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Thread: भूत से टक्कर: सारनाथ-वाराणसी यात्रा वृत्तान्त

  1. #1
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    May 2017
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    Cool भूत से टक्कर: सारनाथ-वाराणसी यात्रा वृत्तान्त


  2. #2
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    May 2017
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    प्रयागराज के सिविल लाइन्स इलाके में एक चाय की दूकान पर सुनी 'गपाष्टक' को मंच पर 'इच्छाधारी' शीर्षक की छत्रछाया में एक सार्थक लेख के रूप में अवतरित करने के बाद हमने चैन की साँस ली ही थी अचानक वाराणसी से फोन पर सूचना मिली कि एक लड़की पर भूत-प्रेत का साया पड़ गया है और वह अंट-शंट हरकतें कर रही है। सूचना सुनकर हम खुशी से उछल पड़े, क्योंकि मंच पर प्रेमसागर जी अपने सूत्र 'तंत्र की अलौकिक दुनिया:....' लिखकर डेढ़ लाख व्यूज़ के साथ नाम पर नाम कमाए चले जा रहे थे और हमें कोई ऐसा सार्थक मौका नहीं मिल रहा था जिसमें हम अपनी २जी तांत्रिक शक्ति का प्रदर्शन करके मंच पर प्रेम जी का गड़ा झण्डा उखाड़ सकें!

  3. #3
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    May 2017
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    हमने बिना समय गँवाए वाराणसी के लिए रवाना होना चाहा तो हमें याद आया कि हमारे पास वाहन के नाम पर भगवान की दी सिर्फ़ दो टाँगें थीं और सिर्फ़ दो टाँगों के बल पर वाराणसी पहुँचना नामुमकिन था। आप सबने प्रेम जी के लेख 'तंत्र की अलौकिक दुनिया....' में पढ़ा होगा कि प्रेम जी अपने व्यक्तिगत वाहन हार्ड टॉप जिप्सी से मिल्कीपुर के लिए रवाना हुए थे। हम दो टाँगों के व्यक्तिगत वाहन का प्रयोग करके वाराणसी जाते तो प्रेम जी के सामने हमारा कद बड़ा छोटा हो जाता। अतः अपना कद ऊँचा रखने के लिए ड्राइवर के साथ एक अदद व्यक्तिगत वाहन का होना बहुत ज़रूरी था जिससे हम भौकाल के साथ वाराणसी पहुँचकर भूत से टक्कर ले सकें!

  4. #4
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    May 2017
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    प्रेम जी के सामने अपना भौकाल बरकरार रखने के लिए हमने मित्रों-यारों से चर्चा की तो 'वन्दे भारत एक्सप्रेस' ट्रेन से प्रयागराज से वाराणसी जाने का सुझाव मिला, किन्तु चेयरकार का 702 रूपया और एक्ज़्क्यूटिव क्लास का 1,194 रूपया किराया सुनकर हमारे होश उड़ गए। और फिर ट्रेन से चलने पर इतना भौकाल भी न बनता। कई साल पहले दिल्ली में मेट्रो से चलने पर हमारी बड़ी बदनामी भी हुई थी। अतः हमने वन्दे भारत एक्सप्रेस का सुझाव रद्द करके यह पता करना शुरू किया कि किस मित्र के पास ड्राइवर के साथ व्यक्तिगत वाहन है, जिसका उपयोग करके अपना भौकाल बनाया जा सके!

  5. #5
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    Aug 2015
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    वाह ,, बहुत खूब रजत जी !
    आगाज़ की मुरादी बताती है की अंजाम बेहतरीन होगा ! बहुत अच्छा सब्जेक्ट चुना है आपने ,,, आगामी घटनाओ का अंदाज़ा लग रहा है मुझे ,, और अभी से मुस्कुराहते पीछे पड़ गयी है !
    बस थोडा कहानी के "सर और पैर" का ध्यान रख लीजियेगा ,, नहीं तो प्रेम जी के सूत्र की मालकिन आकर इक्क्षाधारी वाले सूत्र की तरह यहाँ भी उधम मचा देंगी !
    सप्रेम रेपो अर्पित है !

  6. #6
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    Aug 2015
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    रेपो नहीं दे पा रहा हु ,
    आप्शन ही गायब है

  7. #7
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    Aug 2015
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    Quote Originally Posted by superidiotonline View Post
    प्रेम जी के सामने अपना भौकाल बरकरार रखने के लिए हमने मित्रों-यारों से चर्चा की तो 'वन्दे भारत एक्सप्रेस' ट्रेन से प्रयागराज से वाराणसी जाने का सुझाव मिला, किन्तु चेयरकार का 702 रूपया और एक्ज़्क्यूटिव क्लास का 1,194 रूपया किराया सुनकर हमारे होश उड़ गए। और फिर ट्रेन से चलने पर इतना भौकाल भी न बनता। कई साल पहले दिल्ली में मेट्रो से चलने पर हमारी बड़ी बदनामी भी हुई थी। अतः हमने वन्दे भारत एक्सप्रेस का सुझाव रद्द करके यह पता करना शुरू किया कि किस मित्र के पास ड्राइवर के साथ व्यक्तिगत वाहन है, जिसका उपयोग करके अपना भौकाल बनाया जा सके!
    वन्दे भारत एक्सप्रेस' ट्रेन के टिकट के खर्चे का किसी भी बैंक से लोन ले लेना था न !
    यात्रा और भौकाल दोनों ही हो जाते ,,,
    और बाद में लोन डकार कर विदेश भाग जाते और अपना नाम भी माल्या और नीरव की तरह LED की रोशनी में रोशन कर सकते थे !

  8. #8
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    May 2017
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    पास और दूर के तमाम नए और पुराने मित्रों-यारों को फ़ोन करने के बाद पता चला कि ड्राइवर तो दूर की कौड़ी है, क्योंकि किसी के पास कोई व्यक्तिगत वाहन नहीं था! सुनकर हमारा मूड बहुत ख़राब हो गया और हमने मित्रों-यारों को तरक्की न करने के लिए खूब लताड़ा। बदले में मित्रों-यारों ने हमें खूब लताड़ा। फिर हमने मित्रों-यारों को चेन्नै में हमारे काल्पनिक बंगले में खड़ी बी०एम०डब्ल्यू० कार का हवाला देते हुए लताड़ते हुए बताया कि तुम लोगों को दिखाने के लिए मैं चेन्नै से प्रयागराज बी०एम०डब्ल्यू० कार लेकर थोड़े ही आऊँगा। फ्लाइट से आया हूँ। हमारी काल्पनिक अमीरी सुनकर मित्रों ने शर्माकर अपना सिर लटका लिया। जबकि सच्चाई यह थी कि सिकन्दराबाद-दानापुर एक्सप्रेस में स्लीपर क्लास में रिजर्वेशन कन्फ़र्म न होने के कारण हम जनरल कोच की भीड़ में एक टाँग पर मुर्गे की तरह खड़े होकर भारी मशक्कत के साथ प्रयागराज पहुँचे थे!

  9. #9
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    आखिरकार काफी मशक्कत के बाद हमें पता चला कि एक पुुराने मित्र के पास बाबा आदम के ज़माने की एक पुरानी टुटही साइकिल है। हमारे पास दूसरा कोई विकल्प नहीं था। वाराणसी में भूत से टक्कर लेने की बात सुनकर मित्र अपनी टुटही साइकिल का ड्राइवर बनने के लिए सहर्ष तैयार हो गए और सुबह साढ़े चार बजे अपनी टुटही साइकिल के साथ हमारे घर पहुँच गए। पुराने मित्र की सच्ची मित्र-भक्ति देखकर हमारी आँखों से खुशी के आँसू बाहर निकलने लगे। इस कलियुग में ऐसे सच्चे मित्र मिलते कहाँ हैं जो अपना वाहन उधार देकर खुद ड्राइवर भी बनने के लिए हँसी-खुशी तैयार हो जाएँ, वो भी टुटही साइकिल का! मित्र हमें भगवान कृष्ण से भी अधिक महान प्रतीत होने लगे, क्योंकि भगवान कृष्ण ने महाभारत के युद्ध में अर्जुन के रथ का सिर्फ़ सारथी ही बनना स्वीकार किया था, अपना व्यक्तिगत रथ अर्जुन को उधार नहीं दिया था! हमने रूमाल से अपना आँसू पोछते हुए मित्र से पूछा कि वाराणसी पहुँचने में कितना समय लगेगा? मित्र ने अलक्ष्यता के साथ बताया कि यही कोई साढ़े तीन या चार घण्टा लगेगा। हमें मित्र की महान साइकिल-ड्राइविंग दक्षता पर अत्यधिक गर्व हुआ और हमारा सीना फूलकर कुप्पा हो गया, क्योंकि प्रयागराज से वाराणसी पहुँचने में पैसेंजर ट्रेन भी लगभग इतना ही समय लेती है!

  10. #10
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    'चलिए, मित्र.. नहीं तो बहुत देर हो जाएगी।' कहकर मित्र अपनी टुटही साइकिल की गद्दी पर सवार हो गए और धीरे से साइकिल आगे बढ़ा दी। हम भी उछलकर पीछे कैरियर पर लद गए और फिर टुटही साइकिल 'चूँ-चूँ' करके चीखती हुई सड़क पर धीरे-धीरे आगे बढ़ने लगी। पहले तो हमें सन्देह हुआ कि इतनी कम रफ़्तार में तो वाराणसी पहुँचने में कम से कम दो दिन का समय लग जाएगा, किन्तु फिर हम समझ गए कि शहर के बाहर वाराणसी हाइवे पर पहुँचते ही मित्र महोदय की तशरीफ़ साइकिल की गद्दी पर ज़रा भी टिकने वाली नहीं है और वे नब्बे-सौ कि०मी० प्रति घण्टा की रफ़्तार से साइकिल भगाकर अपनी जबरदस्त साइकिल-ड्राइविंग दक्षता का ज़ोरदार प्रदर्शन करने वाले हैं! चूँ-चूँ करके करीब डेढ़-दो कि०मी० साइकिल चलने के बाद सुबह साढ़े पाँच बजे के आसपास हम रामबाग इलाके में स्थित इलाहाबाद सिटी रेलवे स्टेशन के सामने से गुजरे और हमारी स्पीड को ब्रेक लग गया। मित्र ने एक चाय-पकौड़े की दूकान के सामने अपनी टुटही साइकिल खड़ी कर दी थी। हम तत्काल समझ गए कि मित्र चाय-पानी पीकर आगे चलना चाहते हैं।

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