Page 2 of 4 प्रथमप्रथम 1234 LastLast
Results 11 to 20 of 38

Thread: कबीर के दोहे

  1. #11
    स्वर्ण सदस्य bndu jain's Avatar
    Join Date
    Sep 2016
    Location
    मध्य प्रदेश
    प्रविष्टियाँ
    60,483
    Rep Power
    50
    रात गंवाई सोय कर दिवस गंवायो खाय ।
    हीरा जनम अमोल था कौड़ी बदले जाय ॥




    अर्थ: रात सो कर बिता दी, दिन खाकर बिता दिया हीरे के समान कीमती जीवन को संसार के निर्मूल्य विषयों की – कामनाओं और वासनाओं की भेंट चढ़ा दिया – इससे दुखद क्या हो सकता है ?

  2. #12
    स्वर्ण सदस्य bndu jain's Avatar
    Join Date
    Sep 2016
    Location
    मध्य प्रदेश
    प्रविष्टियाँ
    60,483
    Rep Power
    50

    पढ़े गुनै सीखै सुनै मिटी न संसै सूल।
    कहै कबीर कासों कहूं ये ही दुःख का मूल ॥




    अर्थ : बहुत सी पुस्तकों को पढ़ा गुना सुना सीखा पर फिर भी मन में गड़ा संशय का काँटा न निकला कबीर कहते हैं कि किसे समझा कर यह कहूं कि यही तो सब दुखों की जड़ है – ऐसे पठन मनन से क्या लाभ जो मन का संशय न मिटा सके?

  3. #13
    स्वर्ण सदस्य bndu jain's Avatar
    Join Date
    Sep 2016
    Location
    मध्य प्रदेश
    प्रविष्टियाँ
    60,483
    Rep Power
    50
    तिनका कबहुँ ना निन्दिये, जो पाँवन तर होय,
    कबहुँ उड़ी आँखिन पड़े, तो पीर घनेरी होय।




    अर्थ: कबीर कहते हैं कि एक छोटे से तिनके की भी कभी निंदा न करो जो तुम्हारे पांवों के नीचे दब जाता है। यदि कभी वह तिनका उड़कर आँख में आ गिरे तो कितनी गहरी पीड़ा होती है !

  4. #14
    स्वर्ण सदस्य bndu jain's Avatar
    Join Date
    Sep 2016
    Location
    मध्य प्रदेश
    प्रविष्टियाँ
    60,483
    Rep Power
    50
    माला फेरत जुग भया, फिरा न मन का फेर,
    कर का मनका डार दे, मन का मनका फेर।



    अर्थ: कोई व्यक्ति लम्बे समय तक हाथ में लेकर मोती की माला तो घुमाता है, पर उसके मन का भाव नहीं बदलता, उसके मन की हलचल शांत नहीं होती। कबीर की ऐसे व्यक्ति को सलाह है कि हाथ की इस माला को फेरना छोड़ कर मन के मोतियों को बदलो या फेरो।

  5. #15
    स्वर्ण सदस्य bndu jain's Avatar
    Join Date
    Sep 2016
    Location
    मध्य प्रदेश
    प्रविष्टियाँ
    60,483
    Rep Power
    50
    पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुआ, पंडित भया न कोय,
    ढाई आखर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होय।




    अर्थ: बड़ी बड़ी पुस्तकें पढ़ कर संसार में कितने ही लोग मृत्यु के द्वार पहुँच गए, पर सभी विद्वान न हो सके। कबीर मानते हैं कि यदि कोई प्रेम या प्यार के केवल ढाई अक्षर ही अच्छी तरह पढ़ ले, अर्थात प्यार का वास्तविक रूप पहचान ले तो वही सच्चा ज्ञानी होगा।

  6. #16
    स्वर्ण सदस्य bndu jain's Avatar
    Join Date
    Sep 2016
    Location
    मध्य प्रदेश
    प्रविष्टियाँ
    60,483
    Rep Power
    50
    माला फेरत जुग भया, फिरा न मन का फेर,
    कर का मनका डार दे, मन का मनका फेर।



    अर्थ: कोई व्यक्ति लम्बे समय तक हाथ में लेकर मोती की माला तो घुमाता है, पर उसके मन का भाव नहीं बदलता, उसके मन की हलचल शांत नहीं होती। कबीर की ऐसे व्यक्ति को सलाह है कि हाथ की इस माला को फेरना छोड़ कर मन के मोतियों को बदलो या फेरो।

  7. #17
    स्वर्ण सदस्य bndu jain's Avatar
    Join Date
    Sep 2016
    Location
    मध्य प्रदेश
    प्रविष्टियाँ
    60,483
    Rep Power
    50
    जाति न पूछो साधु की, पूछ लीजिये ज्ञान,
    मोल करो तरवार का, पड़ा रहन दो म्यान।



    अर्थ: सज्जन की जाति न पूछ कर उसके ज्ञान को समझना चाहिए। तलवार का मूल्य होता है न कि उसकी मयान का – उसे ढकने वाले खोल का।

  8. #18
    कर्मठ सदस्य superidiotonline's Avatar
    Join Date
    May 2017
    प्रविष्टियाँ
    4,955
    Rep Power
    7
    Quote Originally Posted by bndu jain View Post
    पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुआ, पंडित भया न कोय,
    ढाई आखर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होय।




    अर्थ: बड़ी बड़ी पुस्तकें पढ़ कर संसार में कितने ही लोग मृत्यु के द्वार पहुँच गए, पर सभी विद्वान न हो सके। कबीर मानते हैं कि यदि कोई प्रेम या प्यार के केवल ढाई अक्षर ही अच्छी तरह पढ़ ले, अर्थात प्यार का वास्तविक रूप पहचान ले तो वही सच्चा ज्ञानी होगा।
    Quote Originally Posted by bndu jain View Post
    पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुआ, पंडित भया न कोय,
    ढाई आखर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होय।



    अर्थ: बड़ी बड़ी पुस्तकें पढ़ कर संसार में कितने ही लोग मृत्यु के द्वार पहुँच गए, पर सभी विद्वान न हो सके। कबीर मानते हैं कि यदि कोई प्रेम या प्यार के केवल ढाई अक्षर ही अच्छी तरह पढ़ ले, अर्थात प्यार का वास्तविक रूप पहचान ले तो वही सच्चा ज्ञानी होगा।
    रिपीट है। नींद में हैं क्या?

  9. #19
    स्वर्ण सदस्य bndu jain's Avatar
    Join Date
    Sep 2016
    Location
    मध्य प्रदेश
    प्रविष्टियाँ
    60,483
    Rep Power
    50
    जिन खोजा तिन पाइया, गहरे पानी पैठ,
    मैं बपुरा बूडन डरा, रहा किनारे बैठ।




    अर्थ: जो प्रयत्न करते हैं, वे कुछ न कुछ वैसे ही पा ही लेते हैं जैसे कोई मेहनत करने वाला गोताखोर गहरे पानी में जाता है और कुछ ले कर आता है। लेकिन कुछ बेचारे लोग ऐसे भी होते हैं जो डूबने के भय से किनारे पर ही बैठे रह जाते हैं और कुछ नहीं पाते।

  10. #20
    स्वर्ण सदस्य bndu jain's Avatar
    Join Date
    Sep 2016
    Location
    मध्य प्रदेश
    प्रविष्टियाँ
    60,483
    Rep Power
    50
    बोली एक अनमोल है, जो कोई बोलै जानि,
    हिये तराजू तौलि के, तब मुख बाहर आनि।




    अर्थ: यदि कोई सही तरीके से बोलना जानता है तो उसे पता है कि वाणी एक अमूल्य रत्न है। इसलिए वह ह्रदय के तराजू में तोलकर ही उसे मुंह से बाहर आने देता है।

Page 2 of 4 प्रथमप्रथम 1234 LastLast

Thread Information

Users Browsing this Thread

There are currently 2 users browsing this thread. (0 members and 2 guests)

Tags for this Thread

Bookmarks

Posting Permissions

  • You may not post new threads
  • You may not post replies
  • You may not post attachments
  • You may not edit your posts
  •