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Thread: samaj shastri

  1. #31
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    प्रभु जातियों के उदाहरण:

    ग्रामीण भारत का एक ऐसा नक्शा बनाया जा सकता है जिसमें प्रत्येक गाँव की प्रभु जातियाँ दिखाई गयी हों परन्तु इसके लिए बड़े भारी परिश्रम की आवश्यकता होगी । फिर भी कुछ प्रभु जातियों के नाम गिनाये जा सकते हैं ।

    उत्तर भारत में गाँव के लोग प्रभु जातियों को ‘अजगर’ का नाम देते हैं जो दलित अल्पसंख्यक जातियों में प्रभु जातियों के आतंक का सूचक है । अजगर चार प्रभु जातियों के नामों के पहले अक्षरों को लेकर बना है । ये हैं- अहीर, जाट, गूजर और राजपूत ।

    पश्चिमी बंगाल के कुछ भागों में सदगोप, गुजरात में पाटीदार और राजपूत, महाराष्ट्र में मराठा, आन्ध्र में कस्म और रेड्डी, मैसूर में औक्कलिजग और लिंगायत, मद्रास में वेल्लास, गाऊडर पड़याची और कल्लर और केरल में नायर, सीरियाई ईसाई तथा इजवन प्रभु जातियाँ हैं ।

    देहातों में रहने वाले बहुसंख्यक लोगों के लिए और कभी-कभी ब्राह्मणों के लिए भी प्रभु जातियाँ ही आदर्श उपस्थित करती हैं । पाटीदार का पिछले सौ वर्षों में अधिक संस्कृतीकरण हुआ है और गुजरात के कैरा जिले में बारिया सहित अन्य सभी समूहों की संस्कृति पर उनका प्रभाव पड़ा है ।

    क्षत्रियों की भांति ब्राह्मणों ने भी ग्रामीण तथा नगरीय भारत में बहुत दिनों तक प्रभुता बनाये रखी है । तीर्थस्थान और मठ भी संस्कृतीकरण के श्रोत थे । संस्कृतीकरण का प्रसार तीर्थस्थान या मठ वाले क्षेत्र में रहने वाली अप्रभु जातियों में उदग्र रूप में और अन्य क्षेत्रों में क्षैतिज के रूप में होता था ।

    4. जनजातियों में संस्कृतिकरण:

    अनेक जनजातियों में भी संस्कृतीकरण की प्रक्रिया दिखलाई पड़ती है । दूसरी ओर एस. एल. कालिया ने दिखलाया है, उत्तर प्रदेश की जौनसार बावर और मध्य प्रदेश के बस्तर क्षेत्र की जातियों में जनजातिकरण की प्रक्रिया दिखलाई पड़ती है । प्रभु जाति के बुजुर्ग लोग गाँव में लोगों को नियम तोड़ने पर जुर्माने, शारीरिक कष्ट या जाति-बहिष्कार की सजा देते हैं ।

    किन्तु इससे परिवर्तन की गति कम नहीं होती । फिर भी कभी-कभी महान् परम्पराओं के प्रतिनिधि द्विज वर्णे लघु परम्पराओं के सामने घुटने टेकते दिखलाई पड़ते हैं; किन्तु यह मानना सही नहीं होगा कि ब्राह्मणों की संस्कृति में संस्कृतीकरण सदा ही अधिक होता है ।

    मैरियट ने किशनगढ़ी गाँव के अध्ययन में लिखा है- ”इस क्षेत्र में ब्राह्मणों के अपेक्षातया अल्प संस्कृतीकरण में ही इस बात का सूत्र छिपा है कि किशनगढ़ी की बाकी जातियों में संस्कृतीकरण की इतनी धीमी गति का और उनके धर्म में महान् परम्परा के तत्वों के अपेक्षातया इतने अल्प अनुपात का क्या कारण है ।”

    जाति-व्यवस्था की दो प्रवृत्तियों:

    जाति-व्यवस्था में निम्नलिखित दो प्रवृत्तियाँ स्पष्ट दिखलाई पड़ती है:

    (1) किसी स्थानीय समाज में नैतिक और धार्मिक प्रतिमानों सहित बहुत सी संस्कृतियों के अस्तित्व को मान्यता दी जाती है ।

    (2) उच्च जातियों के रंग-ढंग का अनुकरण किया जाता है ।

    परन्तु फिर भी यह याद रखना आवश्यक है कि स्थानीय ग्राम व्यवस्था अखिल भारतीय व्यवस्था से पूरी तरह स्वतन्त्र नहीं होती । आचरण के आदर्श तीर्थयात्राओं हरिकथाओं और धार्मिक नाटकों जैसे महान परम्परा के स्रोतों से ही प्राप्त होते हैं । गाँव में प्रभु जाति के बुजुर्ग ही एक बहुतत्वादी संस्कृति और मूल्य-व्यवस्था के प्रहरी होते हैं ।

    प्रभु जातियाँ अपने प्रभाव क्षेत्र में रहने वाली विभिन्न जातियों के बीच संरचनात्मक दूरी बनाये रखती हैं, किन्तु प्रभु जाति का कार्य केवल बहुतत्ववादी संस्कृति के संरक्षक होने तक ही सीमित नहीं है । वह निम्न जातियों में प्रभु जाति की प्रतिष्ठादायक जीवन-शैली का अनुकरण करने की इच्छा भी जगाती है । अनुकरण का यह कार्य घुमा-फिराकर किया जाता है क्योंकि जल्दबाजी करने से उच्च जातियों द्वारा दण्ड मिलने का भय रहता है ।


    5. पंजाब में संस्कृतीकरण:
    डी॰ आर. चानना ने एक ऐसे क्षेत्र में संस्कृतीकरण के प्रसार का विवेचन किया है जो 1947 में देश के विभाजन तक इस्लाम और कुछ पश्चिम एशियाई सांस्कृतिक रूपों से बहुत अधिक प्रभावित था; वहाँ सिख धर्म को गौण प्रभुता प्राप्त थी । धर्म के मामले में हिन्दू इस्लाम में विशेषतया सूफी सन्तों के उपदेशों से बहुत गहरे प्रभावित थे ।

    भूतपूर्व पंजाब और उत्तरी-पश्चिमी सीमा प्रान्त में मुसलमानों की प्रार्थमिक प्रभुता थी और इस प्रदेश के कुछ इलाकों में सिखों की गौण प्रभुता थी । हिन्दुओं में ब्राह्मणों में न धन था और न विद्या इसलिए व्यापारी जातियाँ अधिक महत्वपूर्ण थीं ।

    आर्य समाज और उसकी प्रतिद्वन्दी सनातन धर्म सभा और उनके द्वारा स्थापित दोनों प्रकार की पारस्परिक और आधुनिक शिक्षा संस्थाओं ने पंजाब के हिन्दुओं में विद्या का प्रसार किया । इससे पंजाबी हिन्दुओं में संस्कृतीकरण बढ़ा । प्रभु जाति का प्रभाव सामाजिक जीवन के सभी क्षेत्रों तक फैला हुआ जान पड़ता है ।



    6. संस्कृतीकरण में राजनीतिक तत्व:
    अंग्रेजों से पहले के भारत में राजनीतिक व्यवस्था की अस्थिरता सामाजिक गतिशीलता का शक्तिशाली स्रोत थी । अठारहवीं शताब्दी में राजनीतिक व्यवस्था के चार स्तर थे- साम्राजिक, माध्यमिक, प्रादेशिक और स्थानीय । साम्राजिक स्तर पर मुगल शहंशाह होते थे । माध्यमिक स्तर पर अवध के नवाब जैसे नवाब थे ।

    इनके अधीन जागीरदार लोग थे जो कि प्रादेशिक स्तर पर सर्वोपरि थे । जागीरदार स्थानीय ‘आमिल’ लोगों के द्वारा शासन करते थे । इस प्रकार मुगल शहंशाह के अधीन अवध का नवाब और अवध के नवाब के अधीन बनारस का राजा था, तथा बनारस का राजा स्थानीय मुखियों की सहायता से शासनकार्य करता था ।

    प्रत्येक स्तर पर निम्न स्तर के पद वाले व्यक्ति को उच्च स्तर की राजनीतिक व्यवस्था के लिए धन और सैनिक जुटाने पड़ते थे । कोहन की भांति शाह ने भी अठारहवीं शताब्दी के गुजरात में राजनीतिक व्यवस्था में अनेक स्तर माने हैं जैसे साम्राजिक, प्रादेशिक तथा स्थानीय स्तर इत्यादि ।

    अठारहवीं शताब्दी में गुजरात तथा बनारस प्रदेश की परिस्थितयों में राजनीतिक व्यवस्था भूमिहार, ब्राह्मण, राजपूत, पाटीदार और कोली जैसे स्थानीय प्रभु समूहों के नेताओं की गतिशीलता के लिए अनुकूल थी । अंग्रेजों से पूर्व के भारत में सामाजिक गतिशीलता का उदाहरण देने के लिए डॉ॰ श्रीनिवास ने उत्तर प्रदेश, गुजरात और केरल से उदाहरण दिए है ।

    इन तीनों ही क्षेत्रों में राजनीतिक सत्ता के विभिन्न स्तर दिखलाई पड़ते हैं और राजनीतिक व्यवस्था गतिशीलता दिखाई पड़ती है । राजनीतिक अस्थिरता के परिणामस्वरूप विशेषतया प्रभु जातियों के लिए सामाजिक गतिशीलता उत्पन्न हुई । अंग्रेजी-पूर्व राजनीतिक व्यवस्था कुछ महत्वपूर्ण स्थिति वाले व्यक्तियों और समूहों की गतिशीलता के लिए अधिक अनुकूल थी ।

    राजा को अपने राज्य में बसने वाली जातियों को उठाने या गिराने का अधिकार था । यह अधिकार इस बात से उत्पन्न हुआ था कि अंग्रेजों से पहले भारतीय राजा, चाहे वे हिन्दू हों या मुसलमान, जाति-व्यवस्था के शिखर पर स्थित माने जाते थे ।

    राज्य के अन्दर जातियों के पदों को राजा की सहमति प्राप्त होती थी और किसी अपराध के लिए जाति से निकाला गया व्यक्ति राजा से पुनरावेदन कर सकता था । राजा को अधिकार था कि वह फिर से सब प्रमाणों की जाँच करें और निर्णय को मान ले या बदल दे ।

    पद के बारे में झगड़े तय करने और किसी अपराध के लिए उपयुक्त दण्ड निर्धारित करने में राजा विद्वान ब्राह्मणों से परामर्श लेता था परन्तु वे केवल नियम को घोषित अथवा निर्धारित करते थे । दूसरी ओर राजा ही उस निर्णय को लागू करता था ।
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  2. #32
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    6. संस्कृतीकरण में राजनीतिक तत्व:
    अंग्रेजों से पहले के भारत में राजनीतिक व्यवस्था की अस्थिरता सामाजिक गतिशीलता का शक्तिशाली स्रोत थी । अठारहवीं शताब्दी में राजनीतिक व्यवस्था के चार स्तर थे- साम्राजिक, माध्यमिक, प्रादेशिक और स्थानीय । साम्राजिक स्तर पर मुगल शहंशाह होते थे । माध्यमिक स्तर पर अवध के नवाब जैसे नवाब थे ।

    इनके अधीन जागीरदार लोग थे जो कि प्रादेशिक स्तर पर सर्वोपरि थे । जागीरदार स्थानीय ‘आमिल’ लोगों के द्वारा शासन करते थे । इस प्रकार मुगल शहंशाह के अधीन अवध का नवाब और अवध के नवाब के अधीन बनारस का राजा था, तथा बनारस का राजा स्थानीय मुखियों की सहायता से शासनकार्य करता था ।

    प्रत्येक स्तर पर निम्न स्तर के पद वाले व्यक्ति को उच्च स्तर की राजनीतिक व्यवस्था के लिए धन और सैनिक जुटाने पड़ते थे । कोहन की भांति शाह ने भी अठारहवीं शताब्दी के गुजरात में राजनीतिक व्यवस्था में अनेक स्तर माने हैं जैसे साम्राजिक, प्रादेशिक तथा स्थानीय स्तर इत्यादि ।

    अठारहवीं शताब्दी में गुजरात तथा बनारस प्रदेश की परिस्थितयों में राजनीतिक व्यवस्था भूमिहार, ब्राह्मण, राजपूत, पाटीदार और कोली जैसे स्थानीय प्रभु समूहों के नेताओं की गतिशीलता के लिए अनुकूल थी । अंग्रेजों से पूर्व के भारत में सामाजिक गतिशीलता का उदाहरण देने के लिए डॉ॰ श्रीनिवास ने उत्तर प्रदेश, गुजरात और केरल से उदाहरण दिए है ।

    इन तीनों ही क्षेत्रों में राजनीतिक सत्ता के विभिन्न स्तर दिखलाई पड़ते हैं और राजनीतिक व्यवस्था गतिशीलता दिखाई पड़ती है । राजनीतिक अस्थिरता के परिणामस्वरूप विशेषतया प्रभु जातियों के लिए सामाजिक गतिशीलता उत्पन्न हुई । अंग्रेजी-पूर्व राजनीतिक व्यवस्था कुछ महत्वपूर्ण स्थिति वाले व्यक्तियों और समूहों की गतिशीलता के लिए अधिक अनुकूल थी ।

    राजा को अपने राज्य में बसने वाली जातियों को उठाने या गिराने का अधिकार था । यह अधिकार इस बात से उत्पन्न हुआ था कि अंग्रेजों से पहले भारतीय राजा, चाहे वे हिन्दू हों या मुसलमान, जाति-व्यवस्था के शिखर पर स्थित माने जाते थे ।

    राज्य के अन्दर जातियों के पदों को राजा की सहमति प्राप्त होती थी और किसी अपराध के लिए जाति से निकाला गया व्यक्ति राजा से पुनरावेदन कर सकता था । राजा को अधिकार था कि वह फिर से सब प्रमाणों की जाँच करें और निर्णय को मान ले या बदल दे ।

    पद के बारे में झगड़े तय करने और किसी अपराध के लिए उपयुक्त दण्ड निर्धारित करने में राजा विद्वान ब्राह्मणों से परामर्श लेता था परन्तु वे केवल नियम को घोषित अथवा निर्धारित करते थे । दूसरी ओर राजा ही उस निर्णय को लागू करता था ।


    7. संस्कृतीकरण के आर्थिक कारण:
    अंग्रेजों के राज्य से पहले केवल राजनीतिक कारणों से ही नहीं बल्कि आर्थिक कारणों से भी जाति व्यवस्था में गतिशीलता दिखलाई पड़ती है । खेतों में मेहनत करने का काम कम हैसियत का चिन्ह माना जाता था । जो जमींदार जितना ही बड़ा होता था उस पर यह निषेध उतना ही अधिक लागू होता था ।

    इस प्रकार भूमि पर अधिकार और आर्थिक स्थिति जाति-व्यवस्था में ऊँचा स्थान दिलाने का एक कारण थी । मध्य युग में सामाजिक गतिशीलता स्थान-विषयक गतिशीलता के साथ जुड़ी हुई थी । स्थान परिवर्तन कर लेने से अनेक नई जातियों का जन्म हुआ और क्रमशः वे मूल जाति से भिन्न हो गई । एक ही जाति की विभिन्न क्षेत्रों में रहने वाली प्रशाखाओं में क्रमशः सांस्कृतिक भिन्नता दिखलाई पड़ने लगी ।

    इस प्रकार सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक अनेक कारणों से भारत की जाति-व्यवस्था में विभिन्न जातियों के पद परिवर्तित होते रहे हैं । किन्तु इस परिवर्तन को ध्यान में रखते हुए यह याद रखना आवश्यक है कि जाति-व्यवस्था में यह परिवर्तन व्यवस्था के अन्दर परिवर्तन है ।

    कुल मिलाकर इस व्यवस्था में कोई परिवर्तन नहीं होता । परिवर्तन की यह प्रक्रिया समझने के लिए डॉ॰ श्रीनिवास ने संस्कृतीकरण के प्रत्यय को प्रयोग किया है । यह प्रत्यय कहाँ तक समीचीन है, इसकी डॉ॰ डी. एक मजूमदार तथा अन्य समकालीन समाजशास्त्रियों ने परीक्षा की है । इस परीक्षा के विवेचन से इस प्रत्यय का महत्व और सीमाएँ स्पष्ट होंगी ।
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  3. #33
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    M.N.Srinivas Biography and Contribution to indian sociology
    NOVEMBER 3, 2017 BY SOCIOLOGY GROUP

    M.N Srinivas full name Mysore Narasimhachar Srinivas. He was born in 1916 in Mysore and passed away in 1999 in Bangalore. He was one of the best Indian sociologists. He was a Brahmin. His studies are prominent in the area of caste and its other classifications, sanskritization and many other topics which revolve around caste itself.

    srinivas bio

    He acquired his knowledge and doctorate in sociology in the University of Bombay. In the late forties, Srinivas went to the University of Oxford for his further studies. There he played a significant role and started bringing up ideas for sociology.

    Methodology:


    Srinivas’s perspective was different from another sociologist as he did not want to rely on a western textbook to study about his own country people. So, therefore, he himself participated and started with observation and fieldwork. Somewhere in 1940-42, He did a vast field work on Coorgs. He further talks about the unity and interaction among different castes present in Coorgs. Caste he covered was Brahmins, Kaniyas, Bannas and Panikas. He also discusses in villages we can see many independent castes.

    Most of the years Srinivas only concentrated on studying caste and religion. He covered all the dimensions of the caste and religion prevailing in the society. He came up with the terms dominant castes, westernization, secularization and sanskritization. This all was the impact and outcome of the caste system.

    Srinivas being from Brahmin caste which was believed to be superior he never hesitated to choose caste system as his main area of interest. He presented number studies how caste has its role everywhere be it be village or cities.

    To make people understand the concept of society he categorized these concepts into two

    (i) book view (ii) field view

    Now when we talk about book view. Srinivas always said what is given in book might be good as a reference but completely believing it won’t be useful. He gave more importance to field perspective. According to books all the caste elements, religion, kinship, geographical areas formulate Indian society’s foundation.

    Srinivas always believed to know Indian society and its different aspects one has to go in the field use his own mind and observation and share what he or she has experienced. He said to study Indian society start with visiting different regions. Study that region and their functions. This is how you can know the nativity of those regions of Indian society.

    He also emphasized the importance to mathematical and statistical studies. Many rely on practical analyzes rather on mathematical as it seems to be difficult to follow. He stuck to the notion of local bounded sites which were best seen his paper on the topic like dominant caste and joint family conflicts which he himself observed in rural south India. His uniques style of researching and best works were provided by him due to his unique sense of methodology. Many of his writing served as the reference to many other sociologists or researchers who were also determined to study caste in India.

    Recognition:

    He was awarded and honored by different institutions. The University of Bombay, the government of France and Royal anthropological institute placed several awards on his hand. President of India awarded him Padma Bhushan. He was also seen as one of the foreigner member in British academy and American Academy of Arts and Science.


    Writing and inspiration:

    Srinivas was greatly influenced by Radcliffe Brown an English social Anthropologist and by his idea of structure. Radcliffe was also his teacher when he was studying at the Oxford.

    Srinivas was firmly determined to study religion, caste, and social changes. He studied every aspect of Indian society and its relationship with one another. Let it be different tribes, castes, peasants, and sections etc. His writing is of great efforts and done in the field in south India.

    Some of his writings are listed below:

    1942, Marriage and Family in Mysore
    1952, Religion and Society among Coorgs of South India
    1955, India’s villages
    1962, Caste in Modern India and Other Essays
    1966, Social Change in Modern India
    1976, the Remembered Village
    1980 India: Social structure and much more. If we will talk about the nature of Srinivas writing it is believed to be interdisciplinary.
    We would discuss briefly on few topics which were of great importance to Srinivas:

    Social changes are occurring from the evolution of society but when we talk about Indian society there are certain social changes which have gained much popularity. Concepts like Sanskritization, Westernization, and Secularization etc are an example of social changes.
    Sanskritization is as the process in Hinduism in which the low caste Hindu person or group tries to acquire values, ideologies, and rituals of higher caste Hindu. Westernization in India when the culture of West is gaining more importance than the culture of India. Indian people borrowing the culture of West is said to be the process of Westernization.
    Secularization in India is a process in which all the religion existing in India will be treated as equal and neutral. These are some of the social changes which Srinivas emphasized on.
    View on Religion, caste and its impact: He emphasized on many topics related to religion and village. How religion plays an important role to formulate Indian society. Religion, therefore, carries caste system which again produces subdivision of these castes. He later discusses how these castes affect different caste groups differently. Each caste carries its position in society and treated on the basis of those ranks. He further talks about how these caste differences bring out more difference among people differences like occupational differences, a hierarchy in society, the system of pure and impure, caste panchayats and assemblies.
    Dominant caste: according to Srinivas any caste that has three main powers of numerical strength, political power, and economic power is said to be a dominant caste.
    Now he arises a new concept of dominant caste it does not talks about how castes are ranked in society. If only concerns with if one has numerical strength, political power and economic power irrespective of whether he belongs to low or high caste.

    We can see this when Srinivas talks about the village of Rampura in Mysore. There he witnesses that there were several castes each holding different positions. It consisted of Brahmins, peasants, and untouchables. But here peasants were stronger and dominant than Brahmins as many peasants had land were numerically stronger and had political power. That is why in this sense Srinivas said caste that was traditionally ranked below but having political and economic power proved them as dominant caste in the village.

    Criticism Srinivas Faced:

    Many have criticized him by saying he has at times eliminated religious minorities from his research during promoting the concept of Sanskritization.

    In his studies, we can see he has focused on Indian traditions like caste and village which revolve around Hinduism trough this we can see he was using no secular concept. He focused more on upper caste or we can say, elite groups.

    Many concepts of social change were introduced by M.N Srinivas such as sanskritization and westernization. These two processes cannot be studied individually. One needs to study both the concepts to acquire full knowledge. He introduced the concept of sanskritization when he was still studying in Oxford and the concept of westernization was put up in 1956. In which he shares how westernization has impacted on the Indian culture and gradually it’s sweeping away the Indian culture over western.

    The concepts which were introduced by Srinivas were not completely unique as they might be having the same concept from Aryanization or Brahminization by Lyall and Risley as said by Mukherjee.

    M.N Srinivas importantly focused on fieldwork rather completely falling for bookish knowledge. He was one of the popular first generation sociologists in India. He discusses all the complex functions in Indian society with ease. He shares his point of view on topics such as caste, religion, traditional villages and their impacts on Indian society.

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