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Thread: लघु कथाये

  1. #111
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    जीती रहो बेटा ,,, ऐसी ही अच्छी कहानिया पोस्ट करती रहो
    Hmmm
    मंच तुम आँखों की पलको से हो गए हो,
    के मिले बिना सुकून ही नहीं आता...!!!

  2. #112
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    *भावनाएं*

    *काम,क्रोध,लोभ,मोह,*
    *ईर्ष्या,प्रेम,अहं का र आदि सभी भावनाएं एक साथ एक द्वीप पर रहतीे थी।*
    *एक दिन समुद्र में एक तूफान आया और द्वीप डूबने लगा।*
    *हर भावना डर ​​गई और अपने अपने बचाव का रास्ता ढूंढने लगी।*
    *लेकिन प्रेम ने सभी को बचाने के लिए एक नाव बनायी।*
    *सभी भावनाओं ने प्रेम का आभार जताते हुए शीघ्रातिशीघ्र नाव में बैठने का प्रयास किया।*
    *प्रेम ने अपनी मीठी नज़र से सभी को देखा कोई छूट न जाये।*
    *सभी भावनाएँ तो नाव मे सवार थी लेकिन अहंकार कहीं नज़र नहीं आया।*
    *प्रेम ने खोजा तो पाया कि, अहंकार नीचे ही था ... !*
    *नीचे जाकर प्रेम ने अहंकार को ऊपर लाने की बहुत कोशिश की,लेकिन अहंकार नहीं माना।*
    *ऊपर सभी भावनाएं प्रेम को पुकार रहीं थी,"जल्दी आओ प्रेम!तूफान तेज़ हो रहा है,यह द्वीप तो निश्चय ही डूबेगा और इसके साथ साथ हम सभी की भी यंही जलसमाधि बन जाएगी।प्लीज़ जल्दी करो"*
    *"अरे! अहंकार को लाने की कोशिश कर रहा हूँ यदि तूफान तेज़ हो जाय तो तुम सभी निकल लेना।मैं तो अहंकार को लेकर ही निकलूँगा।" प्रेम ने नीचे से ही जवाब दिया और फिर से अहंकार को मनाने की कोशिश करने लगा।*
    *लेकिन अहंकार कब मानने वाला था यहां तक कि वह अपनी जगह से हिला ही नहीं।*
    *अब सभी भावनाओं ने एक बार फिर प्रेम को समझाया कि अहंकार को जाने दो क्योंकि वह सदा से जिद्दी रहा है।*
    *लेकिन प्रेम ने आशा जताई,बोला, "मैं अहंकार को समझाकर राजी कर लूंगा तभी आऊगा......."*
    *तभी अचानक तूफान तेज हो गया और नाव आगे बढ़ गई।*
    *अन्य सभी भावनाएं तो जीवित रह गईं,*
    *लेकिन........*
    *अन्त में उस अहंकार के कारण प्रेम मर गया !!*
    *अहंकार के चलते हमेशा प्रेम का ही अंत होता है।*
    अहंकार का त्याग करते हुए प्रेम को अपने से जुदा न होने दें।*
    मंच तुम आँखों की पलको से हो गए हो,
    के मिले बिना सुकून ही नहीं आता...!!!

  3. #113
    कांस्य सदस्य garima's Avatar
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    एक गलती:--

    जब आप एक-एक भिंडी को प्यार से धोते पोंछते हुये फिर काटते है।

    अचानक एक भिंडी के ऊपरी हिस्से में छेद दिख गया, सोचा भिंडी खराब हो गई।

    वह फेंक देगी लेकिन नहीं, उसने ऊपर से थोड़ा काटा, कटे हुये हिस्से को फेंक दिया।

    फिर ध्यान से बची भिंडी को देखा, शायद कुछ और हिस्सा खराब था, उसने थोड़ा और काटा और फेंक दिया फिर तसल्ली की, बाक़ी भिंडी ठीक है कि नहीं।

    तसल्ली होने पर काट के सब्ज़ी बनाने के लिये रखी भिंडी में मिला दिया।

    वाह क्या बात है, पच्चीस पैसे की भिंडी को भी हम कितने ख्याल से।

    ध्यान से सुधारते हैं, प्यार से काटते हैं, जितना हिस्सा सड़ा है उतना ही काट के अलग करते हैं, बाक़ी अच्छे हिस्से को स्वीकार कर लेते हैं। ये तो क़ाबिले तारीफ है।

    लेकिन अफसोस। इंसानों के लिये इतना कठोर हो जाते हैं एक ग़लती दिखी नहीं कि उसके पूरे व्यक्तित्व को काट के फेंक देते हैं।

    उसके सालों के अच्छे कार्यों को दरकिनार कर देते हैं।

    महज अपने ईगो को संतुष्ट करने के लिए उससे हर नाता तोड़ देते हैं।

    क्या पच्चीस पैसे की एक भिंडी से भी गई गुजरी हो गया है इंसानो के रिश्ते।

    विचार करें।
    मंच तुम आँखों की पलको से हो गए हो,
    के मिले बिना सुकून ही नहीं आता...!!!

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