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Results 61 to 68 of 68

Thread: अश्वगंधा पौधा एक फायदे अनेक

  1. #61
    नवागत
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    thanks for such an useful information

  2. #62
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    अश्वगंधा या असगंध (Withania somnifera) एक पौधा (क्षुप) है। यह विदानिया कुल का पौधा है; विदानिया की विश्व में 10 तथा भारत में 2 प्रजातियाँ पायी जाती हैं।

    भारत में पांरपरिक रूप से अश्वगंधा का उपयोग आयुर्वेदिक उपचार के लिए किया जाता है। इसके साथ-साथ इसे नकदी फसल के रूप में भी उगाया जाता है। इसकी ताजा पत्तियों तथा जड़ों में घोड़े की मूत्र की गंध आने के कारण ही इसका नाम अश्वगंधा पड़ा।
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  3. #63
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    अश्वगंधा एक द्विबीज पत्रीय पौधा है। जो कि सोलेनेसी कुल का पौधा है। सोलेनेसी परिवार की पूरे विश्व में लगभग 3000 जातियाँ पाई जाती हैं। और 90 वंश पाये जाते हैं। इसमें से केवल 2 जातियाँ ही भारत में पाई जाती हैं।

    इस जाति के पौधे सीधे, अत्यन्त शाखित, सदाबहार तथा झाड़ीनुमा 1.25 मीटर लम्बे पौधे होते हैं। पत्तियाँ रोमयुक्त, अण्डाकार होती हैं। फूल हरे, पीले तथा छोटे एंव पाँच के समूह में लगे हुये होते हैं। इसका फल बेरी जो कि मटर के समान दूध युक्त होता है। जो कि पकने पर लाल रंग का होता है। जड़े 30-45 सेमी लम्बी 2.5-3.5 सेमी मोटी मूली की तरह होती हैं। इनकी जड़ों का बाह्य रंग भूरा तथा यह अन्दर से सफेद होती हैं।

    रासायनिक घटक
    अश्वगंधा की जड़ों में 0.13 से 0.31 प्रतिशत तक एल्केलाॅइड की सांद्रता पाई जाती है। इसमें महत्वपूर्ण विदानिन एल्केलाॅइड होता है, जो कि कुल एल्केलाॅइड का 35 से 40 प्रतिशत होता है।
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  4. #64
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    विभिन्न औषधियाँ
    अश्वगंधारिष्ट
    अश्वगंधाघृत
    अश्वगंधा चूर्ण
    अश्वगंधा अवलेह
    सौभाग्य शुन्ठी पाक
    सुकुमारघृत
    महारास्नादि योग
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  5. #65
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    भारत में अश्वगंधा की जड़ों का उत्पादन प्रति वर्ष 2000 टन है। जबकि जड़ की माँग 7,000 टन प्रति वर्ष है। मध्य प्रदेश के उत्तर पूर्व भाग में लगभग 4000 हेक्टेयर भूमि पर अश्वगंधा की खेती की जा रही है। मध्य प्रदेश के मनसा, नीमच, जावड़, मानपुरा और मंदसौर और राजस्थान के नागौर और कोटा जिलों में अश्वगंधा की खेती की जा रही है।

    अच्छे जल निकास वाली बलुई दोमट अथवा हल्की लाल मृदा जिसका पी0 एच0 मान 7.5-8.0 हो व्यावसायिक खेती के लिये उपयुक्त होती है।

    यह पछेती खरीफ फसल है। पौधो के अच्छे विकास के लिये 20-35 डिग्री तापमान 500-750 मिमी0 वार्षिक वर्षा होना आवश्यक है। पौधे की बढ़वार के समय शुष्क मौसम एंव मृदा में प्रचुर नमी की होना आवश्यक होता है। शरद ऋतु में 1-2 वर्षा होने पर जड़ों का विकास अच्छा होता है। पर्वतीय क्षेत्रों की अनउपजाऊ भूमि पर भी इसकी खेती को सफलता पूर्वक किया जा सकता है। शुष्क क्रषि के लिये भी अश्वगंधा की खेती उपयुक्त है।

    अगस्त और सितम्बर माह में जब वर्षा हो जाऐ उसके बाद जुताई करनी चाहिये। दो बार कल्टीवेटर से जुताई करने के बाद पाटा लगा देना चाहिये। 10-12 कि0ग्रा0 बीज प्रति हेक्टेयर की दर से पर्याप्त होता है। अच्छी पैदावार के लिये पौधे से पौधे की दूरी 5 सेमी0 तथा लाइन से लाइन की दूरी 20 सेमी0 रखना चाहिये।

    सामान्यतः बीज का अंकुरण 6-7 दिन के बाद प्रारम्भ हो जाता है। अश्वगंधा के अपरिपक्व बीज को बुवाई हेतु नहीं चुनना चाहिए, क्यांेकि इनका भूर्ण परिपक्व नहीं हो पाता है। 8-12 महीने पुराने बीज का जमाव 70-80 प्रतिशत तक होता है। बीज के अच्छे अंकुरण के लिये आई0ए0ए0, जी0ए03 अथवा थायोयूरिया का प्रयोग करना चाहिये।

    नर्सरी को सतह से 5-6 इंच ऊपर उठाकर बनाया जाता है। जिससे कि नर्सरी में जलभराव की समस्या उत्पन्न न हो बीज बोने से पहले नर्सरी को शोधित करने के लिये डाइथेन एम-45 के घोल का प्रयोग करना चाहिये। जैविक विधि से नर्सरी को उपचारित करने के लिये गोमूत्र का प्रयोग किया जाता है। नर्सरी में गोबर की खाद का प्रयोग करना चाहिये, जिससे कि बीजों का अंकुरण अच्छा हो बीजो को लाइन में 1-1.25 सेमी0 गहराई में डालना चाहिये। नर्सरी में बीज की बुवाई जून माह में की जाती है। बीजों में 6-7 दिनों में अंकुरण शुरू हो जाता है। जब पौधा 6 सप्ताह का हो जाये तब इसे खेत में रोपित कर देना चाहिये।

    उन्नतशील प्रजातियाँ
    पोशिता
    जवाहर असगंध-20
    डब्यलू एस0-20
    डब्यलू एस0-134
    खाद एंव उर्वरक:

    औषधीय पौधे जिनकी जड़ों का प्रयोग व्यावसायिक रूप से किया जाता है, उनमें रासायनिक उर्वरकों का प्रयोग नहीं करना चाहिये। सामान्यतः इस फसल में उर्वरकों का प्रयोग नहीं किया जाता है। परन्तु शोध पश्चात यह ज्ञात हुआ है कि अमोनियम नाइट्रेट के प्रयोग से जड़ो की अधिकतम उपज प्राप्त होती है। कुछ शोध में जिब्रेलिक एसिड के प्रयोग से भी जड़ों के विकास में अच्छे परिणाम प्राप्त हुये हैं।

    खेत की तैयारी करते समय सड़ी गोबर की खाद या जैविक खादों का प्रयोग 5 टन प्रति हेक्टेयर की दर से अवश्य करनी चाहिये।

    बुवाई के 25-30 दिन बाद कतार और छिंटकवाँ विधि दोनो में फालतू पौधों को हटा देना चाहिये। 1 वर्ग मीटर में 30-40 पौधे रखने चाहिये। 1 हेक्टेयर में 3 से 4 लाख पौधे पर्याप्त होते हैं। निराई एंव गुड़ाई: बुवाई के 40-50 दिन बाद एक बार निराई गुड़ाई अवश्य करनी चाहिये पौधों की अच्छी बढ़वार तथा अधिक उपज प्राप्त करने के लिये फालतू पौधों को खेत से बाहर निकाल देना चाहिये।

    सिंचाई:

    अश्वगंधा बर्षा ऋतु की फसल है। इसलिये इसमें बहुत अधिक सिंचाई की आवश्यकता नहीं होती है। मृदा में नमी की कम मात्रा होने पर सिंचाई करना अनिवार्य हो जाता है। जलभराव की समस्या होने पर जड़ों का विकास ठीक प्रकार से नहीं हो पाता है। इसलिये खेत में जलनिकास की व्यवस्था ठीक प्रकार से कर लेनी चाहिये। जल भराव के अधिक हो जाने पर पौधों की वृद्धि रूक जाती है तथा पौधे मरने लगते हैं। अश्वगंधा की खेती सिंचित एंव असिंचित दोनो ही दशाओं में की जाती है। असिंचित अवस्था में जड़ों की बढ़वार अधिक होती है। क्योकि जड़े पानी की तलाश में सीधी बढ़ती हैं और शाखा रहित रहती हैं।

    रोग एंव कीट का प्रभाव पौधे पर होता है परन्तु व्यावसायिक द्रष्टिकोण से अश्वगंधा की फसल में यह नुकसान दायक नहीं हैं।

    फरवरी-मार्च के महीने में पौधों में फूल एंव फल आना प्रारम्भ हो जाते हैं। अश्वगंधा की फसल अप्रैल-मई में 240-250 दिन के पश्चात खुदाई के योग्य हो जाती है। परिपक्व पौधे की खुदाई की सही अवस्था जानने के लिये फलों का लाल होना और पत्तियों का सूखना आदि बातों का अध्ययन करना चाहिये। खेत में कुछ स्थानों से पौधों को उखाड़ कर उनकी जड़ों को तोड़ कर देखना चाहिये यदि जड़ आसानी से टूट जाये और जड़ों में रेशे न हों तो समझ लेना चाहिये कि फसल खुदाई हेतु तैयार है। जड़ों के रेशेदार हो जाने पर जड़ की गुणवत्ता में कमी आ जाती है। पौधे को जड़ों सहित उखाड़ लेना चाहिये यदि जड़ें ज्यादा लम्बी हैं तो जुताई क्रिया भी की जा सकती है। बाद में पौधों को एकत्र करके जड़ों को काट कर पौधों से अलग करके छोटे-छोटे टुकड़ों में काट कर धूप में सुखा लेना चाहिये। पके फलों को हाँथ से तोड़ कर सुखा कर बीजों को अलग कर लेना चाहिये।

    सूखी जड़ों को छोटे-छोटे भागों में काट कर साफ कर लेना चाहिये। इन्हें रंग व आकार के आधार पर 4 भागों में बाँटा गया है।

    जड़ों का रंग व आकार के आधार पर तुलना
    ग्रेड 1: इस ग्रेड में जड़ों के टुकड़ों की लम्बाई 7 सेमी एंव चैड़ाई 1-1.5 सेमी होती है। यह बेलनाकार होती हैं। जड़ की बाहरी सतह कोमल ओर रंग में हल्कापन होता है। जड़ें अन्दर से ठोस एंव सफेद होती हैं।
    ग्रेड 2: इस ग्रेड में जड़ों के टुकड़ों की लम्बाई 5 सेमी एंव चैड़ाई 1 सेमी होती है। जड़ें ठोस एंव कड़क होती हैं।
    ग्रेड 3: इस ग्रेड में जड़ों के टुकड़ों की लम्बाई 4 सेमी एंव चैड़ाई 1 सेमी से भी कम होती है। जड़ें पतली एंव शाखित होती हैं, जो कि माँसल भी नहीं होती हैं।
    निम्न श्रेणी: यह आकार में छोटी, पतली होती हैं। और अन्दर की ओर पीली होती हैं। इनकी चैड़ाई 3 मिमी होती है।
    पैदावार
    1 हेक्टेयर भूमि पर 4-5 कु0 सूखी जड़ें प्राप्त हो जाती हैं। 8-10 सेमी लम्बी तथा 10-15 मिमी व्यास बाली जड़ों को व्यापारिक द्रष्टिकोण से अच्छा माना जाता है। बीज प्राप्त करने के लिये फसल के 5 प्रतिशत भाग की खुदाई नहीं करनी चाहिये। जब पौधों के अधिकतर फल लाल हो जायें तब इन्हें काट कर सुखाने के पश्चात बीज निकाल लेना चाहिये।
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  6. #66
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    Withania somnifera, known commonly as ashwa****ha,[2] Indian ginseng,[3] poison gooseberry,[3] or winter cherry,[2] is a plant in the Solanaceae or nightshade family. Several other species in the genus Withania are morphologically similar.[4] Although thought to be useful as a medicinal herb in Ayurveda, trials supporting its clinical use are limited. However, many in vitro and animal experiments suggest effects on the immune, endocrine, and CNS systems, as well as in the pathogenesis of cancer and inflammatory conditions.[
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  7. #67
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    Taxon: Withania somnifera (L.) Dunal
    Genus: Withania
    Family: Solanaceae subfamily: Solanoideae.
    Nomen number: 102407
    Place of publication: A. L. P. P. de Candolle, Prodr. 13(1):453. 1852
    Name verified on: 07-Nov-1985 by ARS Systematic Botanists. Last updated: 30-Aug-1999
    No species priority site assigned.

    NO ACCESSIONS IN NPGS UNDER THIS NAME.

    Common names:
    ashwa****ha (Source: Herbs Commerce ed2 )
    winter-cherry (Source: F Zamb )

    Economic importance:
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  8. #68
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