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Thread: खमोशिया.....एक प्रेम कथा

  1. #1
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    खमोशिया.....एक प्रेम कथा

    ये कहानी ही तो है जो हमें अपने आपको लोगों से अपनी भावनाएं शेयर करने का जरिया बना सकती हैं हर इंसान की जिंदगी की कहानी होती है किसी की कहानी खुशी से भरपूर होती है तो किसी की कहानी दुख से भरी हुई पर कहानी होती जरूर है खामोशियां एक कहानी है मोहब्बत की, जुनून की,तन्हाई की, तड़प की और एक एहसास अकेलेपन की....
    मौत को लोग यूहि बदनाम करते है तकलीफ तो जिंदगी देती है

  2. #2
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    3 साल हो चुके थे राजेश की शादी हुए पर इन 3 सालों में राजेश और पार्वती ने क्या-क्या दुख नहीं झेले।
    राजेश को नौकरी ना मिलना, पार्वती की गोद अभी तक सुनी थी।
    राजेश के मां-बाप रोज दोनों को इस चीज के लिए ताना दिया करते थे।
    राजेश के पिता किसान थे राजेश ने घर के खिलाफ जाकर इंजीनियरिंग की थी जबकि उसके पिता उसे किसान बनाना चाहते थे।

    रोज के लड़ाई-झगड़ों के चलते राजेश ने घर छोड़ दिया और एक किराने की दुकान मे नौकरी करने लगा।

    ऐसा नहीं था कि पार्वती गर्भवती नहीं हो सकती थी दो बार उसका गर्भपात हो चुका था
    भगवान से वो दोनों रोज इन दोनो ख्वाहिशों की मन्नत मांगते थे।

    कहते हैं भगवान के घर देर है अंधेर नही!
    पहले पार्वती गर्भवती हुई और जब उसका आठवां महीना आया तो राजेश को रेलवे में नौकरी मिल गई।
    ना चाहते हुए भी उस को पार्वती को छोड़कर जाना पड़ा।

    फिर आया इस कहानी का असली किरदार जिसने आकर पार्वती का नारीत्व पूरा किया "यश"।
    पार्वती की तो खुशी का ठिकाना ही नही था काफी दुखों के बाद पाया था उसको।

    कहते हैं जहां गुड वहां मक्खी जो मां बाप राजेश और पार्वती को ताना देते थे वो अब उनके गुण गाते नहीं थकते थे।
    जिंदगी रोशन करने आया था यश....

    राजेश तो काम में व्यस्त होता था पर पार्वती तो यश को ही अपनी जिंदगी मान कर चल रही थी।

    उसके नन्हें कदमों ने उसकी जिंदगी जो पूरी की थी।
    भूरी आंखों वाला यश अपने ननिहाल का भी लाड़ला था।
    उसका ननिहाल भी उसी शहर में था जहां राजेश की पोस्टिंग हुई थी।
    उसके ननिहाल में उसके नाना-नानी और मामा-मामी थे।
    उसकी मामी उसे अपने बेटे की तरह मानती थी पर उसके मामा उससे थोड़ी दूरी बनाकर रखते थे।
    यश के मामा उसकी मां से छोटे थे और यश के होने के 1 साल पहले ही उनकी शादी हुई थी और उनकी कोई संतान नहीं हुई थी।
    वक्त बीतता गया और अब यश बड़ा हो गया था और उसकी मामी ने एक लड़की को जन्म दिया और उसका नाम उन्होंने दृष्टि रखा।
    हॉस्पिटल में दृष्टि को देखकर उसने अपनी मां से पूछा कि ये कौन है तो उसकी मां ने बताया कि ये परी है और तुम्हें इसका ख्याल रखना है।
    यश खामोश खड़ा था पर उसके दिल में ये बात घर कर गई कि उसको दृष्टि का ख्याल रखना है।
    और यहीं से शुरुआत हुई एक प्यार की कहानी की।
    खामोशिया!!!
    मौत को लोग यूहि बदनाम करते है तकलीफ तो जिंदगी देती है

  3. #3
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    जैसे जैसे समय बीतता जाता था वैसे वैसे पार्वती का प्यार अपने बेटे यश के लिए बढ़ता जा रहा था उसके बाद उसकी कोई औलाद नहीं थी शायद ये कारण भी था कि वो उसको पागलों की तरह प्यार करती थी।

    उधर यश की मामी ने एक और लड़की को जन्म दिया उसका नाम उन्होंने नेहा रखा।

    वैसे तो दृष्टि घर में सबकी लाडली थी पर यश उससे सबसे ज्यादा प्यार करता था।

    दृष्टि भी उसका साथ नहीं छोड़ती थी उसका एडमिशन भी यश के स्कूल में करवाया गया था।
    पहले दिन वो स्कूल ना जाने के लिए रो रही थी पर जब उसने यश को गेट पर देखा तो उसका हाथ पकड़कर खुशी-खुशी अंदर चली गई।
    यश भी कोई मौका नहीं छोड़ता था स्कूल मे उससे मिलने का....
    लंच ब्रेक मे रोज उसके पास जाकर उसे टिफिन खिलाता....
    घर से उसके लिए चॉकलेट लाता....
    जान थी उसकी दृष्टि...
    उसे प्यार से दीशु बुलाता था।


    ऐसे ही दिन बीतते गए पार्वती यश की सारी इच्छाएं उसकी ख़ामोशी से ही जान देती थी।
    यश को कुछ भी चाहिए होता था तो वो अपने पिता के डर से कुछ बोल नहीं पाता था....
    पर मां का दिल अपने बच्चे की खामोशियों को भी जान लेता है...
    यश जब चुपचाप रहता तो वो उसको अपनी गोद में बैठा कर
    "क्या चाहिए मेरे लल्ला को" और यश उसे बता देता....
    बहुत निर्भर हो गया था यश अपनी मां पर।

    पर जब बात दृष्टि पर आती तो पूरे संसार की ताकत लगा देता....

    ऐसा ही एक वाक्या हुआ था....

    गर्मियों के दिन थे दोनो यश के घर खेल रहे थे पार्वती पड़ोस के घर मे गई हुई थी उसी समय एक आइसक्रीम वाला आ गया...
    दृष्टि ने उससे कहा "भैया मुझे आइसक्रीम खानी है"...
    तो यश बोला मां को आने दे फिर तुझे आइसक्रीम दिला दूंगा पर उसमे अभी समझ तो थी नही...
    वो जोर जोर से रोने लगी कि उसे आइसक्रीम चाहिए पार्वती के आने तक आइसक्रीम वाला जा चुका था..
    पार्वती ने उसे उठाकर पूछा...
    क्या चाहिए मेरे बच्चे को...
    उसने रोते हुए कहा...
    बुआ मुझे आइसक्रीम चाहिए....
    पार्वती ने उसको समझाया कि आइसक्रीम वाला शाम को फिर आएगा।
    जैसे हर बच्चे की आदत होती हैं कुछ ना मिलने पर उसको अपनी मां की याद आती है...
    दृष्टि अपनी मां के पास जाने की जिद करने लगी थोड़ी देर मे यश के मामा दृष्टि को लेकर घर चले गए....
    पर यश को ये बात बहुत बुरी लगी...
    उसने अपनी मां से पैसे मांगे पार्वती को बडी हैरत हुई क्योंकि यश कभी पैसे नहीं मांगता था।

    पर बहुत जिद करने पर पार्वती ने उसे ₹5 दे दिए...
    जब उसने पूछा कि क्या करेगा पैसे का तो उसने कुछ नहीं कहा खामोश रहा...
    यश चुपचाप घर से निकला..
    उसे याद था कि दृष्टि के घर के पास एक आइसक्रीम पार्लर है....
    छोटे होने के बावजूद उसे दृष्टि के घर का रास्ता याद था....
    ( यहां ये बता दें कि दृष्टि का घर यश के घर से 2 किलोमीटर की दूरी पर था)
    घर से निकलते वक्त उसे ये भी याद नहीं रहा कि वो अपनी चप्पल पहन ले...
    नंगे पांव यश जैसे-तैसे गर्मी मे दृष्टि के घर के पास वाले आइसक्रीम पार्लर तक पहुंचा...
    और वहां उसने एक ऑरेंज कैंडी ली उसे लेकर दृष्टि के घर पहुंच गया....
    दरवाजा यश की मामी ने खोला..
    यश को अकेला देखकर वो डर गई!
    उसने उससे पूछा कि वो यहा अकेला कैसे और क्यों आया उसने अपनी मामी को बताया कि वो पैदल चलकर दृष्टि के लिए आइसक्रीम लाया है।
    यश के पैरों के छाले देखकर उसकी मामी की आंखों में आंसू आ गए...
    उसने यश को गले से लगाकर उसकी पीठ सहलाते हुए कहा...
    इतना प्यार करता है तू अपनी दृष्टि से!
    यश की आंखों में भी आंसू आ गए थे उसने हां में सिर हिलाया....
    और पार्वती को फोन करके सारी बात बता दी...
    पार्वती जो यश को घर में ना पागल पागलों की तरह ढूंढ रही थी उसकी जान में जान आई....
    यश ने दृष्टि को आइसक्रीम दी जो वो लाया था आइसक्रीम पाकर दृष्टि यश के गले लग गई।
    फिर आइसक्रीम खाने लगी यश उसे देख कर ही खुश होता रहा हूं...
    उसने बीच में यश को देख कर कहा भैया आप भी खाओगे तो यश ने सिर्फ ना में सिर हिला दिया और उसे देखता रहा।
    कुछ ऐसा ही प्यार था यश का दृष्टि के लिए..
    जान थी उसकी दृष्टि बचपन से....
    उसके चेहरे पर आंसू नहीं देख पाता था।
    मौत को लोग यूहि बदनाम करते है तकलीफ तो जिंदगी देती है

  4. #4
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    दृष्टि धीरे-धीरे बड़ी होने लगी उसके दिल में भी अपने यश भैया के लिए अलग जगह बनने लगी हर रोज जब तक यश को सुबह स्कूल में ना मिल लेती उसे चैन नहीं मिलता।
    सारे त्यौहार यहां तक कि अपना जन्मदिन भी वो यश के साथ अपने बुआ के घर ही मनाती।
    एक बार दृष्टि के जन्मदिन पर राजेश पार्वती और यश को गांव जाना पड़ा(राजेश के मां-बाप के पास)

    उस दिन ना तो दृष्टि ने अपना जन्मदिन मनाया और ना ही अपने लिए कुछ लिया उल्टा उसकी तबीयत खराब हो गई सुबह से ना खाने से...
    दूसरे दिन जब यश को दृष्टि की तबीयत के बारे में पता चला तो वो दौड़ा चला आया वापस गांव से...
    ये उसकी पहली अकेले यात्रा थी।

    जो लड़का मां के बगैर घर से बाहर नहीं निकलता था उसने बस में सफ़र कर लिया वो भी अकेले।
    कहते हैं ना कि प्यार कुछ भी करा देता है।

    जब वो घर पहुंचा तो मामा ने दरवाजा खोला और बिना कुछ बोले घर के अंदर चले गए ऐसा ही रिश्ता था उसके मामा का उसका सिर्फ जरूरत पड़े तो ही बात करते थे।
    जब वो अंदर पहुंचा तो मामी उसे देखकर खुश हो गई।

    मामी:-आ जा मेरे लल्ला अकेले आया है डर नहीं लगता तुझे..
    ये कह के मामी ने उसे सीने से लगा लिया..
    पार्वती ने उसे फोन करके बता दिया था कि यश आ रहा है।

    यश:-मामी दृष्टि कहां है...
    यश की नजरें दृष्टि को ढूंढ रही थी।
    मामी:- जा ऊपर अपने रूम में लेटी है कल से कुछ नहीं खाया तू ही कह कुछ उसे!
    यश:-हां मामी मैं देखता हूं!

    यश दौड़ता हुआ सीढ़ियां चढ़ गया और जैसे ही वो दृष्टि के रूम के सामने पहुंचा वहीं रुक गया....

    उसके सामने दृष्टि सो रही थी उसने पीले रंग की फ्रॉक पहनी हुई थी उसका मासूम चेहरा देखकर यश मन में सोचने लगा
    " दो दिन ही तो हुए हैं तुमसे दूर हुए पर मिलने पर ऐसा क्यों लग रहा है जैसे सदियां बीत गई हो"


    दृष्टि सारी दुनिया को भूल कर बस सोए जा रही थी..
    उसकी आंखों के नीचे दाग पड़ गया था शायद आंसुओं की वजह से जो दृष्टि के दूध जैसे मुखडे पर अलग से दिख रहा था।
    यश ने उसे उठाना मुनासिब नही समझा पर दृष्टि ने कुछ नही ओढा था।
    वो दृष्टि के पास गया और जैसे ही दृष्टि को चादर ओड़ाने लगा उसके हाथ दृष्टि के शरीर से छू गए...
    यश चौक गया!

    दृष्टि का बदन आग की तरह चल रहा था उसको बहुत तेज बुखार था...
    उसने उसके माथे को छुआ!
    यश को बड़ा गुस्सा आया खुद के पर कि वो अपनी दीशू को उसके जन्मदिन पर कैसे छोड़ कर चला गया...
    वो तो जाना ही नहीं चाहता था पर उसके पापा ने जब उसे जाने को कहा था तो वो मना नहीं कर पाया ऐसा नहीं था कि अगर वो कहता तो राजेश नहीं मानता पर यश अपने पापा की बात कभी टालता नहीं था क्योंकि प्यार तो पता नहीं पर सम्मान बहुत करता था वो उनका!
    उसकी मां ने ऐसे संस्कार दिए थे यश को...
    वो बहुत भावुक हो रहा था दृष्टि की हालत देखकर...
    उसकी आंखों से आंसू निकला जो सीधा दृष्टि के होठों पर जाकर उसके चेहरे पर गिरा जिससे उसकी नींद खुल गई..
    उसने यश को सामने देखा तो खुश हो गई पर दूसरे ही पल जब उसको कल की बात याद आई तो उसने मुंह फेर कर दूसरी तरफ कर लिया..
    यश का तो जैसे कलेजा ही फट गया...
    उसकी अपनी दीशू उससे नाराज है...
    यश की आंखें और नम होने लगी....



    यश:- दीशू मेरा बच्चा मुझसे बात नहीं करेगा...
    दृष्टि:- जाओ मुझे आपसे कोई बात नहीं करनी...
    यश:-माफ कर दे मेरी परी मुझको आगे ऐसा नहीं होगा।
    दृष्टि:- मैंने कहा ना मुझे आपसे कोई बात नहीं करनी आप जाओ यहां से...
    यश:- पक्का नही बात करेगी?
    दृष्टि:- नहीं बात करूंगी पक्का वाला पक्का...
    यश- ठीक है तो मैं जा रहा हूं तेरे से बहुत दूर फिर कभी नहीं आऊंगा वापस... यश उसे डराने के लिए कहता है।

    यश बेड से उठ कर दरवाजे की तरफ जाने लगता है।

    अचानक पीछे से रोनी सी आवाज आती है "यश भैया"

    दृष्टि:- रोते हुए प्लीज भैया मुझे छोड़कर मत जाओ।
    दृष्टि की आंखों में आंसू यश से बर्दाश्त नहीं होते और वो दौड़ कर उसे अपने सीने से लगा लेता है।

    दृष्टि:-आप मेरे से प्यार नहीं करते!
    यश:- नहीं मेरी प्यारी परी मैं तुझसे बहुत प्यार करता हूं...
    दृष्टि:- तो मुझे छोड़कर क्यों चले गए थे....
    यश:- आगे से कभी ऐसा नहीं होगा।

    दोनों की आंखों से आंसू रुकने का नाम नहीं ले रहे थे दृष्टि यश की बाहों में ही सो जाती है।
    यश:- उसे सुला कर नीचे जाता है और अपनी मामी से कहता है कि वो दृष्टि के बुखार उतरने तक यही रहेगा।

    रात मे यश दृष्टि को उठाकर उसे सूप पिलाता है और फिर उसी के बैड के बगल में कुर्सी पर बैठकर सिर पर हाथ फेरने लगता है दृष्टि बुखार में सिर्फ इतना ही कह पाती है " आप मुझे छोड़ कर कभी मत जाना" और कस के यश का हाथ पकड़कर सो जाती है..
    यश भी उसके सिर पर हाथ फेरते फिरते वही उसके बगल में कुर्सी पर ही सो जाता है...
    मौत को लोग यूहि बदनाम करते है तकलीफ तो जिंदगी देती है

  5. #5
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    यश भी उसके सिर पर हाथ फेरते फिरते वही उसके बगल में कुर्सी पर ही सो जाता है...
    थोड़ी देर में यश की मामी दृष्टि को देखने आती है यश को कुर्सी पर सोया देखकर भावुक हो जाती है।

    यश को उठाकर मामी ने उसे बगल के कमरे में जाकर सोने के लिए बोला यश ने आधी नींद में कहा" मामी दीशु की तबीयत बहुत खराब है और रात को इसे किसी भी चीज की जरूरत पड़ सकती है इसलिए मैं इसे छोड़ कर नहीं जाऊंगा"
    मामी ये सुनकर बहुत खुश होती हैं और प्यार से यश के गालों को चूम लेती हैं..
    फिर उसे कहती हैं...
    मामी:-बहुत प्यार करता है ना तू अपनी छोटी बहन से....
    यश:-ये मेरी बहन के साथ साथ मेरी छोटी सी परी भी है।

    यश की मामी को उस पर बड़ा प्यार आता है और वो उसे वही दृष्टि के बगल में सोने के लिए बोल देती है।
    यश अपनी मामी की बात मानकर दृष्टि के बगल में लेट जाता है और उसकी मामी उसे गुड नाइट बोलकर वहां से रूम की लाइट और दरवाजा बंद करके चली जाती हैं।
    यश भी दृष्टि के सिर पर हाथ फेरते फेरते सो जाता है।


    रात के 2:00 बज रहे थे यश थक चुका था दिन के सफर से वो गहरी नींद में सो रहा था उसका हाथ अभी तक दृष्टि के सिर पर था अचानक से उसकी नींद खुल जाती हैं किसी के हिलने से...
    वो जाग जाता है और देखता है दृष्टि बुरी तरह से कांप रही है।
    वो बहुत डर जाता है और दृष्टि से पूछता है " क्या हुआ दीशु"..
    दृष्टि ने बस इतना ही कहा" बहुत ठंड लग रही है"
    वो जल्दी से अलमारी की तरफ चला गया उसमें से दो कंबल निकालकर दृष्टि को ओढा दिया।
    दृष्टि का कापना फिर भी बंद नहीं हो रहा था...
    ये देख यश उसके पैर के तलवे को हाथ से रगडने लगा!
    दृष्टि का शरीर जो आग की तरह गर्म था वो अब बर्फ की तरह ठंडा पड़ चुका था!
    यश बहुत देर तक उसके पैरों को रगड़ता रहा।
    पर कुछ फायदा ना होते देख कर दृष्टि के कंबल के अंदर घुस जाता है और उसके पूरे शरीर को सहलाना चालू कर दिया ताकि दृष्टि को आराम मिले..
    दो घंटे मे दृष्टि नॉर्मल हो गई।
    यश को ये देख कर चैन आया और वो भी उसे पकड़े हुए नींद मे सो गया।
    सुबह दृष्टि की नींद पहले खुली और उसने देखा कि यश उसे पकड़कर सोया हुआ है!
    ये उसे बहुत अच्छा लगा।
    उसका बुखार अभी भी नहीं उतरा था...
    वो यश के चेहरे को देखकर सारी बातो के बारे में सोचने लगी कि यश उससे कितना प्यार करता है।
    वो अकेला कैसे गांव से आ गया!
    कैसे उसने सारी रात उसकी सेवा की और उसे भी यश के ऊपर बड़ा प्यार आता है।
    वो यश के गालों को चूम कर वही यश के चेहरे को देखते हुए लेटी रहती है।
    थोड़ी देर मे यश की नींद खुलती है।
    उसने दृष्टि को जागा देखकर उससे कहा...
    यश:-तुम कब जागी?
    दृष्टि:-थोड़ी देर हुई है।
    यश:- तो फिर मुझे जगाया क्यों नही?

    दृष्टि:- वो मैंने सोचा कि आप रात भर मेरे कारण सोए नहीं हो।
    यश:-तेरे लिए तो मैं जिंदगी भर जाग सकता हूं दीशू!

    दीशु ये सुनकर उसके गले से लग गई।

    कुछ पल हुए थे और नेहा उन दोनों को जगाने आ गई और उन्हें बताया कि राजेश और पार्वती आ चुके हैं।

    यश ये सुनकर फ्रेश होने के लिए बाथरुम चला गया..
    फ्रेश होने के बाद उसने दृष्टि को उठाया और उसे ब्रश करवाया और गीले कपड़े से उसके हाथ और मुंह को पोछा।
    इतने में पार्वती भी कमरे में आ गई और दृष्टि को गले से लगा लिया।

    दृष्टि:- बुआ आप मुझे छोड़कर क्यों चली गई थी?
    पार्वती:-बेटा आपके फूफा जी को कुछ जरूरी काम आ गया था गांव मे!
    दृष्टि:-और भैया को भी साथ ले गई थी जाओ मैं आपसे बात नहीं करूंगी!!
    पार्वती तो ठीक है मैं जो प्रिंसेस वाली ड्रेस जो तुमको बहुत पसंद आई थी वो नेहा को दे देती हूं...
    दृष्टि:-(ये सुनकर दृष्टि बहुत खुश हो जाती है और कहती है) नहीं बुआ मैं तो आपकी परी हूं ना प्लीज वो ड्रेस मुझे ही देना।
    मौत को लोग यूहि बदनाम करते है तकलीफ तो जिंदगी देती है

  6. #6
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    यश उन दोनों को बातों में छोड़कर नीचे की तरफ चला गया।

    [ अब आप लोगों को थोड़ा दोनों के घर और घरवालों के बारे में बता देता हूं...
    दोनों का घर बिलासपुर नाम के शहर में था..
    यश के पिता राजेश को तो आप लोग जानते ही हैं कि वो रेलवे में इंजीनियर है उसे एक 3bhk घर मिला हुआ था रेलवे की तरफ से कॉलोनी मे नीचे एक हॉल,किचन और दो बेडरूम जिसमें एक अटैच बाथरूम था जो राजेश और पार्वती का था दूसरा बेडरूम मेहमानों के लिए था जिसमे यश के दादा दादी आते तो रुकते थे....
    तीसरा बेडरूम ऊपर था जिसमे साथ मे बालकनी और बाथरूम भी था...
    सीढ़ियों के साथ एक लाबी थी जिसमें बेडरूम का दरवाजा था....
    वो था यश का कमरा.....
    पार्वती घर के काम करती और राजेश सुबह ऑफिस चला जाता.....
    राजेश की यश से कम बात जरूर होती थी पर इसका ये मतलब बिल्कुल नहीं था कि यश से उसे प्यार नहीं था बस राजेश बोलता ही बहुत कम था।
    बहुत शांत स्वभाव का था राजेश पार्वती से तो वो अपनी जान से भी ज्यादा प्यार करता था।
    राजेश का पिता किसान था पर अब राजेश ने अपनी कमाई से गांव के पुराने कच्चे घर को पक्का बनवा दिया था...
    राजेश के माता-पिता वही रहते थे...
    गांव शहर से 3 घंटे की दूरी पर था नाम था माधोपुर!


    दृष्टि का घर रेलवे कॉलोनी से 2 किलोमीटर की दूरी पर एक रेजीडेशल कॉलोनी में था ये घर उसके दादा "जयराम शर्मा" ने बनाया था उसकी दादी का नाम "पुष्पा देवी" था....
    घर में चार बेडरूम हॉल और किचन थे...
    नीचे के 2 बेडरूम में से एक दृष्टि के दादा-दादी का था और दूसरे मे उसके पिता "अश्विनी शर्मा" और मां "प्रीति शर्मा" रहते थे जिसमे नेहा भी उनके साथ ही सोती थी।
    ऊपर का एक कमरा दृष्टि का था और दूसरा मेहमानों के लिए था।
    दोनों कमरों के साथ एक हॉल भी था जिस में नीचे की तरफ TV सोफा सभी चीजें थी...
    जयराज ने अपनी सारी जमा-पूंजी इस घर मे,अश्विनी की पढ़ाई मे और पार्वती की शादी मे लगा दी थी।
    जयराज ने अपनी बेटी पार्वती की शादी बेरोजगार रहते हुए भी राजेश से इसलिए करवा दी थी क्योकि वो जानता था कि राजेश को एक ना एक दिन अच्छी नौकरी मिल ही जाएगी जो सच भी हुआ।
    दृष्टि के दादा सरकारी कंपनी से सेवानिवृत्त लिपिक थे पर दृष्टि का पिता अश्वनी कोई नौकरी नहीं करता था यही वजह थी कि अश्वनी का मन हमेशा अशांत रहता था।
    घर का खर्च दृष्टि और नेहा की पढ़ाई सब जयराज की पेंशन से चलता था...
    अश्वनी को नौकरी मिलती भी तो छोड़ देता इसी वजह से जयराज और अश्विनी की पटती नहीं थी।
    पर दृष्टि और नेहा तो जयराज की लाडली थी वो प्रीति को भी अपनी बेटी की तरह रखता था।
    यश में जयराज की जान बसती थी....
    कुल मिलाकर अश्वनी की नौकरी को छोड़ दे तो सारा परिवार खुशी-खुशी रहता था]
    मौत को लोग यूहि बदनाम करते है तकलीफ तो जिंदगी देती है

  7. #7
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    यश नीचे उतर गया और अपने पिता के पैर छुए और सीधा किचन में जाकर डाइनिंग टेबल पर बैठ गया।
    वहां उसकी मामी नाश्ता बना रही थी।
    यश:- मामी आपने मुझे गांव जाते समय रोका क्यों नही?
    क्या आप नहीं चाहती थी कि मैं यहां आप लोगों के साथ रहूं?
    प्रीती:- कैसी बातें करता है लल्ला अरे तू तो मेरा राजा बेटा है..

    यश:-फिर जब आपको मालूम था कि दृष्टि ने कभी मेरे बगैर अपना जन्मदिन नहीं मनाया तो आपने मुझे रोका क्यों नही।


    प्रीती:-अरे मुझे थोड़े ही पता था कि महारानी इतना बड़ा बवंडर कर देंगी जब सुबह जन्मदिन के दिन उसे पता चला कि तुम लोग गांव गए हो तो उसने रो-रोकर सारा घर सिर पर उठा लिया और दिन भर कुछ नहीं खाया...
    और दिन भर खुद को कमरे में बंद कर लिया और फिर शाम को जब बाबूजी(जयराज)ने उसे बाहर चलने के लिए जगाया तब पता चला कि उसे बुखार है...
    तब मैंने दीदी (पार्वती) को फोन करके बताया दृष्टि के बारे मे...

    यश:-पहले ही बता देते जन्मदिन के दिन ही मैं आ जाता।

    प्रीती:-मुझे क्या मालूम था कि मेरा लल्ला इतना बड़ा हो गया है कि वो अकेला आ जाएगा...
    आगे से ऐसा नही करूंगी।

    यश:-आगे से ऐसी नौबत ही नहीं आएगी मैं अपनी दीशु को छोड़कर कहीं नहीं जाऊंगा।

    ये सुनकर प्रीती हंसने लगी इतने मे जयराज भी आ गया वो एक दिन के लिए बाहर गया था।
    राजेश और यश को देखकर वो खुश हो गया।
    यश और राजेश ने उनके पैर छुए।
    उसने यश को अपने गले लगाकर कहा कैसा है मेरा शेर...
    ठीक हूं नाना जी आप कैसे है?
    मैं भी ठीक हूं बेटा तुम्हारी मम्मी नहीं आई...
    यश ने कहा कि वो दृष्टि और नेहा के साथ उपर है।
    ऐसे ही वो लोग बातें करने लगे अश्विनी भी अपने कमरे से बाहर आकर उनके साथ बैठकर उनके साथ बैठ गया।
    थोड़ी देर मे यश की नजर सीढ़ियो पर गई और वो देखता रह गया!
    दृष्टि परी की ड्रेस में बिल्कुल परियो जैसी ही लग रही थी।
    भरा हुआ मासूम सा चेहरा जो थोड़ा पीला पड़ गया था बुखार की वजह से उसमे गुलाबी रंग की प्रिंसेस ड्रेस साथ में पार्वती ने एक मुकुट भी लिया था जो दृष्टि के सिर पर लगा था।
    उससे वो और भी प्यारी लग रही थी...
    ये प्यार का बीज ही था जो जो उन दोनों के बीच पनप रहा था।

    इतने मे दृष्टि उनके पास आ गई और उसने यश से पूछा....

    दृष्टि:-भैया कैसी लग रही हूं मै?
    उसकी आवाज थोड़ी भारी हो गई थी बुखार की वजह से एक पल तो यश सिर्फ उसे देखता रहा फिर दोबारा पूछने पर उसने कहा...

    यश:-बिल्कुल परियों जैसी मेरी क्यूटपाई...
    यश उसे अलग-अलग नामों से बुलाता था उसने उसके सिर पर हाथ रखकर पूछा तू नीचे क्यों आई।

    वो कुछ कह पाती उससे पहले पार्वती ने कहा कि वो उसे नीचे लाई है फिर उसने राजेश को बाहर से केक लाने को बोला और कहा कि वो सब दृष्टि का जन्मदिन आज मनाएंगे...
    तब पुष्पा देवी(यश की नानी) ने हंसते हुए कहा इसीलिए तो भूख-हड़ताल पर बैठी थी..
    यश खुश हो गया और वो भी अपने पापा के साथ केक लेने चला गया...
    मौत को लोग यूहि बदनाम करते है तकलीफ तो जिंदगी देती है

  8. #8
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    जब वो लोग केक लेकर आ रहे थे तब यश ने झिझकते हुए अपने पापा से कहा...
    यश:- पापा एक रिक्वेस्ट थी!
    राजेश:-बोलो बेटा क्या बात है!
    यश:-वो मैं दृष्टि के ठीक होने तक यहीं से स्कूल चला जाऊगा....
    राजेश:- (थोड़ा सोचकर) ठीक है पर अपनी पढ़ाई जरूर करना....
    यश:-पापा एक और बात है!
    राजेश:- (हस्ते हुए) अब ये मत कहना कि सारी जिंदगी यहीं रहना है।
    यश:-(पापा को खुश देखकर वो जल्दी से कह देता है) पापा वो दृष्टि के लिए मुझे गिफ्ट लेना है।
    राजेश:-(गंभीर होकर) ठीक है पर जल्दी ले लेना सब इंतजार कर रहे होंगे।

    यश और राजेश का ऐसा ही रिश्ता था।
    राजेश ने गिफ्ट शॉप के सामने कार खड़ी कर दी।
    यश ने वहां से एक टेडी गिफ्ट पैक करवा लिया और फिर वो दोनों घर की तरफ निकल गए...
    घर पर सब उनका इंतजार कर रहे थे...

    दृष्टि ने केक काटा और पहला टुकड़ा उसने यश को खिलाया...
    दृष्टि की आंखें खुशी से छलक उठी..
    और उसके चेहरे पर मुस्कान आ चुकी थी जो उसके मासूम चेहरे को और खिला रही थी....
    मामी ने भी पूरी और कोफ्ता बनाया था जो यश और दृष्टि दोनों को बहुत पसंद था।
    यश ने अपने हाथों से दृष्टि को वो खिलाया दृष्टि ने ज्यादा नहीं खाया बुखार की वजह से...

    और उसने जब यश को खिलाना चाहा तब यश ने उसे मना कर दिया ये कहकर कि वो पहले ठीक हो जाए...
    यश दृष्टि के घर चार दिन और रुका वो रोज वहीं से स्कूल जाता दृष्टि के नोट्स उसके क्लासमेट से लेता....
    घर पहुंचकर दृष्टि को खाना खिलाता....
    जब दृष्टि का सिर दर्द होता तो उसे सहलाता....
    रात में वो उसके बगल मे ही सोता
    और उसकी एक हलचल पर जाग जाता...
    इतना प्यार था यश का दृष्टि के लिए..

    वो खुद का तो कोई काम आसानी से नहीं कर पाता था पर दृष्टि की खामोशियां भी समझ जाता था जैसे पार्वती उसकी समझ जाती थी...
    इस तरह दिन बीतते गए और यश और दृष्टि का लगाव ऐसे ही बना रहा।
    प्यार ही कुछ ऐसा था इन दोनों मे..
    मौत को लोग यूहि बदनाम करते है तकलीफ तो जिंदगी देती है

  9. #9
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    भैया आप कहां हो...
    एक मीठी सी आवाज़ यश के कानों में आती है।
    वो नींद में था उसे ऐसा लगा कि वो सपना देख रहा है।
    थोड़ी देर में ही किसी का हाथ उसके कंधे पर पड़ा और उसे हिलाने लगा.....
    उठो ना यश भैया देखो कितना टाइम हो गया है।

    फिर से वही आवाज यश नींद के आगोश मे सो जाता है....
    ज्यादा देर नहीं हुई थी कि किसी ने उस पर पानी डाल दिया!
    यश एकदम चौक कर उठ जाता है...
    और उसके सामने दृष्टि जोर जोर से हंस रही थी।
    दृष्टि की बच्ची कहकर यश जैसे ही उठा दृष्टि उसे जीभ दिखा कर भागने लगी....

    यश:- रुक तुझे अभी बताता हूं....

    दृष्टि:(भागते हुए दरवाजे के पास पहुंचकर बोली) क्या बताएगा....

    यश:-(यश ने दौड़कर उसे पीछे से पकड़ लिया) ये बताऊंगा...

    यश इतना कहकर उसे बाथरूम ले गया और उसके ऊपर पूरी बाल्टी उड़ेल दी...
    दृष्टि के पूरे कपड़े गीले हो गए...
    दृष्टि जोर-जोर से चिल्ला रही थी जिसे सुनकर प्रीति ऊपर आ गई।

    प्रीति:-क्या हो गया इतना शोर क्यों मचा रहे हो?

    दृष्टि:- देखो ना मम्मी इस यश के बच्चे ने मेरे ऊपर पानी डाल दिया।

    यश:- वाह! कुछ चाहिए तो भैया नहीं तो यश का बच्चा...
    मामी इस ने शुरुआत की थी मैं तो सो रहा था।

    प्रीती:- कब होगे तुम बड़े..
    कब आएगी तुम्हें अक्ल?

    दृष्टि:- मैं तो बड़ी हो गई हूं इन बुद्धू को बोलो...
    इतना कहकर वो मुंह फुला कर नीचे चली गई।

    प्रीति यश से:- बेटा जल्दी नीचे आ जाओ नाश्ता तैयार है...
    ये कहकर प्रीति नीचे चली गई।
    और यश फ्रेश होने चला गया....

    यश अपनी गर्मियों की छुट्टियों में आया था यहा...
    यश के उपर अब जवानी की छाया आने लगी थी।
    कद 5 फुट 10 इंच और शरीर दोनों ही अच्छा पाया था रंग तो गोरा था ही साथ ही उसकी नीली आंखे बहुत अच्छी लगती थी।
    कुल मिलाकर देखने मे बहुत खूबसूरत लड़का था...
    स्वभाव भी उसका शांत और काफी इमोशनल था।

    और जब भी दृष्टि के साथ होता तो उसके साथ मस्ती मजाक कर लेता....
    क्योंकि वही तो उसकी एकमात्र दोस्त थी...
    स्कूल में उसका एक बहुत अच्छा दोस्त था आयुष..
    पढ़ाई में ठीक-ठाक था उसे क्रिकेट से बहुत लगाव था।
    और वो स्कूल की क्रिकेट टीम में भी था।

    वहीं दूसरी तरफ दृष्टि भी जवानी की तरफ अपने कदम बढ़ा रही थी वो भी अब बड़ी होने लगी थी।
    भगवान ने मानो उसे फुर्सत से बनाया था दूध सा रंग...
    शरीर का एक-एक कटाव मानो अपनी बात कह रहा हो...
    फूले फूले गाल मासूम सा चेहरा.....
    सुराही की तरह गला उसके नीचे भरे हुए वक्ष जो उसकी उम्र के हिसाब से बड़े थे पर ज्यादा नहीं और उसके शरीर पर खूब जचते थे...
    उसके बाद सपाट पेट...
    भरी-भरी जाघे....अब उसके नितंबों में भी भराव आ चुका था।
    जब भी रोड मे वो चलती तो जवान क्या बूढे सब उसे पलट कर देखते।

    पूरी की पूरी फिल्मो की अभिनेत्री होती जा रही थी....
    ड्रेसिंग भी उसका बहुत माडर्न था।
    जींस,शोर्ट स्कर्ट,कैपरी,टी-शर्ट यही सब उसे बहुत अच्छा लगता था और उसे सूट भी करता था।
    पढ़ाई में वो टॉपर थी डांस का उसे बहुत शौक था।
    स्कूल की जान थी वो...
    स्कूल में उसके बहुत दोस्त थे पर रश्मि उसकी बेस्ट फ्रेंड थी।
    बस उसकी एक ही कमजोरी थी वो किसी से नहीं कह पाती थी "यश"!!
    ऐसा क्यों था ये उसे भी नहीं पता था हर पल उसे यश के पास होने का मन करता..
    इसी कारण जो भी हो त्यौहार,हॉलीडे,जन् मदिन दोनों साथ में ही मनाते।
    कहीं घूमने भी जाना होता तो वो दोनों साथ में ही जाते...
    नेहा भी अब बड़ी हो गई थी पर वो दृष्टि के विपरीत दुबली-पतली सी थी और ज्यादा समय घर पर ही रहती थी उसे दुनियादारी से कोई मतलब नहीं था।
    मौत को लोग यूहि बदनाम करते है तकलीफ तो जिंदगी देती है

  10. #10
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    यश फ्रेश होकर नीचे आया तो उसने दृष्टि को देखा उसने अपने कपड़े बदल लिए थे.....
    लाल रंग का टाइट टॉप जो उसके उभारों को उजागर कर रहा था और सफेद रंग का लॉन्ग स्कर्ट बहुत प्यारी लग रही थी वो उसमे...
    ये ड्रेस उसने यश से ही खरीदवाया था..
    यश ने उसकी तरफ देख कर उसे स्माइल दी...
    दृष्टि ने तुरंत मुँह दूसरी ओर कर लिया..
    वो कुछ कहता उससे पहले प्रीति ने उसे कहा

    प्रीति:-आ बैठ बेटा तू भी नाश्ता कर ले।

    यश:-नहीं मामी मुझे भूख नहीं है उसने दृष्टि की तरफ देखकर कहा...

    प्रीति:-भूख कैसे नहीं है रोज तो सुबह सबसे पहले नाश्ता मांगता है थोड़ा सा खा ले बेटा।

    यश कुछ बोलता उससे पहले दृष्टि बोल पड़ी...

    दृष्टि:-रहने दो ना मम्मी भूख नहीं है तो वैसे भी इनको हमारे घर का खाना अच्छा नहीं लगता( वो यश से गुस्सा नहीं थी मगर जानबूझकर उसे चिड़ा रही थी)

    मामी:-चुप कर बेशर्म कुछ भी बोलती रहती है मेरे लल्ला को मेरे हाथ का खाना बहुत अच्छा लगता है आजा बेटा....

    यश:-नहीं मामी मुझे नहीं खाना...

    इतना कहकर यश फिर ऊपर चला गया।

    जयराज ने यश को जाता देखकर प्रीति से पूछा "यश को क्या हुआ"।
    प्रीति ने उसे बताया कि इन दोनों का फिर झगड़ा हो गया है...
    उसी समय दृष्टि ने कहा...

    दृष्टि:-दादा जी मैंने कुछ नहीं किया।

    जयराज:-बेटा जाओ अपने भैया से माफी मांगो।

    दृष्टि तो खुद यही चाहती थी!
    क्योंकि वो तो बस यश को छेड़ रही थी...
    वो ऊपर चली गई और जैसे ही ऊपर पहुंची उसने देखा यश बेड पर लेट कर रो रहा है दृष्टि को आता देख कर उसने अपने आंसू जल्दी से पोछ लिए....
    पर दृष्टि ने उसे आंसू पोछते देख लिया...

    दृष्टि:-ओओहहह मेरा बच्चा रो रहा है।

    यश:-दृष्टि तू जा यहां से...

    दृष्टि:-जाने के लिए थोड़ी ना आई हूं
    यश के चेहरे को देखकर

    यश:-तो फिर क्या मुझे घर से जाने के लिए बोलने आई है....
    इतना बोल कर यश का अपने आंसुओं पर काबू ना रहा।

    हां मैं तो पराया हूं तेरे लिए...
    ये तो तेरा घर है....
    मैं तो तेरा कुछ भी नहीं...
    न जाने क्या क्या बोले जा रहा था यश....
    उसे दृष्टि की खाने वाली बात चुभ गई थी।

    दृष्टि से यश के आंसू देखे नही गए और यश को अपनी छाती से लगा लिया और खुद रोने लगी।

    दृष्टि:-इतनी छोटी छोटी बात पर कोई रोता है भला!!
    मैं तो आप को सॉरी बोलने आई थी...
    सारी गलती मेरी है आप से मजाक करने का भी हक नहीं है...
    बहुत गंदी हूं मैं!

    यश के तो होश उड़ गए दृष्टि को रोता देखकर उसको अपना रोना तो जैसे याद ही नहीं रहा।

    यश:-अरे तू मुझे मनाने आई थी और खुद रो रही है।

    रोते हुए दृष्टि का चेहरा बड़ा मासूम लग रहा था।

    दृष्टि:-(रोते हुए)मुझे नहीं आता मनाना.....
    आप बहुत रूलाते है मुझे...

    यश:-(चौककर) मैंने कब रुलाया तुझे??

    दृष्टि:-आप बात बात पर रो देते हो और आपके आंसू मुझसे देखे नहीं जाते।

    यश:-ओओ!तो ये बात है....
    , ठीक है आज के बाद रोना बंद....
    और हां सॉरी!!

    दृष्टि:-किसलिए?

    यश:-मैंने मेरी दीशू को रुलाया इसलिए....
    इतना कहकर यश उसे अपने गले से लगा लेता है।

    हर बार ऐसे ही होता था गलती चाहे किसी कोई भी करें सॉरी हमेशा यश ही बोलता था।

    दृष्टि अभी भी यश की बाहों में थी...
    वैसे तो दोनों बचपन से ही गले लगते थे.....
    पर कुछ समय से यश को दृष्टि से गले लगना कुछ अलग लगने लगा था....
    जब भी दृष्टि की छातिया उसके सीने में लगती उसे एक अलग अनुभूति होती....
    यही हाल दृष्टि का भी था जब भी यश उसे गले लगाता और उसकी पीठ सहलाता तो उसे अलग ही आनंद मिलता....
    उसके वक्ष जब भी यश के सीने से लगते तो उसे एक मीठा सा एहसास होता...
    उसकी धड़कने तेज हो जाती उसका चेहरा लाल हो जाता....
    कुछ देर दोनों एक दूसरे की बाहों में खोए रहे....
    फिर यश ने किसी के पैरों की आवाज सुनी और दृष्टि से अलग हो गया और वो चली गई।
    दोनों ने एक दूसरे को देखा दृष्टि का चेहरा लाल हो गया था।
    यश को ये दिख रहा था कि वो शर्मा रही है पर क्यों उसने जानना जरूरी नहीं समझा।
    फिर दृष्टि बोली भैया नीचे चले मम्मा बुला रही हैं.....
    यश ने मुस्कुराते हुए हां में सिर हिलाया.....
    दोनों एक दूसरे का हाथ पकड़कर नीचे चले गए।
    मौत को लोग यूहि बदनाम करते है तकलीफ तो जिंदगी देती है

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