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Thread: कंटेनर

  1. #211
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    (दृष्य-५८)

    (मंत्रियों और पुलिस अधिकारियों की आपातकालीन मीटिंग चल रही है। सी०आइ०डी० के डी०सी०पी० प्रद्युमन भी दया, अभिजित और श्रेया के साथ बैठे हुए हैं।)

    एक मंत्री : बाबा पिद्दी के बारे में कोई सूचना मिली?

    डी०जी०पी० : नहीं सर.. हमने बहुत खोजा, मगर हमें बाबा पिद्दी का कोई पता नहीं चल सका!

    (मंत्री डी०सी०पी० प्रद्युमन की ओर प्रश्नवाचक दृष्टि से देखते हैं।)

    प्रद्युमन : सर.. दया ने बहुत पता लगाया, मगर कुछ पता नहीं चला।

    मंत्री : (क्रोधपूर्वक) दया.. दया.. दया.. आखिर दया बेचारा अकेला कब तक पता लगाता रहेगा? दया के अलावा और कोई भी है आपके पास?

    प्रद्युमन : (सकपकाकर) नहीं सर.. दया बेस्ट है! आप कहिए तो अभिजित और श्रेया को भी लगा दूँ?

    मंत्री : (क्रोधपूर्वक) रहने दीजिए! जब दया कुछ उखाड़ नहीं पाया तो अभिजित और श्रेया क्या करेंगे? नतीजा ज़ीरो रहेगा!

    दूसरा मंत्री : गधा रंजन ने रोज़ देश में आतंक मचा रखा है। सोचिए- गधा रंजन को कैसे रोका जाए?

    डी०जी०पी० : गधा रंजन को रोकना पुलिस और सेना के बस की बात नहीं है, सर।

    तीसरा मंत्री : मैं तो समझता हूँ- जब तक बाबा पिद्दी का पता न चल जाए, हमें गधे को राष्ट्रीय पशु घोषित कर देना चाहिए।

    चौथा मंत्री : गधे को राष्ट्रीय पशु घोषित करने से क्या होगा?

    तीसरा मंत्री : गधे को राष्ट्रीय पशु घोषित करने से गधा रंजन का भूत खुश हो जाएगा और वह देश में आतंक मचाना बन्द कर देगा।

    पाँचवा मंत्री : नहीं.. हम गधे को राष्ट्रीय पशु घोषित नहीं करेंगे। यदि हमने ऐसा किया तो विपक्ष हमें घेर लेगा और कहेगा- सरकार गधा रंजन के भूत से डर गई। चुनाव सिर पर हैं। जनता भड़क गई तो हमारी सरकार गिर जाएगी।

    पहला मंत्री : ठीक है। बाबा पिद्दी के मिलने तक हमें इन्तेज़ार करना चाहिए। मिस्टर प्रद्युमन।

    प्रद्युमन : यस सर।

    पहला मंत्री : देश का कोना-कोना छान मारो। पता करो- बाबा पिद्दी को ज़मीन निगल गई या आसमान खा गया?

    प्रद्युमन : दया पता लगाओ- बाबा पिद्दी को ज़मीन निगल गई या आसमान खा गया?

    दया : यस सर!

    पहला मंत्री : दया.. दया.. दया..

    (पहला मंत्री क्रोधपूर्वक मेज़ पर ज़ोर से घूँसा मारते हैं और चोट लगने के कारण दूसरे हाथ से अपना हाथ दबाने लगते हैं।)

    (दृष्य - ५८ समाप्त)

  2. #212
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    (दृष्य-५९)

    (अनुषा लाल चन्दानी के फ्लैट में पंकज, शीतल और अनुषा लाल चन्दानी खाने की मेज़ के चारों ओर बैठे हैं। खाना खत्म हो चुका है। अनुषा लाल चन्दानी पानी पीकर डकार लेती है और दीवार घड़ी की ओर देखती है। दीवार घड़ी में नौ बज रहे हैं। अनुषा लाल चन्दानी खड़ी होती है।)

    अनुषा : अच्छा.. मैं चलती हूँ।

    शीतल : (आश्चर्यपूर्वक) रात में कहाँ जा रही हो?

    अनुषा : (हँसते हुए) गधा-गाड़ी लेकर रात में सड़कों पर फिरूँगी तभी तो गधा रंजन की नज़रों में पडूँगी। जब गधा रंजन की नज़रों में पडूँगी तभी तो उसका इंटरव्यू लूँगी। जब गधा रंजन का इंटरव्यू लूँगी तभी तो अख़बारों में छपेगा। जब अख़बारों में छपेगा तभी तो दुनिया की सबसे बड़ी धाँकड़ रिपोर्टर बनूँगी.. तेरी तरह!

    शीतल : मेरी तरह?

    अनुषा : क्यों? तुम्हें जलन हो रही है?

    शीतल : जलन नहीं हो रही, डर लग रहा है। गधा रंजन बहुत ख़तरनाक है।

    अनुषा : तुम चिन्ता मत करो। मैं सब संभाल लूँगी।

    शीतल : क्या रात भर दिल्ली की सड़कों पर मारी-मारी फिरोगी?

    अनुषा : अरे नहीं.. मुझे सोना भी तो है और फिर कल ऑफिस भी जाना है। मैं रात दो बजे वापस आ जाऊँगी.. बाय-बाय।

    (अनुषा लाल चन्दानी जाती है और फिर दरवाज़ा बन्द करने की आवाज़ आती है। शीतल और पंकज खिड़की से बाहर देखते हैं- अनुषा लाल चन्दानी गधा-गाड़ी में बैठकर चली जाती है। शीतल पंकज की ओर देखकर मुस्कुराती है।)

    शीतल : अनुषा रात दो बजे आएगी।

    पंकज : हाँ तो?

    शीतल : बुद्धू-बुद्धू.. रात दो बजे तक हम 'बैंग-बैंग' वाला किस करेंगे और साँस तेज़ होने पर अनुषा का बताया फंडा आजमाकर देखेंगे- फ़ायदा होता है या नहीं।

    पंकज : (खुश होकर) हाँ-हाँ.. ठीक है!

    (पंकज और शीतल एक-दूसरे के निकट आते हैं।)

    (दृष्य - ५९ समाप्त)

  3. #213
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    (दृष्य-६०)

    (अनुषा लाल चन्दानी गधा-गाड़ी हाँकती हुई लाल किला, चाँदनी चौक और सदर बाज़ार होते हुए नई दिल्ली रेलवे स्टेशन के सामने पहुँचती है। नई दिल्ली रेलवे स्टेशन में लगी घड़ी रात के बारह बजा रही है। उसी समय अनुषा लाल चन्दानी के मोबाइल की घण्टी बजती है। अनुषा लाल चन्दानी जेब से मोबाइल निकालकर देखती है- शीतल कॉल कर रही है। अनुषा लाल चन्दानी मोबाइल ऑन करके कान से लगाती है।)

    अनुषा : हैलो, शीतल.. क्या हुआ? नींद नहीं आ रही क्या? मैं तो बोर हो गई घूमते-घूमते। पता नहीं- गधा रंजन का भूत कहाँ गायब हो गया!

    शीतल की आवाज़: गधा रंजन को मारो गोली। हमारी बीमारी ठीक नहीं हो रही है, अनुषा।

    अनुषा : हुआ क्या?

    शीतल की आवाज़: तुम्हारे जाने के बाद हमने किस करके देखा।

    अनुषा : फिर?

    शीतल की आवाज़ : जब हमारी साँसें बहुत तेज़ हो गई तो हमने बत्ती बुझा दिया और फिर सारे कपड़े भी उतार दिए, मगर हमारी बीमारी ठीक होने का नाम नहीं ले रही!

    अनुषा : अच्छा..!

    शीतल की आवाज़ : (बिगड़कर) अच्छा क्या? हम दोनों दस बार बत्ती बुझाकर कपड़े उतारकर देख चुके, मगर कोई फ़ायदा नहीं हुआ। साँस तेज़ी से चलती रहती है!

    अनुषा : अच्छा..! पंकज कहाँ है?

    शीतल की आवाज़ : अँधेरे में कुछ दिख नहीं रहा। मुझे तो लगता है- कपड़ा उतारे सोफ़े पर बैठा है। बेचारे के हाँफने की आवाज़ आ रही है।

    अनुषा : और तुम कहाँ हो?

    शीतल की आवाज़ : मैं कपड़ा उतारे बेड पर लेटी हाँफ रही हूँ! अब हम क्या करें?

    अनुषा : (क्रोधपूर्वक) भाड़ में जाओ। तुम दोनों सुधरने वाले नहीं हो!

    (अनुषा लाल चन्दानी क्रोधपूर्वक फ़ोन काट देती है।)

    (दृष्य - ६० समाप्त)

  4. #214
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    (दृष्य-६१)

    (अनुषा लाल चन्दानी के फ़्लैट के बाथरूम से अनुषा लाल चन्दानी नहाकर बाहर निकलती है और देखती है- पंकज और शीतल सो रहे हैं। अनुषा लाल चन्दानी दीवार घड़ी देखती है- दीवार घड़ी सात बजा रही है। अनुषा लाल चन्दानी मेज़ पर रखा जग का पानी पंकज और शीतल के चेहरे पर डाल देती है। पंकज और शीतल की नींद टूट जाती है और दोनों घबड़ाकर उठकर बैठ जाते हैं।)

    शीतल : ये क्या बद्तमीज़ी है, अनुषा?

    अनुषा : सात बज गए और तुम दोनों अभी तक सो रहे हो?

    (पंकज तौलिया लेकर बाथरूम में चला जाता है।)

    शीतल : हम बीमार हैं, अनुषा। तुमने जो बताया था- हमने सब करके देख लिया, मगर कोई फ़ायदा नहीं हुआ। रात में फ़ोन पर तुमने डाँटा भी!

    अनुषा : (हँसते हुए) डाँटू नहीं तो और क्या करूँ? मैंने जो बताया था वो तुम दोनों ने ठीक से नहीं किया। नहीं तो फायदा ज़रूर होता.. यह लो।

    (अनुषा लाल चन्दानी शीतल के हाथ में एक सी०डी० देती है।)

    शीतल : ये क्या है?

    अनुषा : सनी लियोन की डेब्यू फ़िल्म है जो कनाडा में बनी थी। इसमें तुम दोनों की बीमारी दूर करने के लिए कई कारगर तरकीबें बताई गई हैं।

    शीतल : (खुश होकर) अच्छा..!

    अनुषा : मैंने अपनी बीमारी इसी सी०डी० को देखकर ठीक की थी।

    शीतल : (खुश होकर) अच्छा..!

    अनुषा : बड़े काम की सी०डी० है। इस सी०डी० को तुम दोनों एक साथ बैठकर देखना। तुम दोनों की बीमारी एक साथ छूमन्तर हो जाएगी!

    शीतल : (खुश होकर) अच्छा..!

    अनुषा : चलती हूँ.. बाय-बाय!

    (अनुषा लाल चन्दानी जाती है। शीतल हाथ में सी०डी० लिए खुशी से चीखती है। पंकज नहाकर बाथरूम से बाहर आता है।)

    पंकज : क्या हुआ, शीतू? कुबेर का खजाना हाथ लग गया क्या?

    शीतल : नहीं.. हमारी बीमारी दूर करने की सी०डी० हाथ लग गई!

    पंकज : (खुश होकर) अच्छा..!

    शीतल : अनुषा देकर गई है। बेचारी हमारे लिए कितना परेशान है! मैं नहाकर आती हूँ। नाश्ता-पानी करके आराम से बैठकर देखेंगे।

    पंकज : अभी नहीं.. रात में बैठकर देखेंगे आराम से।

    शीतल : अभी क्यों नहीं?

    पंकज : गधा रंजन के डर से हम कब तक छिपते फिरेंगे? आज हम दोनों फिर पार्क जाएँगे और नास्त्रेदमस की आत्मा वाला लॉकेट ढूँढ़ेंगे। गधा रंजन को ख़त्म करना बहुत ज़रूरी है।

    शीतल : हाँ, तुम ठीक कहते हो!

    (शीतल तौलिया लेकर बाथरूम में जाती है।)

    (दृष्य - ६१ समाप्त)

  5. #215
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    (दृष्य-६२)

    (पार्क में शीतल और पंकज नास्त्रेदमस की आत्मा वाला लॉकेट ढूँढ़ रहे हैं। थोड़ी दूर पर कुछ लड़के क्रिकेट खेल रहे हैं। बल्लेबाज लड़का एक ज़ोरदार शॉट लगाता है। गेंद मधुमक्खी के छत्ते से टकराती है और मधुमक्खी का छत्ता टूट जाता है। मधुमक्खियों के छत्ते से मधुमक्खियाँ निकलकर क्रिकेट खेल रहे लड़कों पर हमला कर देती हैं। लड़के जान बचाकर इधर-उधर भागते हैं। एक लड़के का पैर झाड़ियों में छिपी नास्त्रेदमस की आत्मा वाले लॉकेट पर पड़ता है और लॉकेट टूट जाता है। लॉकेट से सफ़ेद धुँआ बाहर निकलता है और नास्त्रेदमस की आत्मा आज़ाद हो जाती है। शीतल मधुमक्खियों के झुण्ड को लड़कों का पीछा करती देखती है।)

    शीतल : (प्रसन्नतापूर्वक) वो देखो, पिंटू.. मधुमक्खियों का छत्ता टूट गया!

    (पंकज मधुमक्खियों के झुण्ड को देखता है और थोड़ी दूर पर सफ़ेद धुँआ देखता है।)

    पंकज : (प्रसन्नतापूर्वक) वो देखो, शीतू.. सफ़ेद धुआँ! इसका मतलब है- नास्त्रेदमस की आत्मा आज़ाद हो गई!

    (उसी समय पंकज और शीतल के सामने सफ़ेद धुँआ प्रकट होकर नास्त्रेदमस के स्वरूप में परिवर्तित हो जाता है। नास्त्रेदमस की आत्मा हँसती है।)

    नास्त्रेदमस : हा-हा-हा.. मैंने कहा था- जब मधुमक्खियों का छत्ता टूटेगा तो मैं आज़ाद हो जाऊँगा! हा-हा-हा.. और मैं आज़ाद हो गया.. हा-हा-हा! मैं जा रहा हूँ!

    पंकज : रुको.. मुझे तुमसे कुछ पूछना है।

    नास्त्रेदमस : हा-हा-हा.. पूछो.. क्या पूछना है?

    पंकज : गधा रंजन कैसे ख़त्म होगा?

    नास्त्रेदमस : हा-हा-हा.. इस बारे में नास्त्रेदमस की आत्मा भविष्यवाणी कर चुकी है.. हा-हा-हा..

    पंकज : कैसी भविष्यवाणी?

    नास्त्रेदमस : गधा रंजन पहलवान.. बाबा पिद्दी बलवान.. पहलवान की पहलवानी वाह-वाह.. बलवान की बलवानी हाय-हाय.. रोशनी से पैदा होगा नीला महाकाल.. बनेगा पहलवान का काल..

    शीतल : हाँ-हाँ, पिंटू.. यही कहा था उस दिन इसने।

    पंकज : रोशनी से पैदा होगा नीला महाकाल? मतलब? मैं कुछ समझा नहीं!

    नास्त्रेदमस : हा-हा-हा.. इसका मतलब तो खुद नास्त्रेदमस भी नहीं जानता! हा-हा-हा.. नास्त्रेदमस की भविष्यवाणी को अक्ल लगाकर खुद समझना पड़ता है। हा-हा-हा.. मैं जा रहा हूँ! हा-हा-हा..

    (नास्त्रेदमस की आत्मा सफ़ेद धुँआ बनकर गायब हो जाती है।)

    पंकज : रोशनी से पैदा होगा नीला महाकाल.. बनेगा पहलवान का काल.. क्या गधा रंजन को ख़त्म करने के लिए दिन के समय कोई बच्चा पैदा होगा जिसका नाम महाकाल रखा जाएगा और उसका रंग नीला होगा? उफ़्.. पता नहीं क्या मतलब है?

    शीतल : बच्चा पैदा होगा.. बड़ा होगा.. फिर गधा रंजन को ख़त्म करेगा! इसमें तो दसियों साल लग जाएगा, पिंटू.. तब तक गधा रंजन मुझे ढूँढ़कर ख़त्म कर देगा! सभी तुम्हें अस्सी साल का समझते हैं। अगर मुझे कुछ हो गया तो दूसरी गर्लफ्रेंड नहीं मिलने वाली तुम्हें। ज़िन्दगी भर नकली रंग-बिरंगी दाढ़ी लगाकर बाबाई करते फिरोगे!

    (पंकज चिंतित हो जाता है।)

    पंकज : (चिंतित स्वर में) कुछ करना होगा.. गधा रंजन को ख़त्म करने के लिए कोई दूसरा उपाय ढूँढ़ना होगा!

    (दृष्य - ६२ समाप्त)

  6. #216
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    पाठकगण कृपया ध्यान दें।

    दृष्य नं० - २४ में दिया गीत नं० - ३ गलती से वहाँ लग गया है। अतः वहाँ पर दिए गीत के स्थान पर निम्न गीत पढ़ें-

    शीतल : मेरे दिल की धड़कन तुम्हारे लिए.. तुम बने हो सनम हमारे लिए..

    पंकज : मेरे दिल की धड़कन तुम्हारे लिए.. तुम बनी हो सनम हमारे लिए..


    'कंटेनर'

    (दृष्य-६३)

    (अनुषा लाल चन्दानी के फ़्लैट में पंकज, शीतल और अनुषा लाल चन्दानी बैठे बातचीत कर रहे हैं और खिलखिलाकर हँस रहे हैं। अनुषा लाल चन्दानी दीवार घड़ी की ओर देखती है- दीवार घड़ी रात के नौ बजा रही है।)

    अनुषा : अरे, नौ बज गए। चलती हूँ। दिल्ली की सड़कों पर गधा-गाड़ी हाँकने का वक्त हो गया......

    (अनुषा लाल चन्दानी जाने के लिए खड़ी होती है और फिर शीतल की ओर देखती है।)

    ......पूछना भूल गई थी। सी०डी० देखी तुम लोगों ने?

    शीतल : कहाँ देखी! वक्त ही नहीं मिला देखने का। हम दोनों बाहर चले गए थे।

    अनुषा : ठीक है.. अब देखना। मैं कल की तरह रात दो बजे वापस आऊँगी। बाय-बाय।

    (अनुषा लाल चन्दानी जाती है। शीतल सी०डी० निकालकर प्लेयर में डालती है और रिमोट से टी०वी० ऑन करती है। अर्धनग्न सनी दिखाई देती है जो अपने बॉयफ्रेंड को किस कर रही है। पंकज और शीतल कुछ देर तक आँखें फाड़-फाड़कर टी०वी० देखते हैं और फिर एक-दूसरे से लिपट जाते हैं। गीत शुरू होता है।)

    (गीत -६)

    शीतल : मैं जवाँ तुम जवाँ, रात भी जवान है..

    पंकज : मैं जवाँ तुम जवाँ, रात भी जवान है..

    शीतल : मेरे तन-बदन में लगी ऐसी आग़ है..

    पंकज : मेरे तन-बदन में लगी ऐसी आग़ है..

    शीतल : दूर क्यों खड़े हो, पास आओ ना..

    पंकज : दूर क्यों खड़ी हो, पास आओ ना..

    (गीत समाप्त होता है।)

    (दृष्य - ६३ समाप्त)

  7. #217
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    यह सब पढ कर हम सोच रहे है अगर आपकी सचमुच की कहानी पढ़ने को मिल जाए तो कितना मज़ा आए!
    महाठग आप ठगाईए, ओर न ठगिए कोय । आप ठगें सुख ऊपजे, ओर ठगें दुःख होय ॥

  8. #218
    कर्मठ सदस्य sanjaychatu's Avatar
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    Quote Originally Posted by MahaThug View Post
    यह सब पढ कर हम सोच रहे है अगर आपकी सचमुच की कहानी पढ़ने को मिल जाए तो कितना मज़ा आए!
    Maha thag jee . ye yaha sirf ghost writing hee karte hai
    Actual write-up pe paisa peetate hai .. Aur
    is vishay par paise ke alawa kisee ki nahee sunate

  9. #219
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    Quote Originally Posted by MahaThug View Post
    यह सब पढ कर हम सोच रहे है अगर आपकी सचमुच की कहानी पढ़ने को मिल जाए तो कितना मज़ा आए!
    सचमुच की कहानी? मतलब ये चोरी की कहानी है?

  10. #220
    कर्मठ सदस्य superidiotonline's Avatar
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    'कंटेनर'

    (दृष्य-६४)

    (आधी रात का समय है। अनुषा लाल चन्दानी दिल्ली की सुनसान सड़कों पर गधा-गाड़ी हाँक रही है। अनुषा लाल चन्दानी के मोबाइल की घण्टी बजती है। अनुषा लाल चन्दानी जेब से मोबाइल निकालकर देखती है- शीतल कॉल कर रही है। अनुषा लाल चन्दानी मोबाइल ऑन करके कान से लगाती है।)

    अनुषा : हैलो..

    शीतल : (क्रोधपूर्ण स्वर में) तू बहुत बड़ी कमीनी है, अनुषा।

    अनुषा : वो तो हूँ। बहुत बड़ी पुरानी कमीनी हूँ। हुआ क्या?

    शीतल : (क्रोधपूर्ण स्वर में) सी०डी० दिखाकर तूने बिना शादी के हमारा हनीमून करवा दिया बेमौसम.. कमीनी-कमीनी-कमीनी!

    अनुषा : तो क्या हुआ? आजकल बड़े शहरों में वन नाइट स्टैंड का फैशन चल रहा है! एक-दो नहीं, पूरे साढ़े तीन वन नाइट स्टैंड का एक्सपीरियन्स है मुझे।

    शीतल : साढ़े तीन क्या?

    अनुषा : (हँसते हुए) चौथा वाला बीच में ही सटककर हाथ से निकल गया था!

    शीतल : तू बड़ी बेशर्म है, कमीनी.. मगर मैं तेरे जैसी नहीं हूँ। तुझे बताना चाहिए था- सी०डी० में कौन सी फ़िल्म है।

    अनुषा : (हँसते हुए) बताया तो था- सनी लियोन की डेब्यू फ़िल्म है जो कनाडा में बनी थी। अब तू नहीं समझी तो मैं बेचारी भोली-भाली क्या करूँ?

    शीतल : बेशर्म.. तू बेचारी भोली-भाली है?

    अनुषा : और नहीं तो क्या?

    शीतल : ये तूने अच्छा नहीं किया, अनुषा। मैंने अमेरिका, लंदन, जापान, हांगकांग, सिंगापुर, स्विटजरलैंड, पेरिस में हनीमून मनाने का मेगा प्लान बनाया था!

    अनुषा : तो अब मना लो अमेरिका, लंदन, जापान, हांगकांग, सिंगापुर, स्विटजरलैंड, पेरिस में हनीमून। मैं तुम्हारा हाथ पकड़े हूँ?

    शीतल : कुछ भी हो- शादी के बिना हनीमून मनाना अच्छा नहीं लगता।

    अनुषा : बड़े लोग आजकल शादी कहाँ करते हैं? अखबार में अपना स्टेटमेंट देते हैं- वी आर डेटिंग ईच अदर। कहो तो कल के अख़बार में तुम्हारा धमाकेदार स्टेटमेंट छपवा दूँ- 'आइ एम डेटिंग पंकज जलोटा- शीतल कार्नवालिस'!

    शीतल : शटअप.. जो भी धमाका करना होगा, मैं खुद करूँगी। तुम मेरे मामले में टाँग मत फँसाओ।

    अनुषा : ठीक है.. ठीक है। अच्छा ये बताओ- तुम दोनों की बीमारी का क्या हालचाल है?

    शीतल : (हँसते हुए) हम दोनों एकदम ठीक हैं.. चकाचक।

    अनुषा : (हँसते हुए) मैंने कहा था न- सी०डी० देखने के बाद तुम दोनों की बीमारी एकदम ठीक हो जाएगी। चलो, मेरी मोटी फ़ीस निकालो। मैंने तुम दोनों का इलाज किया है!

    शीतल : एक छ्दाम भी नहीं दूँगी। कुछ भी हो- बिना शादी हमारा हनीमून करवाकर तुमने अच्छा नहीं किया। पंकज बेचारा अभी तक रो रहा है।

    अनुषा : (हँसते हुए) रोने दो।

    शीतल : तुमने जो उल्टा-सीधा काम किया है न.. उसके लिए तुम्हें ज़ुर्माना भरना पड़ेगा।

    अनुषा : ज़ुर्माना?

    शीतल : हाँ, ज़ुर्माना। आते समय हमारे लिए सबसे मँहगा वाला गिफ्ट लेती आना। नहीं, बड़ा मार खाएगी।

    अनुषा : लाती हूँ, बाबा.. लाती हूँ।

    (शीतल फ़ोन काट देती है। अनुषा लाल चन्दानी जेब में फ़ोन रखकर गधा-गाड़ी हाँकने लगती है।)

    (दृष्य - ६४ समाप्त)

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