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Thread: आग के बेटे (वेद प्रकाश शर्मा द्वारा रचित) - विजय विकास श्रृंखला

  1. #11
    हीरक सदस्य bndu jain's Avatar
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    "देखो प्यारे काले लड़के ।” विजय अकड़कर सीना फूलाता बोला "देखो विजय दो ग्रेट की शोहरत, स्वयं गृहमन्त्री ने हमें इस केस पर लगाया है ।"

    ब्लैक ब्वाय के अधरों पर मुस्कान उभर आई ।

    विजय ने लाल कागज खोलकर पढना प्रारम्भ किया । लिखे हुए शब्द कुछ इस प्रकार थे I


    “'प्यारे राजनगर वासियो और पुलिस अधिकारियों।

    हमे कुछ इस तरह के समाचार मिलै हैं कि आजकल रिजर्व बैंक आँफ़ इंडिंया की मुद्रा की सख्या कई करोङ तक पहुच गई है I अधिकारीगण जरा हमारी बात को गहराई से सोचे I वास्तविकता यह है कि हम लोग हमेशा जनकल्याण के लिए तत्पर रहे हैं । हमारा अभी तक का जीवन जनकल्याण में ही व्यतीत हुआ हैं और उम्मीद करते हैं कि अगर आप लोगों का सहयोग मिला तो जीवनपर्यत हम लोग इसी प्रकार परहिताय के लिए प्रयत्नशील रहेगे| अभी तक हम लोग जनकल्याण के छोटे-छोटे कार्य करते रहते थे। किन्तु हमने देखा कि भारत कुछ इतनी परेशानियो में घिरा है कि अगर हमारी यह जनकल्याण की भावना इतनी धीमी रही तो हम कुछ नहीं कर पाएँगे और हमारा जीवन एक तरह से निरर्थक सा ही ही हो जाऐगा । अतः हम लोग खुलकर सामने आ रहे है ।

    हाँ तो मैं उस विषय पर लिख रहा था जो जनकल्याण का कार्य हम अभी कुछ ही समय बाद करने जा रहे हैं । हम एक बार फिर कहते हैं कि हमें समझने का प्रयास करे । बात ये है कि रिजर्व बैंक मे मुद्रा आवश्यकता से अधिक हो गई है ।

    अब जरा आप लोग दिमाग से सोचे कि इतनी बडी रकम चुराने का लालच किस के दिमाग में नहीं आऐगा? आजकल भारत में भ्रष्टाचार, धोखा, चोरी, लूट इत्याद्वि जोरों पर है । अब आप सोचिए कि क्या किसी भी वक्त वे लुटेरे रिजर्व बैंक की दस करोड़ की रकम, जो भारतीय प्रजा की है, लूट नही सकते? आपको विश्वास हो या न हो हम लोग तो क्योंकि जनक्लाण के लिए जीतै हैं अत: प्रजा की सुरक्षा का ध्यान लगा रहता है । प्रजा के धन को अत्यंत सुरक्षित रखने के लिए हम लोग यह धन ले जाऐगे । ताकि इसे अत्यंत सुरक्षा के साथ रखा जा सके । शायद आप लोग हमारे इस काम की निन्दा करे लेकिन हम फिर भी कहेगे कि हमे समझने का प्रयास किया जाया । अगर यह धन यहां रहा तो हमेशा चोरी होने का भय लगा रहेगा । संभव है कि इस प्रयास मे किसी की ह्नत्या हो जाए ओर हमारे होते हुए यह सब हो जाए तो हम किस बात के जनकल्याणी है ?

    इस बात की संभावना ही स्माप्त हो जाए, इसलिए हम ठीक दो बजे आऐगे ।

    हमने अब बहुत कुछ लिख दिया हैं।


    आशा करते है हमारे कार्यो मे बाधा डालने के स्थान पर हमें सहयोग देंगे।

    अंत मे ये लिखना अपना कर्त्तव्य समझते हैं कि अगर हमारे इस कल्याण कार्य में कोई हमारे विरूध आया तो दोस्तो ये याद रखना कि जो कार्य जनकल्याण के लिए किए जाते हैं, कार्यकर्ता उन सभी रोडों को ठिकाने लगाता हुआ अपनी मंजिल तक पहुचता है जो मार्गो में आतै हैं ।

    यू तो हमारे द्वारा सुरक्षित रखनै पर भी चोरी होने का भय तो लगा ही रहेगा। स्वयं हमारी जान भी जा सकती है किन्तु हमें अपनी चिंता नहीं नही है, चिंता हैं तो आप लोगों की है| कहीं आप लोगों को किसी तरह का कष्ट न हो । अब हम इस मुसीबत को अपने साथ ले जाने के लिए ठीक दो बजे आ रहे है

    इस धन की सुरक्षा में अगर हम लोगों की जान भी चली जाए तो हम अपना परहिताय जीवन सफल समझेगे । अच्छा, अब दो बजे मिलेंगे ।।

    जनकल्याणकारी आप ही के दोस्त

    आग के बेटे
    उपन्यास को ज़रा फास्ट कीजिये विजय सीरीज को किस्तों में पढने में मजा नहीं आता है

  2. #12
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    जी हाँ, जल्दी नावेल अपलोड करूँगा |
    अभी मिस्टेक्स है नावेल में, उन्हें ठीक कर रहा हूँ l
    ठीक करते ही पूरा नावेल अपलोड कर दूंगा l
    कृपया थोड़ा इंतज़ार कीजिये l

    "हर छोटी से छोटी चीज प्रकृति में मायने रखती है"



  3. #13
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    Quote Originally Posted by anita View Post
    बेह्तरीनं

    आपका बहुत बहुत धन्यवाद
    प्रोत्साहन के लिए आभार

    "हर छोटी से छोटी चीज प्रकृति में मायने रखती है"



  4. #14
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    विजय ने सम्पूर्ण कागज पढा। वास्तव में सारा पत्र एक विचित्र ढंग से लिखा गया था । प्यार भरे शब्दों में ही एक खतरनाक चैलेंज दे दिया था। अतिम शब्दों पर तो वास्तव में उसकी निगाहे जमकर रह गई ।

    उसकी समझ में नहीं आ रहा था कि ये आग के बेटे क्या बला है? आग के बेटे कैसे होगे? आग के बेटों का आखिर मतलब क्या है?

    उसने चौंककर घडी देखी जो ठीक सवा बजने का सदेश दे रही थी I घडी देख कर उसने विचित्र ढंग से मुंह बिचकाया और फिर ब्लैक ब्वाय की ओर देखकर बोला ।

    "'तो प्यारे चीफ़ मियां, इसमें परेशानी क्या है ? ये साले आग के बेटे तो जनकल्याणकारी हैं । जो कर रहे है जनता के लाभ के लिए ही कर रहे हैं । हम क्यों बेकार में इनके रास्ते में रोडे बने ?”

    "सर यह जानते हुए भी कि परिस्थिति कितनी गंभीर है, आप मजाक कर रहे है । शीघ्रता से सोचिए कि हमें करना क्या चाहिए ? समय कम है सर ।” ब्लैक ब्वाय चिंतित स्वर में बोला ।

    "खैर प्यारे! अगर तुम कहते हो तो हम इन्हें रोकने का प्रयास करेंगे । वैसे हमे लगता है कि ये साले आग के बेटे किसी हरामी की औलाद हैं! हमारे रोकने से रूकेगे नहीं, लेकिन वो अगर आग के बेटे हैं तो हम भी ठाकुर के पूत हैं । साले इस तरह नहीं रूके तो दो-चार झकझकिया सुनकर धराशायी कर देगे ।” विजय सीना फुलाता हुआ बोला ।

    "सर I” ब्लैक ब्वाय उसी प्रकार गंभीरता के साथ बोला।

    "मेरे ख्याल में क्यों न राजनगर में तीन बजे तक के लिए कर्फ्यू लगा दिया जाए ?”

    "नहीं नहीं प्यारे ।” विजय एकदम सतर्क होकर बोला।” भूलकर भी ऐसा पवित्र कार्य न कर बैठना । इस समय अगर कर्फ्यू लगाया गया तो जनता भड़क उठेगी और एक नई मुसीबत खडी हो जाएगी । इस समय प्रत्येक कदम सोचकर उठाओ ।"

    "तो फिर क्या किया जाए सर ?"

    "तुम अशरफ इत्यादि सभी को वहाँ पर भेज दो । तब तक हम भी पहुच रहे है I” विजय ने कहा और घडी को देखता हुआ तुरंत सीक्रेट रूम से बाहर निकल आया । घड़ी डेढ बजने का संदेश दे रही थी ।

    ठीक पौने दो बजे विजय रिजर्व बैंक पहुचा । वहाँ उसके पिता, राजनगर के आई जी, के नेतृत्व में काफी भारी सख्या में पीएसी के नौजवान उपस्थित थे जो उमड़ती भीड़ पर काबू पाने का प्रयास कर रहे थे । काफी हद तक वे अपने प्रयास में सफल भी थे । नेतृत्व क्योंकि खुद ठाकुर साहब कर रहे थे अंत प्रबंधन काफी सुदृढ था ।

    रिजर्व बैंक के चारो और कुछ इस तरह के चक्रव्यूह का निर्माण किया गया था मानो महाभारत को दोहराना हो ।

    "हर छोटी से छोटी चीज प्रकृति में मायने रखती है"



  5. #15
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    रघुनाथ ने स्वयं एक ओर का मोर्चा सभाल लिया था । विजय ने देखा कि सीक्रेट सर्विस के अन्य सदस्य विभिन्न मेकअप में वहाँ उपस्थित थे । आशा इस समय किसी चिड़चिडी और बदसूरत सी बुढिया के मेकअप में थी जिसकै काले भद्दे और चेचक के दाग वाले चेहरे की लम्बी और टेढी-मेढी नाक पर एक ऐनक लगभग लटक-सी रही थी । उसके मोटे लटके हुए होंठों से पान की पीक बह रही थी । बाल पक चूके थे । उसके हाथ में एक लठिया थी और वह अपने हुलिए के अनुसार कुशल अभिनय करने में सफ़ल थी ।

    विजय इस समय स्वयं मेकअप में था ताकि ठाकुर साहब न पहचान सके । इस समय वह ऐसे मेकअप में था कि उसे पहचानना कठिन ही नहीं, असंभव था । उसको कुछ शरारत सूझी I अंत: उसने आशा की ओर देखा और आंख मार दी । उत्तर में जो हरकत आशा ने की, उससे वह मान गया कि आशा कमाल का अभिनय करती है । उसके आंख मारते ही आशा ने ठीक किसी बुढिया की भांति तेवर बदले और दो-चार गालियों से विभूषित कर दिया ।

    यह एक अलग बात है कि इस बीच पान की पीक ने होंठों के बीच से निकलकर मैली कुचैली धोती पर एक सुंदर-सा प्रिंट बना दिया था । वैसे प्रिंट बनाना भी शायद आशा के अभिनय का एक भाग था I

    विजय तुरंत भीड़ में विलुप्त हो गया । वह यह न जान सका कि आशा ने भी उसे पहचाना है अथवा नहीँ । वह भीड़ में घुस गया और एक स्थान पर आराम से खडा होकर बैंक के उस चौपले को देखने लगा-जहां सिर्फ सरकारी कर्मचारी ही खड़े थे ।

    अभी वह ध्यान से सब कुछ देख ही रहा था कि वह चौंक पड़ा, न सिर्फ चौंक पडा बल्कि उछल पड़ा, जब भीड़ में से किसी ने ये बेहूदा हरकत की ।

    हुआ ये कि विजय की कमर में किसी ने बहुत जोर की चुंटी काटी । परिणामस्वरूप वह उछल पडा और अपने चारो और का निरीक्षण किया, किन्तु वह न जान सका कि ये हरकत किसकी है । जब उसे काफी प्रयासों के बाद भी असफलता ही हाथ लगी तो वह शांत खडा हो गया और अपना ध्यान आग के बेटो की और लगाने का प्रयास कर ही रहा था कि एक बार वह फिर चौंक पडा।

    कारण था फिर वही बेहूदा हरकत ।

    विजय को लगा कि कोई शरारती बच्चा उसके साथ शरारत कर रहा है

    किंतु तभी उसके दिमाग में प्रश्न उठा, आखिर ये शरारत उसी के साथ क्यों की जा रही है ?

    कहीं इस छोटी सी घटना के पीछे कोई बड़ा रहस्य तो नहीं? उसके दिमाग ने उत्तर दिया कि संभव है ऐसा ही हो क्योकि आग के बेटों के उस पत्र से स्पष्ट होता है कि अपराधी कछ विचित्र सी आदतों का स्वामी है ।

    कही अपराधी उसे छका तो नहीं रहा ? न जाने क्यों उसके दिमाग में यह बात घर कर गई कि हो न हो, ये हरकत कोई बहुत बडा रहस्य है ।

    अभी सोच ही रहा था कि इस बार किसी ने अपनी सपूर्ण शक्ति लगाकर चुंटी काटी, इतनी शक्ति से कि विजय तिलमिला कर रह गया, लगभग चीखा "अबे ओ भाई, कौन है बे?"

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  6. #16
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    लेकिन जो भी था, वह उसके पास से गायब था । एक बार को तो विजय की खोपडी घूम गई ।

    उसके बोलने के ढंग पर उसके आसपास खडे लोग उसे विचित्र-सी निगाहों से देखने लगे ।

    विजय ने मूर्खो की भांति चेहरा बनाया और शुतुरमुर्ग की भांति अपनी गर्दन लम्बी करके इधर-उधर देखने लगा । लोग मुस्कराकर रह गए ।

    वैसे इस बार विजय पूर्णतया सतर्क था ! अब वह पता लगाना चाहता था कि आखिर ये हरकत है किसकी और उसका अभिप्राय क्या है? तभी वह चौंक पडा I

    वास्तव में इस समय उसे यहां जिस चेहरे के दर्शन हुए, उसे देखकर वह बुरी तरह से चौंक पडा । विकास लोगों की टांगो के बीच से होता हुआ उसकी ओर आ रहा था । वास्तव में इस चेहरे की यहां इस समय उपस्थिति आश्चर्य थी ।

    विजय चकरा-सा गया । आखिर उसने उसे मेकअप में भी पहचान लिया ?

    विजय के मन में इस प्रश्न की उत्पत्ति हुई और मन ने उत्तर में यही कहा कि आखिर ये लड़का है क्या ? वह उसके निकट आया और अभी चुंटी काटने ही वाला था कि विजय चीखा "अबे ओ हरामखोर की औलाद! कौन है तू ?"

    “डैडी को गाली दी तो मैं आपकी दाढी पकड़कर लटक जाऊगा।आप मुझे नहीं पहचानते! मैं विकास हूं I” लगभग ग्यारह वर्षीय वह लड़का शरारत-भरे लहजे में बोला ।

    विजय चकराकर रह गया ।

    आखिर ये लड़का उसे पहचान कैसे गया ? इस समय वह ऐसे मेकअप में था कि अच्छे-से-अच्छा पारखी भी उसे पहचान न सकता था किंतु ग्यारह वर्षीय यह छोकरा I एक बार फिर विजय सोचने पर मजबूर हो गया कि विकास खतरनाक शैतान है I यह तो उसे पता था कि अलफांसे ने उसे न सिर्फ खतरनाक कार्यो में दक्ष कर दिया था बल्कि दहकते शहर नामक केस का हीरो भी विकास ही था किन्तु विजय को पहचानना एक भिन्न और आश्वर्यपूर्ण बात थी ।

    विकास ..!!!!

    विकास, विजय के दोस्त रघुनाथ का लड़का था । यह लड़का अत्यंत खतरनाक बन गया था । इस अल्पायु में ही अलफांसे ने उसे गजब के हैस्तअगेज कारनामे सिखा दिए थे ।

    विजय को लगा कहीं ये खतरनाक लड़का यहां उसकी पोल ही न खोल दे । अंत वह तुरंत भीड़ में से निकलकर एक ओर को चला गया । विकास के मासूम से अधरों पर शरारतपूर्ण मुस्कान थी और वह विजय के पीछे-पीछे ही बाहर आया ।

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  7. #17
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    भीड़ से अलग आकर विजय उसकी और मुड़कर बोला-"'क्यों वे दिलजले तुम यहां कैसे ?"

    “अंकल! सच बताऊ या झूठ ?” विकास बोला ।

    “देखो मियां दिलजले! तुम्हारी हरकते लम्बी होती जा रही हैं । पहले नेकर का नाडा बांधना सीखो, तब ऐसे खतरनाक स्थानों पर आया करो ।"

    "अंकल मैं पैंट पहनता हूं जिसमेँ नाडा नहीं, पेटी होती हैं ।"

    विजय ने घडी देखी। दो बजने में सिर्फ 5 मिनट शेष थे । अंत इस समय वह विकास को यहां से खिसकाने के लिए उससे बिना उलझे बोला "तुम यहां क्यों आए हो बेटे ?"

    ”आपको दिलजली सुनाने ।"

    ”अबे ओ ।” विजय अभी कछ कहने ही जा रहा था कि ठहर गया और स्वयं ही बात बदलकर बोला "लेकिन तुमने हमें पहचाना कैसे ?"

    “लो, ये भी कोई कठिन काम था झकझकिए अंकल ! मैं आपको दिलजली सुनाने आपकी कोठी पर गया था । वह्य देखा तो पाया कि आप शीशे के सामने बैठे ये श्रृंगार कर रहे हैं । मेरे देखते ही-देखते आपने ये नकली दाढी मूछे लगाई और यहां आ गए । मैं आपके पीछे पीछे था ।"

    विजय विकास के मासूम प्यारे-प्यारे चेहरे को देखता ही रह गया । उसे विश्वास नहीं हुआ कि इतनी अल्पायु का किशोर इतनी विलक्षण बुद्धि रख सकता है । वह इतना खतरनाक हो सकता है जितना कि विजय था ।

    विजय को कुछ विचित्र-सा लगा ।

    विकास को इतना जीनियस देखकर उसे विचित्र-सी खुशी का अहसांस हुआ । विकास की एक-एक हरकत ऐसी थी कि जो विजय के मन में घर कर जाती । विकास को वह भारत का ही नहीँ, बल्कि विश्व का सर्वोत्तम जासूस बनाने का दृढ निश्चय कर चुका था किन्तु इस समय विकास को यहां देखकर न जाने क्यों उसे कछ मानसिक परेशानी हुई । तभी वह विकास से कुछ कहने ही जा रहा था कि चौंक पडा ।

    अचानक बैंक की तरफ से तगडे शोर की उत्पत्ति हुई और फिर समस्त वातावरण भयभीत चीखों से भर गया । भागती हुई भीड़ का रेला उसी ओर आया ।

    उसने विकास को सभालने के लिए वहां निगाह मारी जहां विकास था, किंतु उस समय विजय की आंखे आश्चर्य से फैल गई जब उसने पाया कि विकास रूपी छलावा अपने स्थान से गायब है । विजय को लगा कि यह लड़का छलावा तो नहीं I आसपास उसे कही विकास नज़र नहीं आया ! भागती हुई भीड़ का रेला उसके अत्यंत निकट आ गया था । लोगों की भयभीत चीखें वातावरण पर अपना प्रभुत्व जमाए थीं I विजय ने फिलहाल अपना मस्तिष्क विकास से हटाकर उस ओर लगा दिया I

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  8. #18
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    वह एक ओर को हट गया और उधर देखा जिधर से लोग चीखते हुए भाग रहे थे I उधर देखते ही विजय बुरी तरह चौंक पडा। आश्चर्य से उसकी आंखे सिकुड़ गई । वह उस ओर देखता ही रह गया । उसे ऐसा लगा वह जो देख रहा है वह स्वप्न मात्र है । वास्तव में इस समय विजय जो देख रहा था, वह उसी तरह मुर्खतापूर्ण बात थी जैसे ये सोचना कि आकाश गिर जाए ।

    कुछ ऐसा ही दृश्य उसके सामने था जिस पर वह कदापि विश्वास नहीं कर सकता था । वह इस बात पर तो विश्वास कर सकता था कि हिमालय अपने स्थान से हिल गया। किन्तु इस दृश्य को सत्य नहीं मान सकता था, किंतु दृश्य कठोर यथार्थ के रूप में उसके सामने था ।

    क्षण-प्रतिक्षण उसकी आंखे हैरत से फैलती जा रही थी । दृश्य जितना स्पष्ट होता जाता, उसकी आंखे उसी अनुपात में हैरत से फैलती चली जाती थीं । वास्तव में था यह हैरतअंगेज दृश्य । उसे अपने रोंगटे खडे होते हुए महसूस हुए । भयानक दृश्य उसने देखा । उस दृश्य को देखकर लोग उससे भयभीत होकर न सिर्फ चीखने-चिल्लाने लगे थे, बल्कि अपनी-अपनी रक्षा हेतु भाग लिए थे I विजय को भी मानना पड़ा कि प्रस्तुत दृश्य मौत से भी भयानक और खतरनाक है ।

    सबसे पहले उसने बदहवास-सी भागती भीड़ के उस पार धुआं उठता देखा, जिसे देखकर एक ही क्षण में भीड़ काई की तरह फ़ट गई और प्रस्तुत दृश्य को देखकर विजय की आंखे हैरत से फैल गई ।

    उसके सामने आग के बेटे थे ।

    वास्तव में ये आग के बेटे थे !

    ये लगभग दस जीवित हाड़-मांस के इंसान थे! किंतु आश्चर्च की बात ये थी कि उनके सपूर्ण जिस्म आग की लपटों में घिरे हुए थे । समस्त जिस्म से आग ऐसे लपलपा रही थी मानो किसी ने उनके जिस्मों पर पेट्रोल छिड़ककर आग लगा दी हो । उनके जिस्मों से लपलपाती हुई भयकर अग्निशिलाऐं धधक रही थीं।

    लपटे कुछ इस प्रकार ऊंची उठ रही थीं मानो दस होलियां एक साथ जल रही हों । उनके जिस्मो से ज्वलित अंगारे धरती पर गिरते जा रहे थे ।

    भयकर अग्निशिलाऐं ऐसे लपलपा रही थी मानो गधक की अग्निशिलाएं जल रही हौं ।


    उनका सपूर्ण जिस्म भयंकर किस्म की लपलपाती आग की लपटों में था ।

    इससे भी आगे आश्चर्यजनक ये था कि आग की लपटों में घिरे हुए वे आग के बेटे निरंतर रिजर्व बैंक की और बढ रहे थे! लोगों को न सिर्फ आश्चर्य हो रहा था, बल्कि बदहवास हो गये थे । ये बात न सिर्फ उनके दिमाग से बाहर थी बल्कि हैरतअंगेज भी थी कि इस बुरी तरह आग की लपटों में लिपटे हुए इंसान जीवित भी रह सकते हैं । वे न सिर्फ जीवित थे, बल्कि मस्त हाथी की तरह झूमते हुए अपने लक्ष्य की और बढ़ रहे थे ।

    मैदान साफ हो चुका था । पी.ए.सी. वाले विचित्र-सी परेशानी और कशमकश में फंस गए थे । यह तो वे जानते ही थे कि उ'न्हें किन्हीं विशेष अपराधियों से टकराने के लिए बुलाया गया है, किन्तु उन्हें ऐसी आशा कदापि नहीं थी कि अपराधी इस विचित्र ढंग के होगे ।

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  9. #19
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    स्वयं विजय को समझ में नहीं आ रहा था कि वह क्या करे । अपने स्थान पर खड़ा विजय सामने के भयानक दृश्य को देख रहा था ।

    सहसा वह चौंका उसने देखा ।

    अचानक उसके पिता शहर के आईजी ठाकुर साहब आग के बेटों के सामने आ ड़टे । विजय देख चुका था कि ठाकुर साहब के चेहरे पर भयानक भाव उभर आए हैं जो इस बात का प्रमाण थे कि वे कोई भयानक निर्णय ले चुके है । इस समय विजय ने अपना कदम आगे बढ़ाना उचित न समझा । अंत: वही खडा रहकर सब कुछ देखता रहा I

    ठाकुर साहब आग के बेटों के सामने रिवाल्वर तानकर खडे हो गए और चीखे "इन्हें चारों ओर से घेर लिया जाए ! "

    पी.ए.सी बदहवास तो हो ही चुके थे किंतु आदेश का उन्होने तुरंत पालन किया I क्षण-मात्र में आग के बेटे पी.ए.सी के वृत्त में कैद थे किंतु आग के बेटे मस्त हाथी थी की भांति झूमते हुंए अपने लक्ष्य की ओर अग्रसर थे मानो इस घेराव से उन्हें सरोकार ही न हो । उनके ठीक सामने ठाकर साहब खडे थे I

    आग के बेटे आगे बढते रहे । ठाकुर साहब भी मानो अडिग चट्टान थे । वे जितने निकट आते जाते, उसी अनुपात में ठाकुर साहब के चेहरे की भयानकता में चार चाँद लगते जाते थे । तब जबकि वे अत्यंत निकट आ गए, ठाकुर साहब बोले "ठहरो!! नहीं तो भून दिए जाओगे ।"

    किन्तु ऐसा लगता था जैसे वे सभी बहरे हो I

    ठाकुर साहब की आवाज का लेशमात्र भी प्रभाव उन पर न हुआ । वे उसी प्रकार बढ रहे थे I

    विजय इस दृश्य को देख रहा था किंतु सिर्फ देख ही रहा था ।

    आग के बेटे निरंतरं आगे बढ रहे थें । ठाकुर साहब चीख-चीखकर चेतावनी दे रहे थे।जिसका उन पर कोई भी प्रभाव नहीं पड़ रहा था। अलबत्ता ठाकुर साहब के क्रोध में निःसंदेह वृद्धि होती जा रही थी।

    अंत में तब जबकि वे इतने निकट आ गए कि ठाकुर साहब को उनके जिस्मों से लपलपाती आग की ऊष्मा मिलने लगीं तो ठाकुर साहब चीखे “फायर !"

    "रेट रेट रेट ! "

    आदेश के साथ ही पी ए सी वालो की गनों ने अपने भयानक जबडे खोल दिए । लपलपाते हुए भयकर आग के शोले आग के बेटों की ओर बढे । वे दहकते हुए जिस्मो से टकराए भी किन्तु उस समय विजय को आश्चर्य नहीं हुआ जब बेचारी गनों की गोलियां बिना कोई जौहर दिखाए शहीद हो गई ।

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  10. #20
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    उसे पहले ही उम्मीद थी कि आग के बेटे इन आम हथियारो के बस में आने वाले नहीं है बल्कि इनका अंत करने के लिए दिमागी पेंचो को खटखटाना पडेगा ।

    परिणाम देखकर ठाकुर साहब को जहां थोडा आश्चर्य हुआ, वही पी ए सी के जवान तो भौंचक्के रह गए । आग के बेटे ठाकुर साहब के अधिकाधिक निकट आ गए थे । इतऩे निकट कि उन्हें अपना जिस्म जलता-सा प्रतीत होने लगा तो वे तुरंत वहां से हट गए ।

    उसके बाद ।

    क्रम इसी प्रकार चलता रहा । ठाकुर साहब बार बार आग के बेटों को खतरनाक लहजे और शब्दों में चेतावनी देते रहे, किंतु जब उसका लेशमात्र भी प्रभाव न देखते तो उन्हें स्वयं यह महसूस होता कि उनकी चेतावनी खोखली है । अनेक बार गने गरजती किंतु परिणाम वही ढाक के तीन पात I अंत में सदर दरवाजे से होते हुए आग की लपटों में लिपटे आग के बेटे बैंक के अंदर चले गए। पुलिस का चक्रव्यूह उनको लेशमात्र भी हानि पहुचाने में असफल रहा ।

    ठाकुर साहब का क्रोध सातवें आसमान पर पहुच गया किंतु वह कर ही क्या सकते थे ?

    सड़क पर अब भी दहकते शोले बिखरे पडे थे।

    विजय अभी कोई उपाय सोच ही रह्य था कि बुरी तरह से चौंका । उसकी नजर छलावे पर पडी ।

    हां, उसे छलावा ही क़ह सकता था । वास्तव में यह शैतान था। अल्पायु का खतरनाक शैतान I

    वह विकास के अतिरिक्त कोई न था जिसे देखकर विजय चौंका था । वह सिर्फ विकास के चेहरे से नहीं चौंका था ।

    वास्तव में वह चौंका था विकास की हरकत से । उसकी समझ में नहीं आया कि आखिर लड़का चाहता क्या है ? आखिर विकास उसे कितनी बार आश्चर्य के सागर में गोते लगवाएगा ।

    विजय को लगा कि अगर यह लड़का इसी तरह मौत के भयानक जबडों में छलांग लगाता रहा तो किसी दिन मौत के जबड़े उसे अपने आगोश में ले लेगे ।

    उसे गुस्सा आया अलफांसे पर जिसने विकास को इन खतरनाक खेलों में दक्ष किया था । इस अल्पायु में भला विकास को इतना खतरनाक लड़का बनाने की क्या तुक है ?

    वास्तव में विकास की इस हरकत से चौंकने वाला सिर्फ विजय ही न था, बल्कि ठाकुर साहब और रघुनाथ के साथ-साथ अन्य पी.ए.सी. के जवान भी थे |

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