद कर सकते हो तो करो।
    देखो मैं यह अपने दोस्त के पासपोर्ट के लिए आया हु मेरे पास तो पासपोर्ट है।मैन दोस्त के खातिर मिन्नते की निस्वार्थ भाव से इसलिए मेरे पास दोस्त है तुमरे पास नही है
    वो उठा और बोला आप तुरंत मेरी खिड़की पे पहुंचो मैं आज ही फार्म जमा करूँगा

    मैं नीचे गया उसने फार्म जमा किया फीस भरी ओर हफ्ते भर में पासपोर्ट बन गया।
    आगे
    Last edited by garima; 23-10-2018 at 05:49 PM.
    मंच तुम आँखों की पलको से हो गए हो,
    के मिले बिना सुकून ही नहीं आता...!!!

  3. #103
    कांस्य सदस्य garima's Avatar
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    बाबू ने मुझसे मेरा नम्बर मांगा
    मैन अपना नम्बर दिया और चला गया।
    कल दीवाली पर मेरे पास बहुत से फोन आये।मैन करीब करीब सबके फोन उठाए ओर सबको हैप्पी दीवाली बोला।
    उसी में एक फ़ोन आया "रविन्द्र कुमार चौधरी बोल रहा हु साहब"
    मैं बिलकुल पहचान न सका।उसने कहा कि साल पहले आप हमारे पास अपने एक दोस्त के पासपोर्ट के लिए आये थे और आपने मेरे साथ रोटी भी खाई थी
    आपने कहा था पैसे के बजाय रिश्ते बनाओ।
    मुझे एकदम याद आ गया मैने कहा हां जी चौधरी साहब कैसे है।

    उसने खुश होकर कहा साहब आप उसदिन चले गए फिर मैं बहुत सोचता रहा सच मे पैसे तो बहुत दे जाते है पर साथ खाने वाला कोई नही मिलता।

    सब अपने मे व्यस्त है।
    साहब अगले दिन मैं पत्नी को लेने उसके मायके गया बहुत मिन्नते की वो मां ही नही रही थी।वो कहना खाने बैठी तो मैंने उसकी प्लेट से एक रोटी उठा ली
    कहा कि साथ खिलाओगी वो हैरान थी
    रोने लगी ।मेरे साथ आ गई बच्चे भी आ गए।
    साहब अब मैं पैसे नही रिश्ते कमाता हु।जो आता है उसका काम कर देता हूं।
    आज आपको हैप्पी दीवाली बोलने के लिए फ़ोन किया है।
    अगले महीने बिटिया की शादी है आपको आना है।
    अपना पता दीजियेगा मैं ओर मेरी पत्नी आपके पास आएंगे।
    मेरी पत्नी ने मुझसे पूछा था ये पासपोर्ट ऑफिस में रिश्ते कमान कहा से सीखा?
    मैन पूरी कहानी बताई।
    आप किसी से नही मीले पर सभी से आपका रिश्ता जुड़ गया।
    सब आपको जानते है बहुत दिनों से बात करने की कोशिश कर रहा था पर हिम्मत ही नही हुई।आज दीवाली के मौके पे कर रहा हु
    आपको शादी में आना है।
    बिटिया को आशीर्वाद देने ।मुझे यकीन है आप आएंगे वो बोलता जा रहा था मैं सुनता जा रहा था। सोचा नही था कि सचमुच उसकी जिंदगी में भी रिश्ता पैसो पर भारी पडेगा।
    लेकिन मेरा कहा सच हुआ रिश्ते भावनाओ से जुड़ते है कारणों से नही।
    कारणों से तो मशीने चला करती है।

    पैसा इंसान के लिए बनाया गया है इंसान पैसो के लिए नही।
    जिंदगी में किसी का साथ ही काफी है कंधो पर रखा हाथ ही काफी है।
    दूर हो या पास क्या फर्क पड़ता है अनमोल रिश्तो का तो बस एहसास ही काफी है

    मरने के बाद भी जीना चाहो तो कुछ पढ़ने लायक लिख जाना या
    लिखने लायक कुछ कर जाना।
    याद रखना पैसा सबके पास है किसी के पास कम तो किसी के पास ज्यादा
    ये सोचो कि रिश्ते किसके पास ज्यादा है।
    मंच तुम आँखों की पलको से हो गए हो,
    के मिले बिना सुकून ही नहीं आता...!!!

  4. #104
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    एक गाँव में बाहर से आकर एक ब्राह्मण रहने लगा ।

    उसने गाँव की एक लड़की के साथ शादी कर ली ।

    उसके दो बच्चे हुए ।

    एक का नाम राजाराम और दूसरे का नाम सीताराम था ।

    दोनों बड़े हुए इसलिए जरूरत बढ़ी ।

    माँग कर पेट भरना मुश्किल था और मेहनत वाला कोई काम तो ब्राह्मण नहीं करेगा ।

    दान दक्षिणा से ही काम चलायेगा ।
    ऐसे में सरपंच का चुनाव एक साल बाद आने वाला था ।

    दोनों ब्राह्मण पुत्रों ने रोज एक दूसरे से लड़ना चालू किया और गाँव के लोगों को अपने पक्ष में करने लगे ।

    पूरा गाँव दो भागों में बँट गया । आधा राजाराम के पक्ष में और आधा सीताराम के पक्ष में ।

    चुनाव में राजाराम जीत गया और सरपंच बन गया ।

    दोनों का रहना एक ही घर में था । ब्राह्मण की लॉटरी लग गयी ।

    पूरा घर और राजाराम सीताराम की बहुएँ खुश हो गयी, क्योंकि घी तो खीचड़ी में ही जानेवाला था। यानि फायदा दोनों को था ।

    राजाराम ने 5 साल में भ्रष्टाचार करके काफी सम्पत्ति इकट्ठी कर ली ।

    चुनाव नजदीक आते ही सीताराम ने राजाराम के भ्रष्टाचार को expose करना चालू कर दिया और गाँव वालो से कहने लगा कि मुझे सरपंच बना दे तो मैं राजाराम को जेल में डलवा दूँगा ।और ऐसा बोल कर वह खुद सरपंच चुनाव के लिये योग्य उम्मीवार बन गया ।

    चुनाव आते ही ज्यादातर गाँव के लोग सीताराम के समर्थन में आ गये और चुनाव होते ही सीताराम पूर्ण बहुमत से चुनाव जीत गया ।

    आज सीताराम सरपंच है और राजाराम की पत्नी उपसरपंच है ।

    पूरा गाँव के लोग इसलिए खुश है क्योंकि राजाराम हार गया ।

    न राजाराम जेल में गया, न सीताराम !

    दोनों के पास अकूत सम्पत्ति है, पर फिर भी पूरा गाँव दोनों को अलग अलग समझता है और बारी बारी से उनको चुनता है ।

    *निष्कर्ष-* बस यही हाल है आज कोंग्रेस और बीजेपी की ब्राह्मण राजनीति का है, एक 2G-2G करता रहेगा दूसरा राफेल-राफेल ! आम जनता को तो इनके मीडिया का तमासा देखकर बारी-बारी से इन्ही को पक्ष विपक्ष में बिठाना है, अगर आपको राजाराम सीताराम का यह खेल समझ में आ गया हो तो मेसेज को आगे फॉरवर्ड कर दीजिए हो सकता है जिस जनता को यह मूर्ख समझते हैं वह जनता इनके सामने इस बार किसी तीसरे को वोट देकर इन्ही को मूर्ख बना दे !!

    *कोंग्रेस बीजेपी को छोड़ दो*, *फुले शाहू पेरियार अम्बेडकर कांशीराम के विचारों को वोट दो*
    मौत को लोग यूहि बदनाम करते है तकलीफ तो जिंदगी देती है

  5. #105
    कांस्य सदस्य garima's Avatar
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    एक मन्दिर था ।

    उसमें सभी लोग पगार पर थे।
    आरती वाला,
    पूजा कराने वाला आदमी,
    घण्टा बजाने वाला भी पगार पर था...

    घण्टा बजाने वाला आदमी आरती के समय, भाव के साथ इतना मसगुल हो जाता था कि होश में ही नहीं रहता था।

    घण्टा बजाने वाला व्यक्ति पूरे भक्ति भाव से खुद का काम करता था।मन्दिर में आने वाले सभी व्यक्ति भगवान के साथ साथ घण्टा बजाने वाले व्यक्ति के भाव के भी दर्शन करते थे।उसकी भी वाह वाह होती थी...

    एक दिन मन्दिर का ट्रस्ट बदल गया,और नये ट्रस्टी ने ऐसा आदेश जारी किया कि अपने मन्दिर में *काम करते सब लोग पढ़े लिखे होना जरूरी है। जो पढ़े लिखें नही है, उन्हें निकाल दिया जाएगा।*

    उस घण्टा बजाने वाले भाई को ट्रस्टी ने कहा कि 'तुम्हारी आज तक का पगार ले लो। कल से तुम नौकरी पर मत आना।'

    उस घण्टा बजाने वाले व्यक्ति ने कहा, "साहेब भले मैं पढ़ा लिखा नही हूं,परन्तु इस कार्य में मेरा भाव भगवान से जुड़ा हुआ है, देखो!"

    ट्रस्टी ने कहा,"सुन लो तुम पढ़े लिखे नही हो, इसलिए तुम्हे रखने में नही आएगा..."

    दूसरे दिन मन्दिर में नये लोगो को रखने में आया। परन्तु आरती में आये लोगो को अब पहले जैसा मजा नहीं आता था। घण्टा बजाने वाले व्यक्ति की सभी को कमी महसूस होती थी।

    कुछ लोग मिलकर घण्टा बजाने वाले व्यक्ति के घर गए, और विनती करी तुम मन्दिर आओ ।

    उस भाई ने जवाब दिया, "मैं आऊंगा तो ट्रस्टी को लगेगा कि मैं नौकरी लेने के लिए आया है। इसलिए मैं नहीं आ सकता।"

    वहा आये हुए लोगो ने एक उपाय बताया कि 'मन्दिर के बराबर सामने आपके लिए एक दुकान खोल के देते है। वहाँ आपको बैठना है और आरती के समय घण्टा बजाने आ जाना, फिर कोई नहीं कहेगा तुमको नौकरी की जरूरत है ..."

    उस भाई ने मन्दिर के सामने दुकान शुरू की और वो इतनी चली कि एक दुकान से सात दुकान और सात दुकानो से एक फैक्ट्री खोली।

    अब वो आदमी मर्सिडीज़ से घण्टा बजाने आता था।

    समय बीतता गया। ये बात पुरानी सी हो गयी।

    मन्दिर का ट्रस्टी फिर बदल गया .

    नये ट्रस्ट को नया मन्दिर बनाने के लिए दान की जरूरत थी

    मन्दिर के नये ट्रस्टी को विचार आया कि सबसे पहले उस फैक्ट्री के मालिक से बात करके देखते है ..

    ट्रस्टी मालिक के पास गया ।सात लाख का खर्चा है, फैक्ट्री मालिक को बताया।

    फैक्ट्री के मालिक ने कोई सवाल किये बिना एक खाली चेक ट्रस्टी के हाथ में दे दिया और कहा चैक भर लो ट्रस्टी ने चैक भरकर उस फैक्ट्री मालिक को वापस दिया । फैक्ट्री मालिक ने चैक को देखा और उस ट्रस्टी को दे दिया।

    ट्रस्टी ने चैक हाथ में लिया और कहा सिग्नेचर तो बाकी है"

    मालिक ने कहा मुझे सिग्नेचर करना नंही आता है लाओ *अंगुठा मार देता हुँ,* "वही चलेगा ..."

    *ये सुनकर ट्रस्टी चौक गया और कहा*, "साहेब तुमने अनपढ़ होकर भी इतनी तरक्की की, यदि पढे लिखे होते तो कहाँ होते ...!!!"

    तो वह सेठ हँसते हुए बोला,
    *"भाई, मैं पढ़ा लिखा होता तो बस मन्दिर में घण्टा बजा रहा होता"*

    *सारांश:*
    कार्य कोई भी हो, परिस्थिति कैसी भी हो, तुम्हारी *काबिलियत* तुम्हारी *भावनाओ* पर निर्भर करती है ।
    भावनायें *शुद्ध* होगी तो *ईश्वर* और *सुंदर भविष्य* पक्का तुम्हारा साथ देगा ।
    मंच तुम आँखों की पलको से हो गए हो,
    के मिले बिना सुकून ही नहीं आता...!!!

  6. #106
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    मित्रता
    एक भंवरे की मित्रता एक गोबरी (गोबर में रहने वाले) कीड़े से थी ! एक दिन कीड़े ने भंवरे से कहा- भाई तुम मेरे सबसे अच्छे मित्र हो, इसलिये मेरे यहाँ भोजन पर आओ!*

    *भंवरा भोजन खाने पहुँचा! अब भंवरे ने कीड़े को अपने यहां आने का निमंत्रन दिया कि तुम कल मेरे यहाँ आओ!*

    *अगले दिन कीड़ा भंवरे के यहाँ पहुँचा! भंवरे ने कीड़े को उठा कर गुलाब के फूल में बिठा दिया! कीड़े ने परागरस पिया! मित्र का धन्यवाद कर ही रहा था कि पास के मंदिर का पुजारी आया और फूल तोड़ कर ले गया और बिहारी जी के चरणों में चढा दिया! कीड़े को ठाकुर जी के दर्शन हुये! चरणों में बैठने का सौभाग्य भी मिला! संध्या में पुजारी ने सारे फूल इक्कठा किये और गंगा जी में छोड़ दिए! कीड़ा अपने भाग्य पर हैरान था! इतने में भंवरा उड़ता हुआ कीड़े के पास आया, पूछा-मित्र! क्या हाल है? कीड़े ने कहा-भाई! जन्म-जन्म के पापों से मुक्ति हो गयी! ये सब अच्छी संगत का फल है!*
    *संगत से गुण ऊपजे, संगत से गुण जाए*
    *लोहा लगा जहाज में , पानी में उतराय!*

    *कोई भी नही जानता कि हम इस जीवन के सफ़र में एक दूसरे से क्यों मिलते है,*
    *सब के साथ रक्त संबंध नहीं हो सकते परन्तु ईश्वर हमें कुछ लोगों के साथ मिलाकर अद्भुत रिश्तों में बांध देता हैं,हमें उन रिश्तों को हमेशा संजोकर रखना चाहिए।*
    मंच तुम आँखों की पलको से हो गए हो,
    के मिले बिना सुकून ही नहीं आता...!!!

  7. #107
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    सफल जीवन
    एक बेटे ने पिता से पूछा-
    पापा.. ये 'सफल जीवन' क्या होता है

    पिता, बेटे को पतंग उड़ाने ले गए।
    बेटा पिता को ध्यान से पतंग उड़ाते देख रहा था...

    थोड़ी देर बाद बेटा बोला-
    पापा.. ये धागे की वजह से पतंग अपनी आजादी से और ऊपर की और नहीं जा पा रही है, क्या हम इसे तोड़ दें !! ये और ऊपर चली जाएगी....
    पिता ने धागा तोड़ दिया ..

    पतंग थोड़ा सा और ऊपर गई और उसके बाद लहरा कर नीचे आयी और दूर अनजान जगह पर जा कर गिर गई...

    तब पिता ने बेटे को जीवन का दर्शन समझाया...

    बेटा..
    'जिंदगी में हम जिस ऊंचाई पर हैं..
    हमें अक्सर लगता की कुछ चीजें, जिनसे हम बंधे हैं वे हमें और ऊपर जाने से रोक रही हैं
    जैसे :
    -घर-⛪
    -परिवार-
    -अनुशासन-
    -माता-पिता-
    -गुरू-और-
    -समाज-
    और हम उनसे आजाद होना चाहते हैं...

    वास्तव में यही वो धागे होते हैं जो हमें उस ऊंचाई पर बना के रखते हैं..

    'इन धागों के बिना हम एक बार तो ऊपर जायेंगे परन्तु बाद में हमारा वो ही हश्र होगा जो बिन धागे की पतंग का हुआ...'

    "अतः जीवन में यदि तुम ऊंचाइयों पर बने रहना चाहते हो तो, कभी भी इन धागों से रिश्ता मत तोड़ना.."

    "धागे और पतंग जैसे जुड़ाव के सफल संतुलन से मिली हुई ऊंचाई को ही 'सफल जीवन' कहते हैं.."
    मंच तुम आँखों की पलको से हो गए हो,
    के मिले बिना सुकून ही नहीं आता...!!!

  8. #108
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    Quote Originally Posted by garima View Post
    सफल जीवन
    एक बेटे ने पिता से पूछा-
    पापा.. ये 'सफल जीवन' क्या होता है

    पिता, बेटे को पतंग उड़ाने ले गए।
    बेटा पिता को ध्यान से पतंग उड़ाते देख रहा था...

    थोड़ी देर बाद बेटा बोला-
    पापा.. ये धागे की वजह से पतंग अपनी आजादी से और ऊपर की और नहीं जा पा रही है, क्या हम इसे तोड़ दें !! ये और ऊपर चली जाएगी....
    पिता ने धागा तोड़ दिया ..

    पतंग थोड़ा सा और ऊपर गई और उसके बाद लहरा कर नीचे आयी और दूर अनजान जगह पर जा कर गिर गई...

    तब पिता ने बेटे को जीवन का दर्शन समझाया...

    बेटा..
    'जिंदगी में हम जिस ऊंचाई पर हैं..
    हमें अक्सर लगता की कुछ चीजें, जिनसे हम बंधे हैं वे हमें और ऊपर जाने से रोक रही हैं
    जैसे :
    -घर-⛪
    -परिवार-
    -अनुशासन-
    -माता-पिता-
    -गुरू-और-
    -समाज-
    और हम उनसे आजाद होना चाहते हैं...

    वास्तव में यही वो धागे होते हैं जो हमें उस ऊंचाई पर बना के रखते हैं..

    'इन धागों के बिना हम एक बार तो ऊपर जायेंगे परन्तु बाद में हमारा वो ही हश्र होगा जो बिन धागे की पतंग का हुआ...'

    "अतः जीवन में यदि तुम ऊंचाइयों पर बने रहना चाहते हो तो, कभी भी इन धागों से रिश्ता मत तोड़ना.."

    "धागे और पतंग जैसे जुड़ाव के सफल संतुलन से मिली हुई ऊंचाई को ही 'सफल जीवन' कहते हैं.."
    superb ,,,,,
    satyawachan ,,,,,

  9. #109
    कांस्य सदस्य garima's Avatar
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    धन्यवाद महाराज
    मंच तुम आँखों की पलको से हो गए हो,
    के मिले बिना सुकून ही नहीं आता...!!!

  10. #110
    कर्मठ सदस्य sanjaychatu's Avatar
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    Quote Originally Posted by garima View Post
    धन्यवाद महाराज
    जीती रहो बेटा ,,, ऐसी ही अच्छी कहानिया पोस्ट करती रहो

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