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Thread: चमत्कार

  1. #21
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    जय श्री राम मित्रो।

    आज से यहा पर थोडा थोडा पोस्ट करने का यत्न करुगाँ। आपसे एक गुजारिस है कि यहा पर यह जो चमत्कार के संदर्भ में जो पोस्ट आ रही थी वह अब थोडे दिनो स्थगित करने पडेगी। हुआ यह के, पहले यह बतादु की आपकी तरह मेरे और भी मित्र है जो मेरी पुस्तके पढते है तो जब में यह पुस्तक लिख रहा थी तब मेरे एक बहुत करीबी मित्र आये और उन्होने जबरजस्ती यह पुस्तक पढने के लिए ले गए। तो कुच दिनों के लिए आगेके अपडेट उस संदर्भ में देना थोडा मुश्किल होगा। पर में यहा पर एक नया thread रखना चाहुगा जो ऐसी है अन्य सत्य अनुभवो के आधार पर मेरे पास गुजराती में पु्स्तके है जो तंत्र मंत्र यंत्र और योग पर आधारित है जिससे हमे काफि लाभ होगा।
    कुच मित्रोने मुजे मेरी जीवन और साधना के बारेमें पुछा है पर उनको में यह अनुरोध करुगाँ की में एक सामान्य से सामान्य व्यक्ति हुं बस मेरे खोजी प्रवृत्ति है तो मेने एसी पुस्तके मेरे पास रख्खी है जो मेरे और मेरे जैसे मित्रो के अलावा और कोई नही पढता। अगला में नया thread कुच समय में यहा पर दे रहा हुं और यत्न करुगाँ की हररोज अपडेट दुं।

  2. #22
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    Bahut badhiya

  3. #23
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    Aage intezaar hai

  4. #24
    नवागत
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    Sir update plzzz

  5. #25
    नवागत
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    Sarji ahmedabad thi chu
    Mane aapustak athava to pdf ma hoy te aapso
    jaasthaent@live.com

  6. #26
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    Quote Originally Posted by Jayrudra View Post
    Sarji ahmedabad thi chu
    Mane aapustak athava to pdf ma hoy te aapso
    jaasthaent@live.com
    ।। જય શ્રી રામ ।।
    આ પુસ્તક ગુજરાતીમાં અમદાવાદના માર્કેટમાં ઉપલબ્ધ છે. તમે અમદાવાદમાં ક્યાં રહો છો તે કહો.

  7. #27
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    अजय जी काफी लम्बे समय से इस पर कोई अपडेट नही आया है | कृपया अपडेट दीजिये
    लोग मुझ पर हँसते है क्यों की मैं सबसे अलग हूँ, मैं उन पर हँसता हूँ क्यों की वो सब एक जैसे है |

  8. #28
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    Quote Originally Posted by Loka View Post
    अजय जी काफी लम्बे समय से इस पर कोई अपडेट नही आया है | कृपया अपडेट दीजिये
    धन्यवाद लेख पसंद करने के लिए। देखे कुच लेख मेरे पास पहेले से ही कोम्प्युटर मे टाईप किये हुए है तो उन्हे मैं यहा पर तुरंत रख सकता हुं। कुच पु्स्तके गुजराती में है उसे यहा पर रखने के लिए मुझे उसे टाईप करना पडता है। समय के अभाव में थोडा वक्त लकता है तो आपके अनुरोध और लेख पसंद आने पर मैं जल्द से जल्द उसे टाउप करके यहा पर रखने का यत्न करुंगा। में कभी भी कुच अच्छी चीज अगर मेरे पास आती है तो उसे पढना जीतना पसंद करता हुं उतना ही उसे दुसरो को देने के लिए लालइत रहता है यह मैंरा नैसर्गिक गुण है। पर क्या किया जाय आज कल बहुत ही कम लोग हे जो ऐसी पुस्तके पसंद करते है। मेरे घर में ही मेरे पुस्तके पढने वाला कोई नही है पुरी अलमारी भरी पडी है क्या किया जा सकता है पर जब भी कोई मुजसे पुस्तक के बारे में कहता है तो मुजे बहुत ही अच्छा लगता है और मैं उसे कोई लालच या कोई आशक्ति के बिगेर देने का यत्न करता हुं पर कुछ पुस्तके कोपीराईट के अंतर्गत होती है और कुच यहा पर रखने के लिए समय चाहिए तो थोडा मुस्किल है। खैर देके क्या होता है आगे..

  9. #29
    सदस्य Prasun's Avatar
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    Bahut hi dilchasp

  10. #30
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    ।। जय श्री राम ।। सभि मित्रो को।

    आगे की कहानि यहा पर देनें कि कोशिस करुंगां।

    जिसे उन्होंने “मोहनभाई” कहकर सम्बोधित किया था, उसने बैठे-बैठे ही, किन्तु जरा आगे सरकते हुए, अत्यन्त नम्रतापूर्वक हाथ जोड़कर कहा, “ आपकी कृपा से सब कुशल-मंगल है, बहन जी ”
    अम्बिकादेवी ने छत की ओर संकेत किया और मुस्करा कर कहा, “कृपा तो ईश्वर की है। हम पामर मनुष्यों के बूते में है ही क्या”

    इसी तरह के संवाद अम्बिकादेवी और श्रद्धालुओं के बीच चलते रहे। किसी को कोई व्याधि थी, किसी को कोई दुःख था, किसी को कोई आशंका या बाधा थई। अम्बिकादेव के पास सभी के दुःख-दर्द का कोई-न-कोई उपाय अवश्य था।

    महायोगिनी जी ने मेरे सिन्धी मित्र से पूछा, “क्यों साई, बहुत दिनों बाद पधारे ”
    “धन्धे में फँसा रहता हूँ, बहनजी, दुनिया के चक्कर ही ऐसे हैं कि...” सिन्धी ने बहुत नम्रता से कहा।
    “जब ऊपर वाले का बुलौवा आयेगा, तभी तुमहारे चक्कर पूरे होंगे, क्यों... तभी तुम्हे जरा फुरसत मिला करेगी, है न....”
    सभा में हास्य फैल गया। मेरी नजर में, यह संवाद इतना घिसापिटा था कि इसमें हास्य का कोई तत्व मैं चाहकर भई न खोज सका। महायोगिनी ने मेरी तरफ देखा भई न था। मेरे आसपास के, आगे-पीछे के लोगों से वह बातें करती जा रही थीं, किन्तु मेरी मौजूदगी को साफ नकार रही थीं। इस उपेक्षा ने मुझे अकुलाहट से सान दिया। मैंने वहाँ से उठ जाने की सोची और इसी गरज से सिन्धई मित्र का हाथ हौले से दबाया।

    सिन्दी मित्र मेरी तरफ भी देख भी न पाया थआ कि महायोगिनी जी का स्वर सुनाई दिया, “साई, अपने दोस्त से कहो कि अधीर न हों। मैं उनकी उपेक्षा नहीं कर रही। मुझे तो उनके साथ शान्ति से बैठकर बातें करनी है। इसीलिए पहले दुसरों को निबटा रही हूँ।”

    उस स्वर की शान्त और ठण्डी ताकत ने मुझे बर्फ की तरह जमा दिया। मैं स्तब्ध था। मेरे मन की बात उन्होंने, उतने फासले से भी, उतनी सही-सही कैसे पकड ली थी।
    मैं चुपचाप बैठा रह गया।

    मुझे लगातार अहसास मिलता रहा कि महायोगिनी के सामने मेरा मन किसी खुली किताब की तरह पडा हुआ है और वह उसके जिस पन्ने को चाहती है, खास उसी को पलटकर पढने लगती है मेरे चेतन-अवचेतन में भावना-विभावना की जो भी लहरें उठ रही है, उन सबको वह साक्षात देख सकती है।

    मुझे भय लगा। पूरे शरीर में मैंने झुरझुरी महसूस की।
    कुछ देर बाद अधिकांश लोग चले गये।

    केवल छः व्यक्ति शेष रहे। छः में से दो तो मैं और सिन्धी ही थे। शेष चार जनों में एक स्तरी थी। उसकी गोद में लगभग सोलह बरस का एक किशोर अधमरी-सी हालत में पडा हुआ था।
    मेरा ध्यान किशोर पर पहली बार ही गया, हालाकि मैं वहाँ उतनी देर से बैठा हुआ था।
    “उसे मेरे सामने सुला दीजिए” महायोगिनी ने किशोर की ओर उँगली उठाकर उस स्त्री से कहा।

    नरकंकाल हो चुके उस किशोर का पूरा बदन जकड़ा हुआ था। शरीर का कोई हिस्सा लेशमात्र भी हरकत नहीं कर रहा था।
    साथ आये दो पुरुषों ने जब किशोर को उठाकर हायोगिनी के सामने सुलाया, तब भी वह अपने तमाम अंगो को सिकोड़कर ऐसे पडा रहा, जैसे बेजान डालियों को आडा-टेढा रख दिया गया हो। उसके चेहरे के भी सारे स्नायु खिंचे हुए थे। किसी भई मनोभाव को व्यक्त करना उस चेहरे के लिए सम्भव था ही नही। यदि किशोर की पुतलियाँ स्तब्ध भाव से इधर-उधर, लगातार, हिल न रही होतीं, तो

    क्रमशः......

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