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Thread: कुछ अलौकिक घटनाओं के किस्से

  1. #31
    नवागत
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    रात का सन्नाटा चीरते घुंघरू और छन छन छन

    अम्मा की बीमारी से मै परेशान चल ही रहा था कि इसी बीच पिताजी की तबियत खराब रहने लगी वह काफी बहकी बहकी बातें करने लगे कि मेरे शरीर में जहर फैल गया है। जहर से मेरा शरीर बेकार होता जा रहा है पहले लगा कि कोई ऊपरी बाधा है कई लोगों से बात की। कई लोगों ने देखा सबकी राय यही थी कि कोई ऊपरी बाधा नहीं है मैने अपने एक डाक्टर मित्र से चर्चा की तो उन्होंने कहा कि मेडिकल कालेज की साइकियेट्री डिपार्टमेंट में हेड डा. अनिल अग्रवाल हैं आप उनसे मिल लीजिए। मैने उनसे चर्चा की तो उन्होंने पिताजी को लाने को कहा मै पिताजी को लेकर गया। पिताजी वहां पहुंचकर भड़क गए कहने लगे तुमने मुझे पागल समझ लिया है क्या। जो पागलखाने ले आए हो। मैने कहा कि नहीं डाक्टर ने कहा है यह बीमारी है उनके पास इस जहर को निकालने के उपकरण हैं। वह निकाल देंगे। करीब तीन घंटे के परीक्षण के बाद उन्होंने कहा कि आपके पिताजी सीवियर डिप्रेशन में हैं इलेक्ट्रिक शॉक वह झेल नहीं पाएंगे। हम दवाओं से कंट्रोल करेंगे। पिताजी को भर्ती करना पड़ेगा। पिताजी को भर्ती कराना पड़ा मै रात में उनके साथ वहां रुकता था। वहां मैने अजब नजारा देखा। वह आम अस्पताल से बिल्कुल अलग था। पिताजी के साथ मै प्राइवेट रूम में था। एक तरफ प्राइवेट रूम बने थे दूसरी तरफ पुरुष वार्ड था दूसरी मंजिल पर लेडीज वार्ड था। रात में गैलरी में जल रही जीरो पावर की रोशनी में पसरा सन्नाटा बड़ा डरावना लगता था। पहली रात में सन्नाटे को चीरती छन छन छन की आवाज ने मुझे चौंका दिया आवाज धीरे धीरे करीब आ रही थी। मेरी धुकधुकी बढ़ती जा रही थी। आवाज तेज होते हुए एकदम दरवाजे के करीब आ गई तो मै उठकर दरवाजे के पास पहुंचा फिर वह आवाज दरवाजे से आगे बढ़ती प्रतीत हुई तो मैने झिर्री से झांक कर देखा तो पता चला कि वह डंडा बेड़ी में जकड़ा कोई अपराधी था। दिन में जब पुरुष वार्ड में गया तो देखा कि कई अपराधी वहां आराम फरमा रहे थे। बातचीत में पता चला कि सजा से बचने के लिए यहां भर्ती हो गए हैं। दिन में तमाम महिलाओं को वहां काम करते और बैठे देखा पूछने पर पता चला कि इन महिलाओं को इनके परिजन यहां छोड़ गए और अपना पता गलत लिखा गए अब यह महिलाएं ठीक हैं लेकिन नियम यह कहता है कि अकेले भेजा नहीं जा सकता और लिवाने कोई आता नहीं इसलिए यह महिलाएं यहीं रहने को अभिशप्त हैं।
    इसी तरह से एक दिन रात में 12 बजे के बाद अचानक घुंघरुओं की आवाज आने लगी जैसे कोई नाच रहा हो पता लगाने के लिए मै फिर कमरे से बाहर निकला तो देखा कि जेंट्स वार्ड में एक महिला नाच रही है। वहां भर्ती सारे पुरुष ताल दे रहे थे। मैने वार्ड ब्वाय को तलाशा तो वह लापता था। काफी देर तलाशने पर भी वह नहीं मिला तो मैने डा. अनिल अग्रवाल का फोन किया उन्होंने कहा कि देखिये नीचे चाय तो नहीं पी रहा है उन्होंने न मिलने पर दोबारा फोन करने को कहा। मैने नीचे भी ढूंढा और फिर उनको फोन किया उन्होंने आनन फानन में चार डाक्टरों और सात आठ वार्ड ब्वाय-गर्ल को भेजा सबके वार्ड में पहुंचते ही डांस रुक गया। पता चला कि वह महिला ऊपर महिला वार्ड में भर्ती थी वह एक नृत्यांगना थी जो डिप्रेशन की शिकार थी। डाक्टर बाकी मरीजों को देखने का नाटक करने लगे। महिला नर्सों ने महिला को पकड़ा कहा बस अब कार्यक्रम खत्म चलो आराम कर लो किसी तरह उसको फुसला कर ले जाया गया। अगले दिन डाक्टर साहब ने धन्यवाद दिया। इसी तरह से वक्त गुजरता रहा। पढ़ने का समय मिला या नहीं पढ़ा या नहीं लेकिन एक चीज में ईश्वर मेरे साथ रहा कि मै फेल नहीं हुआ बीए पास करके एलएलबी कर रहा था सोचा था वकालत करूंगा लेकिन कुदरत को कुछ और मंजूर था मै पत्रकारिता के क्षेत्र में आ गया। क्योंकि दिल में दहशत थी कि पिताजी बीमार अम्मा बीमार पिताजी की नौकरी छूट गईं तो गुजारा कैसे होगा। इसलिए पत्रकारिता को प्राथमिकता दी। नौकरी शूरू कर दी। बाद में जांच मे पता चला कि पिताजी को पार्किंसन बीमारी हो गई है। उस समय इस बीमारी का नाम पहली बार सुना था। तब न तो इंटरनेट था ना ही मोबाइल फोन। इसलिए गूगल अंकल से ज्ञान लेने का सवाल ही नहीं था।

  2. #32
    नवागत
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    क्या अपने पुण्य दान किये जा सकते हैं

    मेरे जीवन का प्रथम सोपान पूर्ण होने को है। इसमें आगे कई नये मोड़ आएंगे लिहाजा उसको मै नये सूत्र से लिखना आरंभ करूंगा। इस सूत्र के समापन से पहले बस इतना ही कहना है कि होश सम्हालने के बाद अपने जीवन में कई विपरीत स्थितियों से गुजरते हुए जब कोई आधार नही दिखा तो बचपन में हरिद्वार में सनातन धर्म स्कूल में प्रति सप्ताह होने वाले हनुमान चालीसा के पाठ से हनुमान जी मेरे आराध्य हो गए। हनुमान चालीस में एक प्रसंग है अष्ट सिद्धि नव निधि के दाता असबर दीन्ह जानकी माता। राम रसायन तुम्हरे पासा सादा रहो रघुपति के दासा। यानी हनुमान जी की कृपा से अष्ट सिद्धियां मिल सकती हैं। यह मेरी समझ में आया लेकिन शर्त यह थी कि राम रसायन अपने पास रखना पड़ेगा। तभी हनुमान जी की कृपा का आनंद लिया जा सकता है। अम्मा को रामचरित मानस तो आधी से ज्यादा जबानी याद थी। पिताजी यों तो दुर्गा सप्तशती के मंत्र गुनगुनाते रहते थे। लेकिन उनका प्रिय भजन अच्युतं केशवं राम नारायणं कृष्ण दामोदरं वासुदेवं हरिं श्रीधरं माधवं गोपिकावल्लभं जानकीनायकं रामचंद्रम भजे। अच्युतानंद गोविंद नामोच्चारण भेषजात् नश्यन्ति सकला रोगा सत्यं सत्यं वदाम्यहं। अनिश्चयंतयन्तोमा ् ये जनाः पर्युपासते तेषां नित्याभियुक्ताना योगक्षेमं वहाम्यहम्। लेकिन हमारे घर में पूजा का कोई स्थान नहीं था जहां नित्य पूजा होती हो। मैने पूजा शुरू की तो अम्मा पिताजी ने समझाया कि इसमें नियम संयम बहुत जरूरी होता है। भगवान को घर में बैठाने से बेहतर है। एक स्थान पर बैठकर उनका ध्यान करो। मुझे फिर एक चीज समझ में आई हनुमान चालीसा। इसमें कहा गया है कि जो शत बार पाठ कर कोई छूटहिं बंदि महासुख होई। और मैने एक बैठक में हनुमान चालीसा के 108 पाठ किये। अम्मा ने पूछा कि क्या मांगा मैने अपनी बेवकूफी भरी भरमाइशें बताईं तो अम्मा ने कहा कि ये हमेशा ध्यान रखना चाहिए कि भगवान क्या दे सकते हैं और क्या हम उनसे मांग सकते हैं। केवल एक बार 108 पाठ से शक्ति आएगी लेकिन इतनी नहीं कि कोई बड़ा पत्थर हिला सको। कितनी बार ये पाठ करना होगा यह तो नहीं कह सकती लेकिन शक्ति अर्जित करनी पड़ेगी तभी उस शक्ति का प्राकट्य होगा जो तुम्हें संतुष्ट कर सके। इसके बाद मैने निरंतर यह अभ्यास शुरू किया। धीरे धीरे हमारे घर की स्थिति सुधरने लगी। अम्मा पिताजी को भी लगने लगा कि कष्ट कटने लगे हैं। इस बीच मेरी शादी हो गई। एक साल बाद छोटी बहन की शादी हो गई लेकिन इसी बीच एक दुखद घटना हुई जिसमें छत पर से गिरने से पिताजी का स्वर्गवास हो गया मृत्यु के समय आंवला उनके मुंह में था। संभव था कि आंवले की गुठली थूकने के लिए वह झुके हों और इसी में संतुलन बिगड़ने से वह नीचे आ गिरे हों। लोग पिताजी को उठाकर तुरंत अस्पताल ले गए। मै उस समय घर पर नहीं था जब अस्पताल पहुंचा तो वहां जबर्दस्त भीड़ थी सैकड़ों लोग बाहर खड़े थे। पहले तो मुझे लगा शायद दंगा फैल गया है क्योंकि बाबरी मस्जिद का ढांचा 6 दिसंबर को ढहा था और यह घटना दस दिसंबर की थी। लेकिन जब मैने देखा कि सब मोहल्ले के लोग हैं तो मैने पूछा क्या हो गया इस पर कई लोग एक साथ बौले चाचाजी गिर पड़े हैं हम लोग खून देने आए हैं। इनमें हिन्दू मुसलमान सब शामिल थे। मै अंदर गया तो वहां पिताजी के पलंग के पास शासन के सारे बड़े अधिकारी मौजूद थे। जो प्रमुख डाक्टर थे उन्होंने मुझसे कहा कि मेडिकल कालेज ले जाएं। बचने के चांस बहुत कम हैं कोई चमत्कार ही बचा सकता है। पिताजी के सिर में पट्टी बंधी थी। मेडिकल कालेज में टीम पहले से तैनात थी। सारे डाक्टर जुट गए। हम सब को डाक्टरों ने बाहर कर दिया। मै जब बाहर आया तो मैने अपने आराध्य का स्मरण किया और हाथ जोड़कर कहा कि मैने अपने जीवन में यदि कोई पुण्य किया है तो मै अपने पिताजी को दे रहा हूं। या तो वह ठीक हो जाएं। वरना उनहें इन कष्टों से मुक्ति दे दें। यह कहते हुए मेरे आंसू बह रहे थे। मै जैसे ही यह कह कर मुड़ा तब तक अंदर से डाक्टर बाहर आए और उन्होंने कंधे पर हाथ रखकर कहा सारी। अम्मा ने कहा क्या हुआ मैने कहा अंदर मत रोना वरना दूसरे मरीज परेशान होंगे। अम्मा को ले जाकर पिताजी को दिखाया छोटी बहन को एक मित्र के साथ घर भेजा। फिर अम्मा के साथ वहीं रुक गया। थोड़ी देर में कहा गया पिताजी को पोस्टमार्टम हाउस में रखना होगा। अपने पिताजी को शव गृह में रखने की बात पर मै गड़बड़ा गया पहले डाकटरों से भिड़ गया फिर प्रयास शुरू किये तो पता चला कि मेडिकल कालेज से डेथ मेमो थाने जाएगा फिर इंस्पेक्टर आकर पंचनामा भरेगा। इस बीच पिताजी को लेकर शव गृह में गए मै पहली बार पोस्टमार्टम हाउस में घुसा था। लाशों के बीच चलते हुए जगह बनाकर पिताजी को लिटाया और बाहर आ गए इस बीच मै एसएसपी सामल से मिलने गया संयोग से वह मिल गए उन्होंने उस व्यस्तता के बीच जबकि लगभग पूरे शहर में कर्फ्यू लगा था कहा कि ठीक है मै आदेश किये दे रहा हूं। इंस्पेक्टर जाकर पंचनामा भर देगा। पोस्टमार्टम नहीं चाहते हैं तो नहीं होगा। अब मै मेडिकल कालेज आकर इंस्पेक्टर का इंतजार करने लगा कभी थाने जाता तो कभी मेडिकल कालेज आता। फिर थाने गया तो वहां दीवान ने डिटेल पूछकर कहा कि आपका डेथ मेमो आया ही नहीं उसे भिजवाएं तो दरोगा को भेजा जाए। अब मै फिर से वार्ड में गया तो पहले तो उन्होंने कहा कि भेज दिया है जब मैने कहा नहीं गया है तो उन्होंने देखा तो वह वहीं रखा था। मैने कहा कि यह यहां कैसे। उन्होंने कहा कि आप चाहें तो इस डाक्टर की नौकरी खा सकते हैं यह कहते हुए उन्होंने डेथ मेमो मेरे सामने कर दिया। उस पर लिखा था पेशेंट कंडीशन वैरी लो बाडी सेंट टु मार्चुरी। मैने कहा कि इसका मतलब हुआ कि पिताजी उस समय जिंदा थे। उन्होंने कहा कि इसी लिए तो डेथ मेमू नहीं गया। क्यों करेक्ट वही डाक्टर कर सकता है जिसने मेमो बनाया हो। मैने कहा आप भी तो थे उस समय इसको फाड़िये दूसरा मेमो बनाकर दीजिए। मुझे कोई कार्रवाई नहीं करनी है। इसके बाद काफी रिक्वेस्ट करने पर उस पन्ने को कैंसिल करके दूसरा डेथ मेमू बना जिसे लेकर मै थाने गया और फिर अगले दिन दारोगा ने आकर पंचनामा किया। और मैने अपने पिता की अंत्येष्टि की।
    इसके पांच साल बाद अम्मा को मेजर हार्ट अटैक पड़ा जिसका उन्हें पता चला न हम लोगों को वह डाक्टर को दिखाने गईं तो डाक्टर ने भर्ती होने को कहा इस पर उन्होंने कहा तुम गधे हो और लड़कर घर चली आईं। घर आकर उन्होंने यह बात पत्नी को बताई तो पत्नी ने मुझे फोन किया मैने घर आकर अम्मा से बात की तो वह मुझ पर झल्ला गईं बोलीं मै भर्ती होकर खून नहीं चढ़वाऊंगी डाक्टर खून चढ़ाने को कह रहा था। मै उनका पर्चा लेकर तुरंत डाक्टर के पास गया संयोग से अस्पताल में वही हार्ट का वही डाक्टर था उसने मुझे देखते ही कहा माता जी को ले आए मैने कहा नहीं मै तो पूछने आया था क्या बात है उन्होंने कहा उनका हार्ट सही काम नहीं कर रहा है उन्हें तुरंत लेकर आओ। अम्मा को भर्ती कराया रात में उनकी हालत बिगड़ गई। अगले दिन भी डाक्टर जूझ रहे थे। अम्मा बुरी तरह से तड़प रही थीं वह पैरों में भयंकर दर्द बता रही थीं। उस समय जब उनकी हालत मुझसे देखी नहीं गई तो मैने एक बार ईश्वर के हाथ जोड़ कर कहा कि मै अब तक के सारे पुण्य अम्मा को दे रहा हूं इन्हें इनके कष्टों से मुक्ति दो। थोड़ी देर में ही अम्मा मुक्त हो गईं। इस तरह मेरी जिंदगी का एक अध्याय खत्म हुआ। अब कल से नया सूत्र शुरू करूंगा जिसमें मेरी तंत्र में आस्था से जुड़े पहलू उजागर होंगे।
    Last edited by ramkrishna; 18-06-2018 at 05:45 PM. Reason: कुछ शब्द गड़बड़ होना

  3. #33
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    Aapke naye sutra ka besabri se intezaar rahega

  4. #34
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    Bahut hi dilchasp

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