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Thread: खुशियों का फण्डा बाँटने का धन्धा

  1. #101
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    २. धन की भूख :

    'धन की भूख' आखिर किसे नहीं होती? बिरले ही होते हैं वे लोग जिनके अन्दर धन प्राप्त करने की भूख नहीं होती। यदि आपके पास धन है तो आप चाहे जितने झूठे, मक्कार, दग़ाबाज़, चार सौ बीस, धूर्त, बेईमान और पापी हों, आपको सच्चा और धर्मात्मा ही माना जाएगा। यदि आपके पास धन नहीं है तो आप चाहे जितने सच्चे, शरीफ़, ईमानदार और धर्मात्मा हों, आपको झूठा और पापी ही माना जाएगा। यही कारण है- हर मनुष्य धन के पीछे भागता है। धन के कारण मनुष्य के अन्दर अहंकार की भावना जाग्रत होती है और उसकी सोचने-समझने तथा निर्णय लेने की क्षमता नष्ट हो जाती है। वह अपने सामने दूसरों को तुच्छ और हीन समझने लगता है। धन पर एक प्रचलित दोहा भी है-

    कनक कनक ते सौ गुनी, मादकता अधिकाय।
    या खाए बौराए जग, वा पाए बौराए।


    अर्थात्- 'स्वर्ण (धन) का नशा भांग के नशे से भी सौ गुना अधिक होता है। भांग खाने से नशा चढ़ता है जबकि धन का नशा मनुष्य को पागल बना देता है।'

    लोगों का कहना है कि सच्चे प्रेम को छोड़कर धन से संसार की हर खुशी खरीदी जा सकती है। इसका कारण यह है कि सच्चे प्रेम का सम्बन्ध मनुष्य के भावनात्मक लगाव से है और यह प्रक्रिया पूर्णतः प्राकृतिक है। फिर भी तराजू में रखकर तौलने पर प्रेम के सामने धन का पड़ला हमेशा भारी रहता है। ऐसा क्यों? ऐसा इसलिए कि धन हमेशा प्रत्यक्ष होता है और दिखाई पड़ता है, जिसके कारण धन की गिनती की जा सकती है और उसकी सही-सही मात्रा बताई जा सकती है। जबकि प्रेम के साथ ऐसा नहीं है। प्रेम अदृष्य होता है, जिसके कारण प्रेम को न ही गिना जा सकता है, न ही इसकी सही-सही मात्रा बताई जा सकती है और न ही इसे सिद्ध किया जा सकता है। प्रेम की महत्ता पर कबीरदास का एक प्रचलित दोहा भी है-

    प्रेम ना बाड़ी उपजै, प्रेम ना हाट बिकाई।
    राजा परजा जेहि रुचै, शीश देहि ले जाई।।


    अर्थात्- प्रेम न तो खेत में पैदा होता है और न ही बाज़ार में बिकता है। राजा या प्रजा जो भी प्रेम का इच्छुक हो वह अपने सिर का, यानि सर्वस्व त्याग कर प्रेम प्राप्त कर सकता है। सिर का तात्पर्य गर्व या घमण्ड से है। अतः गर्व या घमण्ड का त्याग प्रेम के लिये अत्यावश्यक है।

    'प्रेम के आगे धन का पड़ला कैसे भारी रहता है'- इस बात को बखूबी चित्रित किया गया है वर्ष २००२ में लोकार्पित तमिल फ़ीचर फ़िल्म 'उन्नै निनैत्तु' में।

    एक धनवान सज्जन हैं- बड़े ही बद्-दिमाग़। हर किसी को भला-बुरा बोलकर बेइज्जती कर देते हैं और गाली बकने से भी नहीं चूकते। फिर भी लोग इनके बारे में कहते हैं कि ये मन के बड़े साफ हैं, मुँह से चाहे जितने बुरे हों। हमने पता किया तो कुछ बातें निकलकर सामने आईं। दरअसल धनवान सज्जन भला-बुरा बोलकर बेइज्जती करने के बाद अपार धन खर्च करके 'बेइज्जती की क्षतिपूर्ति (Compensate)' कर देते थे जिसके कारण उनकी बात का कोई बुरा नहीं मानता था! यदि वे क्षतिपूर्ति न करते तो समाज में एक बहुत बुरे व्यक्ति के नाम से चिह्नित हो जाते और कोई न कोई बलवान उन्हें बीच चौराहे पर घसीटकर लतियाने के बाद मुँह में जूता घुसेड़ देता।

    तो आपने देखा कि धन की शक्ति से किस प्रकार असम्भव को सम्भव बनाया जाता है। इसीलिए 'धन की भूख' हर इंसान में होना एक आम बात है। धन के प्रति मनुष्य का अपार प्रेम होने के कारण किसी भी इंसान की 'धन की भूख' को जाग्रत करके अपना काम निकाला जा सकता है।

  2. #102
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    ३. बल की भूख :

    यहाँ पर बल की भूख का आशय यह नहीं है कि आप शारीरिक बल बढ़ाने के लिए तत्काल जिम जाना शुरू कर दें, क्योंकि कुछेक बाहुबलियों को छोड़कर एक आम आदमी के लिए यह शारीरिक बल एकदम व्यर्थ है। शारीरिक बल का प्रयोग करने पर कानूनी पचड़े में फँसने की सम्भावना बनी रहती है। अतः यहाँ पर बल की भूख का तात्पर्य शारीरिक बल से न होकर शक्ति से है। शक्ति क्या है? हर मनुष्य एक-दूसरे से अधिक बलशाली दिखना चाहता है। इसके लिए वह तमाम तरह के यत्न करता रहता है। दूसरों से अधिक बलशाली प्रलक्षित होने के लिए वह अपने साथ अपने समकक्ष या अपने से अधिक बलशाली लोगों को जान-पहचान या मित्रता के द्वारा जोड़ लेता है। यही बल की भूख है।

  3. #103
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    सोचता हूँ- इस सूत्र को आगे बढ़ाऊँ, मगर लिखने से जी धबड़ा गया।

  4. #104
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    शीघ्र ही इस सूत्र का अद्यतन प्रस्तुत किया जाएगा।

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