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Thread: भूत से टक्कर: सारनाथ-वाराणसी यात्रा वृत्तान्त

  1. #11
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    'BHOOT SE TAKKAR: SARNATH-VARANASI YATRA VRITTANT'
    is a work of fiction. Any names, characters, businesses, places, events and incidents are either the products of the author*’s imagination or used in a fictitious manner. Any resemblance to actual persons, living or dead, or actual events is purely coincidental.

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  2. #12
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    Quote Originally Posted by sanjaychatu View Post
    बस थोडा कहानी के "सर और पैर" का ध्यान रख लीजियेगा ,, नहीं तो प्रेम जी के सूत्र की मालकिन आकर इक्क्षाधारी वाले सूत्र की तरह यहाँ भी उधम मचा देंगी !
    आजकल तो रोज़ ही ऊधम चल रहा है चारों ओर। बस यही कोई दो-तीन दिन से बन्द है!

    Quote Originally Posted by sanjaychatu View Post
    रेपो नहीं दे पा रहा हु ,
    आप्शन ही गायब है
    ज़रूर बीबी संकट के चलते ऐसा हुआ होगा!

    Quote Originally Posted by sanjaychatu View Post
    वन्दे भारत एक्सप्रेस' ट्रेन के टिकट के खर्चे का किसी भी बैंक से लोन ले लेना था न !
    यात्रा और भौकाल दोनों ही हो जाते ,,,
    और बाद में लोन डकार कर विदेश भाग जाते और अपना नाम भी माल्या और नीरव की तरह LED की रोशनी में रोशन कर सकते थे !
    बैंक से लोन कभी लिया नहीं, इसलिए अपना क्रेडिट स्कोर ज़ीरो है। और फिर ट्रेन के किराए के लिए हज़ार-दो हज़ार का लोन लेते भी तो भी इतनी छोटी रकम डकारकर लन्दन तो क्या, नेपाल भी भागना बड़ा मुश्किल होता। क्या आपने पढ़ा नहीं- बेचारे माल्या लन्दन में अपनी गर्लफ्रेंड से उधार ले-लेकर अपना खर्चा-पानी चला रहे हैं। इतनी अमीर गर्लफ्रेंड हमारे पास है कहाँ? एक अदद शहर में दो लाख आशिकों वाली गर्लफ्रेंड है जिसकी सारी कमाई अपने दो लाख आशिकों को आइस्क्रीम खिलाकर उन्हें खुश करने में खर्च हो जाती है। थोड़ा बहुत जो बचता है वह बाकी दान-पुण्य करने में खर्च हो जाता है! दान-पुण्य करते-करते बेचारी खुद ग़रीब हो गई है। अब एक ग़रीब गर्लफ्रेंड के भरोसे हम बैंक से लोन लेकर कैसे डकारें?

  3. #13
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    भाई दो ब्रेड पकोड़ो पर कब तक काम चलेगा । या तो और पकोड़े खिलाओ ,,,, या फिर वृत्तान्त को आगे बढ़ाओ ।
    देखो आजकल कही दमन जी काशी तो नही आए हुवे है ।
    और आप से प्रेम जी की मुलाक़ात तो जाए तो क्या कहने ।

  4. #14
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    Quote Originally Posted by sanjaychatu View Post
    भाई दो ब्रेड पकोड़ो पर कब तक काम चलेगा । या तो और पकोड़े खिलाओ ,,,, या फिर वृत्तान्त को आगे बढ़ाओ ।
    देखो आजकल कही दमन जी काशी तो नही आए हुवे है ।
    और आप से प्रेम जी की मुलाक़ात तो जाए तो क्या कहने ।
    आप तो मज़ाक़ करते हैं। हम कम्बख़्त भूत से लगातार टक्कर लेकर वाराणसी में ही बैठे रहेंगे क्या? हम तो कभी का प्रयागराज लौट आए हैं। और ये रहा सुबूत-



    कुछ दिनों बाद चेन्नै लौट जाएँगे। नहीं तो खड़े-खड़े बी०एम०डब्ल्यू० कार की हवा कम हो जाएगी। बड़ा नुकसान हो जाएगा!

  5. #15
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    दो ब्रेड पकौड़े के साथ गर्म-गर्म चाय सुड़कने के बाद मित्र अपनी टुटही साइकिल के साथ इलाहाबाद सिटी रेलवे स्टेशन के प्लेटफ़ार्म नम्बर एक पर दनदनाते हुए पहुँच गए जहाँ पर इलाहाबाद सिटी से मऊ जाने वाली डी०एम०यू० संख्या 75106 चलने के लिए तैयार खड़ी थी। इससे पहले हम कुछ समझते, मित्र महोदय अपनी टुटही साइकिल ट्रेन के डिब्बे में ठूँसने के बाद आराम से एक सीट पर पसर गए और हमें अन्दर आकर बैठने का इशारा करने लगे। हमने बौखलाकर पूछा- 'साइकिल से बनारस नहीं चल रहे हैं क्या?'

    मित्र ने हमें ऊपर से नीचे तक इस प्रकार घूरा जैसे दुनिया के सबसे बड़े मूर्ख व्यक्ति को देख रहे हों। फिर बोले- 'साइकिल चलाकर इतनी दूर कोई जाता है क्या? और वह भी डबल सवारी? साइकिल से लम्बी दूरी की यात्रा करने वाले सभी ग़रीब लोग इसी तरह अपनी साइकिल पैसेन्जर ट्रेन में लादकर ले जाते हैं।'

    हमने आश्चर्य व्यक्त किया तो मित्र ने बताया कि साइकिल के अलावा पैसेन्जर ट्रेन से लोग गाय-बकरी-मुर्गी-कुत्ता तक बड़े आराम से ढ़ो ले जाते हैं।

    आश्चर्यपूर्वक हमारा मुँह खुला का खुला रह गया। मित्र आगे बोले- 'आप बिल्कुल चिन्ता न करिए, मित्र। बनारस पहुँचते ही हमारी साइकिल एक बार फिर सड़क पर सरपट दौड़ेगी।'

    हमने भड़ककर कहा- 'तो आप अपनी साइकिल सड़क पर सरपट दौड़ाते हैं?'

    मित्र ने गर्व से कहा- 'और नहीं तो क्या!'

    हमने और अधिक भड़ककर कहा- 'कहिएगा नहीं किसी से। हमने आपका सरपटपना देख लिया। पैदल चलने वाले भी बड़ी आसानी से आपकी सरपट दौड़ती साइकिल को ओवरटेक कर रहे थे!'

    मित्र ने अलक्ष्यता के साथ कहा- 'पुरानी साइकिल है। बहुत तेज़ सरपट भगाऊँगा तो पहिया टूटकर अलग हो जाएगा और हमारी बत्तीसी टूट जाएगी! इसलिए धीरे चलाने में ही भलाई है।'

    विवश होकर हमने अपना मुँह बन्द कर लिया और ट्रेन चल पड़ी। हमने घबड़ाकर कहा- 'अरे, हमने टिकट तो लिया ही नहीं!'

    मित्र ने अलक्ष्यता के साथ जवाब दिया- 'तो क्या हुआ? जब टी०टी० आएगा तो बनवा लेंगे टिकट।'

    हमने विचलित होकर पूछा- 'कब आएगा टी०टी०?'

    मित्र ने हँसते हुए कहा- 'ये अमीरों के चलने की एक्सप्रेस ट्रेन थोड़े ही है जो टी०टी० ट्रेन चलते ही आ जाएगा। अरे भई, ये ग़रीबों के चलने की पैसेन्जर ट्रेन है। टी०टी० के आने का कोई भरोसा नहीं होता।'

    हमने कहा- 'ये तो बहुत गलत बात है।'

    मित्र ने हँसते हुए कहा- 'इसमें भला गलत क्या है? ग़रीबों की बनाई सरकार है। ग़रीबों के लिए चल रही पैसेन्जर ट्रेन में टिकट चेक करने का दुःसाहस भला कौन सरकार करेगी?'

    --'ग़रीबों की बनाई सरकार? हम कुछ समझे नहीं।' हमने प्रश्नवाचक दृष्टि से मित्र को देखा।

    --'अरे, इतनी सी बात नहीं समझे?' मित्र ने हँसते हुए समझाया- 'अमीरों के वोट में इतना दम-खम कहाँ जो अपनी सरकार बनवा सकें। देश में ग़रीबों की संख्या ज़्यादा है, इसलिए देश में ग़रीबों के वोट की ही सरकार बनती है। अब ग़रीबों के वोट से बनी सरकार में इतना दम-खम कहाँ जो ग़रीबों के लिए चलाई जा रही पैसेन्जर ट्रेन में ग़रीबों का टिकट चेक करने की हिम्मत करके ग़रीबों को नाराज़ करें। यह तो ग़रीबों की मर्ज़ी पर है, जेब में पैसा हो तो टिकट लें, न हो तो न लें।'

    हमने मित्र की बात काटते हुए कहा- 'ऐसा बिल्कुल नहीं है, मित्र। पैसेन्जर ट्रेन में भी कभी-कभी टिकट चेक होता है।'

    हमारी अज्ञानता पर मित्र ने हँसते हुए हमें समझाया- 'वो तो अमीरों को डराने के लिए कभी-कभी टिकट चेक किया जाता है जिससे ग़रीब के भेष में अमीर ट्रेन में बेटिकट घुसकर निःशुल्क यात्रा की सुविधा न ले सकें।'

    हमने एक बार फिर मित्र की बात काटते हुए कहा- 'रेलवे ने ऐसा कोई नियम नहीं बनाया है कि ग़रीबों के लिए पैसेन्जर ट्रेन में चलना निःशुल्क है। बेटिकट यात्रियों के कारण रेलवे का बड़ा नुकसान होता है। बेटिकट चलने वाले यात्रियों को पकड़कर जुर्माना न भरने पर जेल में बन्द कर देना चाहिए।'

    मित्र ने हँसते हुए कहा- 'असली ग़रीब कभी टिकट नहीं लेता और न ही जुर्माना भरने को तैयार होता है। सरकार बेवकूफ थोड़े ही है जो दस-बीस रुपए का टिकट न लेने पर सभी को छः महीने के लिए जेल में बन्द करके नि:शुल्क भोजन-पानी कराए। जेल में छः महीने में एक ग़रीब लगभग छः हज़ार रुपए का राशन-पानी चट कर जाएगा जिससे सरकार को बहुत बड़ा घाटा होगा।'

    मित्र हमें बहुत बड़े ज्ञानी लगने लगे। हमने चिंतित स्वर में पूछा- 'अगर टी०टी० नहीं आया और हमारा टिकट नहीं बना तो हम बेटिकट मंडुवाडीह (वाराणसी) स्टेशन से बाहर कैसे निकलेंगे? गेट पर खड़ा टी०टी० हमें खदेड़कर पकड़ लेगा।'

    मित्र ने गर्व से हमें 'रेलोपदेश' देते हुए कहा- 'चिन्ता न करिए, मित्र। पैसेन्जर ट्रेन के बड़े स्टेशन के प्लेटफ़ार्म पर पहुँचते ही टीटियों का झुण्ड ठीक उसी प्रकार स्टेशन से गायब हो जाता है जिस प्रकार जंगल में शेर को देखते ही हाथियों का झुण्ड गायब हो जाता है!'

    मित्र का 'रेलोपदेश' सुनकर हमने आश्चर्य व्यक्त किया- 'ऐसा क्या?'

    मित्र ने गर्व से कहा- 'और नहीं तो क्या!' और फिर वे इस प्रकार फुसफुसा कर बोलने लगे जैसे दुनिया के सबसे बड़े राज़ का पर्दाफ़ाश करने जा रहे हों! बोले- 'इसके पीछे एक बहुत बड़ा गहरा राज़ छिपा है!'

    हमने आश्चर्य से पूछा- 'क्या गहरा राज़ छिपा है?'

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