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Thread: खुशियों का फण्डा बाँटने का धन्धा

  1. #91
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    सेक्स गुरू ओशो तो 'नदी में डूबते एक मनुष्य को अपनी जान जोखिम में डालकर बचाने' जैसे श्रेष्ठ कृत्य को भी स्वार्थ ही मानते हैं! ओशो के कथनानुसार- 'जब मैं एक आदमी को नदी में डूबते देखता हूँ तब तत्काल मेरे सामने जो सवाल होता है वह उस आदमी को बचाने का नहीं होता। तत्काल सवाल यह होता है कि क्या मैं उस आदमी के डूबने का दु:ख झेल सकता हूँ? यह असली सवाल गहरे स्वार्थ का है। जो इस दु:ख को झेल रहा है वह निकल जाएगा नदी किनारे से, वह फिकर नहीं करेगा। लेकिन जो इस दु:ख को नहीं झेल सकता, वह उस आदमी को बचाता है। वह उस आदमी को नहीं बचा रहा है। वह उस आदमी को डूबते हुए देखने के अपने दु:ख से छुटकारा पा रहा है। और कोई कारण नहीं है। और जब मैं उस आदमी को बचाकर ले आऊँ उस नदी के किनारे- तो मुझे जो सुख मिलता है, वह सुख उस आदमी को बचाने का नहीं है। वह सुख मुझे जो उस आदमी को डूबते हुए देखने की पीड़ा थी, उससे मुक्ति का है। और दूसरा सुख मैंने उसे बचाया है, उसका है। वह आदमी बच गया, यह दूसरी बात है, वह गौण है। आज तक दुनिया में कोई आदमी अपने स्वार्थ के बाहर नहीं जा सका।'

  2. #92
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    May 2017
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    अतः जहाँ पर स्वार्थ शून्य होगा, वहाँ पर प्रेम भी शून्य होगा। जहाँ पर २५ प्रतिशत स्वार्थ होगा, वहाँ पर २५ प्रतिशत प्रेम हाेगा। जहाँ पर ५० प्रतिशत स्वार्थ होगा, वहाँ पर ५० प्रतिशत प्रेम हाेगा। जहाँ पर ७५ प्रतिशत स्वार्थ होगा, वहाँ पर ७५ प्रतिशत प्रेम हाेगा। जहाँ पर १०० प्रतिशत स्वार्थ होगा, वहाँ पर १०० प्रतिशत प्रेम हाेगा। यह दो लोगों के बीच प्रेम का एक ऐसा अटूट बन्धन होगा जो किसी के तोड़ने से भी नहीं टूटेगा। यही वह सच्चा प्रेम है, जिसकी तलाश में लोग पागलों की तरह इधर-उधर भटकते रहते हैं। स्वार्थ और प्रेम के बीच एक अटूट रिश्ता सिद्ध होने के कारण यदि आपको किसी से वृहत् प्रेम प्राप्त करने की आकांक्षा है तो अगले के स्वार्थ का आकार भी बहुत बड़ा होना चाहिए, अर्थात् अगले के स्वार्थ की मात्रा १०० प्रतिशत होना चाहिए। अन्तःकरण का स्वार्थ ही प्रेम का झरना बनकर बाहर निकलता है।

  3. #93
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    आखिर किसी को आपके प्रति प्रेम क्यों होना चाहिए? क्या ज़रूरत है इस प्रेम की? तो इस यक्ष-प्रश्न का उत्तर यह है कि मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। वह अपने सभी कार्य स्वयं नहीं सम्पन्न कर सकता है। किसी न किसी कार्य के लिए मनुष्य को दूसरों पर निर्भर होना ही पड़ता है। उदाहरण के लिए रात दस बजे आपके कमरे का ट्यूबलाइट फ़्यूज़ हो जाता है। अब हर आदमी इलेक्ट्रीशियन तो होता नहीं जो खुद ट्यूबलाइट बदल सके। जो ट्यूबलाइट बदलना नहीं जानता उसके लिए यह कार्य एवरेस्ट पर चढ़ने जैसा कठिन होता है। अब आपके पास सिर्फ दो विकल्प हैं- इलेक्ट्रीशियन को बुलाना या फिर अँधेरे में रहना। वस्तुतः इलेक्ट्रीशियन को बुलाकर ट्यूबलाइट बदलवा लेना ही बेहतर विकल्प प्रतीत होता है, किन्तु यथार्थ के धरातल पर तत्काल ऐसा करना सम्भव नहीं है क्योंकि रात दस बजे किसी इलेक्ट्रीशियन को तत्काल बुलाना लोहे के चने चबाना जैसा होता है। बहुधा इलेक्ट्रीशियन रात में आकर काम करने से इन्कार कर देते हैं। 'वाह जी, क्यों नहीं आएगा इलेक्ट्रीशियन? हम मुफ़्त में थोड़े ही काम करवा रहे हैं!'--जैसे प्रश्नों का जवाब यह है कि दिन-भर काम करके इलेक्ट्रीशियन थक चुके होते हैं और देर शाम के बाद अधिकतर इलेक्ट्रीशियन 'सुरागोश' में रहते हैं। 'सुरालिंगन' में न भी हों तो भी वे थकान के कारण रात में आने से इन्कार कर सकते हैं, क्योंकि दिन भर में उनको जितना कमाना होता है उतना वे कमा चुके होते हैं। अब आपके पास एक ही विकल्प बचता है- अँधेरे में रहना, क्योंकि इलेक्ट्रीशियन का आपके प्रति कोई प्रेम भाव नहीं है। यदि होता तो वह रात दस बजे क्या, रात बारह-एक बजे भी भागा-भागा आता। इस प्रेम भाव के न होने का कारण उसके मन में किसी भी प्रकार का स्वार्थ न होना है। इलेक्ट्रीशियन के मन में 'अधिक धन मिलने का स्वार्थ' पैदा कीजिए। एक बार इलेक्ट्रीशियन के मन में 'अधिक धन मिलने का स्वार्थ' पैदा हो गया तो फिर उसके मन में आपके प्रति अगाध प्रेम उत्पन्न हो जाएगा और फिर रात-बिरात कभी भी आपके बुलाने पर वह भागा-भागा आएगा। यह था दूसरों पर निर्भरता का एक छोटा सा उदाहरण। इसी प्रकार तमाम कार्यों के लिए मनुष्य एक-दूसरे पर निर्भर करता है।

  4. #94
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    May 2017
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    ऊपर के उदाहरण में आपने देखा कि 'अँधेरे में रहना, न रहना' पूरी तरह से एक अदने से इलेक्ट्रीशियन के स्वार्थ पर निर्भर था। यदि इलेक्ट्रीशियन स्वार्थी न होता तो आपको अँधेरे में रहना पड़ता और आप दुःखी हो जाते। आपने 'इलेक्ट्रीशियन को बुलाने का जो कर्म' किया था, वह पूरी तरह से निष्फल हो जाता और आप दुःखी मन से ईश्वर को कोसते रहते, क्योंकि फल देना तो ईश्वर के हाथ में है! वस्तुतः यहाँ पर 'इलेक्ट्रीशियन को बुलाने का कर्म' एक अपूर्ण कर्म था जिसके कारण वह निष्फल हो गया। सम्पूर्ण कर्म तो तब कहलाता जब आप 'इलेक्ट्रीशियन को बुलाने के कर्म' के साथ-साथ 'इलेक्ट्रीशियन के स्वार्थ को जाग्रत करने का कर्म' भी करते। हम अक्सर यही गलती करते हैं और अपने 'अपूर्ण कर्म' को ही 'सम्पूर्ण कर्म' समझकर फल की आस लगाकर बैठ जाते हैं और जब नतीज़ा शून्य आता है तो दुःखी हो जाते हैं। आपके दुःखी होने की मात्रा इस बात पर निर्भर करती है कि आप कितने सन्तोषी हैं? आप जितने अधिक सन्तोषी होंगे उतना अधिक कम दुःखी होंगे। यहाँ पर ध्यान देने योग्य बात यह है कि 'इलेक्ट्रीशियन के स्वार्थ को जाग्रत करने का कर्म' ही प्रमुख कर्म है, न कि 'इलेक्ट्रीशियन को बुलाने का कर्म'। यदि आप 'इलेक्ट्रीशियन के स्वार्थ को जाग्रत करने का कर्म' करने में असक्षम हैं तो फिर 'इलेक्ट्रीशियन को बुलाने का कर्म' करने से कोई लाभ नहीं है!

  5. #95
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    प्रायः खुशियों के फण्डे की किताबों में बताया जाता है कि सकारात्मक विचारों से ही लक्ष्य परिपूर्ण होते हैं जिसके कारण सकारात्मक विचार ही खुशियाँ प्राप्त करने का मार्ग होते हैं। इन किताबों में नकारात्मक विचारों से दूर रहने के लिए कहा जाता है। खुशियों के फण्डे की किताबों में ही नहीं, प्रायः बुद्धिजीवियों को भी सकारात्मक दृष्टिकोण के पक्ष में ही बोलता हुआ देखा गया है। इन बुद्धिजीवी लोगों की आम राय होती है कि हमेशा सकारात्मक दृष्टिकोण ही रखना चाहिए।

    इस प्रकार सकारात्मक के समर्थन में बोलने वालों की संख्या बहुत बड़ी है, जबकि हमारी राय के अनुसार-

    'सकारात्मक सोच वाले खुशफ़हमी में मारे जाते हैं और नकारात्मक सोच वाले गलतफ़हमी में मारे जाते हैं। जो सकारात्मक और नकारात्मक- दोनों पक्षों का तुलनात्मक अध्ययन नहीं करता वह संसार का सबसे बड़ा मूर्ख है।'

    ऐसा क्यों? वस्तुतः सकारात्मक विचारों से खुशफ़हमी पैदा होती है तथा नकारात्मक विचारों से गलतफ़हमी पैदा होती है और ये दोनों प्रकार की 'फ़हमी' घातक सिद्ध होती है।

  6. #96
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    'सकारात्मक विचारों' से पैदा हुई 'खुशफ़हमी' के कारण ही हम अपने 'अपूर्ण कर्म' को 'सम्पूर्ण कर्म' समझकर हाथ पर हाथ धरकर बैठ जाते हैं। इलेक्ट्रीशियन वाले उदाहरण में ही देखिए- अपने सकारात्मक विचारों के द्वारा उत्पन्न हुई खुशफ़हमी के कारण ही 'इलेक्ट्रीशियन को बुलाने के कर्म' को ही सम्पूर्ण कर्म समझकर आप अपने कर्तव्य की इतिश्री समझकर चुपचाप बैठ जाते हैं और अन्त में इलेक्ट्रीशियन के न आने पर हताश और निराश होकर दुःखी हो जाते हैं। सकारात्मक विचारों के कारण ही आपके दिमाग़ में यह बात नहीं आई कि 'अगर बुलाने पर भी इलेक्ट्रीशियन न आया तो?' अपने सकारात्मक विचारों के कारण ही आप अपने मन में यह खुशफ़हमी पालकर आश्वस्त हो गए कि बुलाने मात्र से इलेक्ट्रीशियन भागा-भागा चला आएगा। अन्तत: जब इलेक्ट्रीशियन नहीं आता तब आपको पता चलता है कि आपके कर्म में कहीं कुछ कमी हो गई और आपका 'इलेक्ट्रीशियन को बुलाने का कर्म' पूर्णतः निष्फल हो गया। यदि आपके मन में नकारात्मक विचार भी आते तो आपके दिमाग़ में सबसे पहले यह बात आ जाती कि 'अगर बुलाने पर भी इलेक्ट्रीशियन न आया तो?' अपने नकारात्मक विचारों के कारण आप अपने आप 'इलेक्ट्रीशियन को बुलाने का कर्म' करने के साथ ही 'इलेक्ट्रीशियन के स्वार्थ को जाग्रत करने का कर्म' भी करने को बाध्य हो जाते और अन्ततः सफलता आपके कदम चूमती!

  7. #97
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    'वाह जी, वाह! आपने तो कहा था- नकारात्मक विचारों के कारण गलतफ़हमी पैदा होती है जो घातक होती है। यहाँ पर तो नकारात्मक विचारों के कारण बड़ा लाभ हुआ और 'इलेक्ट्रीशियन के स्वार्थ को जाग्रत करने का कर्म' करने के कारण इलेक्ट्रीशियन आ गया! यह भी कोई बात हुई?'--जैसे यक्ष-प्रश्न पूछकर पेंच फँसाने वालों की शंका का समाधान यह है कि तथाकथित 'स्वार्थ जाग्रत होने के बाद' इलेक्ट्रीशियन रात दस बजे आपके घर की ओर चल दिया, किन्तु किसी कारणवश उसके आने में देर हो गई और आपके अपेक्षित समय पर वह आपके घर पहुँच नहीं सका। आशय यह है कि आपने अनुमान लगाया कि ठीक आधे घण्टे बाद इलेक्ट्रीशियन आपके घर पहुँच जाएगा, किन्तु एक घण्टा होने के बाद भी वह आपके घर नहीं पहुँचा। अब आपके मन में नकारात्मक विचारों का जन्म होता है- 'लगता है- इलेक्ट्रीशियन ने आने का वायदा करके धोखा दे दिया!' इलेक्ट्रीशियन की गद्दारी के कारण आपको क्रोध आ जाता है और आप इलेक्ट्रीशियन को फ़ोन पर खरी-खोटी सुनाकर फटकार लगाने लगते हैं। आपकी फटकार सुनकर इलेक्ट्रीशियन क्रोधित होकर उल्टे पाँव लौट जाता है, क्योंकि 'स्वाभिमान पर आँच आने पर धन का स्वार्थ लोप हो जाता है' और यह मनुष्य का प्राकृतिक गुण है। स्पष्ट है- यहाँ पर आपके 'नकारात्मक विचारों के कारण पैदा हुई गलतफ़हमी' के कारण ही आपको क्रोध आया और आपकी फटकार सुनकर इलेक्ट्रीशियन वापस चला गया जिसके कारण आपका कार्य निष्फल हो गया। अब यक्ष-प्रश्न यह है कि कौन से नकारात्मक विचार लाभदायक होते हैं और कौन से हानिकारक?

  8. #98
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    वस्तुतः क्रोध की निंदा सर्वत्र की गई है। ईसा पूर्व में ख्यातिप्राप्त तमिल भाषा के महान कवि और दार्शनिक तिरुवल्लूवर द्वारा लिखित तमिल दोहों (कुरल-குறள்) के संग्रह ग्रन्थ तिरुक्कुरल के कुरल-301 में क्रोध को नियंत्रित करने पर बल देते हुए कहा गया है-

    செல்லிடத்துக் காப்பான் சினங்காப்பான் அல்லிடத்துக்
    காக்கின்என் காவாக்கா லென் (कुरल-301)


    साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित तमिल साहित्यकार एवं लेखक मु० वरदराजन ने उपरोक्त कुरल-301 के तमिल भावार्थ में लिखा है-

    'जहाँ पर क्रोध के फलीभूत होने की सम्भावना हो; अर्थात् जहाँ पर क्रोध के कारण किसी का अनिष्ट हो सकता हो, वहाँ पर अपने क्रोध पर नियंत्रण रखने वाला ही सच्चा 'क्रोध-विजेता' है। क्रोध के फलीभूत न होने की दशा में क्रोध पर नियंत्रण रखना, न रखना अर्थहीन है।'

    कुरल-301 में उल्लिखित 'क्रोध के फलीभूत न होने की दशा में क्रोध पर नियंत्रण रखना, न रखना अर्थहीन है।' का विवरण कुरल-302 के अध्ययन से ही स्पष्ट हो जाता है-

    செல்லா இடத்துச் சினந்தீது செல்லிடத்தும்
    இல்அதனின் தீய பிற. (कुरल-302)


    तमिल साहित्यकार एवं लेखक मु० वरदराजन ने उपरोक्त कुरल-302 के तमिल भावार्थ में लिखा है-

    'फलीभूत न होने वाले स्थान पर (अपने से अधिक बलशाली के ऊपर) क्रोध करना हानिकारक है। फलीभूत होने वाले स्थान पर (अपने से कमज़ोर के ऊपर) क्रोध करने से अधिक हानिकारक और कुछ नहीं है।'

    स्पष्ट है- क्रोध-नियंत्रण करने वाला यदि बलशाली हो तभी वह 'क्रोध-विजेता' कहलाएगा, न कि कमज़ोर; क्योंकि कमज़ोर व्यक्ति के क्रोध की कोई अहमियत नहीं होती। आशय यह है कि कमज़ोर व्यक्ति के क्रोध से बलशाली कभी नहीं डरता, क्योंकि वह कमज़ोर व्यक्ति का अनिष्ट करने में पूर्णतः सक्षम है। फिर भी कमज़ोर व्यक्ति के ऊपर क्रोध करने को अत्यधिक अनिष्टकारी बताया गया है। ऐसा क्यों?

    ऐसा इसलिए कि बलशाली अपने से कमज़ोर व्यक्ति के ऊपर जब क्रोध करता है तो उसे दो प्रकार से प्रताड़ित कर सकता है- पहला मानसिक और दूसरा शारीरिक। अपने से कमज़ोर व्यक्ति को प्रताड़ित करने वाले को ही अत्याचारी कहा जाता है। वैसे तो झूठ बोलना हर धर्म में वर्जित है, किन्तु कुछ परिस्थितियों में अत्याचारी के सामने झूठ बोलने की अनुमति क़ुरान में भी दी गई है। अत्याचारी की सम्भावित प्रताड़ना से भयभीत होने के कारण ही कमज़ोर व्यक्ति अपने से बलशाली के ऊपर प्रत्यक्षतः क्रोध तो नहीं करता, किन्तु उसके अन्दर क्रोध की भयानक आग़ दावानल की तरह दहकती रहती है तथा मौका मिलते ही वह शक्तिशाली के ऊपर इतने ताबड़तोड़ हमले करता है कि बलशाली को सँभलने तक का मौका नहीं मिलता और वह चारों खाने चित हो जाता है। कमज़ोर का हमला हमेशा बहुत बड़ा और भयानक होता है, क्योंकि वह हार जाने के डर से बहुत बड़ी जबरदस्त तैयारी करके ही प्रतिशोध के मैदान में कूदता है। ज़रूरत पड़ने पर कमज़ोर अपने साथ किसी अति बलशाली को भी जोड़ लेता है। इतिहास गवाह है कि जब सुग्रीव कमज़ोर पड़ा तो उसने बलशाली बालि को हराने के लिए श्रीराम जैसे महाबलशाली का सहारा लिया। बलशाली रावण से अपमानित होने के बाद कमज़ोर विभीषण ने भी श्रीराम का सहारा लिया। यही नहीं, ईसा पूर्व में भी नंदवंश सम्राट धनानंद से अपमानित होने के बाद कमज़ोर चाणक्य ने चंद्रगुप्त मौर्य को मोहरा बनाकर नंदवंश को जड़ से उखाड़ फेंका और मौर्य साम्राज्य की स्थापना की। इसीलिए तिरुक्कुरल में कमज़ोर व्यक्ति के ऊपर क्रोध करने को अत्यधिक अनिष्टकारी बताया गया है।

    अतः अब आपको स्पष्ट रूप से यह पता चल गया होगा कि 'कौन से नकारात्मक विचार लाभदायक होते हैं और कौन से हानिकारक?' जैसे यक्ष-प्रश्न का उत्तर है-

    'जिन नकारात्मक विचारों के कारण उत्पन्न क्रोध के परिणामस्वरूप किसी का अनिष्ट होता हो, वे सभी नकारात्मक विचार हानिकारक होते हैं तथा जिन नकारात्मक विचारों के कारण अपना अनिष्ट होने की सम्भावना हो वहाँ पर तत्काल सतर्क होकर सम्भावित अनिष्ट से बचने का कोई कारगर उपाय करना चाहिए।'

    'अगर बुलाने पर भी इलेक्ट्रीशियन न आया तो?' जैसे नकारात्मक विचारों के कारण ही सम्भावित अनिष्ट से बचने के उपाय के रूप में आप 'इलेक्ट्रीशियन के स्वार्थ को जाग्रत करने का कर्म' करने को बाध्य हुए।

  9. #99
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    इलेक्ट्रीशियन वाले उदाहरण में इलेक्ट्रीशियन के मन में 'अधिक धन मिलने का स्वार्थ जाग्रत करने का कर्म' करने के कारण ही इलेक्ट्रीशियन भागा-भागा आया। इसके अतिरिक्त और भी कई उपायों से किसी के स्वार्थ को जाग्रत किया जा सकता है। आइए अब जानते हैं- किसी के स्वार्थ को जाग्रत करने के क्या-क्या उपाय हैं? वस्तुतः यह सब 'भूख का खेल' है। जी हाँ, बिल्कुल ठीक सुना आपने। किसी के स्वार्थ को जाग्रत करने के लिए उसकी भूख के बारे में जानना बहुत ज़रूरी हाेता है, क्योंकि एक भूखे इंसान का ही स्वार्थ जाग्रत हो सकता है। जो भूखा नहीं होता, उसका स्वार्थ भी जाग्रत नहीं होता। घबड़ाने की कोई ज़रूरत नहीं है, क्योंकि यहाँ पर भूख का मतलब सिर्फ़ खाने-पीने की भूख से नहीं है। इंसान कई तरह से भूखा हो सकता है और हर इंसान को कोई न कोई भूख होती ज़रूर है! जैसे- १. जीवन की भूख २. धन की भूख ३.बल की भूख ४. प्रेम की भूख ५. सेक्स की भूख ६. खाने-पीने की भूख ७. ज्ञान की भूख ८. प्रसंशा की भूख ९. सम्मान की भूख १०. मनोरंजन की भूख ११. नाम की भूख १२. भौकाल की भूख १३. भाव खाने की भूख १४. प्रतिशोध की भूख

  10. #100
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    हो सकता है- इंसान की इन चौदह भूखों के अतिरिक्त और भी कोई भूख होती हो जो इस समय हमारे दिमाग़ में न आ रही हो। यदि ऐसी कोई भूख इस लेख को लिखने के दौरान हमारे दिमाग़ में आती है तो हम उसे लेख में बाद में जोड़ देंगे। आइए, अब जानते हैं- मनुष्य के इन विविध भूखों के बारे में विस्तार से।

    १. जीवन की भूख :

    मृत्यु मानव जीवन का सबसे बड़ा कटु सत्य है। यहाँ तक कि बाइबिल में भी मृत्यु को इंसान का सबसे बड़ा शत्रु बताते हुए परमेश्वर ने वचन दिया है कि वह एक दिन मृत्यु को हमेशा के लिए खत्म कर देगा। मृत्यु से हर मनुष्य घबड़ाता है। कोई मनुष्य मरना नहीं चाहता और दीर्घायु जीवन की कामना करता है। इसीलिए मनुष्य की सबसे बड़ी भूख 'जीवन की भूख' अर्थात् जीवित रहने की भूख होती है। अपने जीवन में किसी प्रकार की बाधा आने पर मनुष्य बुरी तरह घबड़ाकर समर्पण कर देता है। सन्दर्भवश यहाँ पर बताते चलें कि जीवन पर संकट आने पर जिनके अन्दर 'जीवन की भूख' बहुत अधिक होती है वे बुरी तरह बिलबिलाकर चीखते हैं और तत्काल ज़िन्दगी की भीख माँगने लगते हैं। लेखन के उद्देश्य से कृपया लेखकगण इस बिन्दु को नोट करके रख लें। बिरले ही होते हैं वे लोग जिनके अन्दर जीवित रहने की भूख नहीं होती। ऐसे कुछेक बिरलों को हम भी जानते हैं। हमारे एक परिचित हैं जो वर्तमान में राज्य सरकार की अच्छी नौकरी में हैं। इनके आगे-पीछे कोई नहीं है। मतलब ये सिंगल हैं। इनके अन्दर जीवन की भूख ज़रा भी नहीं है। सेवा-निवृत्ति के बाद की अपनी योजना के बारे में बताते हुए इन्होंने हमें बताया कि वे तब तक ही जीवित रहेंगे जब तक उनका हाथ-पैर चल रहा है। जिस दिन हाथ-पैर नहीं चला उस दिन कोई इंजेक्शन लगाकर दुनिया छोड़ देंगे। सुनकर हम हतप्रभ रह गए! हमने वृद्धाश्रम की बात छेड़ी तो वे भड़क गए और वृद्धाश्रम चलाने वालों को गाली बकने लगे। जीवन के प्रति मनुष्य के अपार प्रेम को दृष्टिगत रखते हुए ही प्रायः बाहुबली, गुण्डे-बदमाश इत्यादि मनुष्य के 'जीवन की भूख' को जाग्रत करके अपना काम निकालते हैं।

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