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Results 21 to 30 of 46

Thread: ईश्वर नहीं है!

  1. #21
    नवागत
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    Ajay ratilal kanchrecha ji badhiya

  2. #22
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    ईश्वर हमें मिलने से रहा। वह किसी महाठग, अजय या बाबा जी को नहीं मिलेगा। उनके लिए ईश्वर है ही नहीं। सिर्फ पंचतत्व से बनी आंखे ईसके लिए पर्याप्त नहीं है। अनुयायी या देवता भले दिखाई दें, किंतु ईश्वर कभी दर्शन नहीं देते। वह एक तेजोमय प्रकाशपुंज है। उसका कोई रूप नहीं, आकार नहीं। उसीमें हमारी आत्मा समा जाना चाहती है। लेकिन कर्मों और ईच्छाओं के कारण उसे पृथ्वी पर पुनः आना होता है।
    महाठग आप ठगाईए, ओर न ठगिए कोय । आप ठगें सुख ऊपजे, ओर ठगें दुःख होय ॥

  3. #23
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    आपने जो ईश्वर के बारेमें बताया वह सहि है की उसका कोई रुप नहीं, आकार नहीं, एक तेजोमय प्रकाशपुंज है। इसके अतिरीक वह महाशक्ति संपन्न और मायापति है। वह भक्तों को एक अनुयायी या देवता को निमित्त बनाकर दर्शन अवश्य देता है। पर अजय में वह विवेक नहीं हो, वह भक्ति नही है, उसको पहेचानने के लिए सच्चे सदगुरु का मार्गदर्शन नही है जिससे वह उसे पहेचान नही पाता। तो यह तो अजय की मुश्किल है इसमें ईश्वर क्या करें.....

  4. #24
    नवागत
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    Aap dono hi sahi ho

  5. #25
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    Aug 2016
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    ईन्सान सबसे बुद्धिशाली जीव है और सबसे भोले भी। उन्हें पता ही नहीं वास्तव में उन्हें चाहिए क्या? मोक्ष या सुख? या फिर मोक्ष का सुख? क्युं की मोक्ष वास्तव में सुख-दुख की परिभाषा से भी सुदूर है! और अगर सोचा जाए तो मोक्ष शरीर के बिना ही नहीं, शरीर के साथ भी मिल सकता है। क्यूं की मोक्ष किसी जगह का नहीं बल्की अवस्था का नाम है!
    महाठग आप ठगाईए, ओर न ठगिए कोय । आप ठगें सुख ऊपजे, ओर ठगें दुःख होय ॥

  6. #26
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    अगर आप ईश्वर में मानतें है तो आप अहंकारी हो!
    यह हो सकता है और यह स्वाभाविक है!

    क्युं की और नहीं बल्के अपना हिन्दु धर्म भी उंचनीच की हीन भावना से बुरी तरह ग्रस्त हैयह सभी को मानना ही होगा। सभी एक देवता को मानने वाले दुसरे देवता के पुजक को स्वयं से नीचा मानते थे। राम, कृष्ण, माताजी और एसे सभी देवी-देवताओं के अनुयायी आपस में लड चुके है।

    अभी भी आप किसी को बोल कर देखें की हम ईस भगवान को मानतें है और वह सबसे बड़ा है। तो सामनेवाला स्वयं कहेगा की नहीं फलां देवता तुम्हारे देवता से बड़ा है! या वह यह कहेगा की आपका देवता मेरी ही देवता या देवी का तो ईसी का स्वरूप है। अगर आपने ज्यादा बल दिया तो सब स्वीकारेंगे की शिव सबसे बड़े है। तो फिर आपको पता है शिव किसकी तपस्या करतें है???
    महाठग आप ठगाईए, ओर न ठगिए कोय । आप ठगें सुख ऊपजे, ओर ठगें दुःख होय ॥

  7. #27
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    ईश्वर अगर है और अगर उसीने यह ब्रह्मांड रचा है ... तो उसे कोई फर्क नहीं पड़ता आप जीयो या मरो।
    क्यों की उसके लिए यह मात्र शरीरों का बनना-बिखरना है। अगर वही परमपिता है तो उसे अपने सभी जीव से एक जैसा प्रेम होना चाहिए। एक चींटी का कुचला जाना या एक मनुष्य का मरना उसके समान दुख की बात होनी चाहिए। आपके सारे सपने, आकाक्षांए और उस चींटी की भुख उसके लिए एक जैसी ही जिम्मेदारी होनी चाहिए।

    और अगर यह सच है तो मनुष्यों को अहंकार किस बात का? कभी भी कोई ज्वालामुखी, सुनामी या एस्ट्रोनोईड धरती को तबाह कर देगा और ईश्वर के लिए यह एक मात्र तुच्छ सी घटना होगी क्युं की उसके लिए तो वह पृथ्वी उसके पुरे ब्रह्मांड का एक दाना मात्र थी।

    आप जानतें है न की ब्रह्मांड के आगे पृथ्वी के कद क्या है?
    महाठग आप ठगाईए, ओर न ठगिए कोय । आप ठगें सुख ऊपजे, ओर ठगें दुःख होय ॥

  8. #28
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    Quote Originally Posted by MahaThug View Post
    ईन्सान सबसे बुद्धिशाली जीव है और सबसे भोले भी। उन्हें पता ही नहीं वास्तव में उन्हें चाहिए क्या? मोक्ष या सुख? या फिर मोक्ष का सुख? क्युं की मोक्ष वास्तव में सुख-दुख की परिभाषा से भी सुदूर है! और अगर सोचा जाए तो मोक्ष शरीर के बिना ही नहीं, शरीर के साथ भी मिल सकता है। क्यूं की मोक्ष किसी जगह का नहीं बल्की अवस्था का नाम है!
    शरीर के साथ मोक्ष? कृपया और प्रकाश डालें।

  9. #29
    कांस्य सदस्य garima's Avatar
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    इसको आप ये कह सकते हो कि इस मोह माया को छोड़ आत्मा को उपराम बनाना।आत्मा अजर अमर ज्योति बिंदु है।मोह माया में न पड़ के शरीर रूपी पिंजड़े में रहते हुए अपने को उस अवस्था मे लाना जहा आप खुद को शरीर न समझ के आत्मिक अवस्था मे रह के कार्य करे कि ये ईश्वर का काम है मैं सिर्फ इस शरीर मे रह के एक निमित हु उस कार्य को करने के लिए।
    ये अवस्था ही शरीर के साथ मोक्ष है
    मंच तुम आँखों की पलको से हो गए हो,
    के मिले बिना सुकून ही नहीं आता...!!!

  10. #30
    नवागत
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    May 2018
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    Bilkul sahi kaha aapne garima ji

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