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Thread: Pakhandi baba

  1. #1
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    Oct 2012
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    पाखंडी बाबा

    ये दुनियाँ चमत्कारों के पीछे भागती है लेकिन वो चमत्कार कैसे होते है ये समझती ही नही । उसके चक्कर में आर्थिक और दैहिक शोषण भी कर लेते है ये लोग
    फर्रुखाबाद के पास एक गाँव नगला दीना में एक विधवा जानकी देवी रहती थी उनका जीवकोपार्जन अपने पति की पेंशन से होता था । जानकी देवी एक गौरवर्ण और आकर्षक व्यक्तित्व की महिला थी । दूसरी महिलाओं के मुकाबले ज्यादा बातें करती थी और खुद को बहुत सभ्य और समझदार महिला समझती थी । वो अक्सर अपने शरीर की बीमारियों से दुखी रहती थी । उनके बड़े बेटे जनमेश को भी टीवी हो गया था । अपनी इकलौती बेटी रश्मि की शादी कर चुकी थी । वो कुछ ज्यादा ही धार्मिक किस्म की महिला थी । बिना नहाए खाना नही बनाती थी ,बिना पूजा -अर्चना किये भोजन नही करती थी , नल को नार बार धोकर पानी निकालती थी और कभी भी रखे हुए वासी पानी या भोजन को नही खाती थी ।
    उसी गाँव में एक लड़का सत्यपाल अपने मालिक अनुरागी जी महाराज के यहाँ पर भजन कीर्तन में ढोलक बजाया करता था । अनुरागी जी महाराज का आश्रम एटा के मलावन गाँव के पास था । जब सत्यपाल ने जानकी देवी को अपने चमत्कारी गुरु अनुरागी जी महाराज के बारे में बताया तो जानकी देवी का भी पूरा मन हुआ, कि वो भी गुरु अनुरागी महाराज जी से दीक्षा लेकर अपने कष्टों का निवारण करवाएगी । सत्यपाल ने पहले ही जानकी देवी के घर परिवार के बारे में गुरु जी को बता दिया था । जब जानकी देवी सत्यपाल के साथ मलावन के आश्रम में अनुरागी महाराज के पास गई तो गुरु जी ने समझ लिया कि आज सत्यपाल हमारे लिए एक बकरा फांसकर लाया है उन्होंने अंजान बनने की एक्टिंग शुरू कर दी । नमस्कार प्रणाम होने के बाद अनुरागी बाबा ने जानकी देवी और सत्यपाल को बैठने को कहा । फिर धीरे से जानकी देवी के जीवन के सुख दुख के बारे में कुछ बातें बताने लगा । उसने कहा कि जानकी जी आप सही समय पर हमारे पास आई हो अब आपके कष्टों को हम जल्द ही दूर कर देंगे । आपके घर पर कई बुरी आत्माओं का निवास है वो आपके शरीर में भी रहती है जल्द ही हम एक अनुष्ठान में आपकी इस खोखट को बाहर निकाल देंगे । अनुरागी ने जानकी देवी को सबसे पहले दीक्षा दी जिसके बदले में जानकी देवी ने अनुरागी बाबा को ₹2100/- दक्षिणा के रूप में दिए । सौभग्यवश कुछ दिनों में जानकी देवी के गिरते स्वास्थ्य सुधार आया तो उनकी अनुरागी के प्रति श्रद्धा और बढ़ गयी । अब तो उन्होंने अपने बड़े बेटे जनमेश को भी गुरु अनुरागी जी से ₹2100/- दक्षिणा देकर दीक्षा दिला दी । लेकिन उनके बेटे के स्वास्थ्य में कुछ भी ख़ास सुधार नही आया । उनका बेटा अपने गुरु अनुरागी के आश्रम को छोड़कर घर पर आ गया ।
    लेकिन जानकी देवी वहीं आश्रम में गुरु जी के पास रुक गयी । अपने गुरु के प्रति पूर्ण श्रद्धा रखते हुए अपने देवर की उम्र के गुरु की सेवा करने लगी । हालांकि वो एक विधवा थी इसलिए अपने पति की कमी भी उनको खलती थी । अब इसको उनका उस गुरु से विपरीत लिंग का आकर्षण समझिए या कुछ और ....जानकी देवी भी उस अनुरागी महाराज के प्रति आकर्षित होती चली गयी ।
    आश्रम में नियमानुसार अनुरागी महाराज अपनी महिला भक्तों के साथ ही लेटते थे । अपने अगल बगल में अनुरागी महाराज जवान महिला भक्तों को लिटाते थे और इसके बाद उम्रदराज महिलाओं को लिटाते थे ।
    बीमार जानकी देवी को अनुरागी ने बताया था कि किसी महिला के शरीर में वास कर रही बुरी आत्मा को निकालने के लिए मैं उसके शरीर में अपने शरीर की पुण्य-शक्ति का प्रवेश करता हूँ । पुण्य-शक्ति के प्रभाव से बुरी आत्माएं उस महिला के शरीर में दुबारा कभी बापस नही आ सकती है , वशर्तें उपरोक्त कर्म को गोपनीय रखा जाय ।
    अब जानकी देवी को लगा होगा कि वो उम्रदराज है गुरु जी अपनी पुण्य-शक्ति मेरे शरीर में भी अवश्य ही भेजेंगे । उनको लगने लगा था कि अब अनुरागी के सम्पर्क में आने से उनके कष्ट सदा के लिए खत्म हो जायेंगे । इसलिए वो दिन रात अनुरागी की शारीरिक सेवा करने लगी । कभी उसके पैर दबाती थी, कभी उनके शरीर की मालिश भी कर देती थी । इस तरह से जानकी देवी पूर्ण श्रद्धा से अपने गुरु की सेवा करती थी ।
    दुर्भाग्य/सौभाग्य से एक दिन शाम को एक युवा सेविका को अपने घर वापस जाना पड़ा तो उस रात जानकी जी को अपने गुरु जी के पास वाले पलंग पर लेटने का अवसर मिल गया । जब रात्रि में सभी लाइटें बन्द कर देने के बाद सभी महिलायें और युवतियां घुर्राते मारकर सो रही थी , तभी जानकी देवी ने अपने शरीर पर कुछ हलचल महसूस की और फिर उन्होंने अपने शरीर पर कुछ दबाव भी महसूस किया , उन्होंने जल्द ही समझ लिया कोई बुरी नियत से उनके पास आ रहा है । उन्होंने कपड़ो दाढ़ी और पगड़ी से ये अंदाजा तो लगा लिया था कि वो पुरुष कोई और नही अपने अनुरागी महाराज ही है । अब उन्होंने ये कन्फर्म करने के लिए धीरे से कहा "गुरु जी आप ?" तो गुरु जी ने कहा कि " हां जानकी देवी मैं ही हूँ आपका गुरु , लेकिन आप चुपचाप रहें आज आपके शरीर से दुष्ट आत्माओं को निकालकर पुण्य-शक्ति का प्रवेश करूँगा ।" जानकी जी तो थी ही भक्ति भाव में उन्होंने अपना शरीर एक पत्नी की तरह अपने अनुरागी महाराज को सौप दिया । अंत में जब अनुरागी जी का अनुष्ठान खत्म हुआ तो उन्होंने जानकी देवी से ये बात गुप्त रखने को कहा यदि ऐसा नही होगा तो उनके बड़े बेटे की मृत्यु हो जायेगी । अब जानकी जी पूर्ण श्रद्धा से अनुरागी जी को समर्पित हो गयी थी । उनकी हम-उम्र सहेली रज्जो दीदी भी जान चुकी थी कि जानकी का भी मेरी ही तरह अनुष्ठान हो चुका है अब वो दोनों आपस में घुल मिल गयी । बातों बातों में ही जानकी देवी को पता चला कि विधवा रज्जो दीदी के बेटों ने रज्जो दीदी को घर से निकाल दिया है अपने जेवर और पैसे रज्जो दीदी ने अनुरागी महाराज को दान कर दिए है अब आश्रम में खाना बनवाने की जिम्मेदारी उठा रही है । अनुरागी महाराज ने रज्जो से कहा कि अब आप अपना थोड़ा काम जानकी देवी को सौंप दे ताकि आप की थकान कम हो सके । जानकी जी अब भी पूर्ण श्रद्धा से अनुरागी महाराज की सेवा कर रही थी । एक दिन आश्रम में थोड़ी भीड़ कम थी तब अनुरागी जी ने सबके सामने जानकी को बुलाकर उनका हालचाल पूंछा तो जानकी जी ने सबको बताया कि अब मुझे गुरु जी के आश्रम में बहुत ज्यादा लाभ हो रहा है और जानकी देवी उठकर अंदर चली गयी । अब गुरु जी ने अपना सत्संग खत्म किया और अंदर कमरे में जहां पर जानकी जी पहले ही साफ़ सफाई कर रही थी । जानकी जी के पास में ही खड़े होकर अनुरागी ने कहा कि अब आप अपनी जमीन जायदाद और धन दौलत का मोह त्याग दो इसे दान करके हमेशा के लिए इस आश्रम में आकर रहने लगो । जानकी जी को ये बात समझ में नही आयी । उन्होंने जमीन जायदाद को दान करने वाली बात अपने दामाद लाल कुमार को बताई ,तो उनके दामाद ने उनको तुरन्त ही आश्रम को छोड़ने की सलाह दी । चूँकि जानकी देवी अपने दामाद पर पूरा भरोसा करती थी और सबसे ज्यादा उनको ही अपना हितैषी मानती थी । इसलिए वोे पैसे लाने का बहाना करके आश्रम छोड़कर अपने घर पर आ गयी ।
    कुछ दिनों बाद वे पुनः वापस आश्रम में चली गयी। अब उनकी जगह पर एक खूबसूरत महिला आश्रम की रसोई की देखभाल के लिए आ गयी । जानकी देवी को लगा कि अब अनुरागी जी उनकी तरफ कम ध्यान दे रहे है तो उन्होंने अनुरागी महाराज से अपनी गलती को जानना चाहा कि किस कारण से आपने मुझे रसोई जी जिम्मेदारी से हटा दिया है तब गुरु जी ने बताया कि आपने मेरी बात की अनदेखी की है । आपने अपने खेतों की रजिस्ट्री मेरे नाम नही की है इसलिए मैं आपसे अभी नाराज हूँ । जिस दिन आप ये काम कर दोगी उसी दिन आपको इस आश्रम में राजमाता का दर्जा मिल जाएगा और सभी भक्त आपकी दिन रात सेवा करेंगे । अब जानकी देवी समझ चुकी थी कि ये अनुरागी महाराज एक झूठा मक्कार और ऐय्यास ठग है जो सीधी साधी महिलाओं को अपनी बातों के चक्रव्यूह में फांसकर उनका शारीरिक और आर्थिक शोषण करता है । अब जानकी देवी दिन रात अपने गुरु की गतिबिधियों पर नजर रखने लगीं । एक दिन रात्रि में वो पेशाब करने के लिए उठीं तो उनको गुरु जी अपने पलंग पर नही दिखे । वो बाहर तीन अंजान व्यक्तियों से बातचीत कर रहे थे । जल्दी से जानकी देवी अपने जरूरी कार्य से निपटकर हाल में आकर सोने का नाटक करने लगी । थोड़ी देर में वो तीनो व्यक्ति उस हाल में आये और अँधेरे में ही अनुरागी के पलंग के पास लेटी हुई जवान चेलियों के बिस्तर में घुसकर उनसे शारीरिक सम्बन्ध बनाने लगे । सभी युवतियां ने यही सोंचकर उन व्यक्तियों को अपना शरीर समर्पित किया होगा कि आज उनके अनुरागी महाराज उनके शरीर में पुण्य-शक्ति को प्रविष्ट कर रहे है ।
    अब जानकी देवी अपने अतीत में ये सोंचते हुए खो गयी कि उनके अनुरागी महाराज जब उनके ऊपर अपने शरीर का वजन रखते थे तो किसी रात उनका वजन हल्का और किसी रात उनका वजन भारी क्यों हो जाता था। ... किसी रात अनुरागी बाबा की दाढ़ी महसूस होती थी तो किसी रात सफाचट...अब उनको समझ में आ गया था कि उनके साथ हर रात्रि अलग अलग मर्दों ने उनके शरीर का उपभोग किया है ! अब जानकी देवी को साफ साफ समझ में आ रहा था कि ये अनुरागी महाराज भडुआ है और हम सब औरतों को वैश्या की तरह बनाकर रखता है रात्रि में ग्राहकों को लाकर उनके लिए हम सभी सेविकाओं को परोसकर बदले में मोटी रकम लेता है । अब तो जानकी देवी इस नर्क से बाहर निकलना चाहती थी लेकिन अनुरागी महाराज उनको आश्रम से बाहर जाने नही दे रहे थे । परेशान होकर जानकी देवी ने अपने दामाद को फोन किया तब दामाद ने अनुरागी महाराज को पहले तो प्यार से समझाया जब वो नही माने तब उन्होंने पुलिस को लेकर आने की धमकी दी तो अनुरागी तुरन्त मान गया । अब जानकी देवी अपने गाँव में आ चुकी थी । लेकिन उन्होंने अपने साथ घटित हुई घटना किसी को नही बताई ।
    जब दामाद और बेटी अपनी माँ जानकी देवी से मिलने आये तब उनकी बेटी ने भी कहा कि माँ जी हमे भी अनुरागी महाराज से दीक्षा लेनी है तो जानकी देवी बिफर कर रोने लगी उन्होंने कहा कि बेटी आश्रम में जाने से कोई फायदा नही है । अनुरागी के आश्रम में बहुत गलत लोग आते है ।
    इसलिए मैंने उस आश्रम और अनुरागी महाराज को हमेशा के लिए छोड़ दिया है अब वो मेरे गुरु नही है । अब मैं खुद ही अपनी गुरु बनूंगी । और किसी भी तरह के अन्धविश्वास और पाखण्ड को नही मानूँगी ।
    जब बेटी द्वारा गहराई से पूंछताछ की गयी तब जानकी जी ने अपने बेटी को सिर्फ इतना बताया कि उन्होंने अनुरागी महाराज को अब तक कुल ₹60000/- दक्षिणा के रूप में दे दिए है और वो हमारी जमीन की रजिस्ट्री भी अपने नाम करवाने की कोशिस में लगे थे । बेटी ने जब कहा कि माँ जी चलो हम अनुरागी बाबा के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज करेंगे । तो जानकी जी ने अपनी तमाम बातें खुल जाने और परिवार की बदनामी हो जाने का हवाला देते हुए मामले को भूल जाने की बात कहते हुए रिपोर्ट लिखवाने से मना कर दिया ।
    अब जानकी देवी अपने मन में ठान चुकी थी कि अब किसी भी ढोंगी पाखंडी के झांसे में नही आएगी ।
    धीरे धीरे उन्होंने अपने गाँव के सभी लोगों को अनुरागी के आश्रम के पीछे औरतों का धंधा करने वाली बात बता दी ताकि दूसरी औरतों का उसकी तरह से बाबा शोषण न कर सकें । कुछ दिनों बाद पता चला वो अनुरागी बाबा भी एक सड़क दुर्घटना में खत्म हो गया था।
    कुछ साल बाद जानकी देवी ने अपनी कहानी अपनी बेटी रश्मि को भी बता दी थी । और अपनी बेटी को भी ऐसे पाखण्डियों से दूर रहने की सलाह दे दी ताकि उनकी बेटी रश्मि को कोई पाखंडी ठग अपने जाल में न फांस सके ... ये कहानी एक सच्ची घटना पर आधारित है ।
    Last edited by hindi9; 13-04-2018 at 10:22 AM. Reason: Spelling mistake

  2. #2
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    Aaj kal aise logo ki bharmaar hai

  3. #3
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    नमस्कार , आपसे एक सलाह लेना चाहता हूँ , उचित समझें तो सहायता कीजिए..........लगभग 30 वर्ष पहले की बात है........मेरे चाचा जी अपने परिवार सहित कहीं घूमने गये थे............हम लोग भी साथ थे..............जहाँ हम लोग गये थे , वो स्थान तो अब ध्यान नहीं पर जंगल जैसा इलाक़ा था........वहाँ एक साधु था जो की काफ़ी उम्रदराज़ था..........मेरे चाचा और अन्य लोग घूमते - फिरते इधर -उधर निकल गये थे.........मेरी चाची , उनका लड़का जिसकी उम्र लगभग 5 से 7 साल की होगी और मैं पीछे एक साथ रह गये थे.........काफ़ी देर तक हम चाचा जी का इंतज़ार करते रहे फिर उन्हें खोजने चल दिए..........यहाँ - वहाँ उन्हें तलाशा पर वो नहीं मिले........हम लोग वहीं रुक कर उनका इंतज़ार करने लगे............तभी वो साधु वहाँ आया और हमें कहने लगा की चाचा जी दूसरी तरफ घूम रहें हैं मेरे साथ आओ मैं उनके पास ले चलता हूँ.........हम लोग थोड़ा सकपकाए पर देर हो रही थी तो हिम्मत कर के साधु के साथ हो लिए.........थोड़ी दूर जा कर वो साधु एक पेड़ के पास रुक गया और चाची जी को बोलने लगा की इधर आओ.......चाची जी उस पेड़ के पास चली गईं..........तब उस साधु ने चाची जी को कहा की इस पेड़ को हाथ लगाओ.........चाची जी पेड़ को हाथ लगाने ही वाली थीं की तभी उनके बेटे ने जो की 5 से 7 साल का था , उसने चाची जी का हाथ झटक कर अपना खुद का हाथ उस पेड़ पर लगा दिया , जैसे ही बच्चे ने पेड़ को हाथ लगाया........तुरन्त उस साधु ने बच्चे के हाथ को तेज़ी से हटा दिया.........ये सब कुछ बहुत तेज़ी से हुआ.........यह देख कर उस साधु ने बेहद गुस्से में चाची जी के बेटे को देखा.......ये कहिए घूर के देखा........और तुरन्त हम सब को वहीं छोड़ कर कहीं चला गया........बड़ा ही तमतमाया हुआ.......गुस्से में........हम लोग भी वहाँ से निकल गये.........यहाँ एक बात जो मैं आपको बताना चाहता हूँ वो ये की मेरे चाचा जी की मेरी चाची जी से बनती नहीं थी..........कारण चाचा जी शराब के काफ़ी शौकीन थे और चाची जी को ये सब पसंद नहीं था........तो अनबन होती रहती थी...........इस घटना को काफ़ी साल हो गये पर किस्सा आज भी ताज़ा है........अभी हाल ही में किसी जानकार से मुलाकात हुई थी.........उसने एक बात कही........उसने चाचा जी के उस लड़के को देखकर बताया की उसके साथ कोई चीज़ लगी हुई है......और वो चीज़ तो महिलाओं पर लगाई जाती है.........उस जानकार ने ज़्यादा तो कुछ नहीं बताया पर इतना कहा की ये चीज़ जो इसके साथ लगी है वो औरतों के लिए की जाती है शायद ग़लती से इस पर लग गई होगी..........पर चीज़ किसी औरत के लिए थी........साधु वाली बात हमनें उस जानकार को बिल्कुल भी नहीं बताई थी...........किसी भी बात का कोई ज़िक्र तक नहीं किया था.........पर मन में एक विचार आया की इस बात का ताल्लुक कहीं सालों पुरानी उस साधु वाली घटना से तो नहीं.............कृपया अपने विचार बताएँ |

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