Results 1 to 5 of 5

Thread: जिसे मन कहते हैं

  1. #1
    नवागत devar_ji's Avatar
    Join Date
    May 2016
    प्रविष्टियाँ
    8
    Rep Power
    0

    जिसे मन कहते हैं

    ये बङा साधारण सा लगने वाला प्रश्न लगता अवश्य है पर है नहीं . आप विचार करे कि मन शब्द का प्रयोग पूरे विश्व में होता है .लेकिन ये कोई नहीं जानता कि मन आखिर है कहाँ किसको मन कहा जाता है .हमारे शरीर में उसकी क्या और कहाँ स्थिति है . तो लोग अक्सर सिर की तरफ़ इशारा करते हैं और कोई कोई दिमाग या दिल को मन बताते हैं यह दोंनों ही बात गलत हैं और ये एक आश्चर्यजनक सत्य है.

    वर्तमान मेडीकल सांइस में जितनी खोज हो चुकी है उसके आधार पर कोई भी अभी भी नहीं बता सकता कि मन आखिर है क्या और हैं कहाँ .हांलाकि इस तरह की बात कहना उचित नहीं है फ़िर भी आगामी सौ साल बाद , हजार साल बाद भी ये प्रश्न का उत्तर ज्यों का त्यों ही रहेगा .

    आज मान लीजिये कि नासा के प्रोजेक्ट देख कर संसार हैरत में है और नासा का सबसे बङा मिशन है . ऐसे किसी दूसरे ग्रह की तलाश जिस पर किसी भी प्रकार का जीवन हो या फ़िर हमारी तरह की मनुष्य सभ्यता वहाँ निवास करती हो . इस पर अरबों डालर का खर्च आता है .अब जरा आप बहुत लोकप्रिय पुस्तक तुलसी की रामायण का उत्तरकाण्ड खोलकर देंखे तो नासा की तमाम खोज तमाम प्रयास आपको बचकाने लगेगें . इसमें तुलसी ने काकभुसुन्डी के माध्यम से अनेको स्रष्टियों का वर्णन किया है .

    वास्तव में मन है पर वहाँ कहीं नहीं जहाँ हम समझते हैं . बुधि भी मन का ही दूसरा रूप है. बुधि मन का ही परिशोधित रूप है. मन जब कोई फैसला करता है तो उसे बुधि कहते हैं. चित भी मन का ही तीसरा रूप है. मन जब कल्पना करता है तो उसे चित कहते हैं. मन जब कोई कियृा करता है तो उसे अंहकार कहते हैं. तो इस जगत में या कहीं भी सारा खेल ही मन का है. लेकिन वास्तव में वो कया है जिसे मन कहते हैं.
    Last edited by devar_ji; 13-04-2018 at 04:50 PM. Reason: अषर

  2. #2
    नवागत crushh's Avatar
    Join Date
    Sep 2015
    Location
    new york
    प्रविष्टियाँ
    54
    Rep Power
    3
    बहुत से लोग इस गलतफ़हमी के शिकार हैं कि इस सृष्टि को ब्रह्मा ने बनाया है । आईये इसको भी जानते हैं । सात दीप । नव खन्ड के । इस राज्य का मालिक । निरंजन यानी ररंकार यानी राम यानी कृष्ण यानी काल पुरुष यानी मन है । यह सृष्टि निर्माण के बाद अपने आरीजनल रूप को गुप्त करके हमेशा के लिये अदृष्य हो गया । वास्तव में इसकी पत्नी और इसके तीन बच्चे ब्रह्मा विष्णु शंकर भी इसको अपनी इच्छा से नहीं देख सकते हैं । यह अपनी इच्छा से ही किसी को मिलता है । आपको याद होगा । राम अवतार के समय शंकर ने कहा था । हरि व्यापक सर्वत्र समाना । प्रेम से प्रकट होत मैं जाना ।
    तब भी इसकी सिर्फ़ आवाज ही आकाशवाणी के द्वारा सुनाई दी थी । वास्तव में यही राम कृष्ण के रूप में अवतार लेता है । और वेद आदि धर्म ग्रन्थ इसी की प्रेरणा से रचे गये हैं । वेदों को तो इसने स्वंय रचा है । सारे धर्म ग्रन्थों में यही संदेश देता है । इसकी पत्नी अष्टांगी कन्या यानी आध्या शक्ति यानी सीता यानी राधा यानी ब्रह्मा विष्णु शंकर की माँ यानी प्रकृति यानी सृष्टि की पहली औरत है ।
    Last edited by crushh; 13-04-2018 at 04:55 PM. Reason: मिसटेक

  3. #3
    वरिष्ठ सदस्य
    Join Date
    Jun 2016
    Location
    Ahmedabad, Gujarat.
    प्रविष्टियाँ
    681
    Rep Power
    2
    बहुत ही अच्छी व्याख्या की गई है यह पर मन की। वेदांत के नजरीये से कहा जाय तो मन नाम की कोई वस्तु ही नही है, वह मात्र एक आभास है। जब शरीर-बुद्धि-अहंकार सयुक्त होते है तब एक उर्जा का निर्माण होता है वह उर्चाका नाम चित्तशक्ति कहलाता है। यह शक्ति का पर्यायवाचि शब्द ही मन के नाम से संसार में जाना जाता है। हालाकि मन और आत्मा दो अलग अलग नही है, जबकी वह अलग अलग दिखते जरुर है। जब आत्मा निष्किर्य, निर्लिप्त अवस्था में रहता है तब उसे आत्मा कहते है और जब वह सक्रिय रहता है तब उसे मन कहा जाता है। जब आत्मा शरीर-बुद्धि-अहंकार को स्विकार करता है उससे आश्कत रहता है तब वह मन कहलाता है अन्यथा वह सिर्फ निराकार, निगुण आत्मा ही होता है। शरीर, बुद्धि, संसार यह सब चित्तशक्ति का हि परिणाम है जो आत्मा की नीजकी शक्ति कहलाती है। आश्कति के कारण ही आत्मा अपनी शक्ति का उपयोग करके यह सब सृष्टि रचता है और एक समय ऐसा आता है जब वह आशक्ति रहीत हो कर सर्वव्यापक परमात्मा में लिन हो जाता है। परमात्मा और आत्मा एक ही है पर विभिन्न आश्क्तिओं के कारण मन-चित्त बहुतरे दिखते है और वह अपना अपना संसार निर्माण कर मनोनाश होने तक उसमें आत्मा को खिचकर बाधित करते रहते है। यह सिर्फ मेरी समज है हालाकि ज्ञानिलोग उसमें कुच प्रकाश डाल सकते है जो सब के लिए लाभदाई हो सकता है।

  4. #4
    कर्मठ सदस्य prem_sagar's Avatar
    Join Date
    Apr 2016
    प्रविष्टियाँ
    1,125
    Rep Power
    4
    वाह मित्र ,,,,, मन की अद्भुद एवं सटीक व्याख्या की है आपने !

    मेरा मानना है की , " मन और कुछ नहीं ,, वरन, आत्मा की "भौतिक" अभिव्यक्ति ही है !

    यहाँ भौतिक शब्द पर गौर करना आवश्यक है ! हम जानते है की विभिन्न योनिया आत्मा एवं पदार्थो के विभिन्न अनुपात से संलयन से बनाती है ! आत्मा के जन्मजन्मान्तर के पोषित गुण दोषों , निर्माण यौगिको के प्राकृतिक वृतियो एवं जन्म के प्रारंभिक संकारो के मेल से आत्मा की भौतिक अभिव्यक्ति " मन "का प्रारंभिक निर्माण होता है ! और आगे ये कर्म फल के हिसाब से विकसित या विकृत होता जाता है !

    इसके साथ ही एक अन्य अवयव भी जन्म लेता है " विवेक " ,,,, जिनके प्रारंभिक जनक सिर्फ आत्मा के जन्मजन्मान्तर के पोषित गुण दोषों ,एवं जन्म के प्रारंभिक संकार होते है ! यह भी आगे कर्म फल के हिसाब से विकसित या विकृत होता जाता है !

    पुण्य आत्माओ का प्रारंभिक संस्कारों से सिचित विवेक , सद्कर्मो की राह पर बड़ता शक्तिशाली होकर मन पर विजय प्राप्त कर उसे भी अपने साथ विकसित कर सकता है !

    उसी प्रकार , मन के निर्माण में भौतिकता के समावेश से आने वाली उदंडता , अविकसित विवेक को कुचल कर मन एवं विवेक दोनों को विकृत कर सकता है !

    कृपया ध्यान दे ,,,, एक साधू ( सज्जन ) मनुष्य का मन सदा ही करुणा , दया ,,, दूसरो की सहायता एवं भक्ति के भावो से भरा रहता है ,,, वही दूसरी तरफ एक दुष्ट मनुष्य का मन धोखा , परिपीडा , लूट खसोट ,, एवं हिंसा के भावो से भरा रहता है !
    अंतर कहा आया ,,,, दोनों मनुष्य ,,, यौगिक भी एक सामान ,,,
    अंतर था की एक के विवेक ने उसके मन को भी विकसित कर रखा है ,,,,
    दुसरे का मन एवं विवेक दोनों ही वीकृत हो चुका है !
    ,,,,प्यार बाँटते चलो ,,,,

  5. #5
    वरिष्ठ सदस्य
    Join Date
    Jun 2016
    Location
    Ahmedabad, Gujarat.
    प्रविष्टियाँ
    681
    Rep Power
    2
    Quote Originally Posted by prem_sagar View Post
    वाह मित्र ,,,,, मन की अद्भुद एवं सटीक व्याख्या की है आपने !

    मेरा मानना है की , " मन और कुछ नहीं ,, वरन, आत्मा की "भौतिक" अभिव्यक्ति ही है !

    यहाँ भौतिक शब्द पर गौर करना आवश्यक है ! हम जानते है की विभिन्न योनिया आत्मा एवं पदार्थो के विभिन्न अनुपात से संलयन से बनाती है ! आत्मा के जन्मजन्मान्तर के पोषित गुण दोषों , निर्माण यौगिको के प्राकृतिक वृतियो एवं जन्म के प्रारंभिक संकारो के मेल से आत्मा की भौतिक अभिव्यक्ति " मन "का प्रारंभिक निर्माण होता है ! और आगे ये कर्म फल के हिसाब से विकसित या विकृत होता जाता है !

    इसके साथ ही एक अन्य अवयव भी जन्म लेता है " विवेक " ,,,, जिनके प्रारंभिक जनक सिर्फ आत्मा के जन्मजन्मान्तर के पोषित गुण दोषों ,एवं जन्म के प्रारंभिक संकार होते है ! यह भी आगे कर्म फल के हिसाब से विकसित या विकृत होता जाता है !

    पुण्य आत्माओ का प्रारंभिक संस्कारों से सिचित विवेक , सद्कर्मो की राह पर बड़ता शक्तिशाली होकर मन पर विजय प्राप्त कर उसे भी अपने साथ विकसित कर सकता है !

    उसी प्रकार , मन के निर्माण में भौतिकता के समावेश से आने वाली उदंडता , अविकसित विवेक को कुचल कर मन एवं विवेक दोनों को विकृत कर सकता है !

    कृपया ध्यान दे ,,,, एक साधू ( सज्जन ) मनुष्य का मन सदा ही करुणा , दया ,,, दूसरो की सहायता एवं भक्ति के भावो से भरा रहता है ,,, वही दूसरी तरफ एक दुष्ट मनुष्य का मन धोखा , परिपीडा , लूट खसोट ,, एवं हिंसा के भावो से भरा रहता है !
    अंतर कहा आया ,,,, दोनों मनुष्य ,,, यौगिक भी एक सामान ,,,
    अंतर था की एक के विवेक ने उसके मन को भी विकसित कर रखा है ,,,,
    दुसरे का मन एवं विवेक दोनों ही वीकृत हो चुका है !
    उपरोक्त तीनों व्याख्या से आपकी व्याख्या अधिक सटिक लगती है। पर क्या करें जानते हुए की मन का कोई अस्तित्व न होते हुए भी उसी में उल्झे रहते है कई जन्म-जन्मांतरों से हम। विवेक की बात कहकर आपने उससे छुटने का एक उपाय जरुर बतला दिया है आपने पर सदगुरु के सतसंग के बिना यह संभव नही लगता।

Thread Information

Users Browsing this Thread

There are currently 1 users browsing this thread. (0 members and 1 guests)

Bookmarks

Posting Permissions

  • You may not post new threads
  • You may not post replies
  • You may not post attachments
  • You may not edit your posts
  •