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Thread: छिनाल पर बवाल

  1. #61
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    ४. 'ह्वाइट कॉलर क्राइम' को चिह्नित करना एक टेढ़ी खीर है, क्योंकि कौन ह्वाइट कॉलर क्राइम अंजाम देने जा रहा है- यह पता लगाना बड़ा मुश्किल काम होता है। फिर भी 'ह्वाइट कॉलर क्राइम' को चिह्नित करने की संक्षिप्त परिभाषा यह है कि 'जो सीधे रास्ते पर नहीं चलते वे कहीं से कहीं से ह्वाइट कॉलर क्राइम को अन्जाम देने की कोशिश कर रहे होते हैं।' अत: उल्टी-सीधी हरकतों, साक्ष्य मिटाने की कोशिश, हाई वोल्टेज ड्रामा, लॉलीपाप देना, झाँसा देना, टालमटोल करना इत्यादि से इसका अनुमान ही लगाया जा सकता है, सुनिश्चित नहीं किया जा सकता। यही कारण है- ह्वाइट कॉलर क्राइम के शिकार हमेशा जाल में फँस जाते हैं। ह्वाइट कॉलर क्राइम का शिकार बनने पर ही इसका पता चलता है। उदाहरण के लिए उत्तर भारत के तमाम रेलवे स्टेशनों पर लाउडस्पीकर पर चीख-चीखकर यात्रियों को चेतावनी दी जाती है- 'किसी अपरिचित व्यक्ति से कोई खाने-पीने का सामान लेकर न खाएँ। हो सकता है- वह जहरखुरान हो। आप बेहोश हो जाएँ और वह आपको लूट ले।' सभी यात्री सुनते रहते हैं, फिर भी ज़हरखुरान जब-तब अपना काम कर ही जाते हैं। कैसे? हमारे यहाँ लोग बड़े होशियार और चतुर होते हैं। सरकार ने कहा है- अपरिचित व्यक्ति से खाने-पीने का सामान न लें। सरकार ने कभी परिचित व्यक्ति से लेने से मना नहीं किया। इसीलिए पहले वे अपरिचित व्यक्ति से बातचीत करके अपना परिचित बना लेते हैं और फिर उसका दिया खाने-पीने का सामान लेकर लूट का शिकार बन जाते हैं! है न हास्यास्पद। इस उदाहरण से स्पष्ट है- ज़हरखुरान द्वारा खाने-पीने का कुछ सामान आपको देने पर भी आप उस व्यक्ति पर शक़ तो कर सकते हैं किन्तु स्पष्ट रूप से यह घोषित नहीं कर सकते कि आपको ज़हरखुरानी का शिकार बनाया जा रहा है, क्योंकि आपका शक़ एक वहम भी हो सकता है। अतः जब तक आप ज़हरखुरान का दिया कुछ खाकर ज़हरखुरानी का शिकार नहीं बन जाते तब तक आप उसे अपराधी घोषित नहीं कर सकते। 'काटो तो खून नहीं', 'चेहरे पर हवाइयाँ उड़ना' और 'नौ दो ग्यारह होना' जैसे हिन्दी मुहावरे ह्वाइट कॉलर क्राइम करने वालों के लिए विशेष रूप से बने हैं, क्योंकि जब ह्वाइट कॉलर क्राइम करने वाले रंगे हाथ पकड़े जाते हैं तो उन्हें काटो तो खून नहीं रहता, उनके चेहरे पर हवाइयाँ उड़ने लगती हैं और वे तत्काल नौ दो ग्यारह होने की कोशिश करते हैं। इसके पीछे एक कारण है। अपराधी का दिल चूहे की तरह होता है तो 'ह्वाइट कॉलर क्राइम' करने वालों का दिल मच्छर की तरह होता है, क्योंकि उन्हें हमेशा पकड़े जाने का डर सताता रहता है। जैसा कि हमने ऊपर बताया कि ह्वाइट कॉलर क्राइम का शिकार बनने पर ही इसका पता स्पष्ट रूप से चलता है, फिर भी ह्वाइट कॉलर क्राइम करने वालों की गतिविधियों से इसका अनुमान लगाकर इसकी रोकथाम की जा सकती है या विशेष युक्ति के प्रयोग द्वारा ह्वाइट कॉलर क्राइम करने वालों को रंगे हाथ पकड़ा जा सकता है। इस विशेष युक्ति का तात्पर्य यह है कि ह्वाइट कॉलर क्राइम प्लेयर्स के फैलाए हुए जाल में फँसने का अभिनय करके ह्वाइट कॉलर क्राइम प्लेयर्स को रंगे हाथ दबोच लिया जाए। आइए, इस बात को ज़हरखुरानी के छोटे से उदाहरण द्वारा समझते हैं-

    गतिविधि : किसी को ज़हरखुरानी का शिकार बनाने के लिए खाने-पीने की वस्तुएँ बड़े प्रेम से प्रस्तावित की जाती हैं जिसे खाते ही शिकार थोड़ी देर में बेहोशी की नींद सोने लगता है।

    बचाव का उपाय : इससे बचने का उपाय यह है कि किसी से कुछ खाने-पीने का सामान लेकर न खाएँ।

    पूर्व उपाय : पूर्व उपाय वह होता है जो 'ह्वाइट कॉलर क्राइम' करने वालों का हौसला पहले ही इतना पस्त कर देता है कि वह क्राइम करने का विचार ही त्याग देता है।

    ज़हरखुरानी के मामलों से बचने का पूर्व उपाय यह है कि प्रायः सहयात्री राजनीति के विषय पर चर्चा शुरू करके समय व्यतीत करते हैं। आप ज़हरखुरानी का विषय छेड़कर चर्चा शुरू कीजिए और सहयात्रियों को ज़ोर-शोर से बताइए कि किस प्रकार ज़हरखुरान बड़े प्रेम से खाने-पीने की वस्तुएँ देकर सहयात्रियों को लूट लेते हैं। साथ ही यह झूठ भी बोलिए कि कुछ साल पहले एक ज़हरखुरान कैसे रंगे हाथ पकड़ा गया था और सहयात्रियों ने उसकी जमकर इतनी ठुँकाई की थी कि उसका हाथ-पैर टूट गया था और सिर फट गया था जिसके कारण भलभलाकर खून बह रहा था। आपका भयानक वर्णन सुनकर आसपास कोई ज़हरखुरान बैठा होगा तो उसका हौसला पस्त हो जाएगा और वह ज़हरखुरानी का विचार त्याग देगा।
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  2. #62
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    उपरोक्त उपायों पर अमल करना 75 प्रतिशत तक ही सुरक्षा कवच प्रदान करता है, क्योंकि कुछ ज़हरखुरान इतने जीवट किस्म के होते हैं कि एक बार खाने-पीने का सामान मना कर देने पर भी पीछे लगे रहते हैं और दूसरी बार किसी मंदिर का प्रसाद निकालकर आपको देते हैं तथा आपके मना करने पर ईश्वर पर श्रद्धा और भक्ति का भय दिखाते हैं कि 'प्रसाद मना नहीं किया जाता। नहीं तो देवी-देवता नाराज़ हो जाते हैं।' यदि आपने कड़ाई से मना कर दिया तो ठीक, नहीं तो ज़हरखुरानी का शिकार बनना तय है।

    जैसा कि हम पहले बता चुके हैं कि खाने-पीने की वस्तुएँ प्रस्तावित करने मात्र से आप किसी को अपराधी घोषित नहीं कर सकते, क्योंकि यह आपका वहम भी हो सकता है। अतः यदि आप बिना किसी संदेह के आधार पर यह सुनिश्चित करना चाहते हैं कि सामने वाले का इरादा नेक नहीं है और वह एक ज़हरखुरान ही है तो आपको इसके लिए सम्भावित और संदेहास्पद ज़हरखुरान के जाल में फँसने का अभिनय करके कुछ विशेष चालें चलनी होगी। आप देखेंगे कि सामने वाला अपने ही जाल में उलझकर बुरी तरह छटपटाने और तड़पने लगेगा। इसके लिए आपको जो चालें चलनी हैं, उसका हमने 'वाइनरी चाल' नाम दिया है। यह एक तरह से ऐसी शतरंजी चाल होती है जिसमें इस प्रकार शह दी जाती है कि सामने वाले के इरादे नेक नहीं हुए तो उसकी मात निश्चित होती है।

    वाइनरी चाल नं० १ :

    जैसे ही सन्देहास्पद ज़हरखुरान आपको प्रसाद दे, इन्कार बिल्कुल न करें और खुश होने का जबरदस्त अभिनय करते हुए लपककर ले लें। विश्वास कीजिए- आपके इस कृत्य से ज़हरखुरान मन ही मन बड़े प्रसन्न होंगे। शिकार जो फँस गया बड़ी आसानी से! याद रखें- प्रसाद लेकर गड़प से खाना नहीं है, बल्कि प्रसाद लेते समय नीचे लिखा संवाद प्रसन्नतापूर्वक बोलना है-

    --'वाह-वाह.. प्रसाद! लाइए-लाइए.. किस्मत चमक गई। भाग्य खुल गया। भगवान की कृपा बरस रही है। किस मंदिर का प्रसाद है?'

    आपको कोई न कोई उत्तर ज़रूर मिलेगा। जैसे- वैष्णोदेवी। अब यह संवाद बोलें-

    --'आहा.. यात्रा में देवी की कृपा बरस गई हमारे ऊपर। सब काम बन जाएगा लगता है!'

    आपकी भक्तिपूर्ण बात सुनकर ज़हरखुरान अपने मन में सोचेगा- 'काम बनेगा नहीं, काम तमाम होगा तेरा.. तू खा तो सही!' फिर आपसे मुस्कुराते हुए कहेगा- 'क्यों नहीं, क्यों नहीं.. सारा काम बन जाएगा आपका। माँ की कृपा है आपके ऊपर!' इतना कहने के बाद वह बेसब्री से आपके प्रसाद खाने का इन्तेज़ार करेगा। अब प्रसन्नता के साथ भक्तिपूर्वक प्रसाद माथे से लगाएँ और खाने के लिए मुँह तक ले जाएँ। योजना सफल होते देखकर ज़हरखुरान मंद-मंद मुस्कुराते हुए प्रसाद आपके मुँह में जाने की प्रतीक्षा करेगा। अचानक प्रसाद देखकर खाते-खाते रुक जाएँ और यह संवाद बोलें-

    --'बड़ा कम है प्रसाद। थोड़ा और दीजिए।'

    ज़हरखुरान के पास और प्रसाद होगा तो आपको और मिल जाएगा। और-और करके जितना प्रसाद आपको दिया गया था, उसका दुगुना कर लें। अब आधा प्रसाद ज़हरखुरान के हाथ में 'लीजिए, आप भी प्रसाद ग्रहण कीजिए' कहते हुए थमा दें। इसे कहते हैं- मियाँ की जूती, मियाँ के सिर।

    अब कृपया ध्यान दें। असली ज़हरखुरान हो या आपका वहम हो, उत्तर एक ही मिलेगा- 'अरे, हम तो दर्शन करके प्रसाद लेकर ही आ रहे हैं! आप लीजिए।'

    अब बड़े प्रेम से अरस्तु के पड़दादा की तरह समझाएँ- 'अरे, आपको नहीं पता क्या? गीता के पचासवें अध्याय के चार सौ बीसवें श्लोक में लिखा है- 'यात्राम् मात्राम् प्रसादम् मुख घुसेड़म् दाता अर्धभागे न रौरव नर्कम्' अर्थात् श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि यात्रा के दौरान मिलने वाले प्रसाद को पूरा का पूरा स्वयं खाने वाला रौरव नर्क में जाता है और उसे पुण्य भी प्राप्त नहीं होता। अतः प्रसाद का आधा भाग देने वाले को खिलाने के बाद ही ग्रहण करना चाहिए।'

    अब ज़हरखुरान इतने बड़े ज्ञानी तो होते नहीं जो आपकी बकवास पकड़ सकें कि न तो गीता में ५० अध्याय होते हैं और न ही ४२० श्लोक! बस ज़हरखुरान को इतना पता चल जाएगा कि भारी गड़बड़ी हो चुकी है। सामने वाला निर्दोष होगा तो आपकी बात सुनकर भय-भक्ति के साथ प्रसाद खाकर अपना पुण्य बढ़ा लेगा। ज़हरखुरान होगा तो उसे काटो तो खून नहीं होगा और चेहरे पर हवाइयाँ उड़ने लगेंगी। अब वह प्रसाद खाने से टालमटोल करेगा और बातों से आपको झाँसा देने की कोशिश करेगा। अब मंद-मंद मुस्कुराने की आपकी बारी है। अब ज़हरखुरान आपको क्या-क्या झाँसे देगा, आइए जानते हैं-

    (अ) झाँसा : मेरे पेट में दर्द है। कुछ न खा पाऊँगा।

    झाँसे की काट : प्रसाद मना नहीं करते। माँ का नाम लेकर आप प्रसाद ग्रहण कीजिए। माँ की कृपा से दर्द छूमन्तर हो जाएगा।
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  3. #63
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    आप की बात सुनते ही ज़हरखुरान बुरी तरह से बौखला जाएगा और वह किसी न किसी प्रकार से नौ दो ग्यारह होने की कोशिश करेगा।

    अगला झाँसा : पेट में बहुत ज़ोर से दर्द हो रहा है.. टॉयलेट होकर आता हूँ।

    यह कहते हुए ज़हरखुरान टॉयलेट जाने के बहाने वहाँ से रफूचक्कर होने की कोशिश करेगा।

    पहले आप उनके शिकार थे। अब वो आपके शिकार हैं। अपने शिकार को हाथ से न जाने दें और रास्ता रोकते हुए बड़े प्रेम से कहें-

    झाँसे की काट : टॉयलेट जाने से पहले मुँह में थोड़ा सा प्रसाद डाल लें, मित्र। माँ की कृपा से सब ठीक हो जाएगा। गरूड़ पुराण में लिखा है- प्रसाद इन्कार करके जो टॉयलेट जाता है वह एक साल तक नर्क की आग़ में भूना जाता है।

    अब ज़हरखुरान को क्या पता गरूड़ पुराण में ऐसी बात लिखी है या नहीं? मन ही मन आपके ज्ञान को गाली बकते हुए एक ही बात कहेगा- 'मैंने तो कभी नहीं सुना!'

    अब आप मुस्कुराते हुए कहिए- 'आप बिल्कुल चिन्ता न करें, मित्रवर.. हम दो सौ सोलह वेद और आठों पुराण घोंटे बैठे हैं। मत्स्य पुराण में भी यही बात लिखी है। शिव पुराण में तो लिखा है- जो पापी मनुष्य पेट दर्द के कारण प्रसाद खाने से इन्कार करके मल-मूत्र विसर्जन करने चला जाता है उसके जबड़े में दर्द हो जाता है।'

    आपकी बात सुनकर घबड़ाए हुए ज़हरखुरान के मुँह से एक ही बात निकलेगी- 'अच्छा.. कैसे?'

    अभी तक आप 'ह्वाइट कॉलर क्राइम' की चालों को अपने 'ह्वाइट कॉलर स्किल' द्वारा बराबर काटते चले आ रहे थे। अब इससे काम नहीं चलने वाला, नहीं तो शिकार फरार हो जाएगा और आप हाथ मलते रह जाएँगे। तुरन्त अमरीश पुरी को याद करते हुए 'ऐसे' कहकर एक जबरदस्त घूँसा ज़हरखुरान के जबड़े पर जड़ दें और पूछें- 'दर्द हुआ?'

    आपको यह देखकर बड़ी निराशा होगी कि ज़हरखुरान आपकी कॉमेडी का आनन्द लेने के स्थान पर तेज़ी से भागने का प्रयास कर रहा है। चुस्ती और फुर्ती के साथ कॉलर पकड़कर पैर फँसाकर नीचे गिरा दें और शोर मचाएँ। सहयात्री आपकी सहायता के लिए तत्काल आ जाएँगे। अब यात्रियों को एक रस्सी देकर ज़हरखुरान को बाँधने के लिए कहें जिससे कि वह भागने न पाए। चोर, जेबकतरा, ज़हरखुरान इत्यादि के रंगे हाथ पकड़े जाने पर यात्री बड़े प्रसन्न होते हैं और तत्काल घूँसा-लात से सत्कार करना अच्छा टाइम-पास समझते हैं। अतः यदि कोई यात्री ज़हरखुरान का सत्कार घूँसा-लात से करने के लिए आगे बढ़ता है तो उसे अत्यन्त शान्त स्वर में मानवता का लम्बा-चौड़ा भाषण देकर तत्काल रोक दें। अब ज़हरखुरान अपने मन में भगवान को धन्यवाद दे रहा होगा। धन्यवाद पूरा होने से पहले ही अमरीश पुरी और कादर खान की हँसी बारी-बारी से कई बार भयानक रूप से हँसकर ज़हरखुरान को बुरी तरह डरा दें। ठीक से नहीं हँस पाते तो किसी ड्रामा कोचिंग सेंटर में प्रवेश लेकर पहले से सीख लें जिससे हँसने में भयानकता बनी रहे। हँसने के बाद ज़हरखुरान से पूछें कि इससे पहले कहाँ-कहाँ ज़हरखुरानी की? आपका प्रश्न सुनकर ज़हरखुरान कसकर अपना मुँह सिल लेगा और कोई जवाब नहीं देगा। ज़हरखुरान की धूर्तता और चुप्पी देखकर कुछ यात्री आपसे कहेंगे कि बिना सत्कार किए ये कुछ नहीं बताएगा। एक बार फिर अमरीश पुरी और कादर खान की मिश्रित हँसी हँसकर कहें- 'ये लोग मार खाने के बड़े अभ्यस्त होते हैं। मार खाकर भी कुछ नहीं बताएँगे। इसका दूसरा उपाय है।' कहते हुए अपने मोबाइल फ़ोन में ज़हरखुरान को वर्ष 1981 में लोकार्पित हिन्दी फ़ीचर फ़िल्म 'मेरी आवाज़ सुनो' का वह दृष्य दिखाएँ जिसमें जितेन्द्र के नाखून उखाड़े गए थे।



    दृष्य ख़त्म होते ही एक बार फिर अमरीश पुरी और कादर खान की भयानक हँसी हँसते हुए कहें- 'इससे बुरा होगा तेरा हाल। तू हो जाएगा बेहाल। तू आया था लूटने माल। जो बन चुका है तेरी काल। अब फटाफट मुँह खोल। बता दे अपनी सब पोल।'

    आपकी भयानक हँसी और दमदार कविता सुनकर ज़हरखुरान का हौसला पस्त हो जाएगा और वह फटाफट सब कुछ उगलना शुरू कर देगा कि इससे पहले कहाँ-कहाँ ज़हरखुरानी की। इसका मोबाइल फ़ोन से वीडियो क्लिप बना लें। जैसे ही कहानी खत्म हो, एक कोल्ड-ड्रिंक मँगवाकर ज़हरखुरान को पिलाएँ। ज़हरखुरान बड़ा प्रसन्न होगा और कोल्ड-ड्रिंक पीते हुए मन ही मन में भगवान को धन्यवाद देगा। जैसे ही कोल्ड-ड्रिंक ख़त्म हो, कोल्ड-ड्रिंक का पैसा ज़हरखुरान से वसूल लें और पूछें- 'चाय-कॉफ़ी कुछ चलेगी क्या?' पैसा खर्च होने के डर से ज़हरखुरान घबड़ाकर इन्कार कर देगा।
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  4. #64
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    अब ज़हरखुरान को जाने दें। 'जान बची, लाखों पाए'- सोचकर ज़हरखुरान फुर्रर हो जाएगा और ज़हरखुरानी का धंधा छोड़ देगा। यात्री के रूप में भयानक पागल खुलेआम जो घूम रहे हैं। पता नहीं- कब क्या कर बैठें!

    अब वीडियो क्लिप सोशल मीडिया पर अपलोड करके दनादन लाइक कमाएँ और यूट्यूब पर अपलोड करके धन कमाएँ। देखा, एक ज़हरखुरान किस तरह आपके लिए फायदेमन्द सिद्ध हुआ!

    (ब) झाँसा : यह तो बड़ी अच्छी बात है, मगर अभी खाने की बिल्कुल इच्छा नहीं। लाइए, प्रसाद वापस कीजिए। जब मेरी खाने की इच्छा होगी तो आपको भी दे दूँगा। हम दोनों साथ बैठकर खाएँगे।

    यदि ज़हरखुरान उपरोक्त झाँसा दे तो इसका मतलब है वह अपनी स्कीम से पीछे हट रहा है। पीछे हटने का मतलब साफ़ है- आपका शिकार आपके हाथ से बड़ी आसानी से निकलकर फरार होना चाहता है। अब आप अच्छी तरह से समझ गए होंगे कि शिकार के हाथ से निकलने का मतलब सोशल मीडिया की लाइक्स और वाहवाही के साथ यूट्यूब की कमाई भी गई! ईश्वर ने यात्रा के दौरान आपके मुफ्त मनोरंजन और अतिरिक्त कमाई करने का जो मौका दिया था वह आपकी बेवकूफ़ी की वजह से हाथ से निकल सकता है। अतः नीचे दिया गया 'झाँसे की काट' का प्रयोग तत्काल करके भागते शिकार को उसी के जाल में फँसाकर वापस खींचें-

    झाँसे की काट : कैसी बात करते हैं, मित्र। मत्स्यपुराण में लिखा है- दिया हुआ प्रसाद वापस करने से मनुष्य नर्क की आग़ में एक हज़ार साल तक भूना जाता है। उसके बाद खौलते तेल में डालकर दो हज़ार साल तक तला जाता है और फिर उसे मछली का जन्म मिलता है। इसलिए प्रसाद वापस करने का सवाल ही नहीं उठता। मेरी मानिए तो इच्छा हो या न हो- आप भी प्रसाद खा लीजिए, क्योंकि गीता के चार सौ बीसवें अध्याय के एक हज़ार दो सौ ग्यारहवें श्लोक में श्रीकृष्ण अर्जुन को उपदेश देते हुए कहते हैं कि जो भक्त प्रसाद दिए जाने पर इच्छा न होते हुए भी भय-भक्ति के साथ तुरन्त खा लेता है उसे चारों धाम का पुण्य प्राप्त होता है, उसके सारे पाप धुल जाते हैं और वह मृत्यु के उपरान्त सीधा स्वर्ग जाता है!

    आपका 'भारी' ज्ञान देखकर ज़हरखुरान बौखला उठेगा। वेद, पुराण और गीता के रूप में भारी खतरा आया जानकर वह बिना कुछ कहे तेज़ी से खिसकने की कोशिश करेगा। शिकार को हाथ से न जाने दें और रास्ता रोकते हुए बड़े प्रेम से कहें- 'भविष्य पुराण में क्या लिखा है- यह तो बताना ही भूल गया। भविष्य पुराण में लिखा है- जो भक्त प्रसाद का अपमान करके बिना कुछ जवाब दिए चुपचाप खिसकने की कोशिश करता है वह मुँह से खून की उल्टी करता है।' आपकी बात सुनकर ज़हरखुरान आपको धक्का देकर भागने की कोशिश करेगा। तत्काल एक शक्तिशाली घूँसा उसके जबड़े पर जड़ दें और शाेरगुल मचाएँ। आगे का दृष्य पहले ही लिखा जा चुका है। यदि ज़हरखुरान बिना कुछ कहे तेज़ी से खिसकने की कोशिश करने के स्थान पर 'अरे नहीं, उल्टी आ जाएगी' कहकर टालमटोल करे तो 'माँ की कृपा से सब ठीक हो जाएगा' कहकर प्रसाद उसके मुँह में ठूँसने की कोशिश करें। यह भी पहले लिखा जा चुका है।

    तो यह था कुछ झाँसों का विस्तारपूर्वक वर्णन जो आपको देकर ज़हरखुरान अपने शराफत के मुखौटे के साथ नौ दो ग्यारह होने की कोशिश करेगा। इसके अतिरिक्त आपको और भी कई झाँसे देकर ज़हरखुरान फरार होने की कोशिश कर सकता है। उन सभी का विवरण यहाँ नहीं दिया जा सकता, क्योंकि सम्पूर्ण विवरण लिखने पर 'ज़हरखुरान कैसे पकड़ें' नामक मोटी पुस्तक तैयार हो जाएगी और इस सूत्र में ज़हरखुरान पकड़ने की सम्पूर्ण विद्या भी नहीं सिखाई जा रही है। कभी ज़हरखुरान के नाम से घबड़ाकर दूर भागने वालों का अब बड़ा मन कर रहा होगा कि किसी प्रकार एक अदद ज़हरखुरान पकड़कर फ़ेसबुक की लाइक्स और वाहवाही के साथ यूट्यूब की कमाई करें, किन्तु एक बात हमेशा याद रखें- ज़हरखुरान अपने साथ ख़तरनाक हथियार भी लेकर चल सकते हैं। अतः अपने जोखिम पर ही ज़हरखुरान पकड़ें। किसी प्रकार की कोई गड़बड़ी होने पर हमारी कोई जिम्मेदारी न होगी। ख़तरनाक हथियार के नाम पर हिम्मत न छोड़कर अपना हौसला बुलन्द रखें तथा ज़हरखुरान से पाला पड़ने पर अपनी पूरी ताकत झोंककर उससे मुक़ाबला करके धूल चटा दें। हमेशा एक बात याद रखें- जो डरता है, वह दिन में दस बार मरता है। जब कभी डर लगे तो हिन्दी फ़ीचर फ़िल्म 'हीरो' का वह गीत गुनगुनाने लगिए- 'प्यार करने वाले कभी डरते नहीं, जो डरते हैं वो प्यार करते नहीं'।
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  5. #65
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    अतः जिससे डर लगे उससे प्यार करना शुरू कर दीजिए। आपका डर दूर हो जाएगा। गोस्वामी तुलसीदास जी भी रामचरितमानस के सुन्दरकाण्ड में लिख गए- 'बिनु भय होइ न प्रीति' अर्थात् बिना भय के प्रेम नहीं होता। पाञ्चजन्य में 'भय बिनु होइ न प्रीति' पर लल्लन प्रसाद व्यास का एक उत्कृष्ट लेख प्रकाशित है जिसे सन्दर्भवश नीचे उद्घृत किया जा रहा है-

    भय बिनु होइ न प्रीति

    'भय बिनु होइ न प्रीति'- रामचरितमानस का यह संदेश या नीति बहुचर्चित है और मान्य भी। यह उल्लेख उस प्रसंग से है, जब श्रीराम अपने अनुज लक्ष्मण के साथ विनयपूर्वक समुद्र तट पर बैठ गए थे इस आशा में कि वह उनकी सेना को पार जाने में सहायता करेगा। किन्तु जब विनयपूर्वक अनशन-अनुरोध का कोई प्रभाव नहीं हुआ, तब राम समझ गए कि अब अपनी शक्ति से उसमें भय उत्पन्न करना अनिवार्य है। लक्ष्मण तो पहले से ही अनुनय-विनय के पक्ष में नहीं थे, क्योंकि वे श्रीराम के बाण की अमोघ शक्ति से परिचित थे। वे चाहते थे कि उनका बाण समुद्र को सुखा दे और सेना सुविधा से उस पार शत्रु के गढ़ लंका में पहुंच जाए।

    समुद्र तो जड़ था ही। गोस्वामी तुलसीदास ने पहले ही उसे जड़ बता दिया था-

    विनय न मानत जलधि जड़, गए तीनि दिन बीति।

    बोले राम सकोप तब, भय बिनु होइ न प्रीति।।

    ठीक ही था कि जो समुद्र तीन दिनों तक यह न समझ सका कि उसके तट पर जो बैठा है, वह कौन है और उसका बाण करोड़ों समुद्रों को सुखा सकता है- "कोटि सिन्धु तोषक तव नायक-' तब वह जड़ नहीं तो और क्या था? तभी श्रीराम ने अपने महा-अग्निपुंज-शर का संधान किया, जिससे समुद्र के अन्दर ऐसी आग लग गई कि उसमें वास करने वाले जीव-जन्तु जलने लगे। तब समुद्र ब्राह्मण वेश में प्रकट होकर हाथ में अनेक बहुमूल्य रत्नों का उपहार ले अपनी रक्षा के लिए याचना करने लगा और कहने लगा कि वह पंच महाभूतों में एक होने के कारण जड़ है। अतएव श्रीराम ने शस्त्र उठाकर उसे उचित सीख दी है।

    "भय बिनु होइ न प्रीति'- वाली एक और सीख "रामचरितमानस' में सुग्रीव के प्रसंग में मिलती है, जब वह श्रीराम की सहायता से बाली-वध के बाद किÏष्कधा का राज्य और अपनी पत्नी रूमा को पा जाने के बावजूद राजकाज को भूल गया था। इससे पहले ऋष्यमूक पर्वत पर श्रीराम से मिलने पर उसने प्रतिज्ञा की थी कि वह सीता जी का पता लगाने में राम की पूरी सहायता करेगा। रावण ने उनका हरण कर लिया था और राम-लक्ष्मण उन्हें ढूंढते फिर रहे थे। सुग्रीव का राज्याभिषेक होने के बाद वर्षाकाल आ गया। अतएव यह तय हुआ कि श्रीराम और लक्ष्मण वर्षाकाल समाप्त होने तक प्रवर्षण गिरि पर रहेंगे और उसके तुरन्त बाद सुग्रीव अपनी वानर सेना के सहयोग से सीता जी का पता लगाने का प्रयास करेंगे। परन्तु वर्षाकाल बीत गया और सुग्रीव को अपने वचनों की भी याद नहीं रही। बहुत प्रतीक्षा के बाद एक दिन राम ने लक्ष्मण से कहा-

    सुग्रीवहुं सुधि मोरि बिसारी। पावा राज, कोत पुर नारी।

    जेहि सायक मारा मैं बाली। तेहि सर हतों मूढ़ कहं काली।।

    अर्थात् सुग्रीव ने भी राज्य, कोष और स्त्री पाकर मुझे भुला दिया। अतएव जिस बाण से मैंने बाली को मारा था, उसी से उस मूर्ख को भी मार सकता हूं। श्रीराम के इस रोष से लक्ष्मण मन ही मन प्रसन्न हुए, क्योंकि वे दुष्टों को सजा देने में देरी के पक्ष में नहीं रहते। अतएव अपना धनुष-बाण संभालने लगे। तब श्रीराम फिर लक्ष्मण से बोले-

    "भय देखाइ तैं आवहू, तात सखा सुग्रीव।'

    अर्थात् सुग्रीव को मेरा भय दिखाकर मेरे पास ले आओ।

    ऐसा ही हुआ। क्रोध में भरकर लक्ष्मण किÏष्कधा पहुंच गए। उधर मंत्री हनुमान ने भी श्रीराम का भय दिखाकर सुग्रीव को आगाह कर दिया था। अतएव लक्ष्मण के क्रोध के पीछे बाली का वध करने वाले श्रीराम के बाण के स्मरण मात्र से उसकी विलासिता पता नहीं कहां चली गई और वह चुस्त-दुरुस्त होकर लक्ष्मण के साथ श्रीराम के पास पहुंच गया। साथ ही सभी प्रकार से उनसे क्षमा मांगते हुए सूचित किया कि उसने सीता जी की खोज के लिए चारों दिशाओं में अपने वानरों को भेजने का आदेश दिया है। रामजी प्रसन्न हो गए और उसके अपराध को क्षमा कर दिया।
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    सुग्रीव और समुद्र को दी गईं राम की सीखें हमेशा के लिए सार्थक नीति का संदेश बन चुकी हैं, जो व्यक्ति, परिवार, समाज और देश के परिप्रेक्ष्य में समान रूप से प्रासंगिक हैं। भारत के लिए तो यह और भी अधिक है, जो विशाल और सर्वशक्तिमान राष्ट्र होने के बावजूद छोटे-छोटे देशों या शक्तियों से पीड़ित, प्रताड़ित और पूर्व में पराजित होता रहा है। आज का संदर्भ भी कुछ ऐसा दिखाई पड़ता है। इसका सबसे बड़ा कारण है पहले के राजाओं और अब के राजनेताओं में नि:स्वार्थी देश-सेवा और सतत जागरूकता का अभाव तथा चालाक और धोखेबाज पड़ोसियों के साथ अंधविश्वासी मित्रता उस समय तक जब तक उनका वि·श्वासघात हमारे सामने नग्न रूप से नहीं आ जाता। राम और कृष्ण से लेकर चाणक्य तक इस देश में देशहित और व्यावहारिक कूटनीति कई बार बहुत आहत हुई है।"भय बिनु होइ न प्रीति' की यथार्थता के आगे की एक और अधिक पेचीदी यथार्थता मानव जीवन में दिखाई पड़ती है। इसका परिचय रामायण और महाभारत में भली प्रकार मिलता है। इसके अनुसार व्यक्ति में कुमति या कुप्रवृत्तियां बढ़कर उस पर इतनी हावी हो जाती हैं कि उसके लिए भय भी बेअसर हो जाता है। वह अपने अहं, मनमानी और स्वार्थ में मृत्यु भय की भी उपेक्षा कर देता है और अंतत: मृत्यु को ही प्राप्त होता है। इसके असंख्य उदाहरण धार्मिक साहित्य और शास्त्र में हैं किन्तु दो बड़े उदाहरण रावण और दुर्योधन हैं- क्रमश: रामायण और महाभारत के खलनायक। यद्यपि ये प्रत्येक काल और देश में पाए जाते हैं।

    रावण की ही भांति "महाभारत' में मिलता हैं दुर्योधन जिसको अपने पाण्डव भाइयों से संधि करके महायुद्ध टालने के लिए माता-पिता, गुरु, अनेक ऋषि-मुनि आदि ने दबाव डाला और यहां तक स्वयं भगवान कृष्ण ने उसके पास जाकर संधि का प्रस्ताव किया किन्तु उसने साफ कह दिया कि पांच गांव तो क्या सुई की नोक के बराबर भूमि भी वह नहीं देगा।

    इतना ही नहीं उसने भगवान कृष्ण को बंदी बनाने की योजना बनाई। अत्यन्त दुर्भाग्यवश आज ऐसे रावण और दुर्योधन संसार के कोने-कोने में धार्मिक कट्टरता और आतंकवाद के रूप में फैल गए हैं, जिन्हें किसी प्रकार का कोई भय विश्वशांति, सद्भाव और भाईचारे की ओर नहीं ले जा सकता। हिंसा की महाअग्नि में संसार को धकेला जा रहा है। उनसे लड़ने और उन पर विजय प्राप्त करने का मंसूबा बांधने वाली शक्तियों को विचार करना है कि क्या उनके साथ श्रीराम या श्रीकृष्ण की कृपा शक्ति है?

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    साभार : पाञ्चजन्य
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