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Thread: विरोधाभासी संवाद: निकाले कहानी का दम

  1. #1
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    Cool विरोधाभासी संवाद: निकाले कहानी का दम


  2. #2
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    क्या आप जानते हैं- विरोधाभासी संवादों (Contradictory dialogues) के कारण निकल सकता है आपकी पूरी कहानी का दम और आपकी कहानी के पात्र अचानक लगने लगेंगे एकदम हास्यास्पद या संदेहास्पद! और यह सब कुछ होगा आपके अनजाने में, क्योंकि 'कलम फूँक-फूँक कर' लिखने पर भी नवागत लेखकों से लिखने में गलती हो ही जाती है। संवाद लेखन में की गई एक छोटी सी गलती के कारण आपकी कहानी के पात्र की सकारात्मक छवि नकारात्मक छवि में परिवर्तित होकर पाठकों को अत्यन्त भ्रमित कर सकती है। यहाँ तक कि कहानी की विधा (Genre) के बदलने की भी पूरी सम्भावना बन जाती है।

  3. #3
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    यहाँ पर विरोधाभास अलंकार या विरोधीलंकार की बात नहीं की जा रही है। विरोधाभास अलंकार हिन्दी कविता में प्रयुक्त होने वाले एक अलंकार का भेद है जिसका विरोधाभासी संवाद से कोई लेना-देना नहीं है। अतः पाठकगण विरोधाभास अलंकार और विरोधाभासी संवाद को एक समझकर ज़रा भी भ्रमित न हों।

  4. #4
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    वैसे तो विरोधाभास अलंकार या विरोधीलंकार इस लेख का विषय नहीं है, किन्तु सन्दर्भवश तथा विरोधाभासी संवाद की सम्पूर्ण व्याख्या स्पष्ट करने के निमित्त यहाँ पर विरोधाभास अलंकार की संक्षिप्त व्याख्या करना अत्यावश्यक है जिससे पाठकगण विरोधाभासी संवाद और विरोधाभास अलंकार के बीच के अन्तर को भली-भाँति समझकर पूर्णरूपेण आत्मसात् कर सकें।

  5. #5
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    सबसे पहले जानते हैं- अलंकार क्या है? काव्य की शोभा बढ़ाने वाले कारक को अलंकार कहते हैं। दूसरे शब्दों में शब्दार्थों द्वारा चमत्कार उत्पन्न करके काव्य को मनोहारी और मनोरंजक बनाने की विधा को अलंकार कहते हैं। वस्तुतः विरोधाभास अलंकार हिन्दी कविता में प्रयुक्त होने वाले अलंकार के एक प्रमुख भेद अर्थालंकार के अन्तर्गत आने वाले कई अलंकारों में से एक है। यहाँ पर बता दें कि अर्थालंकार में अर्थ के माध्यम से काव्य में चमत्कार उत्पन्न किया जाता है। विरोधाभास अलंकार में प्रयुक्त किए गए शब्द वास्तविक विरोध न होते हुए भी विरोध का आभास देकर काव्य में चमत्कार उत्पन्न करते हैं। जैसे-

    मोहब्बत है मीठा ज़हर।
    खाए तो कहर, ना खाए तो कहर।


    उपरोक्त उदाहरण में ज़हर को मीठा बताकर विरोध का आभास दिया गया है, क्योंकि यह ज्ञातव्य है कि ज़हर मीठा नहीं होता। अतः 'मीठा ज़हर' विरोधाभास अलंकार का एक उत्कृष्ट प्रयोग है। सन्दर्भवश यहाँ पर यह बताते चलें कि उपरोक्त उदाहरण की द्वितीय पंक्ति 'खाए तो कहर, ना खाए तो कहर' में कहर शब्द के ध्वनि विकार द्वारा श्रोता की कल्पना में भिन्न अर्थ उत्पन्न करके काव्य में चमत्कार उत्पन्न किया गया है जिसे काकु वक्रोक्ति अलंकार कहते हैं। इसके अतिरिक्त उपरोक्त उदाहरण की दोनों पंक्तियों के अन्त में ज़हर और कहर शब्दों के प्रयोग द्वारा तुकबन्दी की गई है। इस तुकबन्दी के प्रयोग को अन्त्यानुप्रास अलंकार कहते हैं।

    उपरोक्त छोटे से उदाहरण में आपने देखा कि एक-दो नहीं, तीन अलंकारों के समावेश द्वारा काव्य में चमत्कार उत्पन्न किया गया है। वस्तुतः हिन्दी काव्य में अलंकार का विषय अत्यन्त वृहत् है जिसकी यहाँ पर सम्पूर्ण व्याख्या करना असम्भव है तथा पाठकों को स्मरण होगा कि यह लेख विरोधाभासी संवाद पर आधारित है तथा सन्दर्भवश विरोधाभास अलंकार की संक्षिप्त व्याख्या मात्र की जा रही है। विरोधाभास अलंकार के सन्दर्भ में दिए गए उपरोक्त उदाहरण से यह स्पष्ट हुआ कि-

    जहाँ पर प्रत्यक्षतः बाहर से विरोध दृष्टिगोचर हो, किन्तु यथार्थ में विरोध न हो वहाँ पर 'विरोधाभास अलंकार' होता है।

  6. #6
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    यहाँ पर रोचक बात यह है कि विरोधाभास अलंकार के परिप्रेक्ष्य में दी गई व्याख्या 'प्रत्यक्षतः बाहर से विरोध दृष्टिगोचर हो, किन्तु यथार्थ में विरोध न हो' किसी अलंकार की परिभाषा लगने की जगह किसी फ़ीचर फ़िल्म का 'वन लाइनर' या संधारणा (Concept) लगता है। इस 'वन लाइनर' या संधारणा को कहानी या उपन्यास के लिए केन्द्रीय विचार (Central Idea) कहा जाता है। केन्द्रीय विचार क्या है? किसी रचना के लेखन के लिए लेखक के मन में उत्पन्न हुए प्रेरक विचार को केन्द्रीय विचार कहते हैं। खुशी की बात यह है कि इस केन्द्रीय विचार पर किसी का सर्वाधिकार (Copyright) नहीं होता। अतः एक ही केन्द्रीय विचार पर आधारित कई कहानियाँ, उपन्यास, कविताएँ, लेख, स्तम्भ इत्यादि लिखे जा सकते हैं।

  7. #7
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    पाठकों को यह जानकर अत्यधिक आश्चर्य होगा कि विरोधाभास अलंकार की परिभाषा 'प्रत्यक्षतः बाहर से विरोध दृष्टिगोचर हो, किन्तु यथार्थ में विरोध न हो' का विस्तार करके बखूबी चित्रण किया गया है वर्ष 2011 में लोकार्पित हिन्दी फ़ीचर फ़िल्म 'द डर्टी पिक्चर' में।

  8. #8
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  9. #9
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    Cool

    याद करिए- 'द डर्टी पिक्चर' में निर्देशक अब्राहम (इमरान हाशमी) और रेशमा/सिल्क (विद्या बालन) के अनुक्रम (Sequence) में आने वाले दृश्यों को जिसमें-
    Last edited by superidiotonline; 15-12-2019 at 07:01 AM.

  10. #10
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    दक्षिण भारतीय फिल्मों में अपने कामोत्तेजक नृत्यों की वजह से 'सेक्स सिम्बल' के नाम से विख्यात नर्तकी-अभिनेत्री सिल्क से निर्देशक अब्राहम बहुत नफरत करता है, क्योंकि उसका मानना है कि अच्छी फ़िल्मों की सफलता के लिए सेक्स का चित्रण ज़रूरी नहीं होता। अब्राहम जब-तब सिल्क से बातों ही बातों में अपनी नफ़रत का प्रदर्शन करता रहता है और उसकी नफ़रत बढ़ते-बढ़ते इतनी अधिक बढ़ जाती है कि वह सिल्क से प्यार करने लगता है। संक्षेप में- अब्राहम और सिल्क के दृश्यों में बाहर से नफ़रत तो दृष्टिगोचर होता है किन्तु वास्तव में ऐसा कुछ नहीं होता। है न- विरोधाभास अलंकार की परिभाषा का सटीक प्रयोग? यहाँ पर इस सिलसिले में एक रोचक बात और उल्लेखनीय है। वह यह कि उस दौर में अब्राहम और सिल्क के बीच की तथाकथित 'नफ़रत' का जादू इस क़दर लोगों के सिर चढ़ गया कि कुछ लोगों ने अपने से 'नफ़रत' करने वालों को प्राथमिकता देने की घोषणा कर दी!

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