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Thread: शाही 100 टन योजना

  1. #21
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    शाही बावर्ची : क्षमा करें, महारानी। बैंगन की कलौंजी तो आजकल बच्चे बना रहे हैं। आप महारानी हैं। कितना बड़ा कद है आपका। इतनी बड़ी महारानी होकर आप बच्चों की तरह बैंगन की कलौंजी बनाइएगा तो लोग क्या कहेंगे!

    महारानी : क्या कहेंगे लोग?

    शाही बावर्ची : लोग कहेंगे- इतनी बड़ी महारानी होकर अभी तक बच्चों की तरह बैंगन की कलौंजी बनाकर काम करने का रिहर्सल कर रही हैं!

    महारानी : तो फिर मैं क्या करूँ?

    शाही बावर्ची : बैंगन की कलौंजी बनाने से आपका भौकाल नहीं बढ़ेगा, महारानी। आज से आप लौकी का रायता बनाकर काम करने का रिहर्सल करिए। मजा आ जाएगा आपको। महारानी का भौकाल भी बढ़ेगा।

    महारानी : (प्रसन्न होकर) बहुत खूब, शाही बावर्ची.. बहुत खूब। तुमने हमारा महारानी का भौकाल बढ़ाने के लिए बहुत अच्छी सलाह दिया है। हम बड़े खुश हुए। शाही अध्यादेश संख्या अठत्तर बटे छः हज़ार आठ सौ बटे आठ सौ अठत्तर बटे आठ के जरिए तुम्हारी तन्ख्वाह २०० स्वर्णमुद्राओं से ३०० स्वर्णमुद्राएँ की जाती हैं।

    शाही बावर्ची : (सिर झुकाकर) महारानी की जय हो! आप बड़ी दयालु-कृपालु हैं। अब आप आराम से मन लगाकर लौकी का रायता बनाइए। मैं तख़्त पर लेटकर थोड़ा आराम करता हूँ। दही की मथाई करते-करते थक गया। आपको पता है न- लौकी का रायता बनता कैसे है।

  2. #22
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    महारानी : (गर्वपूर्वक) हाँ-हाँ, पता है। दही में लौकी डालकर दही का रायता बनाया जाता है। बहुत आसान काम है दही का रायता बनाना!

    (शाही बावर्ची तख़्त पर लेट जाता है। महारानी दही का रायता बनाने के लिए लौकी उठाकर दही की हाँडी में डाल देती हैं। मोटी लौकी दही की हाँडी के मुँह में फँस जाती है। महारानी ज़ोर लगाकर देखती हैं- लौकी न अन्दर जाती है, न बाहर आती है। दही की हाँडी के मुँह में लौकी फँसा देखकर महारानी के मुँह से चीख निकल जाती है।)

    महारानी : (चीखते हुए) शाही बावर्ची! जल्दी आओ.. दही की हाँडी के मुँह में लौकी बुरी तरह फँस गई है। न अन्दर जाती है, न बाहर आती है!

    (शाही बावर्ची फुर्ती से उठकर महारानी के निकट आता है और दही की हाँडी के मुँह में बुरी तरह फँसी हुई लौकी को देखता है।)

    शाही बावर्ची : ये क्या किया महारानी आपने? हाँडी के मुँह में लौकी फँसाकर धर दिया। इस तरह कहीं लौकी का रायता बनता है? अरे, लौकी को कद्दूकस करके पकाया जाता है और फिर दही में डालकर ऊपर से मसाला मिलाया जाता है।

    महारानी : (चीखते हुए) बात मत करो.. जल्दी से निकालो लौकी बाहर। मेरी तो जान निकली जा रही है। अगर कहीं हाँडी का मुँह फट गया तो क्या होगा? ये कोई ऐसी-वैसी हाँडी नहीं है। चीन के झाऊ वंश के शासक ने यह हाँडी मुझे जन्मदिन पर उपहार में दी थी!

    शाही बावर्ची : आप बिल्कुल चिन्ता न करें, महारानी.. आपकी हाँडी का बाल-बाँका भी नहीं होगा।

    (शाही बावर्ची एक हाथ से हाँडी का मुँह पकड़कर दूसरे हाथ से लौकी पकड़कर ऊपर-नीचे हिलाकर बाहर निकालना चाहता है।)

    महारानी : (चीखते हुए) अरे-अरे-अरे.. ये क्या कर रहे हो तुम? इतनी ज़ोर-ज़ोर से लौकी न हिलाओ। नहीं तो हाँडी का मुँह फट जाएगा!

    शाही बावर्ची : अच्छा आप दोनों हाथ से हाँडी का मुँह दबाकर कसकर पकड़ लीजिए। मैं लौकी को धीरे-धीरे गोल-गोल घुमाकर बाहर निकालने की कोशिश करता हूँ!

    (महारानी अपने दोनों हाथों से हाँडी का मुँह दबाकर कसकर पकड़ लेती है। शाही बावर्ची लौकी को धीरे-धीरे गोल-गोल घुमाकर सट् से बाहर खींच लेता है। महारानी की जान में जान आती है और हाँडी के मुँह को सहलाते हुए ध्यान से देखने लगती हैं।)

  3. #23
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    महारानी : (चिंतित स्वर में) तुम भी ध्यान से देखो, शाही बावर्ची.. हाँडी का मुँह कहीं से फटा तो नहीं?

    शाही बावर्ची : दही की हाँडी एकदम सही-सलामत है, महारानी।

    महारानी : देखो-देखो.. और ध्यान से देखो।

    शाही बावर्ची : जैसी आज्ञा, महारानी।

    (शाही बावर्ची दही की हाँडी का मुँह जीभ से चाटने लगता है।)

    महारानी : अरे-अरे.. ये क्या कर रहे हो तुम? जीभ से चाटकर मेरी दही की हाँडी जूठी क्यों कर रहे हो?

    शाही बावर्ची : जूठी नहीं कर रहा हूँ, महारानी.. कायदे से काम कर रहा हूँ।

    महारानी : (आश्चर्यपूर्वक) अच्छा.. कैसे?

    शाही बावर्ची : दही की हाँडी के मुँह को चारों तरफ से चाटकर साफ करने पर ही तो पता चलेगा- हाँडी कहीं से चटकी तो नहीं! कहीं से ज़रा भी चटकी होगी तो जीभ से तुरन्त पता चल जाएगा।

    महारानी : (प्रसन्न होकर) अरे वाह.. तुम तो बड़े ज्ञानी हो। लगे हाथ हाँडी के मुँह के अन्दर की तरफ भी जीभ फिराकर देख लो- हाँडी कहीं अन्दर से तो नहीं चटकी?

    शाही बावर्ची : जैसी आज्ञा, महारानी। वैसे ये काम तो मैं खुद करने वाला था!

    (शाही बावर्ची हाँडी के मुँह के अन्दर की तरफ जीभ फिराने लगता है।)

    महारानी : (प्रसन्न होकर) वाह-वाह.. तुम कितना मन लगाकर ईमानदारी, मेहनत और लगन से काम कर रहे हो। तुम्हारी देश भक्ति देखकर हमें बड़ी खुशी हुई। विशेष शाही अध्यादेश संख्या अठत्तर बटे छः सौ सत्तर बटे साठ बटे छः सौ ग्यारह के जरिए तुम्हारी तन्ख्वाह ४०० स्वर्णमुद्राएँ की जाती हैं।

  4. #24
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    शाही बावर्ची : (सिर झुकाकर) महारानी की जय हो! आप बड़ी दयालु-कृपालु हैं। मैंने बड़ी अच्छी तरह से हाँडी के मुँह के अन्दर और बाहर जीभ फिराकर देख लिया है। हाँडी एकदम सही सलामत है। कहीं पर खरोंच तक नहीं आई। आज्ञा दें तो मथानी डालकर दही की मथाई शुरू करूँ?

    महारानी : (बिगड़कर) अब तुम रहने भी दो। मथाई के नाम पर तुम झौवा भर किसमिस खाकर ढ़ेर सारा दूध पियोगे और फिर दही की हाँडी के साथ सिर्फ़ खिलवाड़ करोगे।

    शाही बावर्ची : क्षमा करें, महारानी। अगर आपको मेरी मथाई पसन्द नहीं है तो मैं तख्त पर लेटकर आराम करता हूँ। यह पकड़िए मथानी और अपने मन-मुताबिक दही मथकर मक्खन निकालकर देखिए। थोड़ी देर में आपको खुद पता चल जाएगा- मथाई करना इतना आसान काम नहीं है।

    महारानी : (शर्माते हुए) नहीं-नहीं..

    शाही बावर्ची : नहीं-नहीं क्या? अपने मन-मुताबिक दही मथने के लिए मथानी तो आपको पकड़ना ही होगा! अरे, आप शर्मा क्यों रही हैं?

    महारानी : (शर्माते हुए) इतनी बड़ी महारानी होकर एक मामूली मथानी को हाथ लगाते मुझे बहुत शर्म आ रही है!

    शाही बावर्ची : यह आपको मामूली मथानी लग रही है? गौर से देखिए- इस पर शाही चिह्न बना हुआ है।

    (महारानी मथानी को ध्यानपूर्वक देखती हैं।)

    महारानी : (खुश होकर) अरे हाँ, इसमें तो वाकई किसी देश का शाही ठप्पा नज़र आ रहा है।

    शाही बावर्ची : और ध्यान से देखिए।

    महारानी : (खुश होकर) यही है.. यही है.. बिल्कुल इसी शाही ठप्पे वाली मथानी को मैं बचपन से सपने में देखती आ रही हूँ! किस देश का ठप्पा है ये?

    शाही बावर्ची : यह पॉन्टस महासाम्राज्य का शाही ठप्पा है, महारानी।

    महारानी : (सोचते हुए) पॉन्टस महासाम्राज्य? इस देश का नाम कभी सुना नहीं!

    शाही बावर्ची : पॉन्टस महासाम्राज्य काला सागर के पास है, महारानी।

    महारानी : काला सागर तो यहाँ से बहुत दूर है, मगर तुम्हारे पास पॉन्टस महासाम्राज्य की शाही मथानी आई कैसे?

    शाही बावर्ची : जैसे आपके पास चीन के झाऊ-वंश के शासक की हाँडी आई!

    (महारानी मथानी पकड़कर अपनी ओर खींचती हैं।)

    महारानी : अच्छा.. लाओ, यह मथानी मुझे दो।

    शाही बावर्ची : (चीखते हुए) अरे-अरे.. इतनी जोर से मथानी न खींचिए। नहीं तो मथानी का डण्डा उखड़कर आपके हाथ में आ जाएगा और फिर मथानी किसी काम की न रहेगी।

    महारानी : छोड़ो मथानी.. अब यह मथानी हमारे पास रहेगी!

    शाही बावर्ची : नहीं-नहीं.. मथानी मेरे पास रहेगी।

    महारानी : तुम्हारे पास कैसे रहेगी? विशेष शाही अध्यादेश संख्या अठत्तर बटे छः हज़ार आठ सौ बटे छियासी बटे पचपन के जरिए तुम्हारी मथानी को हमारे देश की राष्ट्रीय सम्पत्ति घोषित किया जाता है। अब इस मथानी पर तुम्हारा कोई अधिकार नहीं रहा।

  5. #25
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    शाही बावर्ची : अरे, वाह.. कैसे नहीं अधिकार रहा? शाही अध्यादेश के जरिए किसी की निजी सम्पत्ति हड़पना ठीक नहीं है! आपका नाम ख़राब होगा। भौकाल अलग ख़त्म हो जाएगा।

    महारानी : तुम्हारी मथानी लेकर मैं कहीं भागे थोड़े ही जा रही हूँ। जब तुम्हें दही मथकर मक्खन निकालना हो, आकर माँग लेना।

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