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Thread: ॐ श्री उधाराय नमः

  1. #1
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    Cool ॐ श्री उधाराय नमः

    उधार की महिमा अपरम्पार है। जो उधार लेने में विशेषज्ञ हैं, वे अच्छी तरह से जानते हैं कि उधार का जितना भी गुणगान किया जाए, बहुत कम है। उधार लेने वाला अपने जीवन में कभी निराश नहीं होता और सदा प्रसन्न रहता है और सीना तानकर अकड़कर चलता है जबकि उधार देने वाला हमेशा दुःखी मन से मुँह लटकाए यह सोचकर निराशा के साथ घूमता रहता है कि ‘दिया हुआ उधार वापस मिले या न मिले’!

  2. #2
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    मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। क्यों? मनुष्य ही एकमात्र ऐसा प्राणी है जो उधार ले और दे सकता है। इस ‘उधार लेने और देने की प्रक्रिया’ से ही मनुष्य के सामाजिक अस्तित्व का पता चलता है। उधार लेने का मज़ा मनुष्य ही लूट सकता है, जानवर उधार लेने का मज़ा कभी नहीं लूट सकते। अतः उधार लेना मनुष्य का जन्मसिद्ध अधिकार है।

  3. #3
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    एक तरह से देखा जाए तो उधार देना आधा पुण्य करने के समान है। उधार की वापसी हो गई तो उसे उधार समझना चाहिए, वापसी न हुई तो उसे दान समझना चाहिए। अतः उधार देना एक तरह से ‘अर्धदान’ अर्थात् आधा दान देने के समकक्ष है, किन्तु धर्म-कर्म दान-पुण्य में विश्वास न रखने वाले कुछ कंजूस-झरूस-मक्खीचूस लोग उधार देने को एक सजा समझकर न ही खुद उधार देते हैं और न ही दूसरों को उधार देने देते हैं। कुछ लोग उधार देने के खिलाफ़ बाकायदा मुहिम छेड़कर उधार लेने वालों को हतोत्साहित करते हैं। वे यह भूल जाते हैं कि महाकवि रहीम ने उधार लेने वालों के पक्ष में एक शानदार-जानदार दोहा लिखकर उधार न देने वालों को बहुत शर्मिन्दा किया है। आप खुद पढि़ए महाकवि रहीम के इस दोहे को-

  4. #4
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    ‘रहिमन’ वे नर मर चुके, जे कहुँ माँगन जाहिं।
    उनते पहले वे मुए, जिन मुख निकसत नाहिं।।


    अर्थात्- जो मनुष्य किसी के सामने हाथ फैलाने जाते हैं, वे मृतक के समान हैं और वे लोग तो पहले से ही मृतक हैं, मरे हुए हैं, जो माँगने पर भी साफ इन्कार कर देते हैं।

    देखा आपने- महाकवि रहीम ने उधार लेने वालों को कितना अधिक प्रोत्साहित किया है और उधार न देने वालों को कितना अधिक शर्मिन्दा किया है!

  5. #5
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    वस्तुतः उधार माँगना एक विशेष प्राचीन कला है। उधार हर किसी ऐरे गैरे नत्थू खैरे को नहीं मिलता। उधार सिर्फ़ उन्हीं को मिलता है जो उधार माँगने की कला में पारंगत हैं। मनुष्य होकर किसी से उधार न लिया तो मनुष्य जीवन व्यर्थ है। उधार लेने की क्षमता से मनुष्य का ‘सामाजिक अंक’ अर्थात् ‘सोशल स्कोर’ का पता चलता है। मनुष्य का यह ‘सोशल स्कोर’ बैंकों के क्रेडिट स्कोर के समान होता है। अतः मनुष्य का जितना बड़ा ‘सोशल स्कोर’ होगा, उतना ही अधिक उधार प्राप्त होगा। कैशलेस आर्थिक व्यवस्था में मनुष्य जेब मेें क्रेडिट-डेबिट कार्ड लेकर घूमता है। उधार लेना एक तरह से कार्डलेस आर्थिक व्यवस्था होती है जिसमें मनुष्य को जेब में क्रेडिट-डेबिट कार्ड लेकर चलने की झंझट भी नहीं उठानी पड़ती। उधार लेने की महाकला में पारंगत महान वैज्ञानिकों के लिए हर रिश्ते-नातेदार, मित्र और जान-पहचान वालों की जेब ए॰टी॰एम॰ मशीन के समान होती है- जब चाहा तड़ से उधार कैश निकाल लिया! (अभी और है!)

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