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Thread: मोबाइल फ़ोन : कहानी का जानी दुश्मन

  1. #1
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    Cool मोबाइल फ़ोन : कहानी का जानी दुश्मन


  2. #2
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    २०वीं सदी के अन्त तक लिखी गई कहानियों में मोबाइल फ़ोन की कोई भूमिका (Role) नहीं थी। ले-देकर बेचारा एक अदद लैंडलाइन या फ़िक्स्डलाइन फ़ोन हुआ करता था जो कहानी के अमीर किरदारों के घर पर ही दिखाई पड़ता था। बहुत ज़रूरी होने पर ही कहानी में इन लैंडलाइन फ़ोनों का इस्तेमाल किया जाता था। फ़िल्म-लेखन में इन लैंडलाइन फ़ोनों के इस्तेमाल के वक़्त जो तकनीक इस्तेमाल की जाती थी उसे 'इंटरकट' कहते थे।

  3. #3
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    पुराने ज़माने का एक लैंडलाइन फ़ोन

  4. #4
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    २०वीं सदी के अन्तिम दशक की समाप्ति के वर्षों के दौरान लैंडलाइन फ़ोन का घर पर होना भौकाल बनाने के लिए एक बहुत ज़रूरी चीज़ समझा जाने लगा, जिसके कारण लोगों में अपने-अपने घरों पर लैंडलाइन फ़ोन लगवाने की होड़ सी मच गई। उस समय लैंडलाइन फ़ोन का कनेक्शन लेना एक टेढ़ी खीर था, क्योंकि लैंडलाइन फ़ोन लगवाने के लिए लम्बी प्रतीक्षा-सूची (Waiting List) हुआ करती थी। जैसे-तैसे करके हमने जुगाड़-तकनीक के प्रयोग द्वारा वर्ष १९९८ में एक अदद लैंडलाइन फ़ोन अपने घर पर लगवा लिया जिसकी हमें कोई ख़ास ज़रूरत नहीं थी, क्योंकि हम अक्सर घर में ताला लगाकर कन्याकुमारी निकल जाते थे और दो-तीन हफ़्तों के बाद ही वापस लौटते थे। बहरहाल लैंडलाइन फ़ोन के कारण चारों ओर हमारा भौकाल फटाफट बनने लगा। हमारे मित्र-यार, रिश्तेदार और जान-पहचान वाले पी०सी०ओ० (Public Call Office) में एक रुपए की आहुति (Oblation) देकर हमें कॉल करके अपना भौकाल जमाने में हँसी-खुशी लग गए। उस समय किसी लैंडलाइन फ़ोन वाले को कॉल करना भी समाज में भौकाल समझा जाता था!

  5. #5
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    पुराने ज़माने का एक पी०सी०ओ० लैंडलाइन फ़ोन जिसमें सिक्का डालकर बात किया जाता था

  6. #6
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    वैसे तो लैंडलाइन फ़ोन के बारे में इतनी लम्बी-चौड़ी व्याख्या करना इस लेख का मूल विषय नहीं है, किन्तु लेखन के वक़्त कुछ पुरानी अनूठी (Unique) बातों को लिपिबद्ध (Record) करना अच्छा समझा जाता है, क्योंकि ये आलेख (Record) आगे की पीढ़ी के लिए ज्ञानवर्धक होने के साथ-साथ मनोरंजक भी होते हैं। लिपिबद्ध किए गए इन आलेखों को भविष्य में प्रमाणस्वरूप अंगीकृत (Adopt) किया जाता है जिसके कारण आगे की पीढ़ी के रचनाकार लिपिबद्ध किए गए इन आलेखों के हवाले से अपनी रचनाओं को सरलतापूर्वक सम्पूर्ण करते हैं।

  7. #7
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    बहरहाल एक अदद लैंडलाइन फ़ोन की बदौलत जितनी तेज़ी से हमारा भौकाल बना था, उतनी ही तेज़ी से घुस भी गया। हुआ यह कि एक बार जब हम कन्याकुमारी से वापस लौटे तो पता चला कि लैंडलाइन फ़ोन से टक्कर लेने के लिए बाज़ार में 'पेजर' (Pager) आ चुका था और हमारे कुछ दोस्त-यार एक अदद पेजर बेल्ट में लटका कर अकड़ कर घूम रहे थे और सभी को अपना पेजर नम्बर बाँट कर महाभौकाल बना रहे थे!

  8. #8
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    मोबाइल फ़ोन आने के कारण अपने लाँच के एक साल में शहीद हुआ बेचारा 'पेजर'

  9. #9
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    हमारी वक्र दृष्टि माचिस की डिब्बी से थोड़ा बड़े आकार वाले उस आधुनिक यन्त्र पर जम गई जिसे पेजर कहते थे। पूछताछ करने पर पता चला कि पेजर एक ऐसा यन्त्र है जिस पर कोई भी सन्देश तत्काल भेजा जा सकता था। सन्देश भेजने के लिए किसी भी लैंडलाइन फ़ोन से पेजर सेवा प्रदाता के ग्राहक सेवा केन्द्र पर कॉल करके तत्सम्बन्धित पेजर नम्बर के साथ अपना सन्देश बताना होता था और फिर वह सन्देश चुटकियों में पेजर धारक को प्राप्त हो जाता था। हम पाँच-छः हज़ार रुपया लादकर पेजर के दफ़्तर पहुँचे तो पता चला कि पेजर सिर्फ़ ढ़ाई-तीन सौ किलोमीटर के दायरे में ही काम करता है और नेशनल रोमिंग तो बिल्कुल उपलब्ध नहीं है। यह सब जानकर हमें पेजर एक बेकार की चीज़ लगी जो ढ़ाई-तीन सौ किलोमीटर के दायरे के बाहर जाते ही मर जाता था। वैसे पेजर कम्पनी वालों ने हमारा पैसा तत्काल लूटने की गरज से हमें आश्वासन दिया कि जल्दी ही नेशनल रोमिंग की सुविधा भी आने वाली है, किन्तु हम उनके जाल में नहीं फँसे और पेजर खरीदने का ख्याल त्याग दिया। पेजर न खरीदना ही हमारे लिए लाभदायक सौदा सिद्ध हुआ, क्योंकि एक साल के अन्दर ही मोबाइल फ़ोन लाँच हो गया। बेचारा पेजर मोबाइल फ़ोन की उपयोगिता के सामने टिक न सका और शहीद हो गया। बेचारा पेजर इतनी बुरी मौत मरा कि किसी तमिल फ़ीचर फ़िल्म में भी अपनी शक्ल तक न दिखा सका। यदि आपकी जानकारी में किसी भी भारतीय फ़ीचर फ़िल्म की कहानी में पेजर की भूमिका हो तो तत्काल बताएँ जिससे इस लेख में उसका समावेश किया जा सके।

  10. #10
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    मोबाइल फ़ोन की उपयोगिता के कारण २१वीं सदी के आरम्भ में ही यह धीरे-धीरे करके लोगों के दिलों पर राज करने लगा और मोबाइल फ़ोन रखना भौकाल जमाने का प्रतीक बन गया। उस दौरान जिसके पास मोबाइल फ़ोन होता था वह समाज में बहुत बड़ा भौकाली समझा जाने लगा। देखते-देखते लोग लैंडलाइन फ़ोन को छोड़कर मोबाइल फ़ोन की ओर टूट पड़े और एक अदद मोबाइल फ़ोन खरीदकर अपना भौकाल बनाने लगे। इस भौकाल में भी एक पेंच था। जिसके पास सबसे छोटे आकार का मोबाइल फ़ोन होता, वह सबसे बड़ा भौकाली समझा जाता। उस दौरान लकड़बग्घा टाइप के बहुत बड़े और वजनी मोबाइल फ़ोन भी चलन में थे जो थोड़ा सस्ते हुआ करते थे। छोटे आकार का मोबाइल फ़ोन महँगा होने के कारण सम्मान की दृष्टि से देखा जाता था।

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