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Thread: बचपन की याद

  1. #1
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    बचपन की याद

    ऐसी चीज़ें जिन्हें 90 के दशक में पैदा हुआ हर बच्चा आज मिस करता है
    मंच तुम आँखों की पलको से हो गए हो,
    के मिले बिना सुकून ही नहीं आता...!!!

  2. #2
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    बीता हुआ समय हमें हमेशा अच्छा लगता है, चाहे वो अच्छा रहा हो या फिर दुश्वारियों से भरा. और यदि वह बीता हुआ समय हमारा बचपन और 90 के दशक के दिन हो तो फिर क्या कहने!. जब शाम को खेलने के लिए दोस्त खोजने नहीं पड़ते थे, जब चिट्ठियां ही संदेश भेजने का जरिया हुआ करती थीं. जब टेक्नॉलॉजी हमारे बेडरूम तक नहीं घुसा था. जब हमारे पास दूसरों और ख़ुद के लिए पर्याप्त समय था. हम दूरदर्शन से ही पूरी तरह संतुष्ट थे. आज वह समय बेशक बीत चुका है, मगर हम आज भी उन बचपन की यादों से बाहर नहीं आना चाहते.
    यहां हम ख़ास आपके लिए लेकर आए हैं 90 के दशक की ऐसी चीज़ें जो आपको फिर से आपके बचपन में ले जाने की गारंटी हैं...
    मंच तुम आँखों की पलको से हो गए हो,
    के मिले बिना सुकून ही नहीं आता...!!!

  3. #3
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    1. हर रविवार की सुबह ही-मैन (He-Man) को पढ़ने के लिए अख़बार खोजना.
    ही मैन और मास्टर्स ऑफ यूनिवर्स वो कुछ ख़ास चीज़ें थीं जिन्हें पढ़ने के लिए हम आंखें मलते हुए भी उठ जाया करते थे, आख़िर बाद में दोस्तों को जाकर उसकी कहानी जो सुनानी होती थी.
    मंच तुम आँखों की पलको से हो गए हो,
    के मिले बिना सुकून ही नहीं आता...!!!

  4. #4
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    2. सुपरहीरोज़ की बात हो तो हम-सभी के फेवरेट शक्तिमान का जिक्र तो बनता है बॉस...
    आज भले ही कितने ही सुपरहीरोज़ आ चुके हों, मगर शक्तिमान हमेशा हमारी पहली पसंद रहेगा. आख़िर वह दोस्त पहले और सुपरहीरो बाद मेंं था, और Sorry Shaktiman को भला कोई कैसे भूल सकता है?
    मंच तुम आँखों की पलको से हो गए हो,
    के मिले बिना सुकून ही नहीं आता...!!!

  5. #5
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    3. मोगली और उसकी जंगलमंडली के साथ-साथ दानासुर को भला कोई कैसे भूल सकता है...
    जंगलबुक और दानासुर मेंं से फेवरेट तय करने में मुझे बड़ी परेशानी होती है, मैं तो दोनों को ही रखना चाहूंगा. बगीरा और बल्लू के साथ-साथ शेर खान के आतंक को कोई कैसे भूल सकता है? मगर हम सभी छिप्पकली के नाना-दानासुर को भी बेइंतहा चाहते थे.
    मंच तुम आँखों की पलको से हो गए हो,
    के मिले बिना सुकून ही नहीं आता...!!!

  6. #6
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    4.महाभारत के बाद इतवार कभी भी वैसा सुनहरा नहीं रहा...
    इसे देखने के बाद हम ख़ुद को हिंदी में पारंगत मानने लगे थे, और हम कैसे-कैसे आलोचनात्मक नज़रिया विकसित कर बैठे वो भी सोचने वाली ही बात है. शुक्रिया बी.आर.चोपड़ा साब
    मंच तुम आँखों की पलको से हो गए हो,
    के मिले बिना सुकून ही नहीं आता...!!!

  7. #7
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    5. और उस दौर में यदि चंद्रकांता का जिक्र न हो तो शायद यह बेईमानी होगी...
    उस दौर के सारे लड़के चंद्रकांता को अपनी गर्लफ्रेंड बनाना चाहते थे,
    मंच तुम आँखों की पलको से हो गए हो,
    के मिले बिना सुकून ही नहीं आता...!!!

  8. #8
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    6. या फिर पोटली बाबा की कहानियां...
    उसकी पोटली से पुतलियां निकलती थींं, और किस्सागोई का ऐसा अद्भुत नज़ार फिर कभी देखने को नहीं मिला...
    मंच तुम आँखों की पलको से हो गए हो,
    के मिले बिना सुकून ही नहीं आता...!!!

  9. #9
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    7. और फिर विक्रम-बैतैाल, हातिमताई के साथ-साथ अली बाबा और चालीस चोर तो था ही...
    हम इन सीरियल्स से कितना डरा करते थे, मगर इनका रोमांच भी तो अजीब हुआ करता था...
    मंच तुम आँखों की पलको से हो गए हो,
    के मिले बिना सुकून ही नहीं आता...!!!

  10. #10
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    8.गर्मी की छुट्टियां फिर कभी वैसी नहीं रही जैसी राज कॉमिक्स के किरदारों के साथ हुआ करती थीं.
    किराये पर इन कॉमिक्स को लाना और फिर घंटे भर में ही उन्हें पढ़ कर पहुंचाने चले जाना भी क्या पागलपना था. सुपर कमांडो ध्रुव, बांकेलाल, नागराज और डोगा के साथ बीतते दिन भी क्या दिन थे.
    मंच तुम आँखों की पलको से हो गए हो,
    के मिले बिना सुकून ही नहीं आता...!!!

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