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Thread: छिनाल पर बवाल

  1. #11
    कांस्य सदस्य Rajat Vynar's Avatar
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    इस प्रकरण पर 'इन्फॉर्मेशन टू मीडिया' जाल-स्थल में विस्तार से लिखा गया है-

    छिनाल पर छिड़ी बहस के बहाने

    नई दिल्ली [अनंत विजय]

    'पिछले वर्षो में हमारे यहा जो स्त्री विमर्श हुआ है वह मुख्यरूप से शरीर केंद्रित है। यह भी कह सकते हैं कि वह विमर्श बेवफाई के विराट उत्सव की तरह है। लेखिकाओं में होड़ लगी है, यह साबित करने के लिए कि उनसे बड़ी छिनाल कोई नहीं है। मुझे लगता है कि इधर प्रकाशित एक बहु प्रमोटेड और ओवर रेटेड लेखिका की आत्मकथा का शीर्षक 'कितने बिस्तरों पर कितनी बार' हो सकता है। इस तरह के उदाहरण बहुत-सी लेखिकाओं में मिल जाएंगे।'

    यह कथन था महात्मा गाधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा के कुलपति विभूति नारायण राय का। विभूति का यह विवादास्पद साक्षात्कार भारतीय ज्ञानपीठ की मासिक पत्रिका 'नया ज्ञानोदय' में प्रकाशित हुआ है।

    तकरीबन हफ्तेभर पहले जब पत्रिका का अंक बाजार में आया तो हिंदी के लेखकों के बीच इस साक्षात्कार को लेकर कानाफूसी शुरू हो गई थी, लेकिन खुला विरोध नहीं हो रहा था। अचानक से एक दिन दिल्ली से प्रकाशित एक अंग्रेजी दैनिक ने इस खबर को प्रमुखता से प्रकाशित कर विवाद खड़ा कर दिया। अंग्रेजी अखबार के नादान संवाददाता ने 'छिनाल' शब्द का अंग्रेजी अनुवाद 'प्रोस्टीट्यूट' कर दिया, जिससे अर्थ का अनर्थ हो गया।

    दरअसल, छिनाल शब्द भोजपुरी के 'छिनार' शब्द का परिष्कृत रूप है। यह एक आचलिक शब्द है, जिसका प्रयोग बिहार और उत्तर प्रदेश के कई इलाकों में किया जाता है। छिनाल उन स्त्रियों को कहा जाता है, जो कुलटा होती हैं या फिर स्त्रियोचित मर्यादा को भंग कर अपनी मर्जी से कई पुरुषों से संबंध बनाती हैं, लेकिन वे किसी भी हाल में वेश्या नहीं होती।

    बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश के भोजपुरी इलाकों में शादी ब्याह के मौके पर गाए जाने वाले लोकगीतों में महिला और पुरुष दोनों को छिनाल या छिनार कहा जाता है। शादी-ब्याह के मौके पर जब महिलाएं मंगलगीत गाती हैं तो उसमें दूल्हे की मा, मौसी और 'फुआ' को गाली दी जाती है तो उनमें छिनार शब्द का प्रयोग किया जाता है। तो यह शब्द बिल्कुल आपत्तिजनक है, लेकिन वेश्या जितना अपमानजनक नहीं है। यह गाली है और किसी भी लेखक को अपनी बिरादरी की महिलाओं के लिए इस शब्द के प्रयोग की इजाजत नहीं दी जा सकती है।

    जैसा कि ऊपर संकेत दिया जा चुका है कि यह इंटरव्यू लगभग हफ्तेभर से छपकर विवादित नहीं हो पा रहा था, क्योंकि हिंदी सत्ता की भाषा नहीं है, सत्ता की भाषा तो अंग्रेजी है और अंग्रेजी अखबार के गैर जिम्मेदाराना अनुवाद ने आग में घी का काम किया और विरोध की चिंगारी को भड़का दिया। लेखिकाओं का जितना अपमान विभूति नारायण राय ने किया, उससे ज्यादा बड़ा अपमान तो अंग्रेजी के वे अखबार कर रहे हैं, जो लगातार लेखिकाओं को वेश्या बता रहे हैं।

    न्यूज चैनलों को भी इस मसालेदार खबर में संभावना दिखी और एक-दूसरे से आगे निकलने की होड़ में उन्होंने छिनाल और वेश्या के अंतर को मिटा दिया। किसी ने भी यह जाचने-परखने की कोशिश नहीं की कि दोनों में क्या अंतर है। मीडिया में इसके उछलने के बाद विभूति नारायण राय पर चौतरफा हमला शुरू हो गया।

    हिंदी के लेखकों के अलावा कई महिला संगठनों ने महात्मा गाधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय के कुलपति को लेखिकाओं के खिलाफ इस अमर्यादित टिप्पणी को लेकर कठघरे में खड़ा किया और उनके इस्तीफे और बर्खास्तगी की माग होने लगी।

    मानव संसाधन विकास मंत्री कपिल सिब्बल और राष्ट्रीय महिला आयोग तक भी यह मामाला पहुंच गया। लगभग मृतप्राय लेखक संगठनों में भी जान आ गई और उन्होंने भी विभूति नारायण राय के खिलाफ एक निंदा बयान जारी कर दिया। राय ने लेखिकाओं के खिलाफ बेहद अपमानजनक और अर्मायदित टिप्पणी की है। इस बात के लिए उन्हें लेखिकाओं से खेद प्रकट करना ही चाहिए। हालांकि अब उन्होंने अपने बयान पर बिना शर्त माफी मांग भी ली है।
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  2. #12
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    लेकिन इस इंटरव्यू और उसके बाद इस मामले को लेकर उठे विवाद ने एक बार फिर से हिंदी साहित्य में लेखिकाओं की आत्मकथाओं में अश्लील प्रसंगों की बहुतायत पर बहस का एक व्यापक आधार तैयार कर दिया है। पिछले दिनों कई लेखिकाओं की आत्मकथा प्रकाशित हुई जिसमें मैत्रेयी पुष्पा की 'गुड़िया भीतर गुड़िया', प्रभा खेतान की 'अन्या से अनन्या', मन्नु भंडारी की 'एक कहानी यह भी' के अलावा कृष्णा अग्निहोत्री की 'लगता नहीं है दिल मेरा' और 'और.. और.. औरत' प्रमुख हैं। मन्नु जी की आत्मकथा को छोड़कर इन आत्मकथाओं में सेक्स प्रसंगों का उल्लेख मिलता है।

    विभूति नारायण राय जैसे हिंदी के शुद्धतावादियों को इन सेक्स प्रसंगों पर ऐतराज है और उन्हें लगता है कि ये जबरदस्ती ठूंसे और गढ़े गए हैं ताकि किताबों को चर्चा और पाठक दोनों मिलें। ये लोग अपने तर्को के समर्थन में जॉर्ज बर्नाड शा के एक प्रसिद्ध लेख का सहारा लेते हैं, जिस लेख में उन्होंने आत्मकथाओं को झूठ का पुलिंदा बताया है।

    'आटोबायोग्राफिज आर लाइज' में बर्नाड शा ने कई तर्को और प्रस्थापनाओं से यह साबित करने की कोशिश की है कि आत्मकथा झूठ से भरी होती है। कुछ हद तक बर्नाड शा सही हो सकते हैं, लेकिन यह कहना कि आत्मकथा तो झूठ का ही पुलिंदा होती है, पूरी तरह गले नहीं उतरती। बर्नाड शा के अपने तर्क हो सकते हैं, लेकिन विश्व साहित्य में कई ऐसी आत्मकथा हैं, जिसमें कूट-कूट कर सच्चाई भरी होती है। हिंदी में भी कई ऐसी आत्मकथा हैं, जो सच्चाई के करीब हैं और झूठ का सिर्फ छौंक लगाया गया है। हो सकता है कि इन ऐतराज में सच्चाई हो, लेकिन लेखक क्या लिखेगा, यह तो वही तय करेगा। शुद्धतावादियों और आलोचक तो यह तय नहीं करेंगे। कुछ आलोचकों का तर्क है कि महिला लेखिकाओं की आत्मकथाएं भी दलित लेखकों की आत्मकथाओं की तरह टाइप्ड होती जा रही हैं, जहा समाज के दबंग लेखकों के परिवार की महिलाओं के साथ लगातार बदसलूकी करते हैं। इस तर्क में कुछ दम हो सकता है, लेकिन दलित और महिलाओं की जो स्थिति भारतीय समाज में है, उसमें यौन शोषण की स्थितिया भी तो सामान्य हैं। इन दोनों पक्षों के तर्को पर साहित्य में एक लंबे और गंभीर विमर्श की गुंजाइश है।

    दूसरा बड़ा सवाल जो यह इंटरव्यू खड़ा करता है, वह यह कि किसी भी पत्रिका के संपादक का क्या दायित्व होता है। अगर 'छिनाल' शब्द कहने पर विभूति नारायण राय की चौतरफा आलोचना हो रही है तो उतनी ही तीव्रता से नया ज्ञानोदय के संपादक रवींद्र कालिया का भी विरोध होना चाहिए। किसी भी पत्रिका में क्या छपे और क्या नहीं छपे, इसकी जिम्मेदारी तो पूरे तौर पर संपादक की होती है।

    विभूति नारायण ने लेखिकाओं के लिए जो आपत्तिजनक शब्द कहे, उसे रवींद्र कालिया को संपादित कर देना चाहिए था। अगर उन्होंने जानबूझकर ऐसा नहीं किया तो उनकी मंशा इस साक्षात्कार को विवादित करने और नया ज्ञानोदय के उक्त अंक को चर्चित करने की थी। अगर संपादक की यह मंशा नहीं थी और असावधानीवश वह शब्द छूट गया तो विभूति के साथ-साथ उन्हें भी खेद प्रकट करना चाहिए।

    अंत में विनम्रतापूर्वक इतना कहना चाहूंगा कि हिंदी साहित्य में विमर्श के स्तर को इतना नहीं गिराइए, जहा कोई लेखक अपनी साथी लेखिकाओं को छिनाल कहे और कोई लेखिका अपने साथ के लेखकों को लफंगा। गुस्से में या जानबूझकर दोनों ही स्थितियों में मर्यादा की लक्ष्मण रेखा को लाघना अनुचित है।

    -------------
    साभार : इंफॉर्मेशन टू मीडिया
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  3. #13
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    जैसा कि ऊपर लिखा है- 'छिनाल' का अर्थ अँग्रेज़ी में 'प्रॉस्टिट्यूट' नहीं होता, एकदम सत्य है क्योंकि 'प्रॉस्टिट्यूट' का हिन्दी अर्थ 'वेश्या' है और सभी जानते हैं कि 'छिनाल' किसी हालत में वेश्या नहीं होती। वस्तुतः 'छिनाल' का अँग्रेज़ी समकक्ष शब्द स्लट (Slut) है। हिन्दी के साहित्यकारों में 'छिनाल' की व्याख्या को लेकर बड़ी बहस ही छिड़ गई और एक जाल-स्थल ने 'छिनाल' शब्द के इतिहास पर विस्तृत प्रकाश डालते हुए एक लम्बा-चौड़ा लेख ही प्रकाशित कर दिया-

    छिनाल का जन्म

    ...छिन्न का आमतौर पर इस्तेमाल छिन्न-भिन्न के अर्थ में होता है। ...

    हिन्दी में कुलटा, दुश्चरित्रा, व्यभिचारिणी या वेश्या के लिए एक शब्द है छिनाल। आमतौर पर हिन्दी की सभी बोलियों में यह शब्द है और इसी अर्थ में इस्तेमाल होता है और इसे गाली समझा जाता है। अलबत्ता पूरबी की कुछ शैलियों में इसके लिए छिनार शब्द भी है। छिनाल शब्द बना है संस्कृत के छिन्न से जिसका मतलब विभक्त, कटा हुआ, फाड़ा हुआ, खंडित, टूटा हुआ, नष्ट किया हुआ आदि है। गौर करें चरित्र के संदर्भ में इस शब्द के अर्थ पर । जिसका चरित्र खंडित हो, नष्ट हो चुका हो अर्थात् चरित्रहीन हो तो उसे क्या कहेंगे? जाहिर है बात कुछ यूं पैदा हुई होगी- छिन्न + नार> छिन्नार> छिनार> छिनाल। जॉन प्लैट्स के हिन्दुस्तानी-इंग्लिश-उर्दू कोश में इसका विकासक्रम कुछ यूं बताया है- छिन्ना + नारी > छिन्नाली> छिनाल। इसी तरह हिन्दी शब्दसागर में- छिन्ना+नारी से उसकी व्युत्पत्ति बताते हुए इसके प्राकृत रूप छिणणालिआ> छिणणाली > छिनारि के क्रम में इसका विकासक्रम छिनाल बताया गया है। परस्त्रीगामी और लम्पट के लिए हिन्दी में छिनाल का पुरुषवाची शब्द भी पनपा है छिनरा।

    छिन्न शब्द ने गिरे हुए चरित्र के विपरीत पुराणों में वर्णित देवी-देवताओं के किन्ही रूपों के लिए भी कुछ खास शब्द गढ़े हैं जैसे छिन्नमस्ता या छिन्नमस्तक। इनका मतलब साफ है- खंडित सिर वाली (या वाला)। छिन्नमस्तक शब्द गणपति के उस रूप के लिए हैं जिसमें उनके मस्तक कटा हुआ दिखाया जाता है। पुराणों में वर्णित वह कथा सबने सुनी होगी कि एक बार स्नान करते वक्त पार्वती ने गणेशजी को पहरे पर बिठाया। इस बीच शिवजी आए और उन्होंने अंदर जाना चाहा। गणेशजी के रोकने पर क्रोधित होकर शिवजी ने उनका सिर काट दिया। बाद मे शिवजी ने गणेशजी के सिर पर हाथी का सिर लगा दिया इस तरह गणेश बने गजानन। इसी तरह छिन्नमस्ता देवी तांत्रिकों में पूजी जाती हैं और दस महाविद्याओं में उनका स्थान है। इनका रूप भयंकर है और ये अपना कटा सिर हाथ में लेकर रक्तपान करती चित्रित की जाती हैं। हिन्दी में सिर्फ छिन्न शब्द बहुत कम इस्तेमाल होता है। साहित्यिक भाषा में फाड़ा हुआ, विभक्त आदि के अर्थ में विच्छिन्न शब्द प्रयोग होता है जो इसी से जन्मा है। छिन्न का आमतौर पर इस्तेमाल छिन्न-भिन्न के अर्थ में होता है जिसमें किसी समूह को बांटने, विभक्त करने, खंडित करने या छितराने का भाव निहित है। छिन्न बना है छिद् धातु से जिसमें यही सारे अर्थ निहित है। इससे ही बना है छिद्र जिसका अर्थ दरार, सूराख़ होता है। छेदः भी इससे ही बना है जिससे बना छेद शब्द हिन्दी में प्रचलित है। संस्कृत में बढ़ई के लिए छेदिः शब्द है क्योंकि वह लकड़ी की काट-छांट करता है।सहज ही प्रश्न उठता है कि जिस समाज ने छिन्न शब्द से स्त्री के लिए छिनाल जैसा उपालम्भ-सम्बोधन बनाया वहीं छिनाल के लक्षणोंवाले पुरुष के लिए कौन सा शब्द है? हिन्दी की पूर्वी बोलियों में इसके लिए छिनरा, छिनारा है। हिन्दी के जानेमाने कवि बोधिसत्व ने छिनरा के बारे में जो लिखा है वह जस का तस यहां प्रस्तुत है-
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  4. #14
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    जिन संदर्भों में छिनाल की चर्चा होती है उन्हीं संदर्भों में छिनरा व्यक्ति की भी चर्चा होती है। छिनाल के साथ जो छिनरई करते धरा जाता है सहज ही वह छिनरा होता है। वहाँ दोनों का कद बराबर है- छिनरा छिनरी से मिले हँस-हँस होय निहाल। किसी भी समाज में अकेली स्त्री छिनाल नहीं हो सकती। उसे सती से छिनाल बनाने में पहले एक अधम पुरुष की उसके ठीक बाद एक अधम समाज की आवश्यकता होती है। छिनाल शब्द की उत्पत्ति पहले हुई या छिनरा की यह एक अलग विवाद का विषय हो सकता है । साथ ही समाज में पहले छिनरा पैदा हुआ या छिनाल। क्योंकि बिना छिनरा के छिनाल का जन्म हो ही नहीं सकता। एक पक्का छिनरा ही किसी को छिनार बना सकता है। तत्सम छिनाल का पुलिंग शब्द भले ही न मिले लेकिन तद्भव छिनरी का पुलिंग शब्द छिनरा जरूर मिलता है...। छिनरा का शाब्दिक अर्थ है लंपट, चरित्रहीन और परस्त्रीगामी। वहीं छिनाल या छिनार का अर्थ है व्यभिचारिणी, कुलटा,पर पुरुषगामी। रोचक बात यह है कि लोक ने उस स्त्री में छिपे छिनाल को खोज लिया जिसके गालों में हँसने पर गड्ढे पड़ते हों-

    'हँसत गाल गड़हा परै, कस न छिनरी होय।’

    ----------------
    साभार : शब्दों का सफ़र
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  5. #15
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    जैसा कि ऊपर लिखा गया है कि 'यह (छिनाल) शब्द बिल्कुल आपत्तिजनक है, लेकिन वेश्या जितना अपमानजनक नहीं है।' का अनुमोदन कुछेक पाठकों ने भी करते हुए यह टिप्पणी लिख दी कि 'लोक व्यवहार में छिनरा/छिनाल उतना हेय नहीं है जितनी कि वेश्या' तथा इसका ठीकरा फोड़ा गया अँग्रेज़ी अखबार के सिर पर जिसने गलत अनुवाद किया था। यह ठीक उसी प्रकार था जिस प्रकार हमने अपने एक हास्य-व्यंग्य लेख में 'उल्लू बड़ा या गधा' की व्यापक व्याख्या करते हुए अन्त में गधे को बड़ा बताया था। तर्क-वितर्क के द्वारा यह साबित किया जा रहा था कि अँग्रेज़ी अख़बार ने अपने गलत अनुवाद द्वारा लेखिकाओं का और अधिक अपमान किया है। वस्तुतः यह लोगों का अल्पज्ञान था जो गणिका अर्थात् वेश्या को अपमानजनक समझा जा रहा था, क्योंकि 'शकुन शास्त्र के अनुसार किसी कार्य पर जाते समय यदि रास्ते में गणिका दिख जाए तो यह शुभ शकुन माना जाता है' और इसका प्रमाण यह है कि 'समर्थ दीपिका' नामक ग्रन्थ में वेश्याओं को शुभ शकुन के रूप में स्वीकार किया गया है। शकुन शास्त्र के अनुसार-

    'सामने से शव (लाश), मुर्दा का दिखाई देना बहुत शुभ माना गया है। हाथी का दर्शन दिखाई देना भी शुभ सूचक है। सामने जल से भरा पात्र (बर्तन) या कूड़े से भरी टोकरी भी अच्छे शकुन में आती है। मंगलामुखी (वेश्या) का दर्शन भी बहुत अच्छा माना गया है।

    आपकाे यह जानकर आश्चर्य होगा कि चाणक्यकाल से ही गणिका मंगलामुखी थी और प्रातःकाल उसका मुख देखना शुभ शकुन माना जाता था। चाणक्यकाल के बाद के काल में भी राजा, महाराजा, नवाब तथा उच्चवर्ग के लोग अपने बच्चों को तहजीब, संस्कार तथा दुनियादारी सिखाने के लिए वेश्याओं के पास भेजते थे। अच्छी गणिकाएँ इन बच्चों को अपने पुत्रों की तरह शिक्षा-दीक्षा देती थीं और समाज में बराबरी का सम्मान पाती थीं।

    वात्स्यायन ने अपनी पुस्तक 'कामसूत्र' में भी गणिकाओं पर विस्तार से प्रकाश डालते हुए कहा है कि 'स्त्रियों को बिस्तर पर गणिका की तरह व्यवहार करना चाहिए। इससे दाम्पत्य जीवन में स्थिरता बनी रहती है। पति अन्य स्त्रियों की ओर आकर्षित नहीं हो पाता और पत्नी के साथ उसके मधुर सम्बन्ध बने रहते हैं। इसलिए स्त्रियों को यौन क्रिया का ज्ञान होना आवश्यक है ताकि वह कामकला में निपुण हो सके और पति को अपने प्रेमपाश में बाँध कर रख सके।'

    अतः निर्विवाद रूप से यह बात सिद्ध हुई कि प्रातःकाल जिसका मुख देखना शुभ शकुन माना जाता हो, उसे अपमानजनक समझा जाना अल्पज्ञता का ही जीवन्त प्रमाण है।
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  6. #16
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    गणिकाओं को हेय कब से समझा जाने लगा- यह जानने के लिए हिन्दी के सुप्रसिद्ध साहित्यकार अमृतलाल नागर का लेख 'सुआ पढ़ावत गणिका तरि गई' पढ़ना आवश्यक है। इस लेख में गणिकाओं पर विस्तार से प्रकाश डाला गया है-

    सुआ पढ़ावत गणिका तरि गई

    वेश्या या गणिका का अर्थ स्पष्ट है। जन और गण की पत्नी केवल इस देश के प्राचीन इतिहास से ही नहीं वरन सारी दुनिया में मानव-सभ्यता के पितृसत्तात्मक युग में एक आवश्यक और महत्वपूर्ण संस्था बन गई। बाइबिल में केडेशोथ (Kede shoth) वेश्याओं का वर्णन आता है। ये लोग (Canaanite) मंदिरों से संबद्ध थीं; मोआबाइट और असीरियन मंदिरों में भी इनका बड़ा आदर होता था। अर्मीनिया देश में पुराने समय में यह आम प्रथा थी कि लोग अपनी बेटियों को देवदासी बना देते थे। प्राचीन बेबिलोनिया में इन देवदासियों का बड़ा रुतबा था। प्राचीन एथेंस और रोम में भी वेश्याओं को सम्मान की दृष्टि से देखा जाता था। ये सूचनाएँ जॉर्ज रैले स्कॉट की प्रसिद्ध पुस्तक 'वेश्या जीवन का इतिहास' से प्राप्त हैं।

    हमारे देश में सालवती, मथुरा की बसंत-सेना तथा वैशाली की नगरवधू अंबपाली के वृत्तांत अब तक भारतीय साहित्य में अनेक काव्य, नाटक और कहानी-उपन्यासों की विषय-वस्तु बनकर लोक प्रसिद्धि प्राप्त कर चुके हैं।

    पितृसत्तात्मक सभ्यता के विकास के साथ-साथ पुरुष समाज ने स्त्री-समाज को खाने और दिखाने के दाँतों की तरह दो वर्गों में बाँट लिया था। पितृसत्तात्मक सभ्यता के विकास में पुरुष के उत्तराधिकार की समस्या ही प्रमुखतम थी। अपने उत्तराधिकारी को पाने के लिए वह अपने अधीन स्त्रियों को अन्य पुरुषों का संग करने से रोकने लगा। पतिव्रत धर्म की महिमा हुई। इससे एक नई समस्या सामने आई, क्योंकि तब तक स्त्रियों और पुरुषों को परस्पर इच्छामत मिलने में किसी प्रकार की सामाजिक बाधा नहीं थी। स्त्रियों पर व्यक्ति का पूरा अधिकार हो जाने से व्यक्ति-व्यक्ति में फूट पड़ जाना स्*वाभाविक ही था। मान लीजिए एक बड़ी सुंदर स्त्री है, उसे सब चाहते हैं, परंतु उस पर अधिकार केवल एक ही व्यक्ति का है, तो स्वाभाविक रूप से सिर-कुटव्वल हो जाएगी। इस तरह जातीय संगठनों के बंधन शिथिल पड़ जाने की संभावना होती थी। आत्म-रक्षा के लिए कोई भी जाति अपने हेतु यह स्थिति पसंद नहीं कर सकती थी। समझौते के लिए एक ही मार्ग था। जाति की सर्वश्रेष्ठ सुंदरियाँ जाति के सभी पुरुषों की वधुएँ मान ली गईं।
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  7. #17
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    'सालवती' प्रसंग पर प्रसादजी एक बड़ी अनूठी कहानी हमें दे गए हैं! एक राष्ट्रीयता के नागरिक दूसरी राष्ट्रीयता के एक बड़े नगर में जाते हैं। वहाँ उन्हें कला-निपुण, सुंदर, वाक् चतुर नगर-वधुओं के दर्शन होते हैं। उन्होंने वहाँ यह भी देखा कि नगर-वधुएँ बनाने के लिए वहाँ सौंदर्य-प्रतियोगिता भी होती है। उन नागरिकों ने अपने यहाँ आकर उसी प्रकार का सामाजिक नियम बनाने और सौंदर्य-प्रतियोगिता आरंभ करने की माँग अपनी राष्ट्रीय संसद से की। नगर-वधुओं की निर्धारित फीस देकर कोई भी उन्हें पा सके अर्थात वे पण्यविलासिनी, पण्य-वधू, पण्यांगना हों। अनेक असफल और ईर्ष्यालु प्रेमियों की लारें चू पड़ीं। इस प्रस्ताव का जवानों में इतना समर्थन हुआ कि पुरानों को अपनी-अपनी पगड़ियों की लाज सम्हालते ही बनी। राष्ट्र में फूट पड़ने के भय से उस राष्ट्र की देखा-देखी इस राष्ट्र में भी सौंदर्य प्रतियोगिता हुई। व्यक्ति की प्रेमिका जीती और बरबस सार्वजनिक पण्य-प्रेमिका बना दी गई। यों समाज में वेश्या का उदय हुआ।

    मोहनजोदड़ो से एक नर्तकी की नग्न मूर्ति भी प्राप्त हुई है। रामायण-महाभारत के युग में भी नाचने गाने वालियों के प्रमाण मिलते हैं। कौटिल्य के अर्थशास्त्र द्वारा मौर्यकाल और उसके आस-पास युग में राजदरबार एवं संपन्न प्रजाजनों के लिए गणिका की अनिवार्यता का पता भी चल जाता है। आज से लगभग दो हजार दो सौ बयासी वर्ष पहले का वह जमाना और था। जहाँ तक मानव की वेश्या संबंधी मान्यताओं की बात है, आज की दृष्टि से ठीक उलटी राह पर चल रहा था। आज वेश्या संस्था को समाप्त किया जा रहा है और उस काल में सरकार द्वारा ही वेश्याओं की प्रतिष्ठापना होती थी; उनके लिए एक अलग सरकारी विभाग खुला था। कौटिल्य के अर्थशास्त्र में सरकारी गणिकाध्यक्ष के लिए यह आदेश है कि वह सुंदर, जवान और कला-निपुण युवतियों को एक हजार 'पणम' (तत्कालीन सिक्कों) के वार्षिक वेतन पर गणिका की हैसियत से नियुक्त करें। यही नहीं, बल्कि गणिकाओं में प्रतिस्पर्धा जगाने के लिए कौटिल्य महाराज यह आदेश भी देते हैं कि रूप गुण-कला में उसकी प्रतिद्वंद्विनी गणिका को उससे आधे वेतन अर्थात पाँच सौ पणम वार्षिक आय पर नियुक्त किया जाय। वेश्या यदि कभी बीमार पड़े, विदेश में हो अथवा मर जाए तो उसकी बहन या पुत्री को उसका वेतन और जायदाद मिले। सुंदर नर्तकियों की भरती भी की जाती थी राज्य-चिह्न, चैबर, छत्र आदि की सेवा का उत्तरदायित्व नर्तकियों को ही दिया जाता था। गणिका मंगलामुखी थी। प्रातःकाल उसका मुख देखना शुभ शकुन माना जाता था।
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    जब एक माल की इतनी आवश्यकता हो तो उसके सौदागर भी बाजार में अपने-आप ही आ जाते हैं। आज जो बुर्दाफरोश और उनके गुंडों, कुटनियों तथा दलालों को अपना काम करते हुए पग-पग पर कानून का भय और बाधा सताती है वह उस काल में कदापि नहीं थी। ऐसे पेशेवर 'स्त्री-व्यवहारिण्यः' कहलाते थे।

    कौटिल्य के अर्थशास्त्र में देवदासियों का जिक्र तो अवश्य आता है, परंतु नर्तकियों, गणिकाओं के रूप में नहीं, इसलिए यह अनुमान होता है कि तब तक देवदासियों की मर्यादा इस हद तक नीचे नहीं उतरी थी। मेरा अनुमान है कि मंदिरों में मूर्तियों के रूप में प्रतिष्ठित भगवान् को जब से राजसी ठाट-बाट दिया जाने लगा तब से ही देवदासियों में गणिकाओं, नर्तकियों की भरती भी की जाने लगी। पद्यपुराण एवं भविष्यपुराण में मंदिरों में पुण्यार्थ समर्पित करने के लिए देवदासियाँ खरीदने की बात के प्रमाण मिलते भी हैं।
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    कौटिल्य के अर्थशास्त्र में देवदासियों का जिक्र तो अवश्य आता है, परंतु नर्तकियों, गणिकाओं के रूप में नहीं, इसलिए यह अनुमान होता है कि तब तक देवदासियों की मर्यादा इस हद तक नीचे नहीं उतरी थी। मेरा अनुमान है कि मंदिरों में मूर्तियों के रूप में प्रतिष्ठित भगवान् को जब से राजसी ठाट-बाट दिया जाने लगा तब से ही देवदासियों में गणिकाओं, नर्तकियों की भरती भी की जाने लगी। पद्यपुराण एवं भविष्यपुराण में मंदिरों में पुण्यार्थ समर्पित करने के लिए देवदासियाँ खरीदने की बात के प्रमाण मिलते भी हैं।

    ई. थस्टर्न-लिखित 'कास्ट्स एंड ट्राइब्ज ऑफ सदर्न इंडिया' पुस्तक के दूसरे भाग में देवदासियों का विशद वर्णन है। उक्त पुस्तक के अनुसार दक्षिण के प्राचीन ग्रंथों में सात प्रकार की देवदासियों का उल्लेख मिलता है -

    1. दत्ता वह स्त्री कहलाती जो अपने-आपको मंदिर की सेवा के लिए किसी प्रकार के मूल्य की चाहना के बिना अर्पित करती थीं;

    2. विक्रीता अपने-आपको इसी काम के लिए बेचती;

    3. भृत्या, वह स्त्री कहलाती जो अपने पारिवारिक मंगल हेतु मंदिर की सेविका बनती;

    4. भक्त देवदासी अपनी भक्ति-भावना के कारण मंदिरों में भरती होती थीं;

    5. हृता उन देवदासियों को कहते थे जिन्हें कहीं से भगा लाकर मंदिरों में अर्पित किया जाता था;

    6. अलंकार वर्ग की देवदासियाँ वे कहलाती थीं जो नृत्य-संगीत आदि ललित-कलाओं में दक्ष होकर किसी राजा या रईस द्वारा मंदिरों की भेंट चढ़ाई जाती थीं; और

    7. रुद्र गणिका या गोपिका वर्ग की देवदासियों को अपने नृत्य-संगीत की सेवा के लिए मंदिरों से वेतन दिया जाता था।
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  10. #20
    कांस्य सदस्य Rajat Vynar's Avatar
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    सन 1901 ई. की मद्रास सेन्सस रिपोर्ट में देवदासियों के संबंध में यथेष्ट सूचनाएँ दी गई हैं। उक्त रिपोर्ट के लेखक ने इस पेशे का भविष्य दो जातियों के अवैध नाते से माना है। ऐसे नातों की अवैध संतानें सभ्यता के आदिम विकास में ललित-कलाओं से संबद्ध होकर इस पेशे में आईं! उक्त सेन्सस रिपोर्ट में लिखा है, हिंदू धर्म की अनेक असंगत बातों में एक यह भी है कि यद्यपि इनका (देवदासियों का) पेशा उनके शास्त्रों द्वारा बार-बार हीन दृष्टि से देखा और धिक्कारा जाता रहा है, तथापि दूसरी ओर उनके देव-मंदिरों ने सदा इसे प्रोत्साहन दिया है। इस जाति का संगठन उक्त लेखक के अनुसार ईसा की नवीं-दसवीं शताब्दियों में हुआ था। वेश्याओं को मंगल-भाषी नाम 'देवदासी' भी संभवत: इसी काल में दिया गया। उन दिनों दक्षिण भारत में अनेक भव्य मंदिरों का निर्माण हुआ था।

    उक्त लेखक की बात में कुछ भ्रम अवश्*य दिखलाई देता है, क्योंकि तंजावूर के वृहदीश्वर मंदिर के एक शिला लेखानुसार सन 1004 ई. में चीन महाराज राजराज द्वारा उक्त मंदिर की सेवा के लिए चार सौ देवदासियाँ अर्पित की गई थीं। उन्हें मंदिर की चारदीवारी के अंदर ही रहने को स्थान भी दिया गया था। इससे अनुमान होता है कि देवदासियों का संगठन ईसवी शताब्दियों के पूर्व ही हो चुका था। ईसा की तीसरी शताब्दी में उज्जयिनी के महाकालेश्वर के मंदिर में देवदासियाँ प्रतिष्ठित थीं। सत्रहवीं-अठारहवीं शताब्दी तक दक्षिण भारत में हिंदू राजाओं, सामंतों और धनिकों की कृपा से यह संगठन अधिकाधिक फलता-फूलता रहा। पंद्रहवीं शताब्दी में दक्षिण के विजयनगर दरबार में तुर्किस्तान का अब्दुर्रज़्जाक नामक राजदूत आया था। उसके अनुसार वेश्यावृत्ति राजकीय नियंत्रण में होती थी तथा उसकी आय से पुलिस को वेतन मिलता था। इस प्रकार अपने सदियों के अस्तित्व को लेकर देवदासियों की एक जाति ही अलग बन गई। जाति के चौधरी-चौधराइन नियुक्त हुए, लड़के-लड़कियों द्वारा उत्तराधिकार प्राप्त करने के लिए सामाजिक नियम भी बने। वेश्याओं की यह पंचायत व्यवस्था विश्व में अपने ढंग की एक ही है। देवदासियों की लड़कियाँ पेशा करती थीं और उनके लड़कों की पत्नियाँ कुलवधुओं के समान ही गृहस्थी की मर्यादा में रहती थीं। जो लड़कियाँ सुंदर और गुणवती होती थीं उन्हें देवदासी बनने की शिक्षा दी जाती थी और जो कुरूप या बुद्धू होती थीं उन्हें अपनी ही बिरादरी के युवकों से ब्याह दिया जाता था। इनके लड़कों में से कुछ तो इनके साजिंदे बन जाते थे और कुछ संगीत-नृत्य के शिक्षक हो जाते थे। इन्हें नट्टुवन कहा जाता था। देवदासियों के कुछ लड़के अपना विवाह कर दूसरे रोजगार-धंधों में भी निकल जाते थे। वे अपने को 'पिल्ले' अथवा 'मुदलि' कहकर प्रतिष्ठित करते थे। ये पदवियाँ वेल्लाज और कैकोल जातियों की होती थीं और आम तौर पर इन्हीं दो जातियों से देवदासियों की भरती भी होती थीं।
    Last edited by Rajat Vynar; 22-12-2016 at 03:24 PM.
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