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Thread: परलोक की रुप-रेखा

  1. #71
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    सुबह थोड़ी सी नींद लगी थी तो फिर मुझे लगा कि कोई हिला रहा है..पहले तो किसी ने हल्के से हिलाया-डुलाया..मैं तो मन ही मन डर के मारे कांपने लगा..थोड़ी देर में कोई जोर-जोर से मुझे हिलाने-डुलाने लगा..अब तो बंद आंखों में ही अजीब-अजीब से नजारे दिखने लगे। जब जोर से धक्का पड़ा तो हड़बड़ा कर उठ बैठा..देखा कि मां बगल में खड़ी हैं.. जो उठाने का प्रयास कर रही थीं..धूप सीधी आंखों में आ रही थी..लगा कि दोपहर सी हो गई है। मां बोली-कितना सोओगे..उठो..धूप निकल आई है। मेरी हालत ये थी कि उन्हें भी देखकर डर सा महसूस हो रहा था..आंखों को फाड़-फाड़ कर देख रहा था कि मां ही है..लेकिन भीतर ही भीतर आगे-पीछे खिसकती चारपाई नजर आ रही थी और मन में अंधेरी रात अब भी छाई हुई थी। खैर..थोड़ी देर बाद सामान्य हुआ..और दिनचर्या शुरू हुई।

    चाय-नाश्ते के बाद हम खेत की ओर मटरगश्ती के लिए चले..बगल के दरवाजे से ही एक पगडंडी बनी हुई थी..दांयी और जाने पर सड़क पर पहुंचते थे और बांयी ओर का रास्ता खेत की ओर..सटा हुआ खेत..आधा किलोमीटर की पगडंडी के बाद कुआं तक पहुंचे। जो हमारे लिए पिकनिक स्पाट जैसा था..पानी खींचने के लिए चारों और रहट लगा था..बैठने के लिए पत्थर की छोटी-छोटी चट्टानें..पानी का कल-कल कर छोटी सी नहर में खेत की ओर जाना..चारों और पेड़-पौधे…आसपास बड़े-बडे़ खेत…रह-रह कर रात की बात याद आ रही थी लेकिन न तो किसी से कहने की हिम्मत हुई.. न ही समझ में आया कि रात क्या हो रहा था..चारपाई कौन हिला रहा था..धीरे-धीरे खेलने में मस्त हो गया..और रात का खौफनाक मंजर यादों से हटने लगा। पत्थर पर बैठा पानी में छोटे-छोटे पत्थर फेंक रहा था..बड़ा मजा आ रहा था..तभी पानी में देखा कि कुछ काला सा रेंग रहा है..पानी के भीतर कभी छोटा-कभी मोटा..कभी गोल मोल और जब उसने पूरी लंबाई दिखाई तो लंबी सी चीख निकल गई..काला नाग पानी में मानो नहाने का मजा ले रहा हो..जैसे ही चीखा..दूसरी ओर खड़े पिता दौड़े..जैसे ही उन्होंने मेरी आंखों को एकटक देखा तो समझ गए..बोले..बेटा घबराओ नहीं..यहां तो ऐसे जीव कदम-कदम पर बिखरे हैं..लेकिन उन्हें छेड़ना मत..अपने आप निकल जाएंगे। पिता जी शुरू से गांव में रहे थे..बड़े ही साहसी और जीवट वाले थे..मेरा एक हाथ पकड़ गए कुएं के पास ले गए..बोले झांक कर गौर से देखो..कुएं का नजारा देखकर तो मेरी घिग्घी ही बंध गई..जितनी बार गौर से देखूं..अजीब-अजीब सी हलचलें..एक नहीं दो नहीं…जितनी बार देखूं..अलग-अलग सांप..मेढक..लगातार पानी में होती हलचल…पानी की ऊंची-नीची होती लहरें…पिता जी ने समझाया..बेटा..सैकड़ ं जीव-जंतु कुएं में..खेत में..पेड़-पौधों के आसपास मिलेंगे…इनके बिना हमारा जीवन भी संभव नहीं..यही है प्रकृति का असली नजारा..
    थोड़ी देर में नहा-धोकर हम वापस पगडंडी से हवेली की ओर रवाना हुए…अचानक खेत के दूसरी ओर दूर नजर गई तो देखा उड़ती हुई धूल का गुबार..ऊंचाई तक जाता हुआ..निगाह जब उस पर ठहरी तो लगा कि लंबे से शख्स जैसी आकृति..पूरा शरीर..और गुबार लगातार ऊंचा होता हुआ…इतना ऊंचा होता चला गया कि देखने के लिए गर्दन ऊंची करनी पड़ी..आकृति ऊपर की ओर जाती हुई..और नीचे धूल से बने हुए पैर…पैर लगातार लंबे होते चले जा रहे। रात का जो डर अभी निकला ही था कि ये आकृति देखकर फिर हालत खराब…देखा कि आकृति आसमान की ओर विलीन हो गई..पैर इतने लंबे होते चले गए कि कई मंजिला फ्लैट छोटे पड़ जाएं…एक मिनट में तेजी से बनी आकृति विलीन हो गई..पैर लंबे होते होते आसमान में इतने ऊंचे निकल गए कि पता ही नहीं चला….जब तक पिताजी को इशारा करने की सोचता… तब तक धूल के गुबार का और उस आकृति का नामोनिशान नहीं था..अब फिर उस गुबार और रात के खौफनाक मंजर में उलझ गया। मन अच्छा हुआ था कि अचानक शरीर में सिहरन सी दौड़ने लगी थी..जैसे-तैसे घर तक पहुंचा…और फिर भाई-बहनों के साथ उछल-कूद में मस्त हो गया। जैसे ही शाम होने को आई..फिर खिसकती चारपाई की याद आने लगी…दूसरी रात कैसे निकली…क्या पहले दिन वहम हुआ था..या फिर हकीकत में कोई था

  2. #72
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    दूसरे दिन शाम फिर ढलने को थी…सूरज आसमान में छिपता जा रहा था और अंधेरा पसरता जा रहा था। देखता हूं कि तभी दूर से एक परछाईं सी उभर रही है..जमीन पर आंखें झुकाए..सूरज की धीमी रोशनी में परछाईं लबीं होती जा रही थी..इस गांव के..इस हवेली के अजब नजारे देख मुझे समझ में नहीं आ रहा था कि ये भी एक दुनिया है..परछाईं आगे की ओर खिसकती जा रही थी..डर भीतर समा रहा था..दिख कोई नहीं रहा..फिर ये साया किसका लंबा हो रहा है..और आगे की ओर जा रहा है..तभी देखता हूं कि पिता जी कमरे से बाहर निकल रहे हैं..और परछाईं भी उन्हीं की है जो आगे की ओर जा रही है..चैन की सांस ली और मन ही मन डर के बाद मजा सा लगा। इतने में आंगन के एक कोने से दूर अचानक एक और आवाज गूंजी..फिर थोड़ी देर बाद एक और आवाज..मैं चौंक कर जिस ओर से आवाज आ रही थी.. उस ओर देखने लगा..तभी दादी ने बताया कि गाय की आवाज है..डरो मत..और फिर हाथ पकड़ ले गईं गाय दिखाने…
    आंगन में छोटे-बड़े पेड़-पौधे..सब कुछ एक आंगन में…कई सब्जियां लगी हैं..कई फल लगे हैं…अंधेरा बढ़ता जा रहा है..ठंडी-ठंडी पुरवाई चल रही है..मन आनंदित था लेकिन बीच-बीच में रात की चारपाई खिसकना..पानी में सांप का रेंगना..धूल के गुबार से बनती आकृति और फिर पिताजी का साया..कभी जानवरों की आवाज….लगा कि अलग ही दुनिया में आ गया हूं..कभी डर..कभी फन…लेकिन रात गहराते ही लालटेन की रोशनी में जैसे ही चारपाई पर लेटा..तो फिर पिछली रात की कहानी याद आने लगी। भाई के साथ लेटकर चादर तान ली लेकिन आंखों में नींद आने का नाम नहीं ले रही थी..कभी इस करवट..कभी उस करवट..थोड़ी सी आंखें खोलकर चारपाई का मुआयना कर रहा था कि कहीं हिल तो नहीं रही…अंदाजा लगा रहा था कि चारपाई अपनी ही जगह है या फिर आगे-पीछे हो रही है…तभी फिर लगा कि चारपाई हिली..डर बढ़ने लगा लेकिन पलट कर देखा तो भाई ने करवट ली थी और वो सो चुका था…धीरे-धीरे मेरी आंखें भी झपने लगीं…रात में एकदम सन्नाटा..अचानक कान के एक ओर से सन-सन करती आवाज..कभी आगे जाए..कभी पीछे…लगा कि कान के पास धीरे-धीरे कोई हल्की सी सीटी मार रहा था…पलकें ऊपर उठाऊं तो समझ में न आए कि आवाज कहां से आ रही है और कहां से जा रही है। रात बढ़ती जा रही थी और मेरी नींद फिर उड़ चुकी थी…अचानक फिर चारपाई के हिलने का अंदाजा सा हो रहा था..ठंडी पुरवाई में भी मुझे पसीना आना शुरू हो गया था…चारपाई धीरे-धीरे हिल-डुल रही थी..धीमे से करवट बदली और देखा कि भाई बेसुध लेटा हुआ है..फिर ये चारपाई कौन हिला रहा है..तभी लगा कि किसी ने मेरे शरीर को भी हिलाया-ढुलाया…मेरे सब्र का बांध टूट चुका था..डर को सहन करने की सीमा टूट चुकी थी..जोर की चीख मारी और चारपाई पर उठ बैठा..सामने नजर पड़ी तो देखा कि एक छोटे सी आकृति आंगन को पार करती हुई..गेट की तरफ जा रही है…पेड़-पौधे के झुरमुट में आकृति की एक झलक सी नजर आई और तेजी से लापता हो गई…मैं पसीना-पसीना था…चारपाई पर उठ कर बैठा था..बगल में बैठे भाई ने मुझे फिर चारपाई पर लिटाया और मैं कुछ कहता कि इससे पहले बोला कि चुपचाप सो जाओ..मेरी नींद मत खराब करो..न जाने कैसे-कैसे सपना देखता है..इतना कहकर खुद भी चादर तान कर लेट गया। ये रात कल की रात से भयानक थी..आज मुझे जो छोटी सी आकृति दिखी थी..उससे नींद तो कोसों दूर जा चुकी थी..ऊपर से नीचे आज भी रात भर चादर तानकर लेटा रहा।

  3. #73
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    लग रहा था कि ये हवेली अजीबोगरीब है। कभी अच्छा लगता तो कभी डर के मारे यहां से भागने का मन करता। गांव के माहौल में तालमेल बिठाना अजीब सा लग रहा था लेकिन हम गर्मियों की छुट्टियों में आए थे। इसलिए एक महीने तो यहीं रहना ही था। सुबह हुई तो रात की आकृति दिमाग में घूम रही थी..आज फिर देर से उठा। या समझो उठाया गया। जब भाई-बहन के साथ खेलने में मशगूल रहता था तो रात भूल जाता

    आज फिर फिर खेत के कुएं की ओर पगडंडी पर रवाना हुए। तो दूर से फिर वही छोटी से आकृति आंखों के सामने घूमने लगी। लगा कि वो आकृति हमारे पास आ रही है। फिर आंखों से ओझल हो जाती। फिर लगता कि आकृति और पास दिख रही है। आंखों को मलता हुआ अपने भ्रम को दूर करने की कोशिश में चुपचाप भाई-बहन के पीछे-पीछे चला जा रहा था। तभी देखता हूं कि आकृति बहुत ही पास से दिख रही है। मुझे अब घबराहट सी होने लगी। कभी सोचता कि क्या वाकई वही आकृति है जो रात को देखी थी,या फिर उससे अलग, मैं चल तो आगे की ओर रहा था लेकिन निगाहें खेत के एक ओर जमी हुई थी, जहां से आकृति पास आते दिख रही थी। आकृति छोटी सी थी मुझसे भी आकार में थोड़ी सी छोटी लेकिन स्पष्ट नहीं दिख रहा थाजैसे-तैसे कुएं के तक पहुंचा तो देखता हूं कि आकृति वहां भी दिख रही हैआंखों पर यकीन ही नहीं हो रहा था। समझ में नहीं आ रहा था कि ये आकृति वाकई है या फिर मैं रात के अंधेरे में जाती आकृति को ही देख रहा हूं जब मेरा भाई ध्यान बंटाता तो मैं फिर उससे बात करने के व्यस्त हो जाता, प्रकृति के नजारों को महूसस करने लगता लेकिन फिर उसी तरफ निगाहें लौटाता तो आकृति लगता कि चली आ रही है। हांलाकि पास नहीं आ रहीऐसा लग रहा था कि फिर दूर से आ रही है और पास आते ही नजरों से ओझल हो जा रही। बार-बार ऐसा होते देख फिर मेरी हालत खराब हो रही थी। बार-बार सोचता कि उस ओर देखना ही नहीं है लेकिन मन नहीं मानता और फिर उसी ओर निगाह जातीऐसा काफी देर तक चलता रहा। अभी तक रात का डर निकला नहीं था कि अब खेत और कुएं पर आने पर भी डर लग रहा था। समझ में नहीं आ रहा था कि किससे कहूं, क्या कहूं, जैसे-तैसे अपने बड़े भाई को चुपके से बोला कि देखो उस तरफ वो कौन आ रहा है। भाई ने देखा तो देखता रह गया और बोला कि किसकी बात कर रहे हो। वहां तो दूर-दूर तक कोई नहीं दिख रहा।

    भाई बोला चलो पेड़ पर चढ़ते है। पास में ही लगे अमरूद के पेड़ पर चढ़ने की कवायद शुरू हुई। भाई बोला पहले तुम्हें चढ़ाता हूं। उसने मुझे सहारा देखकर चढ़ाना शुरू किया। मैं ऊपर पहुंचा और दो टहनियों के बीच जगह देखकर बैठ गया। हाथ से दोनों टहनियों को पकड़ लियानीचे से भाई भी चढ़ना शुरू हुआ। जैसे ही मैंने दूसरे पेड़ पर नजर दौड़ाई तो देखा कि कुछ ही दूर दूसरे पेड़ पर वही छोटी सी आकृति बैठी हुई है और हिल-डुल रही है। कभी दिखती तो कभी गायब हो जाती। ऐसा मंजर न कभी देखा था न सुना था। चंचल मन शांत हो चुका था। घबराहट में हाथ-पैर कंपकंपाने लगे थे। तब तक भाई ऊपर चढ़ चुका था। लेकिन मैं इतना घबरा गया कि हाथ छूटे और नीचे गिरा धड़ाम से ज्यादा तो नहीं लगी लेकिन चुपचाप पत्थर पर जाकर बैठ गया। भाई भी नीचे उतर आया बोला ठीक से पकडना चाहिए था। बच गए नहीं तो ज्यादा चोट लग जाती। मुझे चोट का जितना ध्यान नहीं था। उतना उस पेड़ की ओर देख रहा था जहां आकृति नजर आई थी लेकिन अब नहीं दिख रही थी। खैर…थोड़ी ही देर में हम वापस हवेली की ओर लौटे लेकिन उस आकृति का रहस्य अंदर ही अंदर खाए जा रहा थाकभी रात का ध्यान आता तो कभी दिन में हवेली के बाहर दिखती आकृति का वो आकृति वाकई थी, या नहींअगर थी तो कौन थी।

  4. #74
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    पिछले पांच दिन अगर नहीं पढ़ें हों तो पहले पढ़ लो..क्योंकि आज की रात कयामत की है..आज फिर चारपाई वही थी..भाई भी वही था लेकिन मैंने अपनी चालाकी से चारपाई को बिलकुल बींचोंबीच खिसका कर ऐसा हिसाब किताब जमाया कि दोनों और से सुरक्षित रहूं…यही नहीं एक तरफ मां और दूसरी तरफ पिता जी की चारपाई…यानि चाक-चौबंद इंतजाम…अगर आप गांवों में रहे हों तो आपको पता होगा कि शाम ढलते ही कैसे वीरानी छाती हैं..अंधेरा पसरता है..और रोशनी को अपने साथ लेकर चलना पड़ता है…रात को जैसे ही चारपाई पर लेटा..बीती रात की डरावनी फिल्म हमारी आंखों में उतरना शुरू हो गई थी..साथ ही पेड़ की आकृति जेहन में छाई थी..कभी चारपाई और कभी पेड़ नजर आ रहा था..नींद उड़ी हुई थी….रात में जैसे ही सन्नाटा पसरा..आंखों को एक धागे जितना खोलकर करवट बदल रहा था कभी इस ओर देखता तो कभी दूसरी ओर…..

    ये क्रम चल ही रहा था कि देखा कि पिता जी की चारपाई के नीचे कोई बिंदी जितनी रोशनी जगमगा रही थी..मेरे होश फाख्ता…रोशनी जगमगा ही नहीं रही थी..आगे पीछे भी हो रही थी….जब मन में दहशत भरी हो तो हर चीज में संदेह ही संदेह नजर आता है। यही मेरे साथ हो रहा था..मैं रोशनी पर थोड़ी सी आंख खोले नजर गढ़ाए था..और रोशनी भी भरपूर डरा रही थी….थोड़ी देर में देखा कि रोशनी चारपाई से बाहर निकल गई। मेरी हिम्मत नहीं हुई कि उस रोशनी को देखने के लिए चारपाई से उठ कर बैठूं…
    खैर..रात पसरती जा रही थी…और मेरे दिल की धड़कनें भी…गहरा सन्नाटा था..आसमान में भी कालिमा सी छाई हुई थी…ऐसे में फिर वही एहसास शुरू हुआ..चारपाई कांपने लगी और साथ में मैं भी…दहशत चरम पर थी..लेकिन भय के साथ में ये जानना भी चाहता था कि वाकई ये क्या हो रहा है…तभी मैने महसूस किया कि किसी ने मेरे शरीर को हल्के से धकिया..अब मैंने करवट बदली और उसी ओर आंख खोलकर देखा तो एक छोटी सी गुड़िया जितनी आकृति खड़ी है और ऐसा लगा कि वही मुझे धक्का दे रही है..ये बच्ची जैसी आकृति बस बनती हुई दिख रही थी..तभी मैं उठकर बैठा तो देखा कि आकृति में हलचल हुई और फिर आंगन में बाहर की ओर तेजी से जाते दिखने लगी है.वो छोटी सी बच्ची जैसी आकृति कभी जमीन पर..तो कभी उससे ऊपर उठती..ऊपर नीचे होते ही ये छोटी सी बच्ची बाहर की ओर निकल गई…खासी ठंड में पूरे पसीने से तरबतर…फिर चादर ताना और सिर तक ढक लिया..लेकिन कभी लग रहा था कि वो छोटी सी बच्ची मेरी चारपाई के पास खड़ी है तो कभी लग रही है कि वो बाहर जा रही है..मेरे मानस पटल पर ये आकृति लगातार आगे-पीछे होती रही..पूरी रात ऐसी ही गुजरी..सुबह हुई…ये छोटी सी गुड़िया जैसी आकृति कौन थी…कल क्या गुल खिलाएगी ये आकृति..वापस आएगी या फिर नहीं

  5. #75
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    Bahut hi dilchasp

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