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Thread: पूर्वजन्म के पापी

  1. #21
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    May 2017
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    सन्दर्भवश यहाँ पर एक सच्ची घटना का उल्लेख करना अत्यावश्यक है। जनवरी, २०१४ की बात है। अस्सी वर्षीय एक बुजुर्ग जो अपने आप को बड़ा ही धार्मिक और पुण्यात्मा कहते थे, वृद्धावस्था की कई बीमारियों की चपेट में आकर 'बिस्तरगत' हो गए। एक दिन मैं उनसे मिलने पहुँचा तो उनका चेहरा खिल उठा कि 'चलो, कोई बतियाने वाला तो मिला!' बातों ही बातों में उन्होंने एक बहुत बड़ा खुलासा करते हुए बताया कि उनकी एक महिला मित्र है जिसकी आयु अस्सी वर्ष है और वह अपनी जवानी में एक चरित्रहीन महिला थी। इसके बाद उन्होंने उस महिला मित्र की चरित्रहीनता के सन्दर्भ में तमाम खुलासे करते हुए अन्त में ठण्डी साँस लेते हुए बताया कि आज अस्सी साल की उम्र में भी वह स्वस्थ है, शराब पीती है और फर्राटेदार कार चलाती हैं। बुजुर्ग द्वारा अपनी महिला मित्र को इस तरह सरासर अपमानित करना मुझे बड़ा ही अटपटा लगा और नागवार गुज़रा। हमने तत्काल प्रश्न का गोला दाग दिया- 'आप इतने बड़े धर्मात्मा होते हुए भी आज चल-फिर नहीं सकते और बीमारी की सजा भुगत रहे हैं। इसके पीछे क्या कारण है? ईश्वर आखिर आपको इतनी बड़ी सजा क्यों दे रहा है?' प्रश्न सुनकर बुजुर्ग तिलमिला गए और बगलें झाँकने लगे। इसके बाद हमारे बीच मनमुटाव हो गया। बुजुर्ग कहीं स्वस्थ होते तो हो सकता था कि उस दिन हमारे बीच मनमुटाव के साथ-साथ 'हाथमुटाव' और 'पैरमुटाव' भी हो जाता।

  2. #22
    कर्मठ सदस्य sanjaychatu's Avatar
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    Aug 2015
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    Quote Originally Posted by garima View Post
    बहुत सही
    रजत जी सत्यवचन
    पर इतनी गहरी बात वो भी आप ऐसा कैसे?
    आजकर अन्ख्मारू जी , प्रेम जी के शिष्यत्व में प्रेम मय होने की शिक्षा ले रहे है , सब उसी का प्रताप है जी !

  3. #23
    कर्मठ सदस्य sanjaychatu's Avatar
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    Aug 2015
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    वैसे बाबा जी ने लाजबाब बात कही है ,,,
    क्या बात है सर ,,, मज़ा आ गया !

  4. #24
    कर्मठ सदस्य superidiotonline's Avatar
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    May 2017
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    वैसे हमारे उपरोक्त प्रश्न का उत्तर भी पूर्व जन्म में किए गए पापों से जुड़ा हुआ है। एक वैदिक ग्रन्थ है जिसका नाम 'कर्म विपाक संहिता' है। कर्म विपाक संहिता में स्पष्ट रूप से लिखा है कि पूर्वजन्म में किए गए किन पापों के कारण कौन सा रोग होता है। अक्सर लोगों को यह कहते हुए सुना जाता है कि 'मैंने कभी कोई बुरा काम नहीं किया। फिर भी मैं बीमारियों से त्रस्त हूँ। ऐसा मेरे साथ क्यों हो रहा है? क्या भगवान बहुत कठोर और निर्दयी है?' इसका उत्तर यह है कि हमारे रोगों का ईश्वर से कोई सम्बन्ध नहीं है। हमारे पापकर्मों का प्रभाव कभी इसी जन्म में तो कभी अगले जन्म में मिलता है, लेकिन मिलता अवश्य है। तात्पर्य यह है कि हम अपने पापकर्मों के प्रभाव से कभी मुक्त नहीं हो सकते। यह बात अलग है कि पापकर्मों का प्रभाव तुरन्त दिखाई न दे। यदि आप पुण्य कर्म करते हैं तो आप जीवन में सुखी, सम्पन्न और निरोगी रहते हैं। यदि आप लोगों को सताते हैं या पाप कर्म करते हैं तो आप पीड़ित होते हैं और किए गए पाप कर्मों के अनुरूप विभिन्न प्रकार की बीमारियाँ कष्ट देती हैं। यदि आप किसी रोग से पीड़ित हैं तो इसका अर्थ यह है कि आपने अवश्य ही पूर्व जन्म में कोई पाप किया है। उदाहरण के लिए वेदों और उसके अनुयायियों का निरादर करने वाले व्यक्ति को किडनी रोग होता है तथा दूसरों को कटु वचन बोलने वालों को अगले जन्म में हृदय रोग का कष्ट होता है। इसी प्रकार झूठे और धोखाधड़ी करने वाले लोगों को उल्टी की बीमारी होती है। पढ़े-लिखे ज्ञानी लोगों के प्रति दुर्भावना से काम करने वाले व्यक्ति को सिरदर्द की शिकायत रहती है। गरीबों का धन हड़पने वाले लोगों को कफ और खाँसी से कष्ट होता है। यदि कोई समाज के किसी विद्वान की हत्या कर देता है तो उसे तपेदिक रोग होता है। निर्दोष व्यक्ति का वध करने वाले को कोढ़ होता है। झूठी गवाही देने वाले व्यक्ति गूंगे हो जाते हैं। रोगों की सूची बड़ी लम्बी होने के कारण तथा 'कर्मविपाक संहिता' इस लेख का विषय न होने के कारण सभी रोगों का विवरण यहाँ नहीं दिया जा रहा है। अतः पाठकगण कृपया क्षमा करें।

  5. #25
    कर्मठ सदस्य superidiotonline's Avatar
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    May 2017
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    आखिर क्यों कोई संपन्न और कोई निर्धन कुल में जन्म लेता है? इस यक्ष-प्रश्न का उत्तर भी पूर्व जन्म में किए गए कर्मों से जुड़ा हुआ है। 'शिव महापुराण' में इसका उल्लेख किया गया है। शिव महापुराण में देवी पार्वती और भगवान शिव के मध्य हुए संवाद को पढ़ने मात्र से ही मनुष्य को इस यक्ष-प्रश्न का उत्तर मिल जाता है।

    एक बार माता पार्वती ने भगवान शिव से पूछा कि 'प्रभु, आखिर क्यों कोई मनुष्य जन्म से धनवान और समस्त सुख-सुविधाओं से सम्पन्न होता है। वहीं पर दूसरी ओर क्यों कुछ लोग जन्म से ही निर्धन होते हैं और उन्हें अपने जीवन में तमाम कष्टों का सामना करना पड़ता है?'

    इस पर भगवान शिव ने बताया कि 'यह सब कुछ मनुष्य के कर्मों की गति है। जीवात्मा जब पहली बार पृथ्वी पर जन्म लेती है तो वह सम्पन्नता के साथ जन्म लेती है, किन्तु आगे चलकर सब कुछ मनुष्य के बुद्धि, विवेक और कर्मों पर निर्भर होता है। यदि कोई मनुष्य सज्जन और जीवों की सेवा करने वाला होता है तो उसे वर्तमान अथवा अगले जन्म में सभी सुख-सुविधाएँ और सम्पन्नता पुनः प्राप्त हो जाती है। वहीं पर दूसरी ओर यदि कोई मनुष्य पापकर्मों को करने लगता है तथा अन्य प्राणियों के दु:खों एवं कष्टों का कारण बनता है तो ऐसे मनुष्य को अगले जन्म में निर्धनता के साथ ही दु:खों एवं कष्टों का सामना करना पड़ता है।'

  6. #26
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    May 2017
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    'बहुत खूब! क्या धाँसू लेख है। अब दुनिया भर के सभी पापी बड़ी आसानी से पकड़ में आ जाएँगे। सीधा सा फण्डा है- जो ग़रीब या बीमार है, वह बहुत बड़ा पापी है। ऐसे पापियों को चुन-चुनकर ठोंक-बजाकर कूटकर धर देना चाहिए और उनका कचूमर निकाल देना चाहिए!'--यदि आप ऐसा करके पापियों को दण्डित करने की सोच रहे हों तो ज़रा रुकिए और आगे पढ़िए। वस्तुतः विश्व के किसी भी धार्मिक ग्रन्थ में ग़रीब या रोगियों को सताने या प्रताड़ित करने की बात नहीं लिखी गई है। वैदिक धर्मग्रन्थों में कहा गया है कि दीन, अंधे, निर्धन, अनाथ, गूँगे, जड़, विकलांगों तथा रोगियों की सेवा के लिए जो धन दान में दिया जाता है उससे महान पुण्य मिलता है। इस्लाम ने अमीर लोगों की आमदनी में एक हिस्से पर गरीब, यतीम और समाज के सबसे निचले पायदान पर जिन्दगी गुजर-बसर करनेवालों का हक तय कर दिया है। इस्लाम में दान करने के कई तरीके बताए गए हैं जिसे जकात, सदका और फितरा कहते हैं। ईसाई मत के अनुसार 'जो निर्धन पर दया दिखाता है वह यहोवा (परमेश्वर) को उधार देता है और यहोवा उसके इस भले कार्य का प्रतिफल देगा।' अतः यदि आप ग़रीबों और रोगियों को पापी समझकर सताएँगे या प्रताड़ित करेंगे तो स्वयं पाप के भागी होंगे जिसके कारण आपके कर्म खाते में एक पाप जुड़ जाएगा जो जन्म-जन्मान्तर तक पीड़ित करेगा।

  7. #27
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    आइए, अब जानते हैं- अध्यात्म के इस गूढ़ रहस्य के पार्श्व में छिपे एक सबसे बड़े पेंच के बारे में जो आपको एक-दो नहीं, अपितु कई बार गहन चिन्तन करने के लिए बाध्य कर देगा! वस्तुतः अध्यात्म के इस गूढ़ रहस्य में निहित कटु सत्य है- 'यदि किसी के साथ कुछ बुरा घटित होता है तो यह उसके पूर्व जन्मों के पाप का ही फल है'। अतः अध्यात्म का यह कटु सत्य अपराधियों, दुर्जनों और अत्याचारियों के कृत्य को सही ठहराता है, क्योंकि वह ईश्वरीय विधान के अनुरूप पूर्वजन्म में अपने ऊपर हुए अत्याचार का बदला मात्र ले रहा है। वस्तुतः अपराधियों, दुर्जनों और अत्याचारियों के कृत्य को किसी हालत में न्यायसंगत नहीं ठहराया जा सकता, क्योंकि गीता के अनुसार 'मनुष्य कर्म करने के लिए स्वतन्त्र है और मनुष्य के कर्म पर ईश्वर का अधिकार नहीं है'। इन परिस्थितियों में यदि किसी के साथ कोई कुछ बुरा कर्म करता है तो यह उसके 'पूर्व जन्म का फल' है अथवा बुरा कर्म करने वाला इस जन्म में अपने बुरे कर्म से 'एक नया पाप' अर्जित कर रहा है- यह जानने का कोई प्रामाणिक साधन नहीं है। अतएव अपराधियों, दुर्जनों और अत्याचारियों को अध्यात्म के आधार पर निर्दोष कहना किसी हालत में न्यायसंगत नहीं हो सकता!

  8. #28
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    सम्पूर्ण लेख पढ़ने के बाद ये न कहिएगा कि नतीजा वही ढाक के तीन पात निकला और निष्कर्ष शून्य निकला, क्योंकि अध्यात्म के इस गूढ़ ज्ञान से एक बार हमें लाभ भी हुआ था! कुछ महीने पहले हमने एक जान-पहचान के दर्जी को कपड़ा सिलने के लिए देते हुए पूछा कि कपड़े कब तक सिल जाएँगे? दर्जी ने बताया कि एक हफ्ते में सिलकर दे दूँगा, क्योंकि बस एक-दो दिन का काम ही बचा है। उसके बाद एकदम फ्री हो जाऊँगा और फिर आराम से बैठकर आपके कपड़े सिल दूँगा, क्योंकि यह महीना हर साल खाली ही जाता है। कोई काम-धाम नहीं रहता। हम खुश होकर चले गए और फिर जब एक हफ्ते के बाद दर्जी के पास पहुँचे तो पता चला कि कपड़ा सिला नहीं गया। दर्जी ने एक हफ्ते का समय और माँगते हुए बताया कि इस साल तो जैसे कमाल हो गया। अचानक कई अर्जेन्ट नए काम मिल गए जिसके कारण आपका कपड़ा सिलने का समय ही नहीं मिला। धीरे-धीरे करके जब दो महीने गुजर गए और दर्जी हमारा कपड़ा सिलकर नहीं दे सका तो हमने अध्यात्म-ज्ञान का चश्मा लगाकर गम्भीरतापूर्वक सोचना शुरू कर दिया और समाधान मिलते ही खुशी से उछलते हुए दर्जी के पास पहुँचे। दर्ज़ी ने हमें देखते ही हमेशा की तरह बताया कि समय न मिलने के कारण कपड़ा नहीं सिला जा सका। हमने पूर्वजन्म के पाप और पुण्य कर्मों के बारे में संक्षिप्त प्रकाश डालते हुए दर्ज़ी से बताया कि यह सब हमारे पूर्वजन्म के पापकर्मों का फल है जो इतनी जान-पहचान होते हुए भी आप कपड़ा नहीं सिल पा रहे हैं और हमें आपकी दूकान तक बार-बार दौड़ने का कष्ट भुगतना पड़ रहा है! दर्ज़ी हमारी बात नहीं समझ पाया तो हमने विस्तार से अध्यात्म के गूढ़ रहस्य पर प्रकाश डालते हुए बताया कि दरअसल मैं अपने किसी पूर्वजन्म में दर्जी था और आप मेरे ग्राहक थे। किसी कारणवश मैं आपका कपड़ा सिलकर समय पर नहीं दे सका। जिसके कारण आपको हमारी दूकान तक बार-बार दौड़ने का कष्ट भुगतना पड़ा। आपको मेरे पूर्वजन्म के पाप के कारण जो कष्ट हुआ उसके लिए मैं क्षमा चाहता हूँ। अब पूर्व जन्म में मैंने आपका कपड़ा सिलकर दिया या नहीं दिया- ये तो मुझे पता नहीं, किन्तु प्रायश्चित के तौर पर अपना कपड़ा मैं आपको दिए जा रहा हूँ। कपड़ा स्वीकार करके क्षमा करने की दया-कृपा करें। अब मैं अपने पूर्वजन्म के पाप से मुक्त हो गया। कहकर हम वहाँ से हँसी-खुशी रवाना हो गए, क्योंकि कम्बख्त दर्जी अब हमें पूर्वजन्म के पाप का दण्ड नहीं दे सकता था! शायद दर्जी को यह बात हजम नहीं हुई कि किसी पूर्वजन्म के पापी को इस जन्म में दण्डित किया जाए और अगले ही दिन हमारे पास दर्जी का फोन आ गया- 'आपका कपड़ा सिलकर तैयार है। आकर ले जाइए।' देखा आपने? अपने अध्यात्म ज्ञान के कारण हमारा काम फटाफट हो गया!

  9. #29
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    अध्यात्म के इस गूढ़ ज्ञान के कारण कभी-कभी लेने के देने भी पड़ जाते हैं और 'दाँत काटी दुश्मनी' भी पैदा हो सकती है। एक बार एक बचपन के मित्र हमसे मिलने के लिए पधारे और अपनी जन्मपत्री दिखाकर कुछ प्रश्न पूछने लगे। अन्त में उन्होंने अपनी ज़िन्दग़ी का सबसे बड़ा राज़ खोलते हुए बताया कि वे क्यूबा के दिवंगत राष्ट्रपति फिदेल कास्त्रो की तरह बहुत बड़ी शख्सियत न होने के बावजूद भी उनकी तरह तमाम महिलाओं के साथ सम्बन्ध बना चुके हैं। मित्र ने आगे बताते हुए कहा कि यह बात उनके लिए किसी अजूबे से कम नहीं है। इसके बाद उन्होंने अपना प्रश्न दाग दिया- 'कृपया जन्मपत्री देखकर बताएँ कि महिलाएँ हँसी-खुशी बहुत जल्दी मेरे साथ हमबिस्तर होने के लिए राजी क्यों हो जाती हैं?'

    हमने गर्वपूर्वक कहा- 'इतनी छोटी सी बात के लिए जन्मपत्री खंगालने की जहमत उठाने की क्या ज़रूरत?' मित्र ने हमें प्रश्नवाचक दृष्टि से देखा तो हम समझ गए कि वे अज्ञानता के अंधकार में भटक रहे हैं। हमने मित्र के अज्ञानता के अंधकार में अपने ज्ञान का प्रकाश डालते हुए बताया- 'मित्र, आपके प्रश्न का उत्तर अध्यात्म में छिपा हुआ है। मनुष्य जो बोता है, वही काटता है। आपने अपने पूर्वजन्म में तमाम पुण्यकार्य किए होंगे जिसका फल इस जन्म में आपको प्राप्त हो रहा है!'

    मित्र ने खुश होकर पूछा- 'ऐसा क्या पुण्यकार्य किया मैंने अपने पूर्वजन्म में?'

    हमने कहा- 'अब छोड़िए भी। पूर्वजन्म की बीती बातों को इस जन्म में क्या खोदना?'

    मित्र अपनी ज़िद पर अड़ गए तो हमने बताया कि हो सकता है- आप महाभारत के शिखंडी की तरह पूर्वजन्म में स्त्री रहे हों और कई पुरुषों से सम्बन्ध बनाया हो। इस जन्म में आप पुरुष बने और वो सभी पुरुष स्त्रियाँ बन गईं। लगता है- पूर्वजन्म का सम्बन्ध इस जन्म में भी चला आ रहा है।'

    मित्र ने भड़ककर हमें वक्र दृष्टि से घूरते हुए पूछा- 'तो क्या मैं पूर्वजन्म में छिनाल था?'

    हमने घबड़ाकर कहा- 'अरे नहीं! ये आप कह रहे हैं, हम नहीं। यह भी हो सकता है- आप पूर्वजन्म में शहर की चर्चित गणिका रहे हों।'

    मित्र ने आगबबूला होकर हमें मारने के लिए अपनी चप्पल उतार ली तो हम पिटाई से बचने के लिए पास से गुजरती हुई एक सिटी बस में उछलकर चढ़ गए और जाते-जाते बोले- 'पूर्वजन्म में आप क्या थे- इससे आपको अब क्या लेना-देना? इस जन्म में पूर्वजन्म का रोना लेकर बैठ गए! आपके बार-बार पूछने पर ही हमने बताया था। आखिर इसमें मेरा क्या कुसूर?'

    तब से अब तक हमारी 'दाँत काटी दुश्मनी' बरकरार है! मित्र आज भी हमें बेसब्री से ढूँढ़ रहे हैं, मगर हम इतने बेवकूफ तो नहीं जो आसानी से उनके हत्थे चढ़ जाएँगे। वैसे निःशुल्क ज्योतिष सेवा प्राप्त करके चप्पल उतारने का जो महापाप उन्होंने इस जन्म में किया था, उसका फल उन्हें इसी जन्म में मिल गया था। शहर में दो लाख आशिकों वाली गर्लफ्रेण्ड द्वारा प्रायोजित 'पेरिस सत्संग काँड' में जबरदस्त किसमिस घोटाला होने के बाद वैसे तो कई पापी मित्र पुलिस के लपेटे में आ गए थे, किन्तु सबसे पहले यही पुलिस के हत्थे चढ़े थे और चार घण्टे थाने में बन्द भी रहे थे! इतना सब कुछ होने के बावजूद भी मित्र पाप करने से बाज नहीं आए और जैसे ही थाने से छूटे, लगे फ़ोन पर हमें गरियाने। हमने शान्त स्वर में कहा- 'कटु वचन बोलने का पाप न करिए, मित्र। नहीं तो अगले जन्म में आपको हृदय-रोग हो जाएगा।' हमारी बात सुनकर मित्र और भड़क गए और धाराप्रवाह अश्लील शब्दों का इस्तेमाल करके हमें नवाजने लगे। बहरहाल उनके इस नवीनतम पापकर्म का फल भी उन्हें प्राप्त हो गया और उनकी लिव-इन वाली बेहद अज़ीज़ बीबी उन्हें छोड़कर नौ दो ग्यारह हो गई। तब से मित्र महोदय छाती पीट-पीटकर हाय-हाय कर रहे हैं और ठण्डी-ठण्डी साँसें ले रहे हैं! सहजीवन के तजुर्बेकार भुक्तभोगियों के मुताबिक साथी की जुदाई बहुत अधिक खल जाती है।

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