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Thread: मोबाइल फ़ोन : कहानी का जानी दुश्मन

  1. #21
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    तमिल फ़ीचर फ़िल्म 'तुल्लाद मनमुम् तुल्लुम्' की अपार सफलता को देखते हुए इसका पुनर्निर्माण (REMAKE) कई दक्षिण भारतीय भाषाओं में किया गया जो सफल रहा। वर्ष २००० में इस फ़िल्म का पुनर्निर्माण कन्नड़ और तेलुगु भाषा में किया गया। वर्ष २००२ में इस फ़िल्म का पुनर्निर्माण बंगला भाषा में किया गया। वर्ष २००४ में इस फ़िल्म का पुनर्निर्माण उड़िया भाषा में किया गया। यही नहीं, वर्ष २००८ में इस फ़िल्म का पुनर्निर्माण भोजपुरी भाषा में भी किया गया, किन्तु हिन्दी में इसका पुनर्निर्माण नहीं हुआ। फिर भी वर्ष २००६ में लोकार्पित हिन्दी फ़ीचर फ़िल्म 'सुन ज़रा' की कहानी तमिल फ़ीचर फ़िल्म 'तुल्लाद मनमुम तुल्लुम' की कहानी से बुरी तरह उत्प्रेरित (INSPIRED) मानी जाती है।

  2. #22
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    सुन ज़रा

  3. #23
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    यहाँ पर 'बुरी तरह उत्प्रेरित' से आशय है- तमिल फ़ीचर फ़िल्म 'तुल्लाद मनमुम् तुल्लुम्' का अधिकांश भाग आपको हिन्दी फ़ीचर फ़िल्म 'सुन ज़रा' में कुछ परिवर्तन के साथ दूसरे रूप में देखने को मिलेगा। अर्थात् तमिल फ़ीचर फ़िल्म का प्रत्येक मूल दृष्य आपको हिन्दी फ़ीचर फ़िल्म में जैसा का तैसा देखने को नहीं मिलेगा जैसा कि प्रायः पुनर्निर्माण में देखने को मिलता है।

  4. #24
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    आइए, देखते हैं- हिन्दी फ़ीचर फ़िल्म 'सुन ज़रा'


  5. #25
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    इसके अतिरिक्त वर्ष २०१० में यशराज फ़िल्म्स द्वारा लोकार्पित हिन्दी फ़ीचर फ़िल्म 'लफंगे परिन्दे' की कहानी वर्ष १९७८ में कोलम्बिया पिक्चर्स द्वारा लोकार्पित अँग्रेज़ी फ़ीचर फ़िल्म 'आइस कैसल्स' (ICE CASTLES) की कहानी से उत्प्रेरित होने के साथ-साथ तमिल फ़ीचर फ़िल्म 'तुल्लाद मनमुम् तुल्लुम्' की कहानी से भी उत्प्रेरित मानी जाती है।

  6. #26
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  7. #27
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    यदि हम तमिल फ़ीचर फ़िल्म 'तुल्लाद मनमुम् तुल्लुम्' के वर्ष २००८ में लोकार्पित भोजपुरी पुनर्निर्माण को निरर्थक समझकर छोड़ दें तो पता चलता है कि अन्य सभी पुनर्निर्मित फ़िल्में वर्ष २००४ या उसके पहले ही लोकार्पित हो चुकी थीं और उस समय मोबाइल फ़ोन का इतना चलन नहीं था कि कहानी में कोई बाधा उत्पन्न कर सके। वैसे तो तमिल फ़ीचर फ़िल्म 'तुल्लाद मनमुम् तुल्लुम्' से अत्यधिक प्रेरित हिन्दी फ़ीचर फ़िल्म 'सुन ज़रा' वर्ष २००६ में लोकार्पित हुई थी, किन्तु उस समय भी मोबाइल फ़ोन ने घर-घर में अपना भरपूर कब्ज़ा नहीं जमाया था तथा सभी के पास मोबाइल फ़ोन का होना अत्यावश्यक भी नहीं था, जिसके कारण मोबाइल फ़ोन में इतना दम नहीं था कि कहानी में कोई बाधा उत्पन्न कर सके। संक्षेप में- उस दौरान मोबाइल फ़ोन का चलन समाज में बहुतायत (Overflow) से न होने के कारण बड़ी आसानी से तमिल फ़ीचर फ़िल्म 'तुल्लाद मनमुम् तुल्लुम्' की कहानी लिख ली गई। २१वीं सदी के दूसरे दशक में सम्पूर्ण परिदृश्य (Scenario) परिवर्तित हो गया। आज के दौर में प्रायः हर व्यक्ति के पास मोबाइल फ़ोन है। किसी के पास मोबाइल फ़ोन का न होना एक अति विचित्र बात समझा जाता है। मोबाइल फ़ोन तक आम आदमी की पहुँच होने के कारण पी०सी०ओ० की उपयोगिता एकदम से ख़त्म हो गई। २१वीं सदी के पहले दशक में हर गली-कूँचे में पी०सी०ओ० जितनी तेज़ी के साथ कुकुरमुत्ते की तरह उगे थे, उतनी ही तेज़ी से ख़त्म भी हो गए। पी०सी०ओ० ही नहीं, आम आदमी तक लैपटॉप की पहुँच होने के कारण हर मोहल्ले के आसपास दिखाई देने वाले इंटरनेट कैफ़े भी शहीद हो गए। अतः आज के दौर में दो लोगों के एकाएक बिछड़ जाने की बात करना बड़ा ही विचित्र प्रतीत होता है और हास्यास्पद लगता है। स्पष्ट है- तमिल फ़ीचर फ़िल्म 'तुल्लाद मनमुम् तुल्लुम्' की कहानी को आज की तारीख़ में जैसा का तैसा पुनर्निर्मित नहीं किया जा सकता जब तक कि स्क्रिप्ट में कुछ काट-छाँट करके मोबाइल फ़ोन की भूमिका को शून्य (Void) न कर दिया जाए।

    कुछ पाठकों के मन में यह भी सवाल उठ रहा होगा कि 'यदि नायक और नायिका के पास लैंडलाइन फ़ोन हो तो क्या उसकी भूमिका को भी शून्य (Void) करना ज़रूरी है?' तो इसका उत्तर यह है कि 'कहानी में दो लोगों के बिछड़ने के परिदृश्य को भली-भाँति स्थापित करने के लिए मोबाइल फ़ोन ही नहीं, उन सभी संचार उपकरणों (Communicating Apparatus) को शून्य (Void) करना ज़रूरी होता है जिनके द्वारा एक-दूसरे से सम्पर्क किया जा सकता हो। इन संचार उपकरणों में मोबाइल फ़ोन, लैंडलाइन फ़ोन, ईमेल, फैक्स के साथ-साथ सोशल मीडिया प्लेटफ़ार्म जैसे- फ़ेसबुक, ट्विटर, ह्वाट्सऐप इत्यादि शामिल हैं। यही नहीं, यदि भविष्य में किसी अन्य संचार उपकरण का आविष्कार होता है तो उसे भी शून्य (Void) करना ज़रूरी है।' यहाँ पर ध्यान देने योग्य बात यह है कि 'मोबाइल फ़ोन को छोड़कर यदि कोई अन्य संचार उपकरण कहानी के पात्रों द्वारा उपयोग में लाया जा रहा हो तो उसे कहानी के आरम्भ में भली-भाँति स्थापित करना आवश्यक होता है, जिससे दर्शकों या पाठकों को पता चल जाए कि कहानी के पात्र कौन-कौन से संचार उपकरणों का उपयोग कर रहे हैं।' मोबाइल फ़ोन के सन्दर्भ में ठीक इसका उल्टा नियम है। 'यदि कहानी के पात्र किसी कारणवश मोबाइल फ़ोन का उपयोग नहीं कर रहे हैं तो उसे कहानी में तत्काल स्थापित करना आवश्यक होता है।' संक्षेप में- दर्शकों या पाठकों के मन में यह प्रश्न कभी नहीं उठना चाहिए कि कहानी के पात्रों का मोबाइल फ़ोन आखिर गया कहाँ? कहानीकार का यह खाली-खूली तर्क बिल्कुल नहीं चलेगा कि 'हमारी कहानी के पात्र मोबाइल फ़ोन का इस्तेमाल नहीं करते।', क्योंकि कहानी के पात्रों द्वारा मोबाइल फ़ोन का इस्तेमाल न किए जाने के कारण को तत्काल कहानी में स्थापित किया जाना अत्यावश्यक होता है। यहाँ पर ध्यान देने योग्य बात यह है कि यह कारण सशक्त और स्वीकारयोग्य (Acceptable) होना चाहिए, न कि हास्यास्पद। सन्दर्भवश यहाँ पर यह भी बता दें कि यदि कहानी की विधा (Genre) हास्य-व्यंग्य है तो हास्यास्पद कारण भी चलेगा, किन्तु गम्भीर विषयों के लिए हास्यास्पद कारण बिल्कुल नहीं चलेगा।

  8. #28
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    मोबाइल फ़ोन के इस दौर में कहानी के पात्रों के पास मोबाइल फ़ोन का न होना बड़ा अजीब लगता है। इसीलिए तमिल फ़ीचर फ़िल्म 'तुल्लाद मनमुम् तुल्लुम्' की कहानी को आज की तारीख़ में जैसा का तैसा पुनर्निर्मित नहीं किया जा सकता जब तक कि स्क्रिप्ट में कुछ काट-छाँट करके मोबाइल फ़ोन की भूमिका को शून्य (Void) न कर दिया जाए। स्वयं कल्पना करके देखिए- तमिल फ़ीचर फ़िल्म 'तुल्लाद मनमुम् तुल्लुम्' में नायक और नायिका के पास मोबाइल फ़ोन नहीं है। कितना अजीब लगता है! अब कल्पना करके देखिए- नायक और नायिका- दोनों के पास मोबाइल फ़ोन है और कहानी में दोनों का बिछड़ना ज़रूरी भी है। कितना नाजुक दृश्य है! ये कम्बख़्त मोबाइल फ़ोन दोनों को बिछड़ने ही नहीं देगा। नायक और नायिका के बिछड़ने के दृश्य में मोबाइल फ़ोन खलनायक बनकर खड़ा है। इसीलिए हमने कहा कि मोबाइल फ़ोन कहानी का जानी दुश्मन है। आज जब दो लोग बिछड़ने के बहुत दिनों के बाद आपस में मिलते हैं तो जानते हैं- पहला संवाद क्या होता है? 'तुम कहाँ चले गए थे? मैंने तुम्हें ढूँढ़ने की बहुत कोशिश की। मैंने तुम्हें कितने फ़ोन किए, मगर तुम्हारा फ़ोन हमेशा बन्द मिला।' लो भई, बैठे-बैठाए जिस बेचारे/बेचारी का मोबाइल फ़ोन बन्द मिला वो गुनहगार सिद्ध हो गया/गई और ढूँढ़ने वाला/वाली निर्दोष सिद्ध हो गया/गई! अब यह बात कहानी की आवश्यकता पर निर्भर करती है कि कहानीकार किसी पात्र को यह संवाद बोलने का मौक़ा देना चाहता है या नहीं। यदि मौक़ा नहीं देना है तो मोबाइल फ़ोन को लगातार चालू रखना होगा। यदि मौक़ा देना है तो मोबाइल फ़ोन को ठिकाने लगाना ही उचित विकल्प है।

  9. #29
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    मोबाइल फ़ोन को ठिकाने लगाने का एक अच्छा उपाय है- जेल, क्योंकि जेल में कैदियों के द्वारा मोबाइल फ़ोन का उपयोग करना प्रतिबन्धित है। कैदियों का मोबाइल फ़ोन जेल में जमा कर लिया जाता है और जेल से बाहर आने पर ही वापस मिलता है। मज़ेदार बात यह है कि तमिल फ़ीचर फ़िल्म 'तुल्लाद मनमुम् तुल्लुम्' में कहानी के नायक कुट्टी को जेल में बन्द कर दिया गया था। इसलिए यदि उसके पास मोबाइल फ़ोन भी होता तो भी कहानीकार को परेशान होने की कोई ज़रूरत नहीं थी, क्योंकि मोबाइल फ़ोन जेल में जमा होने के कारण अपने आप ठिकाने लग गया होता और कहानी की नायिका रुक्मणि चाहकर भी कुट्टी से सम्पर्क नहीं कर सकती थी। अतः 'कहानी के नायक कुट्टी का जेल में बन्द होना' एक ऐसा दृश्य था जो मोबाइल फ़ोन की भूमिका को सटीकता के साथ शून्य (Void) करने में पूर्णतया सक्षम था।

    कहानी में मोबाइल फ़ोन की भूमिका होने पर सबसे बड़ा पेंच उस समय फँसता जब कहानी की नायिका रुक्मणि के मोबाइल फ़ोन को ठिकाने न लगाया जाता, क्योंकि जैसे ही कहानी का नायक कुट्टी जेल से छूटता वैसे ही वह रुक्मणि को फ़ोन कर देता। इस तरह पूरी कहानी सिरे से चौपट हो जाती, क्योंकि कहानी का आरम्भ दृश्य भी तत्काल काल कवलित हो जाता। वस्तुतः कहानी की नायिका का मोबाइल फ़ोन ठिकाने लगाना एक टेढ़ी खीर है। क्या आपके पास कोई ऐसा कारगर उपाय है जिसके द्वारा कहानी की नायिका का मोबाइल फ़ोन सटीकतापूर्वक ठिकाने लगाया जा सके? नहीं न। प्रथम दृष्टया (Prima Facie) दूर-दूर तक सोचने पर भी ऐसा कोई कारगर उपाय दृष्टिगोचर (Perceptible) नहीं होता। कहानी की नायिका अपने हाथ से मोबाइल फ़ोन को कभी न जाने देगी, क्योंकि उसे पता है कि कुट्टी कभी भी उसे फ़ोन कर सकता है!

  10. #30
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    कहानी की नायिका रुक्मणि का मोबाइल फ़ोन ठिकाने लगाना थोड़ा मुश्किल ज़रूर है लेकिन नामुमकिन बिल्कुल नहीं है। इस बारे में गहनतापूर्वक चिन्तन करने पर हमें एक-दो नहीं, पूरे तीन उपाय मिले हैं जिनकी सहायता से कहानी की नायिका का मोबाइल फ़ोन ठिकाने लगाकर उसकी भूमिका को शून्य (Void) किया जा सकता है।

    १. पहला उपाय-

    कहानी की नायिका रुक्मणि का मोबाइल फ़ोन ठिकाने लगाने का पहला उपाय बहुत ही सरल है और कहानी के विषय के साथ न्यायसंगत लगने के कारण एकदम सटीक और स्वीकारयोग्य भी लगता है।

    जेल के अतिरिक्त एक स्थान और है जहाँ पर मोबाइल फ़ोन का इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। वह स्थान है- पागलखाना। अतः 'यदि कहानी की नायिका रुक्मणि को पागलखाने में बन्द कर दिया जाए तो मोबाइल फ़ोन अपने आप ठिकाने लग जाएगा।'

    कहानी की नायिका रुक्मणि को ऐसे तो आप जबरदस्ती पागलखाने में बन्द नहीं कर देंगे। उसे पागलखाने में बन्द करने का कोई न कोई सटीक कारण भी दर्शकों या पाठकों को बताना होगा। अतः यह दृश्य कुछ इस प्रकार बनेगा-

    'आँख का ऑपरेशन सफल होने के बाद कहानी की नायिका रुक्मणि कुट्टी को फ़ोन करती है, किन्तु कुट्टी का मोबाइल फ़ोन नहीं लगता। रुक्मणि कई दिनों तक रोते-धोते कुट्टी के आने का इन्तेज़ार करती रहती है, किन्तु जब कुट्टी नहीं आता तो कुट्टी के प्रेम में उसका दिमाग़ फिर जाता है और वह पागल हो जाती है, जिसके कारण उसका इलाज पागलख़ाने में चलता है। पागलख़ाने में छः महीने तक इलाज करवाने के बाद रुक्मणि एकदम ठीक होकर घर वापस आती है तो उसे पता चलता है कि उसका मोबाइल नम्बर रिचार्ज न करवाने के कारण हमेशा के लिए डेड हो चुका है। इस तरह कुट्टी का फ़ोन आने की आखिरी उम्मीद भी ख़त्म हो जाती है।'

    वैसे तो वास्तविक (Real) जीवन में प्रेम में वियोग (Separation) के कारण किसी का पागल हो जाना बहुत आम बात नहीं है, किन्तु किसी कहानी में प्रेम में वियोग के कारण किसी का पागल हो जाना एक सामान्य बात समझा जाता है जिसके कारण यह दर्शकों/पाठकों द्वारा एक स्वीकारयोग्य तथ्य है। अतः उपरोक्त पहला उपाय कहानी के साथ पूर्णतया सुसंगत (Compatible) प्रतीत हाेता है जो कि कहानी की नायिका रुक्मणि के पास मौजूद मोबाइल फ़ोन को शून्य (Void) करने में एकदम सक्षम (Adequate) है।

    यहाँ पर पाठकों के मन में यह सवाल उठ सकता है कि रुक्मणि को भी ७ साल के लिए पागलखाने में बन्द कर देते तो क्या बिगड़ जाता? नायक कुट्टी ७ साल जेल में, नायिका रुक्मणि ७ साल पागलखाने में! कितना अच्छा लगता। हाँ, सुनने में अच्छा ज़रूर लगता है, किन्तु कहानी की नायिका को ७ साल के लिए पागलखाने में बन्द करना तमिल फ़ीचर फ़िल्म 'तुल्लाद मनमुम् तुल्लुम्' की कहानी की ज़रूरत के मुताबिक नहीं है। 'तुल्लाद मनमुम् तुल्लुम्' की कहानी के निर्वहण (Denouement) में कहानी की नायिका रुक्मणि को आइ०ए०एस० की परीक्षा पास करने के बाद एक जिलाधिकारी के रूप में दिखाया गया है। वहीं पर हिन्दी फ़ीचर फ़िल्म 'सुन ज़रा' की कहानी के निर्वहण (Denouement) में कहानी की नायिका को बहुत बड़ी गायिका (Singer) के रूप में दिखाया गया है। निर्वहण (Denouement) को फ़िल्म जगत में चरमोत्कर्ष (Climax) कहा जाता है। यहाँ पर यह भी स्पष्ट कर दें कि तमिल फ़ीचर फ़िल्म 'तुल्लाद मनमुम् तुल्लुम्' के विकीपीडिया पृष्ठ पर कहानी के नायक कुट्टी को ८ साल की सजा होने की बात दर्ज है जो कि पूर्णतः एक गलत तथ्य है, क्योंकि तमिल फ़ीचर फ़िल्म 'तुल्लाद मनमुम् तुल्लुम्' में कहानी के आरम्भ में नायक कुट्टी के एक संवाद द्वारा ७ साल की सजा होने की बात को ही स्थापित किया गया है।

    'अरे भई, कहानी की नायिका को बेवजह जिलाधिकारी या गायिका बनाने की क्या ज़रूरत है? बन्द करिए नायिका को ७ साल पागलखाने में। नायक नायिका के अंधे होने पर भी उससे प्यार तो करता ही है। तो फिर पागल नायिका से प्यार न करेगा क्या?'--जैसे प्रश्न पूछने वालों के लिए उत्तर यह है कि 'रियल लाइफ़ (Real Life) की लव स्टोरी में ग़रीब हीरोइन चलती है और रील लाइफ़ (Reel Life) की लव स्टोरी में अमीर हीरोइन चलती है।' 'ऐसा क्यों? ऐसा क्यों? ऐसा क्यों?'--कहकर आँखें फाड़कर विस्मय से कूदने वालों के लिए जवाब यह है कि 'भारतीय उपमहाद्वीप की सामान्य लव-स्टोरी के लिए गठित (Framed) यह एक हिट फ़ार्मूला है और इसका पालन करना सभी लेखकों के लिए अनिवार्य है।' संदर्भवश यहाँ पर यह बता दें कि भारतीय उपमहाद्वीप में आमतौर पर भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश सम्मिलित किए जाते हैं। इसके अतिरिक्त प्रायः नेपाल, भूटान और श्रीलंका को भी सम्मिलित किया जाता है तथा कभी-कभी अफ़गानिस्तान और मालदीव भी सम्मिलित किए जाते हैं।

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