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Thread: हमारे युगपुरुष तथा उन्के लेख

  1. #11
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    मन्त्र शक्ति का अद्भुत चमत्कार

    भारतीय धर्म में मन्त्रशक्ति का स्थान बड़ा महत्वपूर्ण और हमारे वेद-शास्त्र पुराण सभी मन्त्रों की महिमा से भरे हैं। उनका मत यह है कि मंत्रों में शक्ति का अपार भंडार भरा है और जो कोई उनका विधिवत् साधन करेगा। वह उनकी शक्ति से अपना और दूसरों का कल्याण कर सकेगा। पर काल प्रभाव से अब मन्त्रों पर लोगों की वैसी श्रद्धा नहीं रही है और मन्त्रों द्वारा प्रत्यक्ष कार्य कराने वाले साधक भी नाम मात्र को ही मिलते हैं। इसके विपरीत अनेक धूर्तों ने इस विद्या के नाम पर लोगों को ठगना शुरू कर दिया है और वे तरह-तरह की चालें और हाथ की सफाई करके दर्शकों को धोखे में डाल देते हैं, इन बातों का परिणाम यह हुआ है कि जनता का विश्वास मन्त्रों पर से हट गया है और कोई समझदार व्यक्ति मन्त्र-शक्ति की सत्यता को मानने के लिये तैयार नहीं होता। यह स्थिति लोगों के लिये ही नहीं धर्म की दृष्टि से भी हानिकर है, क्योंकि मन्त्रों का मुख्य उद्देश्य चमत्कार दिखलाना नहीं, वरन् आत्मोन्नति के क्षेत्र में प्रगति करना है। सन्तोष का विषय है कि अब भारतीय राष्ट्र में जो नवीन चेतना की लहर उत्पन्न हुई है उसमें अन्य बातों के साथ इस ओर भी अधिकारी पुरुषों का ध्यान गया है और इस विद्या का विधिवत् साधन करने के कितने ही उदाहरण सम्मुख आ रहे हैं। इस सम्बन्ध में एक प्रामाणिक वर्णन गोरखपुर के सहयोगी “कल्याण” के वर्ष 26 संख्या 12 पृष्ठ 1498 में प्रकाशित हुआ है। जिसे हम पाठकों के हितार्थ ज्यों का त्यों उद्धृत कर रहे हैं—
    बिरला हाउस, नई दिल्ली से मास्टर श्रीराम जी लिखते हैं—दिल्ली में अनुमान दो-ढाई मास से एक वैष्णव साधु आये हुये थे, जिनका नाम बाबा गोपालदास है। वे यहाँ पर आर्यनिवास नं.1 डॉक्टर लेन पर ठहरे थे। छत के ऊपर एक गोल सा छोटा कमरा है, उसी में वे रहते थे। उन्होंने गोपाल का एक चित्र काष्ठ की चौकी पर रख छोड़ा था। उस चित्र के चारों तरफ कनेर के पुष्प चढ़ाये हुए रक्खे रहते थे। गोपालदास बाबा उस चौकी के पास ही एक दरी पर बैठे तुलसी की माला फेरते थे। जो लोग उनके पास जाते, वे भी उसी दरी पर बैठ जाते थे। उनके पास जाने वालों को प्रसाद देने के लिये बाबाजी ईंट के छोटे-छोटे टुकड़े अनुमान 4,5 तोले वजन के एक हरे केले के टुकड़े में गोपाल की मूर्ति के सामने आधा मिनट रखकर उठा लेते थे, ईंट के टुकड़े सफेद मिश्री के टुकड़ों में बदल जाते थे और वे उन मिश्री के टुकड़ों को उन लोगों को दे देते थे, जो उनके दर्शन के लिये जाते। कभी-कभी ईंट का टुकड़ा कलाकन्द में बदल जाता था। यह अद्भुत परिवर्तन कैसे हो जाता है? सो तो वह बाबाजी ही जानते हैं और किसी को पता चला नहीं है। विज्ञानवेत्ता इस कारण को ढूँढ़ निकालें तो दूसरी बात है।

  2. #12
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    उस बाबाजी के पास जर्मन-राजदूत, जापानी-राजदूत, (संसद के अध्यक्ष) श्रीमावलंकर, श्रीसत्यनारायणसि ह, रायबहादुर लक्ष्मीकान्त मिश्र आदि गये थे। इनको भी इसी प्रकार का प्रसाद दिया गया था। जर्मन-राजदूत के साथ एक जर्मन महाशय भी थे। उन्होंने तो यह चमत्कार देखकर बाबाजी से अपना शिष्य बना लेने की प्रार्थना भी की।
    इन दो प्रकार के चमत्कारों के अतिरिक्त तीन चमत्कार विशेष उल्लेखनीय हैं। पहला चमत्कार तो यह है कि श्री जुगलकिशोर जी बिरला ने एक ताँबे की चमची को एक केले के हरे पत्ते में लपेटकर अपने हाथ में लिया और बाबाजी के कहने के अनुसार श्री बिरला जी सूर्य के सामने खड़े हो गये। बाबाजी भी पास में खड़े कुछ मन्त्र जपते रहे। दो-तीन मिनट बाद ही चमची निकाली गई तो सोने की बन गई थी। अभी तक वह चमची श्री बिरला जी के मुनीम डालूराम जी के पास उसी आर्य-भवन में रक्खी हुई है।
    दूसरा चमत्कार यह हुआ कि इस मिश्री के प्रसाद का वृत्तान्त सुनकर एक महाशय ने बाबाजी के पास जाने वालों में से किसी को यह बात कह दी कि हम तो बाबाजी की मन्त्रसिद्धि तब मानें जबकि वे पूरी-की-पूरी एक नंबरी ईंट को मिश्री की ईंट बना दें। ऐसी बात बाबाजी को सुनाई गई तो बाबाजी ने झट कह दिया कि गोपाल जी की कृपा से मिट्टी की ईंट के टुकड़े मिश्री के टुकड़े बन जाते हैं तो पूरी मिट्टी की ईंट बन जाना कौन बड़ी बात है। अतएव 18 सितम्बर बृहस्पतिवार को रात्रि के 8 बजे श्री बिरलाजी के तथा और कई सज्जनों के सामने एक नंबरी ईंट मँगाई गई और उसको धो-पोंछकर एक सज्जन के हाथ से काष्ठ की एक चौकी पर वह ईंट रखवा दी गई तथा एक केले के पत्ते से उस ईंट को ढ़क दिया गया। तीन-चार मिनट तक बाबाजी कुछ मन्त्र जपते रहे। फिर उस ईंट को उठाया गया तो केले के पत्ते में से एक दम श्वेत मिश्री की ईंट निकली। वह ईंट (बिरला-हाउस, दिल्ली में ) श्री जुगलकिशोर जी बिरला के पास रक्खी हुई हैं, सो ये दोनों चीजें तो मौजूद हैं, कोई भी देख सकता है।
    तीसरी अद्भुत घटना तो मैंने स्वयं अपनी आँखों से देखी है। उस समय बाबू जुगलकिशोर जी बिरला, गायनाचार्य पंडित रमेश जी ठाकुर तथा ‘नवनीत’ के संचालक श्री श्रीगोपालजी नेवटिया उपस्थित थे। अनुमान दिन के दस बजे होंगे। उस समय किसी ने बाबाजी से कहा कि “एक दिन आपने पानी से दूध बनाया था, परन्तु उस दिन प्रभुदयाल जी हिम्मतसिंह का, माधवप्रसाद जी बिरला आदि जो सज्जन देखते थे, उनको सन्तोष नहीं हुआ था। बाबाजी इस प्रकार से दूध बनायें कि किसी को भी सन्देह न रहे। इस पर बाबाजी बहुत हँसे और बोले, उन लोगों की श्रद्धा की स्यात्, परीक्षा की गई होगी। इसके बाद बाबाजी ने कहा, ‘अच्छा एक काठ का पट्टा बाहर रक्खो और उस पर यह पानी की बाल्टी रख दो।’ बाबाजी ने जैसा कहा वैसा ही किया गया। बाबाजी ने अपनी चद्दर, जो ओढ़ रखी थी, वह भी उतार दी और एक कौपीन तथा उस पर एक तौलिया ही रक्खा और स्वयं दूर खड़े हो गये तथा सबको कह दिया कि उस बाल्टी को एक दफे फिर अपनी आँखों से देख लो। सबने वैसा ही किया। बाबाजी ने एक आदमी से कहा कि “तुम इस पट्टे पर बाल्टी के पास बैठ कर ओम् का जप करते रहो। फिर बाबाजी उस बाल्टी के पास गये और उसमें से कटोरी पानी की भरी और सबको वह पानी दिया गया। सबने कहा, यह तो पानी ही है। फिर बाबाजी श्री गोपाल जी की मूर्ति के पास जा बैठे और वह बाल्टी अपने पास मँगा ली। बाल्टी गमछे से ढ़क दी गई और एक लाल फूल, जो गोपाल जी की मूर्ति पर चढ़ा हुआ था, अपने हाथ से बाल्टी में डाल दिया। उसे पश्चात् जब गमछा हटाया गया, तब एकदम सफेद दूध देखने में आया। सबको एक-एक कटोरी दूध दिया गया। शेष दूध बिरला-हाउस पहुँचाया गया, जो अनुमानतः ढाई सेर था। वह दूध गरम करके जमाया गया और दूसरे दिन उसमें से मक्खन निकाल गया।
    बाबाजी को ऐसी ही अनेक सिद्धियों का हाल गोस्वामी गणेशदत्त जी सुनाया करते हैं; परन्तु यहाँ पर तो संक्षेप में इतना ही उल्लेख किया गया है। इन कुछ आश्चर्यजनक बातों को देखकर मन में आया कि विज्ञानवेत्ताओं से विनयपूर्वक निवेदन करूं कि आर्य-ऋषियों और मुनियों द्वारा सम्मानित पातञ्जल-योगदर्शन के सूत्र ‘जन्मौषधिमन्त्रत ः समाधिजाः सिद्धयः’ में एक मन्त्रसिद्धि भी मानी गई है। मन्त्रसिद्धि का चमत्कार देखने का अब तक मुझे कोई अवसर नहीं मिला था, परन्तु ये कुछ चमत्कार अपनी आँखों से देखकर मुझे मन्त्रसिद्धि में पूर्णतया विश्वास हो गया है। साथ ही एक प्रकार का विस्मय भी उत्पन्न हो गया है। उसी विस्मय के कारण आधुनिक विज्ञानवेत्ताओं से यह निवेदन करने की प्रबल इच्छा उत्पन्न हुई है कि आप पातञ्जल-योगदर्शन के उपर्युक्त मन्त्र में वर्णित मन्त्रसिद्धि को मानते हैं या नहीं? और यदि नहीं मानते हैं तो या तो आय भी ऐसे ही चमत्कार अपने विज्ञान द्वारा करके दिखायें और यदि आप दिखाने में समर्थ नहीं हैं तो आप अपने अभिमान को त्याग कर भारतीय आर्य शास्त्रों में बताई गई मन्त्रसिद्धि को सहर्ष स्वीकार कर लें, क्योंकि आप तो अपने को बराबर ही सत्य का पुजारी घोषित करते रहते हैं।

  3. #13
    नवागत
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    Bahut khoob likha hai

  4. #14
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    मूर्ति पूजा का तत्व ज्ञान

    (श्री स्वामी विवेकानन्दजी का एक भाषण)

    अन्य धर्मावलम्बियों के कथनानुसार हिन्दू लोग अनेक देवताओं को पूजने वाले समझे जाते हैं परन्तु वास्तविक बात ऐसी नहीं है। आप किसी हिन्दू मन्दिर में जाइये, भक्त लोग देवता की, एक ही परमात्मा को लक्ष्यकर स्तुति करते हुए दीख पड़ेंगे। गुलाब का अनेक नामों में उल्लेख करने पर भी उसकी सुगन्ध में फर्क नहीं होता। नाम भेद समझ लेना ठीक नहीं है। मेरे बचपन की बात है। एक पादरी हिन्दुस्तान के किसी गाँव में गंवारों को उपदेश दे रहा था। बीच ही में वह लोगों से कह बैठा- “यदि मैं अपने डण्डे से तुम्हारे देवताओं की मूर्तियाँ तोड़ डालूँगा, तो वे मेरा क्या कर लेंगी?”इस पर एक गंवार बोला- “पादरीसाहब यदि मैं तुम्हारे आसमानी बाप को गालियाँ दूँगा तो वह मेरा क्या कर लेंगे?” पादरी ने कहा- “तेरे मरने पर वह तुझे दण्ड देगा।” गंवार नम्रता से बोला- “तुम्हारे मरने पर हमारे देवताओं की मूर्तियाँ भी तुम्हें दण्ड देंगी।” इस बात के बाद वितण्डा से क्या लाभ है? यदि मूर्तिपूजा करना पाप है, तो पाप से पवित्रता की उत्पत्ति कैसे हो सकती है? मैंने उन्हीं मूर्ति-पूजकों में से ऐसे ऐसे महात्मा और पुण्यात्मा देखे हैं, जिनकी तुलना किसी देश या धर्म के महापुरुष से नहीं हो सकती।इसमें संदेह नहीं है कि धर्म का पागलपन उन्नति में बाधा डालता है, पर अन्धश्रद्धा उससे भी भयानक है। ईसाइयों को प्रार्थना के लिये मंदिर की क्या आवश्यकता है? प्रार्थना करते समय आंखें क्यों मूँद लेनी चाहिएं? परमेश्वर के गुणों का वर्णन करते हुए ‘प्राटेस्टएट’ ईसाई मूर्तियों की कल्पना क्यों करते है? ‘कैथोलिक’ पन्थ वालों को मूर्तियों की क्यों आवश्यकता हुई? भाइयों, श्वास निश्वास के बिना जीना जैसे सम्भव नहीं, वैसे ही गुणों की किसी प्रकार की मनोमय मूर्ति बनाये बिना उनका चिन्तन होना असम्भव है। हमें यह अनुभव कभी नहीं हो सकता कि हमारा चित्त निराकार में लीन हो गया हो, क्योंकि जड़ विषय और गुणों की मिश्र अवस्था के देखने का हमें अभ्यास हो गया है गुणों के बिना जड़ विषय और जड़ विषयों के बिना गुणों का चिन्तन नहीं किया जा सकता, इसी तत्व के अनुसार हिन्दुओं ने गुणों का मूर्ति रूप दृश्य स्वरूप बनाया है। मूर्तियां ईश्वर के गुणों का स्मरण कराने वाले चिन्ह मात्र है। चित्त चंचल न होकर सद्गुणों की मूर्ति ईश्वर में तल्लीनता होने के हेतु मूर्तियाँ बनाई गई हैं। हरएक हिंदू जानता है कि पत्थर की मूर्ति ईश्वर नहीं है। इसी से वे पेड़, पत्ती, आग, जल, पत्थर आदि सभी दृश्य वस्तुओं की पूजा करते हैं। इससे वे पत्थर-पूजक नहीं है। आप मुख से कहते हैं “हे परमात्मन् तुम सर्वव्यापी हो।” परन्तु कभी इस बात का आपने अनुभव भी किया है? प्रार्थना करते हुए आपके हृदय में आकाश का आनन्द विस्तार या समुद्र की विशालता क्या नहीं झलकती? यही ‘सर्वव्यापी’ शब्द का दृश्य स्वरूप है।मूर्ति पूजा में मनुष्य स्वभाव के विरुद्ध क्या हैं हमारे मन की रचना ही ऐसी है कि वह बिना किसी दृश्य पदार्थ की सहायता के केवल गुणों का चिन्तन नहीं कर सकता। मस्जिद, चर्च, क्रूस, अग्नि, आकाश, समुद्र, आदि दृश्य पदार्थ हैं। हिंदुओं ने उनके स्थान में मूर्ति की कल्पना की तो क्या बेजा किया? निराकार की स्तुति करने वाले लोग मूर्तियाँ पूजकों को घृणा की दृष्टि से देखते हैं, परन्तु उन्हें इस कल्पना की गन्ध तक नहीं है कि मनुष्य ईश्वर हो सकता है। वे बेचारे चार दीवालों की कोठारी में बंद हैं। पास पड़ोसियों को सहायता करने से अधिक दूर उनकी दृष्टि नहीं पहुँचती। कोई देवात्मा ग्रन्थ या मूर्ति तो उपासना के साधन मात्र ही हैं। एक बार हिन्दुस्तान में मैं एक महात्मा के पास जाता है। बाइबल, वेद, कुरान, आदि की चर्चा करने लगा। पास ही एक पुस्तक पड़ी थी। जिसमें पानी बरसने का भविष्य लिखा था। महात्मा ने मुझसे कहा इसे जोर से दबाओ, मैंने खूब दबाई वे आश्चर्य से बोले इसमें तो कई इंच पानी बरसने का भविष्य है, पर तुम्हारे दबाने से एक बूँद भी नहीं टपकी! मैंने कहा महाराज, यह पुस्तक जड़ है। इस पर उन्होंने उत्तर दिया कि इसी तरह जिस मूर्ति या पुस्तक को तुम मानते हो वह कुछ नहीं करती परन्तु इष्ट मार्ग को बताने में सहायक होती है। ईश्वर रूप हो जाना हिन्दुओं का अन्तिम लक्ष्य है। वेद कहते हैं कि बाह्य उपचारों से पूजा करना उन्नति की पहली सीढ़ी है। प्रार्थना दूसरी सीढ़ी और तन्मय हो जाना तीसरी सीढ़ी है। मूर्ति पूजक मूर्ति के सामने बैठकर कहता है- “प्रभो! सूर्य, चन्द्र या तारागणों का प्रकाश हम तुम्हें कैसे दिखायेंगे? ये सब ही तुम्हारे प्रकाश से प्रकाशमान हैं।” मूर्तिपूजक अन्य साधकों से पूजा करने वालों की निन्दा नहीं करते। दूसरी सीढ़ी पर चढ़े हुए मनुष्य का पहली सीढ़ी के मनुष्य की निन्दा करना, तरुण पुरुष का बच्चे को देखकर ‘वह अभी बच्चा है’ कहकर-हँसने के बराबर है। मूर्तिदर्शन के साथ- साथ यदि किसी के मन में पवित्र भाव उत्पन्न होते हों तो मूर्तिदर्शन करना पाप कैसा? हिन्दू जब दूसरे सोपान में पहुँचता है तब पहले सोपान पर स्थित समाज की निन्दा नहीं करता। वह यह नहीं समझता कि मैं पहिले कुछ बुरे कर्म करता था। सत्य की धुँधली कल्पना को पार कर प्रकाश में आना ही हिन्दुओं का कार्य है, वे अपने को पापी नहीं समझते। हिन्दुओं का विश्वास है कि जीवमात्र पुण्यमय-पुण्यस्वरूप के अनन्त रूप हैं। जंगली लोगों के धर्म मार्ग से लेकर अद्वैत वेदान्त तक सभी मार्ग एक ही केन्द्र के निकट पहुँचते हैं। देशकाल और पात्रतानुसार सब मानवी यत्न एक सत्य का पता लगाने के लिए हैं। नानाविध गरुड़ पक्षी एक सूर्य बिंब की ओर जा रहे है। हिन्दुओं का सिद्धान्त है कि कोई गरुड़ अशक्त होने से बीच के ही किसी मुकाम पर विश्राम कर लेगा, पर कालान्तर से वह, बिम्ब के पास अवश्य पहुँच जायगा। हिन्दुओं का यह हट नहीं हैं कि सब कोई हमारे विशिष्ट मतों को मानें। अन्य धर्मावलम्बी चाहते हैं कि एक ही नाप का अंगा सब कोई पहिने, चाहे वह ठीक बैठता हो या न हो। प्रतिमा या पुस्तक मूलरूप को व्यक्त करने वाले साधनमात्र हैं, यदि कोई उनका उपयोग न करे तो हिन्दू उसे मूर्ख अथवा पापी नहीं समझते। एक सूर्य की किरणें अनेक रंगों के काँचों से नानारूप की दीख पड़ती हैं, इसी तरह भिन्न-भिन्न धर्म सम्प्रदाय एक ही केन्द्र के भिन्न-भिन्न मार्ग हैं। गीता में श्रीकृष्ण कहते हैं:-“हे धनंजय, मुझसे भिन्न कहीं कुछ नहीं है, मुझमें ही सब कुछ हैं। जैसे डोरे से मणि पोए हुए होते हैं, वैसे मुझसे संसार के सारे पदार्थ पोए हुए हैं।” “जिन 2 वस्तुओं में महत्ता, तेजस्विता अथवा बल है, उन उन वस्तुओं को मेरे ही तेज के अंश से उत्पन्न हुई जान।”अनेक युगों की परम्परा से निर्माण हुए हिन्दु धर्म के मानव जाति पर अनन्त उपकार हुए हैं। “परमतासहिष्णुता” हिन्दुओं के हृदय में छूती तक नहीं। ‘अविरोधी तु यो धर्मों स धर्मों मुनिपुँगव।’ यह हिन्दुओं का सिद्धाँत है वे यह नहीं कहते कि हिन्दुओं को ही मुक्ति मिलेगी, बाकी सब नरक में जाएंगे। व्यास महर्षि का कथन है कि भिन्न जाति और भिन्न धर्म के ऐसे बहुत से लोग मैंने देखे हैं जो पूर्णता प्राप्त हुए हैं।

  5. #15
    नवागत
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    0
    Bahut kamaal likha hai aapne

  6. #16
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    Dilchasp hai

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