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Thread: कुछ अलौकिक घटनाओं के किस्से

  1. #21
    नवागत
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    Badhiya likha hai aapne

  2. #22
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    आपके पिताजी की तरह आप भी प्रतिभासंपन है मित्र। आपकी लेखनी भी उत्तम है। अम्मा के सपनों कि बात मुझे अच्छी लगी ऐसे कई किस्से मेने सुने है जिसमें ऐसे होते हुई देखा है और अम्मा ने जो हिंमत दिखाई वह वाकेय काबिलेतारीफ है। ऐसे मामले में व्यक्ति को अपने आत्मविश्वास के साथ ही लडना होता है। अब वह चाहे सिर्फ मानसिकता हो या सच दोनों में आत्मशक्ति ही काम में आती है।

  3. #23
    नवागत
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    अम्मा बताती थीं कि कानपुर में ही मेरी बहनों का जन्म हुआ। जिसमें दो बहनें आज भी हैं जबकि एक नहीं रही थी। अम्मा बताती थीं कि गर्भावस्था के दौरान उन्हें विलक्षण अनुभव होते थे। जब वह चलती थीं तो ऐसी अनुभूति होती थी कि कोई पीछे से ढकेल रहा है और जैसे ही वह गिरने को होती थीं आगे से कोई थाम कर गिरने नहीं देता था। मेरी एक बहन जो छह महीने में ही हो गई थी उस समय भी उन्होंने पिताजी से कह दिया था किसी ने मुझे ढकेल दिया लगता है यह बच्चा बचेगा नहीं। ठीक ऐसा ही हुआ भी। वह कानपुर में उर्सला अस्पताल में चिकित्सकीय जांच के लिए जाती थीं। मै उनके साथ होता था हम मां बेटे पी रोड से पैदल ही वहां तक जाते थे और लौटते थे रास्ते में दोनो तरफ कब्रिस्तान पड़ता था। अम्मा अक्सर शार्ट कट के लिए कब्रिस्तान के बीच से होकर निकलती थीं। मई जून के महीने में जब दूर दूर तक कोई आदमी नहीं दिखता था हम दोनो मां बेटे कब्रिस्तान के बीच से होकर निकल जाते थे किसी को कोई डर नहीं लगता अम्मा से जब कोई कुछ कहता था तो वह कहती थीं कि मर चुके लोगों से ज्यादा खतरनाक जिंदा इंसान होते हैं।
    अम्मा को गंध का बहुत अच्छा ज्ञान था वह कहती थीं कि इंसान के कर्मों के अनुसार उसकी गंध होती है। अगर कोई गंदा इंसान मर कर भूत बना तो गंधी बदबू यानी दुर्गंध ही फैलाएगा। अच्छी आत्माओं के पास से खुशबू आती है। अगर उन्हें कभी कोई दुर्गंध या खुशबू आती थी तो वह हम लोगों को चुप करा देती थीं कहती थीं कि कोई आत्मा जा रही है। चुप हो जाओ वरना वह डिस्टर्ब हो जाएगी।
    यह घटना सन 1972-74 के आसपास की है। हम कानपुर में पी रोड के पास जहां रहते थे। वह तीसरी मंजिल का हिस्सा था जिसमें जिसमें तीन कमरे बने थे। हमारे बगल के कमरे में एक मिश्रा जी रहा करते थे। हमारे पास दो कमरे व किचन का हिस्सा था। सामने विशाल छत थी वह मकान करीब छह सौ वर्ग गज में बना था। सबसे नीचे व बीच के हिस्से में करीब 15 किराएदार रहा करते थे। पिताजी की चूंकि रात की ड्यूटी रहती थी इसलिए वह दो ढाई बजे रात में आते थे। पिताजी के इंतजार में अम्मा रात को बैठकर स्वेटर बुना करती थीं। स्वेटर बुनने में अम्मा को महारत हासिल थी उन्हें कोई भी डिजाइन दिखा दो वह स्वेटर में उसे उतार देती थीं। एक बार एक लड़के के स्वेटर डिजाइन देखने के लिए हम उसके पीछे पीछे उसके घर तक पहुंच गए थे। खैर उन दिनों कनपटी मार का कानपुर में आतंक था। आए दिन उसके किस्से आते रहते थे इस बीच हमारे एरिये में भी चर्चा शुरू हुई की रात में कोई भूत आता है और सबका दरवाजा खटखटाता है। न कोई कुछ बोलता था न दरवाजा खोलता था। इस बीच एक दिन हमारे घर का दरवाजा भी किसी ने खटखटाया अम्मा ने पूछा कि कौन है लेकिन कोई जवाब नहीं आया। इसके थोड़ी देर बाद पिताजी ने आवाज दी। वहां दूसरे तल पर जीने में दरवाजा था अम्मा खोलने गईं। कुछ देर पहले हुए घटनाक्रम से वह थोड़ा दहशत में थीं। अम्मा की एक आदत थी कि दरवाजा खोलने से पहले वह धीरे से पूछती थीं कि आ गए। पिताजी कहते थे हां खोलो। अम्मा ने दरवाजा खोलने से पहले पूछा कि आ गए क्या। लेकिन कोई जवाब ने आने पर वह ठिठक गईं और सवाल दोहराया कोई जवाब न आने पर उन्हें थोड़ डर लगा उन्होंने कहा कि जब तक जवाब नहीं दोगे मै दरवाजा नहीं खोलूंगी। इसके बाद कोई जवाब तो नहीं आया लेकिन जूतों की चरमराहट से ऐसा लगा कि कोई वापस जा रहा है। अम्मा ने जंगले से झांक कर नीचे गैलरी में देखना चाहा तो अंधेरे में एक तगड़ा सा साया जाता दिखा। इस घटना के करीब बीस मिनट बाद पिताजी आए तो अम्मा ने कहा कि पहले जंगले के पास आओ मै देख लूं तब दरवाजा खोलूंगी। इस पर पिताजी वापस नीचे गए और अम्मा दरवाजा खोल कर उन्हें लिवा लाईं। इस विषय पर चर्चा करते हुए वह लोग सो गए अगले दिन तड़के शोर और हो हल्ले से नींद खुली तो पता चला कि बगल वाले मकान में जो निगम साहब किराए पर रहते हैं उनकी पत्नी को घायल कर चोरी हो गई है। बाद में पता चला कि रात में निगम साहब फिल्म देखने गए थे उनकी पत्नी घर में थीं। यह तो तय था कि निगम साहब देर में घर आएंगे। ऐसे में रात में उठकर दरवाजा कौन खोले यह सोचकर उनकी पत्नी ने दरवाजा उढ़का दिया और बिना अंदर से बंद किये सो गईं। रात में उनका दरवाजा खटखटाया तो उन्होंने लेटे लेटे ही कहा चले आओ दरवाजा खुला है। इसके बाद जो अंदर आया उसे देखकर वह जब तक कुछ समझतीं धाड़ से उनके सिर पर किसी भारी चीज से वार हुआ और वह बेहोश होती चली गईं। मित्रों के साथ गप्प लड़ाकर जब निगम साहब घर पहुंचे तो पत्नी को पहले अस्पताल ले गए। बाद में चोरी की रिपोर्ट लिखाई।
    उधर घूंघट प्रकरण के बाद मेरी दादी ने अम्मा को अपने जीते जी कभी घर में नहीं घुसने दिया। 1974 में दादी के निधन के बाद बाबा हम तीनों भाई बहनों के साथ अम्मा को लेकर हरिद्वार आ गए। उसी साल भैया ने बीएससी पास की उनकी कानपुर यूनिवर्सिटी में 21वीं पोजीशन आई। उन्होंने एमएससी करने के लिए कानपुर आईआईटी का एंट्रेंस एक्जाम दिया जिसमें उन्होंने दस हजार लड़कों में टॉप किया।
    आईआईटी में रहकर पढ़ना होता है। लेकिन हमारी स्थिति ऐसी नहीं थी इसलिए भैया ने काउंसिलिंग के समय आवेदन दिया कि वह आईआईटी छोड़ रहे हैं क्योंकि पिताजी उनकी पढ़ाई का खर्च नहीं उठा सकते हैं। इस पर आईआईटी बोर्ड की बैठक हुई। जिसमें उन्हें आईआईटी घर से आने की सुविधा दी गई। और वह घर से साइकिल से आईआईटी पढ़ने जाने लगे।

  4. #24
    नवागत
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    Jai ho ramkrishna ji

  5. #25
    नवागत
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    बाबा की जय हो। भक्त को तो आप खुद सम्हालेंगे।

  6. #26
    नवागत
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    मै आठ साल का था जब पहली बार ट्रेन में बैठा। वह भी कानपुर से हरिद्वार के लंबे सफर के लिए बाबा फर्स्ट क्लास से ही सफर करते थे इसलिए उसी से जाना हुआ। ट्रेन के रोमांचकारी सफर के बाद जब हम लोग सुबह हरिद्वार स्टेशन पर उतरे तो उस समय वहां रिक्शे नहीं चलते थे सिर्फ तांगे ही चला करते थे। तांगे में बैठकर हम लोग कनखल में होली मोहल्ला में इंजनवाली हवेली में पहुंचे जहां बाबा रहते थे। इसे इंजन वाली हवेली इस लिए कहा जाता था क्योंकि इसके एक काने पर चक्की लगी हुई थी। उस जमाने में जब चक्की लगी होगी तो लोगों के लिए उसकी आवाज चक्की जैसी थी। उसके पीछे रानी की हवेली थी। इंजनवाली हवेली और रानी की हवेली के बीच में एक बहुत बड़ा करीब 20 फुट व्यास का कुअां था जिसमें 12 चरखी लगी थीं। कहते थे कि कुआं पाताल तोड़ गहराई का था। आजादी से पहले हमारे घर में जब कुर्की हुआ करती थी कि उस समय बंदूक तलवारें अादि सब इसी कुएं के मुंह में समाए। बाद के समय जब कुएं की उपयोगिता समाप्त होती गई तो लोगों ने अपनों घरों का मलबा उसमें डालना शुरू कर दिया और 1990 तक लोगों ने मलबे से उस कुएं को पाट दिया।
    खैर हमारी बिल्डिंग में नौ घर थे जिसमें एक तरफ के दो घरों के लिए एक जीना था। बाकी सब के दो घरों के बीच में पतला सा जीना दिया हुआ था वह उनका सैप्रेट जीना था। वैसे हमारे जीने का इस्तेमाल कामन जीने के रूप में हुआ करता था। हमारे घर में रसोई में और बाहर वाले बड़े कमरे में धुआं निकलने के लिए एक मोखा बना हुआ था। जिससे जाड़े में जब कमरे में आग जलाकर रखी जाए तो धुआं सीधे छत पर जाकर बाहर निकल जाए। सभी के घरों में ये बने हुए थे इसलिए इसमें कोई अजूबा नहीं था। पीछे रानी की हवेली की विशाल छत में भी तमाम मोखे या धुआंरे बने थे जो ऊपर से सीमेंटेड थे धुआं निकलने के लिए झरोखे बना दिये गए थे। यह घटना जाड़ों के आसपास की है बच्चे छत पर खेलते थे या मैदान मेंं एक बच्चा जिसका परिवार चक्की के ठीक पीछे रहता था वह लोग काफी गरीब थे। कुछ छोटा मोटा काम किया करते थे वह भी अन्य बच्चों के साथ खेलता था। लोग कहते थे उस कोने वाले मोखे की तरफ मत जाना। वहां कुछ था जिसे लोग बाबा या कुछ और कहा करते थे। एक दिन खेलते खेलते बच्चों में शरारत हुई। किसी ने शर्त लगायी कि इतना बहादुर हो तो उस मोखे में हाथ डालकर दिखाओ उस समय शाम हो चुकी थी ठंडी हवा चल रही थी। अधिकांश बच्चे अपने घर जा चुके थे। वह हाथ डालने आगे बढ़ा तो मौजूद कई बच्चों ने रोक दिया और कहा कि पागल हो अभी पकड़ लेगा। बच्चे उसे लेकर चले आए लेकिन शाम होते होते वह अकेले देखने के लिए कि क्या होता है उस मोखे तक गया और अपना हाथ अंदर डाल दिया। अब जब उसने हाथ निकालना चाहा तो या तो हाथ अंदर फंस गया या कुछ और हुआ उसका हाथ बाहर नहीं निकला वह चीखता चिल्लाता रहा लेकिन किसी को उसकी आवाज सुनाई नहीं दी। अगले दिन लोगों ने उसे बेहोशी की हालत में पाया लेकिन तब तक उसकी आवाज जा चुकी थी। 1981 में मेरे हरिद्वार छोड़ने तक वह अस्फुट सा कुछ बोलने लगा था। लेकिन समझा नहीं पाता था।
    1976 में कनखल के सनातन धर्म हायर सेकंड्री स्कूल में मेरा दाखिला हुआ सीधे क्लास छह में हुआ। इससे पहले मेरी स्कूली शिक्षा नहीं हुई थी। घर में रहकर हिन्दी गणित आदि विषयों की पढ़ाई हुई थी। इसलिए जब सीधे क्लास छह में पढ़ने बैठा तो मुझे कुछ समझ ही नहीं आता था और जब समझ में नहीं आता था तो पढ़ने में रुचि भी नहीं होती थी। खींचतान के पास हो जाता था। किसी तरह कक्षा आठ पास की लेकिन घर में सबकी शिक्षा थी कि विज्ञान विषय लेकर आगे की पढ़ाई करूं लेकिन मुझे विज्ञान समझ में ही नहीं आता था न उसकी गणित। शरारतें करने में मन लगता था। इसी बीच एक घटना घटी जिसने मेरी जिंदगी की दिशा बदल दी। हुआ कुछ यूं कि हमारा स्कूल दरभंगा नरेश का कभी किला था जिसे स्कूल में तब्दील कर दिया गया था उसमें बहुत बड़ा दरबार हाल था। किनारे किनारे कमरे बने थे। उनके सामने फुलवारी थी और चार पांच सीढ़ी चढ़कर सहन था इसके पार किनारे दरबार हाल था। सहन के नीचे कुछ झरोखे से बने थे। लेकिन वहां जाने का रास्ता शायद बंद कर दिया गया था क्योंकि काफी ढूंढने पर भी हमें वह रास्ता नहीं मिला। स्कूल में जाने का मुख्य रास्ता सती घाट या अस्थि प्रवाह घाट होकर था तथा पीछे की तरवाह का गेट पार करने पर एक बहुत बड़ा मैदान था जिसमें एक तरफ कैंटीन थी। दूसरी तरफ गंगा नदी के किनारे कुछ खंडहर थे उनके बीच में एक पुराना शिव मंदिर था। हम लोग टहलने घूमने शिव मंदिर तक भी जाते थे। भूत प्रेत न मैने कभी देखे थे न मानता था। मै लगभग 13 साल का रहा होऊंगा। मेरी क्लास के सभी लड़के मुझसे उम्र में बड़े थे। एक दिन साथियों में बात चली कि अगर खंडहर में जा के बोलो कि सिर कटा राजा बाहर आ तो वह बाहर आ जाता है। मैने सोचा चलो ट्राई करते हैं। मैने एक दिन चुपचाप जाकर खंडहर के बाहर जाकर चिल्ला कर कहा कि सिर कटा राजा बाहर आ। कुछ नहीं हुआ तो मैने तीन बार आवाज लगायी और भाग आया। लेकिन उस समय तो कुछ नहीं हुआ अगले दिन मै स्कूल आया और इंटरवल में घर खाना खाने गया। उस दिन कढ़ी चावल बना था मै खाना खाकर स्कूल आया तो तबियत कुछ खराब लगी और बहुत तेज उलटी हुई। स्कूल से छुट्टी लेकर घर भेजा गया। घर पहुंचते पहुंचते मेरे होश गुम थे। मै लेटा तो ऐसा लगा छाती पर कोई बोझ लदा है। मुझे ऊटपटांग दृश्य दिखाई देने लगे। अम्मा को बुखार के चलते मै बड़बड़ा रहा हूं। उन्होंने मेरे हाथ में सब्जी काटने का चाकू दे दिया और मै अदृश्य में हवा में किसी को काटने लगा। घर पर डाक्टर देखने आए तो मैने पूरे होशओहवास में उनसे बात की और उनके घर से निकलते ही पुनः दौरा सा पड़ गया। मै अपने होश में नहीं था मुझे रामकृष्ण मिशन अस्पताल ले जाया गया जहां मै 15 दिन भर्ती रहा। डाक्टर ने कंपलीट बेड रेस्ट बताया तीन महीने तक पढाई लिखाई बंद रही। इसके बाद मुझे साइंस छोड़ कर कला विभाग के विषय लेकर परीक्षा उत्तीर्ण करनी पड़ी। यहा प्रयास साल बचाने के लिए हुआ था। इसके बाद हाई स्कूल की परीक्षा से पहले अम्मा की तबियत बुरी तरह खराब हुई। और अंततः हम सब को कानपुर आना पड़ा। अम्मा को लेकर जब हम हरिद्वार से चले थे तो यह नहीं पता था कि समय हरिद्वार से हमारी फाइनल विदाई की पटकथा लिख रहा है लेकिन कुछ हालात ऐसे हुए कि हमें कानपुर में रुकना पड़ा और पिताजी को दैनिक जागरण में पुनः वापसी करनी पड़ी। करीब सात आठ महीने कानपुर में रुकने के बाद पिताजी का लखनऊ स्थानांतरण हो गया और हम लोग लखनऊ आ गए।

  7. #27
    नवागत
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    Likhte rahiye ramkrishna ji

  8. #28
    नवागत
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    बलरामपुर अस्पताल की वह भयानक रात

    कानपुर से लखनऊ आने के बाद भी अम्मा का इलाज चलता रहा उन्हें शुगर व शुगर के चलते हार्ट से रिलेटेड समस्याएं थीं इसके चलते उन्हें अक्सर या ये कहें कि हर महीने दो महीने में अस्पताल में भर्ती कराना पड़ता था। तीन चार दिन अस्पताल में भर्ती रहकर घर आ जाती थीं। जबतक बलरामपुर अस्पताल में आईसीयू यूनिट नहीं बनी थी तब तक उन्हें स्पेशल वार्ड में भर्ती किया जाता था यह वार्ड पत्रकारों के परिजनों के लिए सेमी प्राइवेट रूम जैसा होता था। इसके बाद बलरामपुर अस्पताल में आईसीयू यूनिट हार्ट के मरीजों के लिए बन गई। अम्मा की तबियत बिगड़ी तो उन्हें वहीं भर्ती किया गया। हार्ट बीटिंग की मानिटरिंग के लिए मशीन लगी थी। मेरे लिए यह देखना पहला अनुभव था। कोई और देखभाल करने वाला नहीं था। घर पर काम करना होता था छोटी बहनों को तैयार करके स्कूल भेजकर अम्मा व अपने लिए खाना लेकर अस्पताल आ जाता था एक दिन दोपहर में मै बेंच कर खाना खाने बैठा सामने अम्मा सो रही थीं तब तक बगल के केबिन वाले मरीज की हालत बिगड़ी उसे खून की उलटी हुई और ढेर हो गया डाक्टरों ने जांच की हार्ट पंप किया इंजेक्शन दिया लेकिन सब बेकार रहा। बहुत अजीब लग रहा था। मैने शीशे पर पर्दा खींचा मन किया खाना न खाऊं लेकिन फिर लगा अगर खाना न खाया तो शाम को काम करना है रात में जगना है कैसे होगा इसलिए यही सब सोचते हुए अपना खाना खा लिया। और लेट गया अस्पताल में दो ही स्थितियां होती हैं या तो मरीज ठीक होकर घर जाता है या फिर उसकी अंत्येष्टि होती है।
    ऐसे ही एक बार बरसात के दिन थे पानी बरस रहा था बादल रह रहकर गरज रहे थे। दिन में ही अंधेरा छाया हुआ था। अम्मा की तबियत अचानक बिगड़ गई। मै उनको लेकर अस्पताल गया। वहां उनको आईसीयू नहीं मिला उसकी जगह आईसीयू से लगा महिला वार्ड मिला। जिसमें पांच बेड थे। अम्मा के अलावा उसमें चार महिलाएं और भर्ती थीं। चारों महिलाएं बोल बतिया रही थीं। किसी की हालत ज्यादा गंभीर नहीं लग रही थी। अम्मा की हालत भी भर्ती होने के बाद दवाइयां मिलने व चढाए जाने पर हालत सुधरने लगी थी। उन को भर्ती कराने की औपचारिकता पूरी करने के बाद घर जाकर सब व्यवस्थित करके जब मै आया तो उस समय भी सब ठीक लगा। महिला वार्ड होने के नाते वहां हर महिला के पास महिला ही थी। मेरा मामला अलग था इसलिए मै वार्ड के भीतर और बाहर चक्कर लगा रहा था। हालत यह थी कि डाक्टर नर्स टोकें भी नहीं और जरूरत पड़ने पर मै उपलब्ध भी रहूं। बाहर पानी अभी भी गिर रहा था। अंधेरा कुछ गहरा गया था। तब तक डाक्टर नर्स दौड़ते हुए वार्ड में घुसे। मै भी चौकन्ना हुआ। अंदर गया तो देखा कि अम्मा के पैताने जो बुढ़िया भर्ती थी और अपने बच्चों से बातें कर रही थी अचानक उसकी तबियत बिगड़ गई थी। डाक्टरों ने देखा हार्ट बीट गिर रही है उन्होंने उसे बचाने की भरपूर कोशिश शुरू की उसके पलंग को हरे पर्दे के घेरे में ले लिया गया लेकिन सारे प्रयास निरर्थक रहे। हरा पर्दा हट गया बुढ़िया का मुंह सफेद चादर से ढक दिया गया उसके घर वालों को खबर दे दी गई थी। जो महिला साथ थी वह शायद सूचना देने चली गई थी। इसके बाद अभी एक घंटा भी नहीं बीता था कि एक दम कार्नर पर जो पलंग था उस पर जो महिला थी उसकी सासें भी थम गईं। अब अम्मा के अलावा दो बुढ़िया और बची थीं रात नौ बजते बजते एक और बुढ़िया चल बसी। अब अम्मा के पैताने एक व बगल में दाहिनी तरफ दो महिलाओं के शव थे। तीन जीती जागती महिलाएं कुछ पलों में लाश में बदल चुकी थीं अम्मा की बगल में केवल एक बुढ़िया थी जिसकी सासें बहुत धीमी चल रही थीं। मैने अम्मा से पूछा डर तो नहीं लग रहा अम्मा ने बेधड़क कहा बिल्कुल नहीं। तुम आराम से बाहर बैठो। मै बाहर जाकर लेट गया । मै वार्ड के दरवाजे के एक दम बगल में लेटा था। कुछ पल सोया होऊंगा या झपकी लगी होगी तब तक कुछ आवाज हुई या खटका हुआ कुछ समझ में नहीं आया मै दौड़कर अंदर गया तो देखा कि अम्मा के बगल में जो बुढ़िया थी वह भी चल बसी थी मै दौड़कर डाक्टर को बुला कर लाया उन्होंने कन्फर्म कर दिया। अम्मा को अगले दिन दूसरा वार्ड मिल गया लेकिन वह काली रात मेरे जहन में आज भी जब नाचती है तो सिहरन सी हो जाती है।

  9. #29
    नवागत
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    बहुत रोचक कहानी है।

  10. #30
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    Quote Originally Posted by ramkrishna View Post
    बलरामपुर अस्पताल की वह भयानक रात

    कानपुर से लखनऊ आने के बाद भी अम्मा का इलाज चलता रहा उन्हें शुगर व शुगर के चलते हार्ट से रिलेटेड समस्याएं थीं इसके चलते उन्हें अक्सर या ये कहें कि हर महीने दो महीने में अस्पताल में भर्ती कराना पड़ता था। तीन चार दिन अस्पताल में भर्ती रहकर घर आ जाती थीं। जबतक बलरामपुर अस्पताल में आईसीयू यूनिट नहीं बनी थी तब तक उन्हें स्पेशल वार्ड में भर्ती किया जाता था यह वार्ड पत्रकारों के परिजनों के लिए सेमी प्राइवेट रूम जैसा होता था। इसके बाद बलरामपुर अस्पताल में आईसीयू यूनिट हार्ट के मरीजों के लिए बन गई। अम्मा की तबियत बिगड़ी तो उन्हें वहीं भर्ती किया गया। हार्ट बीटिंग की मानिटरिंग के लिए मशीन लगी थी। मेरे लिए यह देखना पहला अनुभव था। कोई और देखभाल करने वाला नहीं था। घर पर काम करना होता था छोटी बहनों को तैयार करके स्कूल भेजकर अम्मा व अपने लिए खाना लेकर अस्पताल आ जाता था एक दिन दोपहर में मै बेंच कर खाना खाने बैठा सामने अम्मा सो रही थीं तब तक बगल के केबिन वाले मरीज की हालत बिगड़ी उसे खून की उलटी हुई और ढेर हो गया डाक्टरों ने जांच की हार्ट पंप किया इंजेक्शन दिया लेकिन सब बेकार रहा। बहुत अजीब लग रहा था। मैने शीशे पर पर्दा खींचा मन किया खाना न खाऊं लेकिन फिर लगा अगर खाना न खाया तो शाम को काम करना है रात में जगना है कैसे होगा इसलिए यही सब सोचते हुए अपना खाना खा लिया। और लेट गया अस्पताल में दो ही स्थितियां होती हैं या तो मरीज ठीक होकर घर जाता है या फिर उसकी अंत्येष्टि होती है।
    ऐसे ही एक बार बरसात के दिन थे पानी बरस रहा था बादल रह रहकर गरज रहे थे। दिन में ही अंधेरा छाया हुआ था। अम्मा की तबियत अचानक बिगड़ गई। मै उनको लेकर अस्पताल गया। वहां उनको आईसीयू नहीं मिला उसकी जगह आईसीयू से लगा महिला वार्ड मिला। जिसमें पांच बेड थे। अम्मा के अलावा उसमें चार महिलाएं और भर्ती थीं। चारों महिलाएं बोल बतिया रही थीं। किसी की हालत ज्यादा गंभीर नहीं लग रही थी। अम्मा की हालत भी भर्ती होने के बाद दवाइयां मिलने व चढाए जाने पर हालत सुधरने लगी थी। उन को भर्ती कराने की औपचारिकता पूरी करने के बाद घर जाकर सब व्यवस्थित करके जब मै आया तो उस समय भी सब ठीक लगा। महिला वार्ड होने के नाते वहां हर महिला के पास महिला ही थी। मेरा मामला अलग था इसलिए मै वार्ड के भीतर और बाहर चक्कर लगा रहा था। हालत यह थी कि डाक्टर नर्स टोकें भी नहीं और जरूरत पड़ने पर मै उपलब्ध भी रहूं। बाहर पानी अभी भी गिर रहा था। अंधेरा कुछ गहरा गया था। तब तक डाक्टर नर्स दौड़ते हुए वार्ड में घुसे। मै भी चौकन्ना हुआ। अंदर गया तो देखा कि अम्मा के पैताने जो बुढ़िया भर्ती थी और अपने बच्चों से बातें कर रही थी अचानक उसकी तबियत बिगड़ गई थी। डाक्टरों ने देखा हार्ट बीट गिर रही है उन्होंने उसे बचाने की भरपूर कोशिश शुरू की उसके पलंग को हरे पर्दे के घेरे में ले लिया गया लेकिन सारे प्रयास निरर्थक रहे। हरा पर्दा हट गया बुढ़िया का मुंह सफेद चादर से ढक दिया गया उसके घर वालों को खबर दे दी गई थी। जो महिला साथ थी वह शायद सूचना देने चली गई थी। इसके बाद अभी एक घंटा भी नहीं बीता था कि एक दम कार्नर पर जो पलंग था उस पर जो महिला थी उसकी सासें भी थम गईं। अब अम्मा के अलावा दो बुढ़िया और बची थीं रात नौ बजते बजते एक और बुढ़िया चल बसी। अब अम्मा के पैताने एक व बगल में दाहिनी तरफ दो महिलाओं के शव थे। तीन जीती जागती महिलाएं कुछ पलों में लाश में बदल चुकी थीं अम्मा की बगल में केवल एक बुढ़िया थी जिसकी सासें बहुत धीमी चल रही थीं। मैने अम्मा से पूछा डर तो नहीं लग रहा अम्मा ने बेधड़क कहा बिल्कुल नहीं। तुम आराम से बाहर बैठो। मै बाहर जाकर लेट गया । मै वार्ड के दरवाजे के एक दम बगल में लेटा था। कुछ पल सोया होऊंगा या झपकी लगी होगी तब तक कुछ आवाज हुई या खटका हुआ कुछ समझ में नहीं आया मै दौड़कर अंदर गया तो देखा कि अम्मा के बगल में जो बुढ़िया थी वह भी चल बसी थी मै दौड़कर डाक्टर को बुला कर लाया उन्होंने कन्फर्म कर दिया। अम्मा को अगले दिन दूसरा वार्ड मिल गया लेकिन वह काली रात मेरे जहन में आज भी जब नाचती है तो सिहरन सी हो जाती है।
    आप बहुत हिंमतवाले व्यक्ति है।

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