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Thread: ईश्वर नहीं है!

  1. #11
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    ईश्वर है यदि यह एक मान्यता, जुठी मान्यता है तो ईश्वर नहिं है यह भी एक मान्यता हुई या फिर जुठी मान्या ही हुई। यह बखेडा सदियों से चला आ रहा है। यह 70-80 साल जिनेवाला इन्सान क्या साबित कर पाईगा की ईश्वर है या नहीं। मेरे खायल से तो ईश्वर है या नही है यह आवश्यकता नही है पर आप किसी के सामने जुकते है यह आवश्यक है। इश्वर का होना आवश्यक नही आपका जुकना, अंहम का कम होना आवश्यक है। ईश्वर को मानने से, उसकी कल्पना करने से आप उसके प्रति नर्म होगे, अंहम कम होता चला चायेगा और एक समय ऐसा आईगा जब आपका अंहम खत्म हो जायेगा तब आपके लिए ईश्वर का होना या नही होना दोनों का कोई मतलब नही होगा।

    इश्वर एक नियम है कर्मका नियम। नियम के अंतर्गत यहा सारी प्रकृति चल रही है। इसमे न गुण है न दोष है। उसका न आकार है न वह निराकार है। सिर्फ नियम है। बस आपको सिर्फ उस नियम के अनुकूल रहना है। जो लोक इन झमेलो में पडते है वह सिर्फ आपना समय ही बरबाद करते है और 70-80 जीवन यापन करके मृत्यु की गोद में चले जाते है और वह साबित नही कर पाते की ईश्वर है या नहि।
    Last edited by AJAY RATILAL KANKRECHA; 06-03-2018 at 05:14 PM.

  2. #12
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    Quote Originally Posted by AJAY RATILAL KANKRECHA View Post
    ईश्वर है यदि यह एक मान्यता, जुठी मान्यता है तो ईश्वर नहिं है यह भी एक मान्यता हुई या फिर जुठी मान्या ही हुई। यह बखेडा सदियों से चला आ रहा है। यह 70-80 साल जिनेवाला इन्सान क्या साबित कर पाईगा की ईश्वर है या नहीं। मेरे खायल से तो ईश्वर है या नही है यह आवश्यकता नही है पर आप किसी के सामने जुकते है यह आवश्यक है। इश्वर का होना आवश्यक नही आपका जुकना, अंहम का कम होना आवश्यक है। ईश्वर को मानने से, उसकी कल्पना करने से आप उसके प्रति नर्म होगे, अंहम कम होता चला चायेगा और एक समय ऐसा आईगा जब आपका अंहम खत्म हो जायेगा तब आपके लिए ईश्वर का होना या नही होना दोनों का कोई मतलब नही होगा।

    इश्वर एक नियम है कर्मका नियम। नियम के अंतर्गत यहा सारी प्रकृति चल रही है। इसमे न गुण है न दोष है। उसका न आकार है न वह निराकार है। सिर्फ नियम है। बस आपको सिर्फ उस नियम के अनुकूल रहना है। जो लोक इन झमेलो में पडते है वह सिर्फ आपना समय ही बरबाद करते है और 70-80 जीवन यापन करके मृत्यु की गोद में चले जाते है और वह साबित नही कर पाते की ईश्वर है या नहि।
    संवाद के लिए धन्यवाद!

    वैसे १००-१२० साल जीनेवाले भी ईश्वर का होना साबित नहीं कर सकते। जो थोडे क्षण मर के वापस जिंदा हुए है उन्हें कुछ भी एसा दिखा नहीं जैसा अलग-अलग धर्मग्रंथो में लिखा है। अगर ईश्वर के डर से लोग नर्म होते तो आज ईतनी हिंसा-पाप आदि होते ही नहीं।

    क्रोध, काम, घृणा, लालच, ईर्ष्या ईत्यादि मानवस्वभाव है। ईन्हें महदअंश काबु करने से शांति प्राप्त होती ही है। ईसमें ईश्वर का कोई चमत्कार कहां? यह सब तो प्रकृति के नियम है। जप-तप-योग सभी मानवीय आविष्कार ही तो है!

    खैर, अगर ईश्वर के भय से ही अभी तक और आगे शांति बनी रहनेवाली हो तो ईश्वर होने का कोन्सेप्ट काम कर रहा है।
    महाठग आप ठगाईए, ओर न ठगिए कोय । आप ठगें सुख ऊपजे, ओर ठगें दुःख होय ॥

  3. #13
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    एक अवधारणा के अनुसार ईश्वर एक आलोकिक ऊर्जा है जो पूरे ब्रह्मांड को पोषित करती है न कि किसी एक देवी देवता को ईश्वर की उपाधि दी जा सकती है।
    पुराने संतो ने और योगियों ने इस ऊर्जा से मिलकर एकाकार किया इसे ही ईश्वर का साक्षात्कार कहा ।

  4. #14
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    एसी अवधारणाओं के चलते पृथ्वी पर कई शक्तिओं को ईश्वर का नाम दे दिया गया। सुरज, चांद, अग्नि, पानी, वायु ईत्यादि। जब की एसा मानने का कोई सही कारण नहीं था। ईनमें से किसी के बिना भी जीवन संभव था ही नहीं। फिर ईसमें अधिक श्रध्धा जागृत करने हेतु सभी को मानवीय स्वरुप में दर्शाया जाने लगा होगा।
    फिर ईन्हीं सुरज, चांद, अग्नि, पानी, वायु ईत्यादि के नकारात्मक प्रभाव अर्थात सूखा, आग, बाढ़, चक्रावात जैसे रुप को मानवी के बुरे कर्मो की शिक्षा के साथ जोड़ दिया गया। लेकिन अब मानव को अगर १% भी ज्ञानी माना जाए तो भी वह ईन सारी कुदरती शक्तियों के बारे में सब कुछ जान चुका है।
    महाठग आप ठगाईए, ओर न ठगिए कोय । आप ठगें सुख ऊपजे, ओर ठगें दुःख होय ॥

  5. #15
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    सभी धर्मों के ग्रंथो को अगर उनकी रचना के अनुक्रम से देखा जाए तो आप देंखेंगे की उनमें गुणवत्ता सुधरती गई है। छोटी छोटी बारीकीयां वढती चली गईं है। जैसे की रामायण में जीतना विवरण था उससे अधिक विवरण महाभारत में मिला। उसके बाद आए उपनिषदों में और अधिक जटिलताएं जोड़ी गई। बाईबल से भी कई भाषाओं में लिखा गया और बाद में अंग्रेजी में ईसका अनुवाद हुआ। ईसके कई पाठ या विधान अलग अलग काल में जोड़े या निकाले गये अथवा, उन्हें सुधारा भी गया। अरबी भाषा के शुद्ध रुप हिजाजी में लिखे हुए कुरान के कई अंश चर्मपत्रों पर पाए गए थे। अरबी भाषा के पूर्ण विकास के बाद ईसे अनुवाद किया गया था। जब की कहा जाता है की कुराने के सबसे प्रथम बोले गए सुरा में गुढ़ अर्थो के एक के अंदर एक एसे कई आवरण थे।

    यह सभी ग्रंथ मानव द्वारा लिखित और अनुवादित थे। आपको नहीं लगता हर काल में मानवो के भले के लिए और धर्म को मज़बुत करने के लिए ईनके अर्थो में वृद्धि की गई हो?
    महाठग आप ठगाईए, ओर न ठगिए कोय । आप ठगें सुख ऊपजे, ओर ठगें दुःख होय ॥

  6. #16
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    एक संत का अभिप्राय

    इस दफा जब मैं गुजरात गया तो अहमदाबाद में एक अफसर मुझे मिलने आये । उन्होंने विदेश में अभ्यास किया था । उनके साथ हुई बातचीत के दौरान उन्होंने कहा की हमारे यहाँ पढेलिखे लोगों का एक बडा तबका एसा है जो इश्वर के अस्तित्व में विश्वास नहीं रखता । वो इश्वर-दर्शन तथा अन्य आध्यात्मिक अनुभवों को कल्पना या भ्रम समजता है । इसके बारे में आपका क्या कहना है ? क्या उनकी बातें सच है ? एसे घोर कलियुग में आप इश्वर की बातें करते हो, क्या ये आश्चर्यजनक नहीं है ?


    मैंने कहा की मुझे इसमें कुछ आश्चर्यजनक नहीं लगता । ईश्वर और आध्यात्मिकता के बारे में पढेलिखें लोगों की जो राय है, वो ठीक नहीं है । वे सच्ची समज और योग्य शिक्षा से दूर है । हमारे यहाँ बहुत सारे लोग एसे है जो आध्यात्मिक साधना के बारे में कुछ नहीं जानते । फिर भी जब वक्त आता है तो 'मैं भी कुछ जानता हूँ' एसा बताने के लिये चर्चा या विवाद में अपने मिथ्या ज्ञान का प्रदर्शन करते है । एसे लोगों ने आध्यात्मिकता को भारी नुकसान पहूँचाया है ।


    जिन्होंने जीवनभर शरीरशास्त्र के बारे में कुछ नहीं जाना, वो दाक्तरी सलाह देने लगेंगे, तो उनकी सलाह का मूल्य क्या होगा ? जिसे संगीत से सूरों की समज नहीं है, वो किसीकी गायकी के बारे में अपना अभिप्राय देगा, तो उसे कौन सुनेगा ? साधना और आध्यात्मिकता के क्षेत्र में भी ये हाल है । जिन्होंने आत्मिक पथ पर कदम नहीं रक्खे, वे इसके बारे में अपनी राय बतानें लगे है, ये ठीक नहीं है । एसा करने से पहले उनको बहुत कुछ सोचने की आवश्यकता है ।


    साधनात्मक अभिप्राय देने के पहले उन्हें खुद साधना करनी होगी । लंबे अरसे तक प्रामाणिकतापूर्व साधना करके उन्हें अपने आप को तैयार करना होगा । अनुभवी महापुरुषों और शास्त्रों के मुताबिक अपना जीवन निर्गमन करना होगा । तब जाकर वो इसके बारे में कुछ कहने के काबिल हो सकेंगे । साधना करते-करते जब तक वो खुद सिद्ध नहीं हो जाते, अपने निर्धारित लक्ष्य की प्राप्ति नहीं कर लेते, उन्हें मौन रहना होगा । सिद्ध महापुरुषों की वाणी में जो बल होता है, वो उनके अनुभव के कारण होता है ।


    कभीकभी एसा भी होता है की खुद की लापरवाही या कमजोरी की वजह से साधना करने के बावजूद सिद्धि हासिल नहीं होती । एसी परिस्थिति में उन्हें अपनी गलतीओं को सुधारना होगा, अत्याधिक प्रयास करना होगा । एसा करने के बजाय अगर वो इश्वर और साधना को मिथ्या बताने की कोशिश करने लगेंगे तो इससे किसीका भला नहीं होगा । साधना का यह सबसे बडा भयस्थान है, और प्रत्येक साधक को इससे बचना है ।


    ये भी सोचनेलायक है की जिसे साधना का कुछ अनुभव नहीं है, वो साधना और इश्वर के बारे में कुछ कहें, तो हम उनकी बातों को क्यूँ महत्व दें ? इससे बहेतर तो हम उनकी बातें सुनें, जिसने लंबे अरसे तक प्रामाणिक प्रयास करके कुछ हासिल किया है । अनुभवी व्यक्ति की बातें सुनना और उनकी बातों पर अमल करना बुद्धिमानी है ।


    मेरी बात सुनकर उस अफसर को तसल्ली हुई । मैं कई साल से साधना के मार्ग पर सफर कर रहा हूँ । इश्वर का शरण लेकर, उसका नम्रातिनम्र शिशु बनकर अपना जीवन निर्गमन कर रहा हूँ । एसा करने से मुझे अनेक अनुभव मिले है । मेरे स्वानुभवों से मेरी श्रद्धा और समज पुख्ता हुई है । तभी तो तर्कवाद के इस जमाने में, मैं इश्वर के साथ प्रेम की अतूट डोर से बँधा हुआ हूँ । इसमें हैरानी की कोई बात नहीं है । अगर किसीको एसा लगें तो ये उनकी कमनसीबी है, यह समज लेना चाहिये ।

  7. #17
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    Ajay ratilal kankrecha ji ki jai ho

  8. #18
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    आपसे बहुत ही सुंदर दृष्टांत और संवाद पा कर आनंद हुआ!
    एसा नहीं है की महाठग नास्तिक है। हम हर हफ्ते मंदिर जातें है, उपवास रखतें है। गिरज़ाघर में केन्डल जला कर प्रेयर करतें है और गांव की मस्जिद पर चादर भी चढातें है। लेकिन आप अगर चारों तरफ देखोगे तो हमारे यह धार्मिक स्वभाव के फायदे कई लोग उठा रहें है।

    हमारे एक पडोसी एक बाबा को बहुत मानतें है। बाबा के हर प्रोडक्ट और उत्पाद वह खरीदते और बेचते या बांटते है। उनके आश्रम में यथाशक्ति दान करतें है। वहां उनके पास अधिक और अधिक दान मांगा जाता है। यह सब तो ठीक ही है, लेकिन अब वह बाबा किसी घोटाले में पकडे गए और जेल चले गए। लेकिन हाय रे मानवमन! वह पडोसी अभी भी उनकी आस्था से मुक्त नहीं हुए है। अभी भी उनके आश्रम वैसे ही चल रहें है और दान-दक्षिणा भी वैसे ही दिए जा रहीं है। कहीं कहीं कई कट्टरवादी धर्म की आड़ ले कर युवाधन को बहकाने के पुरे प्रयत्न कर रहें है, यह भी सब जानतें है। दक्षिणभारत के गरीब गांवों में ईसाई धर्मांतरण भी हो रहें है।

    आप सबको नहीं लगता की यह सब, कुछ ज्यादा ही हो रहा है? धर्म सबको शांति, एकता या सुगठित समाज देने के बजाय हम सबको तोड़ रहा है?

    ईस सब में ईश्वर कहां है बताईए!
    महाठग आप ठगाईए, ओर न ठगिए कोय । आप ठगें सुख ऊपजे, ओर ठगें दुःख होय ॥

  9. #19
    नवागत
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    Mahathug ji aap bhi bilkul sahi keh rahe hain

  10. #20
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    Quote Originally Posted by MahaThug View Post
    आपसे बहुत ही सुंदर दृष्टांत और संवाद पा कर आनंद हुआ!
    एसा नहीं है की महाठग नास्तिक है। हम हर हफ्ते मंदिर जातें है, उपवास रखतें है। गिरज़ाघर में केन्डल जला कर प्रेयर करतें है और गांव की मस्जिद पर चादर भी चढातें है। लेकिन आप अगर चारों तरफ देखोगे तो हमारे यह धार्मिक स्वभाव के फायदे कई लोग उठा रहें है।

    हमारे एक पडोसी एक बाबा को बहुत मानतें है। बाबा के हर प्रोडक्ट और उत्पाद वह खरीदते और बेचते या बांटते है। उनके आश्रम में यथाशक्ति दान करतें है। वहां उनके पास अधिक और अधिक दान मांगा जाता है। यह सब तो ठीक ही है, लेकिन अब वह बाबा किसी घोटाले में पकडे गए और जेल चले गए। लेकिन हाय रे मानवमन! वह पडोसी अभी भी उनकी आस्था से मुक्त नहीं हुए है। अभी भी उनके आश्रम वैसे ही चल रहें है और दान-दक्षिणा भी वैसे ही दिए जा रहीं है। कहीं कहीं कई कट्टरवादी धर्म की आड़ ले कर युवाधन को बहकाने के पुरे प्रयत्न कर रहें है, यह भी सब जानतें है। दक्षिणभारत के गरीब गांवों में ईसाई धर्मांतरण भी हो रहें है।

    आप सबको नहीं लगता की यह सब, कुछ ज्यादा ही हो रहा है? धर्म सबको शांति, एकता या सुगठित समाज देने के बजाय हम सबको तोड़ रहा है?

    ईस सब में ईश्वर कहां है बताईए!
    देखे मित्र आपने जो यह बात बताई वह सिर्फ एक संप्रदाय के प्रति एक व्यक्ति कि श्रद्धा के बारे में बताया। तो शायद वह व्यक्ति मोहित है अपने गुरुके प्रति, अगर ऐसा है तो यह तो अच्छा नही है उसके लिए। पर हम सब को ऐसी छोटी छोटी बातों को लेकर अपनी कुच धारणाएँ नही बनालेनी चाहिए। हमारी द्रष्टि व्यापक करने का यत्न करना चाहिए हमें। हम जब मित्र किसी धार्मिक बातों करते है तब मैं कुच अपना मतव्य व्यकत करता हुँ तो मेरे मित्र कहते है की अरे भाई तुम तो आस्तिक हो और इस सब बातों करके एक नास्तिक जैसी बातें करते हो। मैं कहता हुं कि आप मेरे बात को समज नही पा रहे है इस लिए आपको ऐसा लगता है। जब तब आपकी द्रष्टि व्यापक नही होगी आपको ऐसा ही लगेगा हर एक चीज को लेकर। मन की एक सीमा होती है, उससे आगे वह नहीं समज पाता कि सत्य क्या है, मिथ्या क्या है। जब तक आप अपने ईष्ट के प्रति समर्पण नही करेगे, तब तक आपमें वह श्रद्धा, भाव और प्रेम उत्पन नही होगा, अगर यह नहिं होगा तो आप इन उल्झनों में ही फसे रहेगे। हमे किसीको ईश्वर है या नही वह समजाना नही है और हमे भी यह समजने कि कोशीस नही करने है की ईश्वर है या नही क्योकि यह बहुत ही सुक्ष्म ज्ञान है हम जैसे लोगों के लिए यह अभी बहुत ही दुर की बात है। हमें सिर्फ ईश्वर को प्राप्त करने कि कोशीस करनी है। एक रास्ता तय कर लों और पुरी श्रद्धा, विश्वास और प्रेम-समर्पण के साथ उसके झुटे रहो। तुम्हारा अपना अनुभव होना चाहिए ईश्वर के प्रति। न तुम्हे ईश्वर के बारेमें किसीको समजाना है न किसी कि समज को अपने ऊपर आरोपित करना है। यह विषय तो विस्तृत है बस इतना ही आपके उत्तर में।

    आपको एक मुवी देखने को कहुंगा जो मिजे अच्छी लगी है। अभि मेने यहा का एक सदस्य से वह लिंक मंगवाई है मैं चाहुगां कि आप पी देखे और अपनी प्रतिक्रिया दै। उसका नाम है ....आँखों देखी.... लिंग सिर्फ 24 घंटे के लिय ही है।

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    ।।जय श्री राम।।
    Last edited by AJAY RATILAL KANKRECHA; 14-06-2018 at 11:04 AM.

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