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Thread: छिनाल पर बवाल

  1. #21
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    देवदासी बनाने के लिए लड़की को धूमधाम से मंदिर में ले जाया जाता था, तलवार अथवा देवमूर्ति के साथ उसका विवाह संपन्न होता था और इस विवाह के प्रमाणस्वरूप देवदासी की स्वजाति का कोई पुरुष देवपति की ओर से उसके गले में 'ताली'* बाँधता था। इनकी जो लड़कियाँ देव-मंदिरों में भरती नहीं होती थीं वे इस धंधे के सब गुण सीखकर साधारण गणिका अथवा तमिल भाषानुसार 'मेलक्कारन' बन जाती थीं। इन स्त्रियों को साहित्य, संगीत, नृत्यकला, व्यवहार-वाक् चातुरी, पाँसे आदि के खेल और काम-कला की उत्तम शिक्षा दी जाती थी। भारतीय गृहिणियों के तीरथ-बरत, नोन-तेल, लकड़ी और नाते-गोते की चर्चाभरे व्यवहार के विपरीत वह अलबेली गणिका पुरुषों पर जादू-बान चलाकर, उसके दिन-भर के काम-काज, गृह-काज अर्थात जीवन के गंभीर पक्ष की थकन से उबारकर एक ललित लोक में ले जाती थी। यही वेश्या का महत्व था और किसी हद तक अब भी है। हमारे पुरखे बड़े नंबरी रसिया थे, पहाड़ों तक को रूहे-आफ्ज़ा शरबत बनाकर खुद भी पी गए और आने वाली सदियों को भी पिला गए। साहित्य, संगीत, नृत्य, सभी दिशाओं में उन्होंने अभूतपूर्व मार्मिक गति पाई थी, फिर काम-कला को ही क्यों न ब्रह्मानंद सहोदर बना जाते! मानव-सभ्यता के इतिहास में वात्स्यायन का 'कामसूत्र' अपने रचे जाने के बाद सदियों तक इस विषय का विश्व-साहित्य में एकमात्र शास्त्र-ग्रंथ रहा है; आज तो सारा विश्व उस ग्रंथ की प्रामाणिकता का आदर करता है।

    एक बात कई बरस से मेरे मन में अटकती है, आज प्रसंगवश उसे कह ही डालूँ। भारतीय शिल्प में खजुराहो, जगन्नाथ आदि कौलतंत्रमार्गी मंदिरों के चौरासी काम-आसनों वाली मूर्तियों की बात तनिक देर को भूल भी जाइए तो भी यह ध्यान में अटकता है कि भारतीय शिल्पकारों ने, या उन्हें प्रेरणा और पैसा देने वालों ने कुछ पूजनीय पात्रों को छोड़कर नारी-मूर्तियाँ प्रायः सर्वांग नग्न ही बनाईं। मोहनजोदड़ों की नग्न नर्तकी मूर्ति से लेकर मौर्य गुप्तकाल के वैभव तक यह परंपरा बड़े ठाठ से चलती चली आई है। अगर आज के मानस में रहूँ तो समझ में नहीं आता कि किस प्रकार माता-पिता, बेटी-बेटे, नाती-पोते, सब मिलकर उन मंदिरों में जाते होंगे या उन महल-हवेलियों में रहते होंगे, जिनकी चारदीवारियों में तथा जगह-जगह सजावट में औरतों की नंगी और मादक आकृतियाँ अंकित होती थीं। शायद उस समय सेक्स के मामले में हमारी दृष्टि यह न रही हो। वाल्मीकि जिस ठाठ से भगवती सीता का शारीरिक सौंदर्य बखान गए वह तुलसीदास की सांस्कृतिक चेतना के लिए घृणापूर्ण अकल्पनीय था। जिन खुले शब्दों में वाल्मीकि के राम अपने छोटे भाई लक्ष्मण के सामने सीता के विरह में विलाप कर सकते थे वे तुलसी के राम की मर्यादा से बाहर के हैं।

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    *मंगलसूत्र का तमिल शब्द (यह जानकारी सूत्र-लेखक द्वारा दी गई है।)
    Last edited by Rajat Vynar; 22-12-2016 at 11:07 PM.
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  2. #22
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    खैर यह तो चलते की बात हो गई, मगर भारतीय गणिकाओं की अन्य कलाओं के अतिरिक्त काम-कला प्रवीणता पर एक सर्टीफिकेट चौदहवीं शताब्दी में यहाँ आने वाला अरब यात्री इब्नेबत्तूता भी दे गया है। डॉक्टर अतहर अब्बास रिजवी द्वारा अनुवादित 'तुगलककालीन भारत' में इब्नेबत्तूता का कलाम है, 'दौलताबाद के निवासी मरहठे हैं। ईश्वर ने उनकी स्त्रियों को विशेष रूप से सुंदरता प्रदान की है। उनकी नाकें तथा भृकुटियाँ बड़ी ही सुंदर होती हैं। उनसे संभोग में विशेष आनंद प्राप्त होता है। उन्हें अन्य स्त्रियों की अपेक्षा प्रेम संबंधी बातों का अधिक ज्ञान होता है। ...दौलताबाद में गायकों तथा गायिकाओं का अत्यंत सुंदर तथा बड़ा बाजार है जो तरबाबाद कहलाता है। इसमें बहुत सी दुकानें हैं। प्रत्येक का एक द्वार दुकान के स्वामी के घर में खुलता है। प्रत्येक घर में एक अन्य द्वार भी होता है। दुकानें कालीनों से सजी रहती हैं। इसके मध्य में एक बड़ा-सा झूला होता है जिसमें कोई गायिका बैठी अथवा लेटी रहती है। वह नाना प्रकार के आभूषणों से श्रृंगार किए रहती है। उसकी दासियाँ झूला झुलाया करती हैं। बाजार के मध्य में कालीनों तथा फर्शों से सुसज्जित एक बहुत बड़ा गुंबद है। इसमें वृहस्पतिवार को (अमीरूल मुतरिबीन) गायकों का सरदार अस्त्र की नमाज के पश्चात् बैठता है। उसके सेवक तथा दास भी उसके साथ रहते हैं। गायिकाएँ बारी-बारी से आकर उसके समक्ष सायंकाल की नमाज के समय तक गायन तथा नृत्य करती हैं। तत्पश्चात् वे चली जाती हैं। उसी बाजार में नमाज के लिए मस्जिदें हैं। उनमें रमजान के महीनों में इमाम 'तरावीह' पढ़ाता है। हिंदुस्तान के कुछ हिंदू राजा जब इस बाजार में से गुजरते तो वह गुंबद में रुककर गायिकाओं का गायन सुना करते थे। कुछ मुसलमान बादशाह भी ऐसा ही करते हैं।

    हुमायूँ बादशाह के साथी बैरमखाँ फरमाया करते थे कि अमीर के लिए चार बीवियाँ चाहिएँ, मुसीबत और बातचीत के लिए ईरानी, खाना पकाने के लिए खुरासानी; सेज के लिए हिंदुस्तानी और चौथी तुरकानी हो जिसे हर वक्त मारते-डाँटते रहें कि और बीबियाँ डरती रहें।
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  3. #23
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    ये सर्वकला-निपुण सुंदर गणिकाएँ और नर्तकियाँ तथा उनके धंधे की सहगामिनी देवदासी पुत्री 'मेलक्कारन' - मद्रास सेन्सस रिपोर्ट (सन १९०१) के लेखक के शब्दों में- उस भारतीय संगीत-पद्धति की आज प्रायः एकमात्र कोषाधिकारिणी हैं, जो विश्व की प्राचीनतम पद्धतियों में से एक है। इनके और ब्राह्मणों के सिवा अन्य लोग इस विद्या का विधिवत् अध्ययन प्रायः कम ही करते हैं। उक्त सेन्सस रिपोर्ट के अनुसार ही इन देवदासियों के दो वर्ग होते हैं - उक वलंगापि (दक्षिण पथ) और इलंगापि (वाम पक्ष)। इन दोनों पक्षों में खास अंतर यह है कि जो दासियाँ शिल्पकार या साधारण कर्मकारों, तमिल भाषानुसार 'कम्मालनों' के यहाँ नाचने-गाने जाती थीं वे इलंगापि कहलाती थीं। इन्हें कम्माल दासी भी कहा जाता था।
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  4. #24
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    ई.थर्स्टन महोदय ने अपनी 'दक्षिण भारतीय जातियों और कबीलों के इतिहास' नामक पुस्तक में एबेडुबॉय नामक एक पादरी का यह मंतव्य नोट किया है कि 'भारतीय नारियों में गणिकाएँ ही श्रेष्ठ रूप से सुसज्जित होती हैं।' घरेलू औरतों को पुरुष साल की दो धोतियों पर रखता और अनुभव ने वेश्याओं को सजावट का यह गुर सिखलाया कि अपनी सारी सुंदरता को उघाड़कर रख देने से सौंदर्य-बोध की काम-सुगंध फीकी पड़ जाती है। पुरुष की उत्तेजना नारी के अधझलके सौंदर्य के रहस्य में होती है। भारतीय गणिकाएँ ऐसा साज सँवारना जानती थीं जो पुरुष की नजरों को भी बाँधे और कल्पना को भी। उपर्युक्त पुस्तक में एक अंग्रेज की डायरी का हवाला देते हुए लिखा है कि यहाँ की नर्तकियाँ ऐसा कमाल दिखलाती हैं कि उनके नृत्य की तीव्रता, चंचलता और मादकता से पुरुष का पौरुष रंगीन हो उठता है। मैं भी इस बात की दाद दे सकता हूँ। नर्तकी जब महफिल को बाँधने वाला नाच नाचती है तो हर एक को ऐसा लगता है कि वह उसे ही रिझा रही है, उसके पास अब आई, यो दुपट्टे के पल्लू से छू गई या कि आई और अब गोद में गिरी। इस तरह वह अपने जादू से बाँध लेती है। अंग्रेजों ने भारतीय 'नाच-गर्ल' की बड़ी चर्चा की है, कहीं रंगीन, कहीं पुरमजाक। लखनऊ की नवाबी में भी अधिकतर या तो बटेरों की हुकूमत रही या फिर तवायफों की, अम्मन और अमामन-जैसी कुटनियों-दल्लालाओं की, उनके भाँड़-भगतुओं की। वाजिद अली शाह के काल में अवध के अंग्रेज रेजिडेंट मेजर जनरल सर डब्लयू.एच. स्लीमैन ने अपनी प्रसिद्ध डायरी 'ए जर्नी थ्रू द किंगडम ऑफ अवध' में दरबारी वेश्या-विलासिता का राजनीतिक रूप वर्णन किया है।
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  5. #25
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    जे. टालबॉय ह्वीलर की 'हिस्ट्री ऑफ इंडिया' में एक शाहंशाह की वेश्या प्रेमिका और उसकी सखी के साथ दिल्ली के अमीर सरदारों की नोक झोंक का रोचक वर्णन है। मुगल शासन के पराभव काल में जहाँदारशाह दिल्ली के सिंहासन पर बैठा था। वह लाल कुँवर नामक एक तवायफ के बस में था। लाल कुँवर ने अपना अच्छा समय देखकर बड़े अच्छे-अच्छों को उँगलियों पर नचा दिया, उसके जितने भाई भतीजे, भाँड़ भगतुए थे, सब नवाब हो गए; सब बड़े-बड़े सरकारी ओहदों पर बैठा दिए गए। वंश परंपरागत दरबारियों, मनसबदारों को इससे बड़े अपमान का बोध होता था, पर कर कुछ भी न पाते थे। किसी लुगाई के सैया कोतवाल हो गए तो उसकी हेकड़ी पर कहावत बन गई, और यहाँ तो मुसम्मात लाल कुँवर ने शाहंशाहए हिंदोस्तान को अपने तलवे सहलाने वाला बना रखा था। शाहंशाह जहाँदारशाह दिल्ली के तख्त पर गो नवाब जुल्फिकार खाँ वजीर ए हिंद के द्वारा मिट्टी के माधो-से ही बिठाए गए थे, फिर भी तफ्त पर तो बैठे ही थे। वजीर और दरबारियों को लाख बुरा लगे, मगर तख्तोताज के आगे उन्हें सिर तो झुकाना ही पड़ता था। लाल कुँवर बँदरिया के हाथ में सामंतों रूपों शानदार मणिधर नागों के फन पड़ गए थे। उनकी मणिसी जगमगाती आबरू को छीनकर, उसे ओछे और कमीने समझे जाने वाले आदमियों को सौंपकर, नागों का फन अपने हठ के पत्थर पर रगड़-रगड़कर वह उन्हें मार डालती थी। जैसे अंदर बार-बार सूँघकर देखता है कि साँप मरा या नहीं, उसी तरह अपनी एक एक फरमायश आगे रखकर लाल कुँवर भी आजमाती जाती थी। एक बार उससे बड़ी बात उठाई, यानी कि अपने भाई को आगरे का सूबेदार बनाना चाहा। जहाँदारशाह राजी हो गया। लेकिन एक मजबूरी थी, शाही मुहूर वजीर जुल्फिकार खाँ के पास रहती थी। वजीर अड़ गया। लाल कुँवर तड़पने लगी। जहाँदारशाह दो चक्की के पाटों में पिसने लगे। आखिरकार लाल कुँवर के मारे-फटकारी बेचारे बादशाह ने वजीर को बुलवाकर अपना तेहा दिखलाया। लाल कुँवर पास ही बैठी थी। वजीर के लिए कठिन अवसर था, लेकिन वह भी मौका न चुका, बोला कि जहाँपनाह के हुक्म को टाल सकूँ इतनी मेरी मजाल कहाँ, मगर हक नजराना तो मुझे मिलना ही चाहिए। नजराने की फीस के तौर पर वजीर ने बादशाह से एक हजार तानपूरे माँगे। उसने कहा कि जब से जिन सरदारों को अपनी पदोन्नति की चाह होगी उन्हें तानपूरा बजाने की प्रैक्टिस भी लाजिमी तौर पर करनी ही पड़ेगी। सुनार की सौ ठक ठक पर लुहार के एक घन हथौड़े चढ़ बैठी। लाल कुँवर बड़ी लाल पीली हुई, क्योंकि उसका भाई पहले महफिलों में तानपूरे की संगत ही किया करता था। मगर इसके बाद जहाँदारशाह फिर अपनी माशूका के भाई को आगरे का सूबेदार न बना सके।
    Last edited by Rajat Vynar; 23-12-2016 at 08:06 AM.
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  6. #26
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    आखिरकार लाल कुँवर के मारे-फटकारी बेचारे बादशाह ने वजीर को बुलवाकर अपना तेहा दिखलाया। लाल कुँवर पास ही बैठी थी। वजीर के लिए कठिन अवसर था, लेकिन वह भी मौका न चुका, बोला कि जहाँपनाह के हुक्म को टाल सकूँ इतनी मेरी मजाल कहाँ, मगर हक नजराना तो मुझे मिलना ही चाहिए। नजराने की फीस के तौर पर वजीर ने बादशाह से एक हजार तानपूरे माँगे। उसने कहा कि जब से जिन सरदारों को अपनी पदोन्नति की चाह होगी उन्हें तानपूरा बजाने की प्रैक्टिस भी लाजिमी तौर पर करनी ही पड़ेगी। सुनार की सौ ठक ठक पर लुहार के एक घन हथौड़े चढ़ बैठी। लाल कुँवर बड़ी लाल पीली हुई, क्योंकि उसका भाई पहले महफिलों में तानपूरे की संगत ही किया करता था। मगर इसके बाद जहाँदारशाह फिर अपनी माशूका के भाई को आगरे का सूबेदार न बना सके।

    लाल कुँवर का प्रताप यहीं अंत न हो गया, बल्कि उसने आगे भी सामंतों से करारी मात खाई। लाल कुँवर की एक सहेली थी, उसका नाम जोहरा था। जोहरा कुँजड़िन थी; दिल्ली के किसी बाजार में उसकी तरकारियों की दुकान थी। जब लाल कुँवर लाल किले की मालकिन बनी तो उसकी बचपन की सहेली जोहरा कुँजड़िन का सितारा भी बुलंद हो गया। बड़े-बड़े और नवाब, जो बादशाह से अपना काम करवाना चाहते थे, जोहरा को और उसकी मारफत लाल कुँवर को भी लाखों की रिश्वतें चटाया करते थे। शाही महलों में जोहरा कुँजड़िन शाहजादियों की सी शान शौकत से जाया आता करती थी। बादशाह लाल कुँवर और जोहरा के साथ नशे में धुत्त होकर भद्रता की सारी सीमाएँ तोड़ा करता था। जोहरा और लाल कुँवर के हाली-मवाली स्वभावतया सब लोगों से बड़ी बदतमीजी से पेश आया करते थे।
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  7. #27
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    एक दिन निजाम उल मुल्क की सवारी बाजार से गुजर रही थी। निजाम औरंगजेब के जमाने के ओहदेदार थे और उनकी बहुत बड़ी प्रतिष्ठा थी। आगे चलकर उन्होंने ही हैदराबाद दक्षिण का निजाम राज्य स्थापित किया। ऐसे बड़े पदाधिकारी से जोहरा की सरे बाजार मुठभेड़ हो गई। एक तरफ से निजाम की सवारी आ रही थी और दूसरी तरफ से जोहरा कुँजड़िन की सवारी आ रही थी। मार्ग सँकरा था, जब तक एक की सवारी रुककर और सड़क किनारे हटकर दूसरी को आगे जाने की सुविधा न दे तब तक दोनों का निकलना असंभव था। पुराने समय में इन छोटी-छोटी बातों के लिए रईसों का आपसी मन मुटाव और युद्ध तक हो जाता था, फिर यहाँ तो निजाम और कुँजड़िन के बीच की बात थी। कुँजड़िन बादशाह की मुँहलगी होने के कारण अपने आपको बहुत बड़ा मानती थी, इसलिए उसके आदमियों ने निजाम के आदमियों को रास्ता देने के लिए कड़ककर हुक्म दिया। अपने स्वामी का संकेत पाकर निजाम के आदमियों ने कह दिया कि कुँजड़िनों-खवासिनों के लिए अमीरों की सवारियाँ नहीं रुका करतीं। जोहरा उस समय हाथी के हौदे पर सवार थी, परदे में थी, परंतु यह सुनते ही अपनी-सी पर आ गई। परदा हटा और हाथ बढ़ा बढ़ाकर उसने निजाम की शान में मल्लाही गालियाँ बकनी आरंभ कर दीं। निजाम यह सहन न कर सके। उन्होंने अपने आदमियों को संकेत दिया, जिसके परिणामस्वरूप जोहरा हाथी के हौदे से घसीटकर उतारी गई और उसे जूतियों पीटा गया।
    Last edited by Rajat Vynar; 23-12-2016 at 09:17 AM.
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  8. #28
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    इसके बाद निजाम को चिंता भी पड़ी। जोहरा यों कोई भी हो, पर उस समय तो लाल कुँवर, बादशाह की चहेती थी और बादशाह यों चाहे कुछ भी हो परंतु अपने दरबार के किसी भी रईस का मान मर्दन तो कर ही सकता था। यों तो निजाम उल मुल्क तथा वजीर उल मुल्क में आपसी मनमुटाव था, पर इस बात में दोनों ही सहमत थे कि इस घटना के लिए बादशाह लाल कुँवर के आग्रह पर जोहरा का पक्ष समर्थन कदापि न कर पाए। ये दोनों स्त्रियाँ यदि निजाम को दंड दिलवाने में सफल हो जाएँगी तो नगर में फिर किसी भी रईस की आबरू न बचने पाएगी। वजीर ने तुरंत ही बादशाह को पूरा विवरण लिखकर अंत में यह सूचना भी दे दी कि यदि बादशाह निजाम को दंडित करेंगे तो वजीर निजाम का साथ देगा। वजीर का पत्र बादशाह की सेवा में ठीक समय पर पहुँचा। उसी समय जोहरा सिर के बाल खोले उन पर राख, धूल डालकर दोनों हाथों से छाती कूटती हुई महलों में पहुँची। लाल कुँवर ने अपनी सहेली का जब यह हाल देखा और बातें सुनीं तो आगबबूला हो उठी। दोनों मिलकर बादशाह के पास पहुँचीं। जोहरा ने बड़े बड़े टेसुवे बहाए, लाल कुँवर ने बादशाह को तरह तरह से उभारने का जतन किया, पर वजीर की धमकी के आगे उन दोनों का काम न बन सका।
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  9. #29
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    अंग्रेजी राज की भारतीय रियासतों में रंडियों और रखैलों ने अपने पिया के जोम में बड़े बड़े उत्पात किए भी हैं और भोगे भी हैं। महर्षि दयानंद को काँच का चूरा पिलाकर मारने वाली भी एक रियासी वेश्या ही थी। श्री के.एल. गाँबा की दो पुस्तकों 'हिज हाईनेस' और 'फेमस ट्रायल्स' में उनके अनेक किस्से लिखे हैं। उत्सुक पाठक चाहें तो उन्हें पढ़ सकते हैं। दुर्भाग्यवश इस इस समय मेरे पास वे पुस्तकें नहीं, फिर भी एक मुमताज बेगम का किस्सा कुछ कुछ याद आ रहा है। मुमताज बेगम शायद लाहौर की एक नाचने वाली थी। अपनी उठती उमर के साथ ही उसने न जाने कितने अमीरों के दिल उजाड़े और होते-करते किसी हिज हाइनेस महाराजा की प्राण-प्रिया बन गई। मुमताज बेगम की उँगलियों के इशारे पर महाराज नाचते थे। महाराज ने उसे लाखों रुपये के हीरे-जवाहरात दिए। शायद मुमताज बेगम के अद्वितीय प्रभाव के कारण ही रियासत में उससे जलने वाले भी पैदा हो गए थे। महलों की चाल-ढाल देखते हुए अपनी कमाई और जान बचाने के लिए वह और उसके साथी किसी तरकीब से रातों-रात उस रियासत से भाग निकले। इससे महाराजा साहब को बड़ी बेचैनी हुई। अवसर देखकर मुमताज बेगम के विरोधियों ने कान भरे। महाराजा साहब का हुक्म हुआ कि मुमताज बेगम को पकड़कर फिर रियासत में लाने के लिए कोई कीमत और कोई उपाय न उठा रखा जाए। बंबई में मुमताज बेगम का पता मिला। और एक दिन, दिन-दहाड़े ही बंबई की एक भीड़-भरी सड़क पर महाराज साहब के गुंडों ने मुमताज बेगम की गाड़ी घेर ली, कहा-सुनी, छीना-झपटी, चीख-पुकार मची और मुमताज की हत्या हो गई। महाराजा साहब को अपने तख्त से भी हाथ धोना पड़ा।
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  10. #30
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    शाही नवाबी के पतन-कान से होते चले आते विलासिता के तांडव के कारण गदर के बाद वाले नई चेतना के भारत ने वेश्याओं के विरुद्ध आवाज उठाई। प्रतिक्रिया में वेश्या-जीवन की कारण भी आगे चलकर उभरी। भारतेंदु से लेकर सरशार, कौशिक और उग्र तक ने सुधारक के रूप में वेश्या-गामिता के विरुद्ध आवाज उठाई है। उन्नीसवीं शताब्दी के अंतिम और बीसवीं के प्रथम तीन दशकों में नया सत्ताधारी अंग्रेजी पढ़ा-लिखा मिडल क्लास बाबू अपनी घर-घुस्सू फूहड़ औरत से ऊबकर मेमों जैसी विलायती संगिनियों के अभाव में वेश्यागामी बना। शादी-ब्याह के अवसरों पर घरेलू औरतों द्वारा गाए जाने वाले ढोलक-गीतों में सैयाँ से रंडी नटिनी के यहाँ न जाने की बड़ी बड़ी प्रार्थनाएँ की गई हैं। रंडी घरेलू औरतों का काल थी। इसीलिए सन 21 के राष्ट्रीय आंदोलन के पश्चात वेश्या-संग और महफिलों का चलन उठ गया।

    इसके बाद तो पढ़ने लिखने के बहाने घरेलू लड़कियाँ परदे के बाहर आने लगी थीं, युवकों का ध्यान उस ओर बँटने लगा और होते करते आज यह दिन आया कि समाज को वेश्या की आवश्यकता ही न रही।

    --------------------
    साभार : गद्यकोश
    लेख : अमृतलाल नागर
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