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Thread: आग के बेटे (वेद प्रकाश शर्मा द्वारा रचित) - विजय विकास श्रृंखला

  1. #1
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    Post आग के बेटे (वेद प्रकाश शर्मा द्वारा रचित) - विजय विकास श्रृंखला

    इस सूत्र में प्रस्तुत है, दिवंगत प्रसिद्ध लेखक वेद प्रकाश शर्मा का थ्रिलर उपन्यास

    "
    आग के बेटे"

    इसका श्रेय इंटरनेट पर ये उपन्यास अपलोड करने वाले वास्तविक महोदय को जाता है|

    "हर छोटी से छोटी चीज प्रकृति में मायने रखती है"



  2. #2
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    आतंक की छाया ने लगभग आधे घंटे में ही समस्त राजनगर को आगोश में ले लिया ।

    भय की लहर राजनगर के निवासियों में कुछ इस तीव्रता और भयानकता के साथ व्याप्त हुई, मानो प्लेग का रोग रहा हो । जिस चेहरे पर दृष्टि जाती वही पीला नजर आता ।

    प्रत्येक मुखड़े पर भय एव आश्चर्य के संयुक्त भाव दृष्टिगोचर होते !

    राजनगर का समस्त कार्य अस्त-व्यस्त हो गया ।

    लोगों का ध्यान अपने कर्तव्यों से हटकर इस विचित्र आश्चर्यजनक और भयावह घटना की ओर हो गया ।

    जहा देखो एक ही चर्चा ! जिधर जाओ ड़रावने चेहरे दिखते !

    स्थान-स्थान पर लोगों के जत्थे, जगह-जगह आदमियों की भीड़, भिन्न-मिन्न आयु के बच्चे, बूढे-ज़वान, स्त्री-पुरुष, बहादुर व कायर इत्यादि सभी इस विचित्र से चैलेंज के विषय मे सोच रहे थे, तर्क-वितर्क कर रहे थे ।

    घड़ी की सुइयां तेजी के साथ बढ रही थीं । साथ ही बढ रही थी लोगों की उत्सुकता । साथ ही उनके दिल तीव्र वेग के साथ धड़क रहे थे । वे देखना चाहते थे उस विचित्र और साहसी चैलेंज का परिणाम ! चैलेंज, समस्त राजनगर को भयानक चैलेंज I

    अभी…!

    अब से ठीक एक घंटा पहले यानी साढे ग्यारह बजे तक तो सब कुछ सामान्य था । उसी प्रकार सामान्य जैसे प्रतिदिन रहता था । सभी अपने कार्यो मे व्यस्त थे। किन्तु ठीक बारह बजे…

    आज का बारह बजना मानो कहर था ।

    बात का श्रीगणेश भी कम आश्चर्यजनक नहीं था I सर्वप्रथम भय और आतंक की इस लहर ने जन्म लिया था रिजर्व बैंक आफ इंडिया से । यह बैंक राज़नगर का सर्व सुरक्षित बैंक था और चैलेंज था न सिर्फ उसकी सुरक्षा को, बल्कि समस्त सरकारी अफसरों और राजनगरवासियों को ।

    ठीक उस समय जब रिजर्व बैंक का मैनेजर अपने कमरे मे बैठा एक मोटे-से रजिस्टर को ध्यान से देख रहा था कि एक मधुर ध्वनि ने उसकी तन्द्रा भंग की "मे आई कम इन सर?"

    मैनेजर महोदय की उंगलियों में फंसा सिगार का टुकड़ा गिरते-गिरते बचा ।

    चौंककर उन्होंने दरवाजे पर देखा तो सामने एक हसीन युवती को मुस्कराते हुए पाया ।
    Last edited by asr335704; 30-06-2020 at 02:20 PM.

    "हर छोटी से छोटी चीज प्रकृति में मायने रखती है"



  3. #3
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    उसके मुस्कराने के अंदाज से लगता था मानो वह अब भी अंदर आने की आज्ञा चाहती हो । उसकी आयु बीस और बाईस के बीच थी । जिस्म पर एक मिनी स्कर्ट जिसमें से उसकी गोरी और गोल जंघाए स्पष्ट दिखाई दे रही थीं ।

    मैनेजर ने स्वय को संभाला और बोला "आइए.. आइए !"

    कमर को लचकाती हुई वह कमरे में प्रविष्ट हो गई ।

    मैनेजर ने अपनी नाक पर रखे चश्मे को निश्चित स्थान पर जमाते हुए कहा "वैठिए ।"

    वह इठलाती-सी बैठ गई ।।

    '"कहिए, आपकी क्या सेवा कर सकता हूं ?"

    प्रत्युत्तर मे उस युवती ने कुछ नहीं कहा बल्कि चुपचाप, किन्तु लापरवाही का प्रदर्शन करते हुए उसने एक सिगरेट निकाली और अधरों के बीच फंसाकर इस प्रकार मैनेजर से माचिस मांगी । मानो उसने मैनेजर द्वारा पूछे गए प्रश्न को सुना ही न हो ।

    मैनेजर ने भी चुपचाप लाइटर उसकी और बढा दिया ।

    माचिस के स्थान पर लाइटर देखकर युवती के अधरों पर एक विचित्र सी मुस्कान ने जन्म लिया, किन्तु उसने चुपचाप सिगरेट सुलगाकर लाइटर उसकी ओर बढाया । लाइटर हाथ मे लेते ही मैनेजर चौक पडा । उसके भीतर हल्का सा भय उजागर हुआ ।

    लाइटर के चारों ओर एक लाल सुर्ख कागज लिपटा हुआ था । मैनेजर ने कागज को देखकर प्रश्नवाचक निगाहों से युवती को देखा, किंतु देखते ही उसके मस्तिष्क मे खतरे की घंटियां घनघनाने लगी । वह आश्चर्य के सागर मे गोते लगाने लगा ।

    उसने गौर से सामने बैठी युवती को देखा। आश्वर्य से उसकी आखें फैल गई । उसका चेहरा पीला पड़ गया था।

    उसकै सामने कुर्सी पर बैठी युवती के जिस्म के पोर-पोर से धुआं निकल रहा था ।

    नीले और सुनहरे रग का एक विचित्र-सा संयुक्त धुआं ! कुछ इस तरह की धीमी आवाज कमरे मे गूजने लगी मानो अनेक मक्खियां संयुक्त रूप से भिनभिना रही हो ।

    भिनभिनाहट कुछ तेज होती जा रही थी और साथ ही जिस्म से निकलने वाला धुआं भी तेज होता जा रहा था ।

    मैनेजर के आश्चर्य की कोई सीमा नही थी । वह अवाक्-सा, जीती-जागती युवती को धुएं मे परिवर्तित होते देख रहा था ।

    उसके लिए क्या, वल्कि सारे साधारण मानवों के लिए यह विश्व का महानतम आश्चर्य था ।
    Last edited by asr335704; 30-06-2020 at 02:23 PM.

    "हर छोटी से छोटी चीज प्रकृति में मायने रखती है"



  4. #4
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    मैनेजर के देखते-ही-देखते वह लड़की धुएं मेँ परिवर्तित हो गई | अब उसके सामने वाली कुर्सी पर उस युवती के स्थान पर धुएं की मानव आकृति विराजमान थी ।

    मैनेजर के मुह से एक आवाज तक न निकली| उसके देखते-ही-देखत्ते विचित्र धुएं की मानव आकृति कुर्सी से उठी और वायु की भांति तैरती-सी दरवाजे की और बढी ।

    एकाएक मैनेजर को जैसे होश आया । वह भी तुरंत अपनी कुर्सी से उछल पडा और भयभीत होकर भयानक तरीके से चीखा "भूत भूत भूत.. बचाओ !” वह चीखता हुआ वायु में तैरते धुएं की ओर लपका ।

    तब तक धुआ कमरे से बाहर जा चुका था | मैनेजर की चीख-पुकार सुनकर सारे बैंक में हंगामा-सा मच गया ।

    बन्दूकधारी मैनेजर के कमरे की ओर लपके ।

    कैशियर के कान खडे हो गए ।

    तभी चीखता हुआ मैनेजर अपने कमरे से बाहर आ गया |

    उसकी स्थिति पागलों जैसी हो गई थी | वह वायु में तैरते उस धुए को देख कर चीखा "ये वही लड़की हैं जो अभी मेरे कमरे में आई था। गोली चलाओ |"

    बन्दूकधारी ही नहीं, बल्कि सभी आश्चर्यचकित रह गए क्योंकि किसी ने भी किसी युवती को मैनेजर के कमरे में प्रविष्ट होते नहीँ देखा था और दूसरी बात ये कि मैनेजर धुएं मे लड़की की संज्ञा दे रहा था । एक बार को तो सबके मस्तिष्क में आया कि कही ये मैनेजर पागल तो नही हो गया है ?

    किंतु ये विचार अधिक समय तक उनके मस्तिष्क मे न रह सका, क्योंकि उस धुएं का रंग और वायु में तैरने का ढंग कुछ विचित्र-सा था ।

    उपस्थित तमाम लोग आश्चर्य के साथ उस धुएं को देख रहे थे ।

    तभी मैनेजर चीखा "गोली चलाओ |”

    बन्दूकधारी मानो अभी तक अचेत थे। उनकी चेतना वापस आई, उन्होने बंदूक सीधी की "धाय धाय"

    समस्त वातावरण गोलियों की आवाज से थर्रा उठा ।

    किंतु परिणाम देखकर समी लोगो की आँखे हैरत से फैल गई । चेहरे बर्फ की भाति सफेद पड़ गए ।

    धुएं पर गोलियों का कोई प्रभाव न हुआ था । गोलिया धुएं के बीच से बिना रुकावट के पार हो गई ।

    किसी ने छत पर लगी रांड़ तोडी तो कोई दीवार से लगकर शहीद हो गई । सारे बैंक मे हंगामा खड़ा हो गया ।
    Last edited by asr335704; 30-06-2020 at 02:31 PM.

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  5. #5
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    फायरों की आवाज ने सड़क पर जाते लोगों के पैरों में बेडिया डाल दी । सभी लोग बदहवास-से हो गए ।

    मैनेजर तो पागलों की भांति चीख रहा था ।

    आश्चर्य और भय ही व्याप्त रहा और अजीब रंगका वह अजीब धुंआ बैक के सदर द्धार से यू ही वायु में तैरता हुआ बाहर आ गया I

    हजारों लोगों ने हैरत के साथ उस धुंए को देखा ।

    कुछ शरारती युवको ने अपनी बुद्धि का उपयोग करते हुए उस धुंए पर कुछ पत्थर फेंके किन्तु परिणाम वही ढाक के तीन पात | लोगों के देखते-ही देखते धुंआ वायुमंडल में ऊचा उठता चला गया और कुछ ही क्षणों मे वह लोगों की आखों से ओझल हो गया |

    अब धुंआ नज़र नहीं आ रहा था ।

    उपस्थित व्यक्तियों के चेहरे पर हैरत के भाव थे । सब लोगों ने आश्वर्यपूर्ण निगाहों से एक।दूसरे को देखा। मानो एक-दूसरे से पूछ रहे हो कि क्या तुम धुंए का मतलब समझते हो ? किंतु प्रत्येक चेहरा सिर्फ पूछ रहा था, उत्तर देना किसी के बस का रोग नही था ।।

    मैनेजर तो मानो पागल हो गया था । पागलों की भाति दौड़ता हुआ वह अपने कमरे मे पहुचा| तुरंत पुलिस स्टेशन से सबध स्थापित करके हड़बडाते हुए दूटे-फूटे शब्दों मे समस्त धटना संक्षेप मे बताई!

    दुसरी ओर सुनने वाले रघुनाथ को लगा कि या तो यह मैनेजर पागल हो गया अथवा कोई भयानकतम अपराधी सामने आ रहा है ।

    खैर मैनेजर को कुछ-सांत्वना दी और घटनास्थल पर पहुंचने के लिए कहकर सम्बन्ध विच्छेद कर दिया ।

    मैनेजर को दुसरी ओर से फोन रखने की ध्वनि ऐसी लगी मानो कही आसपास बम गिरा हो ।

    तभी उसके कानों में बाहर से तेज शोर की ध्वनि पडी । वह भी फुर्ती के साथ कमरे से बाहर निकालकर सदर दरवाजे की ओर लपका ।

    बाहर लोगों की भीड़ बैंक के अदर प्रविष्ट होना चाहती थी, लेकिन बैंक के बंदूकधारी उन्हें रोकने का प्रयास कर रहे थे । इस विरोध मे लोगों की भीड़ एक तेज शोर की उत्पत्ति कर रही थी । मैनेजर का समस्त जिस्म पसीने से लथपथ हौ गया । एक तो वैसे ही युवती के धुंए मे परिवर्तित होने वाली घटना से बदहवास था। ऊपर से लोगों की इस बेवकूफी ने उसकी बदहवासी को यौवन पर पहुचा दिया ।

    लोगों का शोर क्षण-प्रतिक्षण तीव्र रुप धारण करता जा रहा था ।
    Last edited by asr335704; 30-06-2020 at 02:36 PM.

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  6. #6
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    घटना के केवल 5 मिनट पश्चात रघुनाथ सज-धज़ कर घटनास्थल पर पहुच गया और उफनती भीड़ पर काबू पाया ।

    जब रघुनाथ मैनेजर के पास पहुचा, उस समय उसकी स्थिति पागलों जैसी हो रही थी । रघुनाथ को इस बात में कोई संदेह नही रह गया था कि वास्तव मे यहां वह अनहोनी घटना घटी है ।

    मैनेजर उसे अपने कमरे में ले गया । रघुनाथ सामने उसी कुर्सी पर बैठता हुआ बोला, जिस पर वह युवती आकर बैठी थी जो बाद में एक आश्चर्य बन गई ।

    "अब आप मुझे सारी घटना विस्तारपूर्वक बताइए ।”

    मैनेजर अब तक स्वयं पर संयम पा चुका था । जेब से रूमाल निकालकर उसने पसीना पोछा और फिर रघुनाथ के प्रश्न के उत्तर में लहजे को संतुलित करने का प्रयास करते हुए बोला "मैं बैठा हुआ था कि अचानक वह युवती आई ।"

    तत्पश्चात मैनेजर ने सपूर्ण घटना विवरण सहित रघुनाथ को सुना दी ।

    जिसे सुनकर स्वयं रघुनाथ को ऐसा लगा जैसे उसकी खोपडी हवा मे चक्कर लगा रही हो ।

    साऱी घटना आश्चर्य से परिपूर्ण थी ।

    समस्त घटना सुनाने के बाद मैनेजर स्वयं ही आश्चर्य के साथ बोला "लेकिन एक अन्य बात ने मुझे हैरत में डाल दिया I"

    “क्या ?” रघुनाथ उसकी ओर देखकर बोला I

    "यही कि बैंक के बन्दूकधारी ही नहीं, समस्त कर्मचारिर्यो के बयान ये हैं कि उन्होंने किसी लड़की को मेरे कमरे मे प्रविष्ट होते हुए नही देखा।"

    “क्या तुम उस लड़की का हुलिया बता सकते हो ?"

    उत्तर में मैनेजर ने हुलिया बताना शुरू किया तो जनाब हुलिए के स्थान पर उसके सौंदर्य का गुणगान अधिक करने लगे ।

    जब रघुनाथ ने अनुभव किया कि अगर उसने न टोका तो मेनेजर महोदय उस लड़की की इतनी प्रशंसा करेगे कि अगर इस समय वह कहीं भी होगी तो वही बैठी बैठी पानी हो जाए ।

    अत: रघुनाथ ने बुरा सा मुह बनाया और मैनेजर से बोलती पर ढक्कन लगाने के लिए कहा।

    मेनेजर की चोंच एकदम बद हो गई I

    रघुनाथ ने मैनेजर से अगला प्रश्न किया "वह लाइटर कहाँ है जिस पर उस लड़की ने लाल कागज लपेटकर तुम्हें वापस किया था ?"
    Last edited by asr335704; 30-06-2020 at 02:40 PM.

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  7. #7
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    "जी .!” मैनेजर एकदम चौंका! उसे तो वो बिल्कुल ही भूल गया| "घबराहट में वह कहीं गिर गया, यही कहीं होगा |” मैनेजर कुर्सी से एकदम उठता हुआ बोला ।

    रघुनाथ ने भी मेज के नीचे झाँका, देखा ।

    तभी उसकी दृष्टि सिगरेट पर पड़ गई जो लगभग पूरी थी और अब बुझ चुकी थी ।

    रघुनाथ ने उसे सावधानी के साथ रूमाल से उठाया और ध्यान से देखा तो पाया कि सिगरेट के फिल्टर वाले भाग पर लिपस्टिक के चिह्न थे ।

    "ये सिगरेट यहा किसने पी ?” रघुनाथ ने पूछा ।

    "ये उसी लड़की ने पी थी ।” मैनेजर के चेहरे पर सिगरेट को देखते ही फिर पसीने को बूंदे उभर आई ।

    रघुनाथ ने चुपचाप सिगरेट जेब में रख ली फिर लाइटर की खोज जारी हो गई ।

    अधिक कठिनाई उठाए बिना ही दरवाजे के पास पड़ा लाइटर मिल गया । लाल कागज अभी तक उसके चारों और लिपटा हुआ था I

    रघुनाथ ने वह कागज उठाया और पढा ।

    पढते पढते ही रघुनाथ की आखों मे गहन आश्चर्य उभर आया । ऐसा लगता था वह अत्यंत परेशान हो गया हो । वह। उस पत्र को देखता ही रह गया । सबसे अधिक आश्चर्य उसे पत्र में लिखे नीचे वाले शब्द पर हो रहा था । यह पत्र भेजने वाले का नाम था जो आश्चर्य से परिपूर्ण था I वह उन्ही शब्दों को घूरे जा रहा था और कोई अर्थ निकालने की चेष्टा कर रहा था किन्तु वह कुछ समझ नहीं पा रहा था ।

    पत्र मैनेजर ने भी पढ लिया था और उसकी स्थिति तो उस बालक जैसी थी, जिसे किसी हाथी ने सूंड से लपेट लिया हो ।।

    उसे लगा जैसे यह सब यथार्थ नहीं, बल्कि वह कोई भयानक स्वप्न देख रहा है । उसकी निगाह भी पत्र के अंतिम शब्दों पर ही स्थिर होकर रह गई थी ।

    मस्तिष्क में बार-बार वही शब्द टकरा रहे थे, किन्तु उनका अर्थ मीलों दूर था । वास्तव मे शब्द आश्वर्यपूर्ण थे।

    रघुनाथ ने पत्र से दृष्टि हटाकर तुरंत घडी पर निगाह मारी और फोन उठा लिया| तुरंत शहर के इस्पेक्टर जनरल ठाकुर साहब से सम्बन्ध स्थापित करके उसने उन्हें सारी स्थिति से अवगत कराया और अंत में सारा पत्र पढकर सुनाया तो वे भी आश्चर्यचकित रह गए ।

    और उन्होंने तुरन्त रघुनाथ को चेतावनी दी कि वह स्वयं वहीं रहे ।
    Last edited by asr335704; 30-06-2020 at 02:46 PM.

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  8. #8
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    उसके बाद.. !

    राजनगर के सरकारी महकमों की घंटियां घनघनाने लगी ।

    जो सुनता,आश्वर्य के सागर में गोते लगाने लगता | समस्त समाचार प्लेग की भाति ही राजनगर के कोने कोने में व्याप्त हो गया।

    चारो तरफ भय और आंतक छा गया । जो पहली बार सुनता, सबसे पहले वह घडी देखता और फिर रिजर्व बैंक की और का रुख करता I

    शायद ही कोई व्यक्ति ऐसा रहा हो जिसने ये समाचार इस एक घंटे के अतर्गत सुन न लिया हो और ऐसा व्यक्ति भी शायद ही कोई हो जिसने सुनते ही दातों तले उंगली न दबा ली हो ।

    समस्त राजनगर बुरी तरह आंतकिंत हो गया ।

    भय और आतक का साम्राज्य फैल गया । एक विचित्र-सा आतक छा गया चारों और ।

    राजनगर के समस्त बाजार बद होने लगे थे । लोग वास्तव मे अत्यंत भयभीत हो चुके थे । सबकी निगाहे घडियों पर जमी हुई थी ।

    फोन की घंटियां रंग लाई । देखते-ही देखते सेना के ट्रक राजनगर की सड़कों को रौंदने लगे । सैनिक-ही-सैनिक सारे राजनगर पर छा गए । रिजर्व बैंक के चारों ओर सेनिक कुछ इस प्रकार छित्तरे हुए थे, मानो शहर के चारों और मधुमक्खियाँ| बैंक के अंदर-बाहर चारो ओर सैनिक-ही-सैनिक |

    ऐसा प्रतीत होता था मानो किसी भयानक युद्ध की तैयारी चल रही हो । ऐसा लगता था जैसे घडी की सुइयां इस समय निरतर और तीव्र वेग से आगे बढ रही हों । पिछले कुछ ही क्षणों में भयानक कहानी ने जन्म लिया था और आने वाले कुछ ही क्षण मानो मौत का पैगाम देना चाहते थे, भयानक खतरों के प्रतीक थे । आने वाले कुछ क्षण मानो भयानकता की चरम सीमा को स्पर्श कर जाएगे । भयानक चैलेंज, किंतु चैलेंज का परिणाम ?

    एक प्रश्नचिह्न बनकर सभी के मस्तिष्क पर मानो चिपक गया था |

    “सर, यह है वह लाल कागज जो उस लड़की ने बैक मैनेजर को लाइटर के ऊपर लपेटकर दिया था ।” सीक्रेट सर्विस के चीफ ब्लैक ब्वाय ने वही लाल कागज विजय की ओर बढाते हुए कहा ।

    "वो तो ठीक है प्यारे काले लड़के लेकिन सवाल ये है कि क्या मामला वास्तव में इतना गंभीर हैं कि विजय दी ग्रेट यानी हमारी आवश्यकता आ पडी ?” विजय लाल कागज हाथ में लेता हुआ बोला ।

    "आप तो सब कुछ जानते ही हैं ।” ब्लैक ब्वाय आगे बोला ”अभी केवल एक घंटे पूर्व से ही राजनगर में किस प्रकार आंतक छा गया है ? सर वास्तव मे यह घटना अपने ढंग की एकदम नई और अनोखी घटना है । इस पत्र को पढकर आप भी उस अपराधी के साहस की दाद देगे और सबसे अधिक आश्चर्यजनक तो इस पत्र में लिखे अंतिम शब्द हैं । इस पत्र के प्राप्त होते ही समस्त राजनगर में सैनिक तैनात कर दिए गए है । लोग भयभीत हैं । गृह मन्त्रालय से स्वय गृहमत्री ने स्रीक्रेट सर्विस से सम्बन्ध स्थापित किए और उन्होने स्पष्ट कहा कि सपूर्ण सीक्रेट सर्विस अपराधी के इस साहसी चैलेंज का मुकाबला करे । विशेषतया यह केस मिस्टर विजय को यानी आपको सौंपा जाए ।"
    Last edited by asr335704; 30-06-2020 at 02:51 PM.

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  9. #9
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    बेह्तरीनं

    आपका बहुत बहुत धन्यवाद
    सभी उपस्थित मित्रो से निवेदन है फोरम पे कुछ न कुछ योगदान करे,अपनी रूचि के अनुसार किसी भी सूत्र में अपना योगदान दे सकते है,या फिर आप भी कोई नया सूत्र बना सकते है

  10. #10
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    "देखो प्यारे काले लड़के ।” विजय अकड़कर सीना फुलाता बोला "देखो विजय दो ग्रेट की शोहरत, स्वयं गृहमन्त्री ने हमें इस केस पर लगाया है ।"

    ब्लैक ब्वाय के अधरों पर मुस्कान उभर आई ।

    विजय ने लाल कागज खोलकर पढना प्रारम्भ किया । लिखे हुए शब्द कुछ इस प्रकार थे I


    “प्यारे राजनगर वासियो और पुलिस अधिकारियों।

    हमे कुछ इस तरह के समाचार मिले हैं कि आजकल रिजर्व बैंक आँफ़ इंडिया की मुद्रा की सख्या कई करोङ तक पहुच गई है I अधिकारीगण जरा हमारी बात को गहराई से सोचे | वास्तविकता यह है कि हम लोग हमेशा जनकल्याण के लिए तत्पर रहे हैं । हमारा अभी तक का जीवन जनकल्याण में ही व्यतीत हुआ हैं और उम्मीद करते हैं कि अगर आप लोगों का सहयोग मिला तो जीवनपर्यत हम लोग इसी प्रकार परहिताय के लिए प्रयत्नशील रहेगे| अभी तक हम लोग जनकल्याण के छोटे-छोटे कार्य करते रहते थे। किन्तु हमने देखा कि भारत कुछ इतनी परेशानियो में घिरा है कि अगर हमारी यह जनकल्याण की भावना इतनी धीमी रही तो हम कुछ नहीं कर पाएँगे और हमारा जीवन एक तरह से निरर्थक सा ही ही हो जाऐगा । अतः हम लोग खुलकर सामने आ रहे है ।

    हाँ तो मैं उस विषय पर लिख रहा था जो जनकल्याण का कार्य हम अभी कुछ ही समय बाद करने जा रहे हैं । हम एक बार फिर कहते हैं कि हमें समझने का प्रयास करे । बात ये है कि रिजर्व बैंक मे मुद्रा आवश्यकता से अधिक हो गई है ।

    अब जरा आप लोग दिमाग से सोचे कि इतनी बडी रकम चुराने का लालच किस के दिमाग में नहीं आएगा? आजकल भारत में भ्रष्टाचार, धोखा, चोरी, लूट इत्याद्वि जोरों पर है । अब आप सोचिए कि क्या किसी भी वक्त वे लुटेरे रिजर्व बैंक की दस करोड़ की रकम, जो भारतीय प्रजा की है, लूट नही सकते? आपको विश्वास हो या न हो हम लोग तो क्योंकि जनकल्याण के लिए जीते हैं अत: प्रजा की सुरक्षा का ध्यान लगा रहता है । प्रजा के धन को अत्यंत सुरक्षित रखने के लिए हम लोग यह धन ले जाएंगे । ताकि इसे अत्यंत सुरक्षा के साथ रखा जा सके ।

    शायद आप लोग हमारे इस काम की निन्दा करे लेकिन हम फिर भी कहेगे कि हमे समझने का प्रयास किया जाया । अगर यह धन यहां रहा तो हमेशा चोरी होने का भय लगा रहेगा । संभव है कि इस प्रयास मे किसी की ह्नत्या हो जाए ओर हमारे होते हुए यह सब हो जाए तो हम किस बात के जनकल्याणी है ?

    इस बात की संभावना ही समाप्त हो जाए, इसलिए हम ठीक दो बजे आएंगे ।

    हमने अब बहुत कुछ लिख दिया है।

    आशा करते है हमारे कार्यो मे बाधा डालने के स्थान पर हमें सहयोग देंगे।

    अंत मे ये लिखना अपना कर्त्तव्य समझते हैं कि अगर हमारे इस कल्याण कार्य में कोई हमारे विरूध आया तो दोस्तो ये याद रखना कि जो कार्य जनकल्याण के लिए किए जाते हैं, कार्यकर्ता उन सभी रोडों को ठिकाने लगाता हुआ अपनी मंजिल तक पहुचता है जो मार्गो में आते हैं ।

    यू तो हमारे द्वारा सुरक्षित रखने पर भी चोरी होने का भय तो लगा ही रहेगा। स्वयं हमारी जान भी जा सकती है किन्तु हमें अपनी चिंता नहीं नही है, चिंता हैं तो आप लोगों की है| कहीं आप लोगों को किसी तरह का कष्ट न हो । अब हम इस मुसीबत को अपने साथ ले जाने के लिए ठीक दो बजे आ रहे है|

    इस धन की सुरक्षा में अगर हम लोगों की जान भी चली जाए तो हम अपना परहिताय जीवन सफल समझेगे । अच्छा, अब दो बजे मिलेंगे ।

    जनकल्याणकारी आप ही के दोस्त

    आग के बेटे"
    Last edited by asr335704; 30-06-2020 at 02:57 PM.

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