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Thread: चीते का दुश्मन (वेद प्रकाश शर्मा द्वारा रचित)

  1. #101
    कांस्य सदस्य asr335704's Avatar
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    नि:संदेह विजय प्रत्यक्ष में बकवास करता नजर आ रहा था किन्तु वास्तविकता ये थी कि टापू के वे जितना करीब पहुंचते जा रहे थे, विजय उतना ही सतर्क होता जा रहा था ।

    तब जबकि वे टापू के काफी करीब पहुंच गए, उन्होंने देखा टापू एकदम निर्जन-सा लगता था । सागर के किनारे लम्बी-लम्बी झाड़ियां थीं । सारे टापू पर अजीब-अजीब लम्बे वृक्ष थे । वृक्षो के पीछे छुपे टापू का वे अधिक भाग नहीं देख सके थे । सारा टापू एक घना जंगल-सा प्रतीत होता था ।

    विजय की आंखें भली-भांति किनारे का निरीक्षण कर रही थीं । किन्तु अभी तक उसे किसी भी प्रकार के खतरे का आभास नहीं मिला था और देखते-ही-देखते मोटर बोट साहिल पर पहुंच गया था ।

    धनुषटंकार और विजय इंजन बंद करके डेक पर आ गए । लंगर डाला गया और विजय से पहले धनुषटंकार किनारे की लम्बी घास में कूद गया । विजय अभी कूदना ही चाहता था कि एक फुंफकार सुनकर उसके कान खड़े हो गए ।

    विजय ने चौंककर देखा - किनारे पर घास में धनुषटंकार भी उसके सामने अपने दो पैरों पर खड़ा उस नाग से टकराने के लिए तैयार था ।

    नाग के जिस्म का एक तिहाई भाग हवा में लहरा रहा था । इस प्रकार वह धनुषटंकार से ऊंचा ही लग रहा था । बिल्कुल स्याह रंग का ये काला नाग देखने में बेहद खतरनाक लग रहा था । एक ही पल में विजय ने पूरी स्थिति का अध्ययन किया और पलक झपकते ही उसने जेब से रिवॉल्वर निकाल लिया ।

    उसी क्षण वातावरण के सन्नाटे में धनुषटंकार की ची-ची गूंजी । विजय ने देखा, धनुषटंकार की आंखें फ़न उठाए नाग पर जमी हुई थी और दायां हाथ ऊपर उठाकर वह विजय को ऐसा संकेत कर रहा था जैसे कोई बहादुर लड़ाका अपने शिकार पर अपने किसी साथी को हमला करते देखकर रोकता हुआ कहता है "ठहरो, ये मेरा शिकार है ।’

    धनुषटंकार की ये हरकत देखकर विजय के होंठों पर हल्की-सी मुस्कान दौड़ गई ।
    || प्रयास करने से ही सफलता मिलती है ||

  2. #102
    कांस्य सदस्य asr335704's Avatar
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    उसने सोचा, धनुषटंकार में एक-एक आदत विकास की आती जा रही है । विजय बहादुर था । अपने जीवन में वह न जाने कितने खतरनाक इंसानों और जानवरों से टकराया था किंतु फिर भी वह बहादुरी से अधिक दिमाग को महत्व देता था । असमय की बहादुरी दिखाना वह मूर्खता समझता था । उसका सिद्धांत था कि दुश्मन को खत्म करना है, चाहे किसी भी प्रकार हो । अगर दुश्मन सरल ढंग से समाप्त हो सकता है तो व्यर्थ की बहादुरी दिखाना उचित नहीं है और बिल्कुल इसके विपरीत मार धाड़ विकास का सिद्धांत| उसका कहना था कि दुश्मन को बहादुरी से खत्म करो । उसी सिद्धांत पर इस समय धनुषटकार भी चल रहा था । एक बार तो विजय के दिमाग में आया कि धनुषटंकार के संकेत को नजरंदाज करके नाग को गोली से उड़ा दे ।

    किन्तु नही.. अगले ही पल उसने विचार बदल दिया ।

    वह जानता था कि अगर उसने ऐसा कर दिया तो धनुषटंकार पजामे से बाहर आ जाएगा । उसने यही उचित समझा कि वह धनुषटंकार को अपने अरमान निकालने के लिए पूरा अवसर दे I

    रिवॉल्वर उसने ताने रखा ताकि अगर धनुषटंकार पराजित-सा होता लगे तो वह नाग को तुरंत गोली मार दे ।

    वह देख रहा था, धनुषटंकार और नाग आमने-सामने थे । नाग मस्ती के साथ अपना फन हवा में लहरा रहा था । इधर दोनों पैरों पर खड़े हुए धनुषटंकार के हाथ कैरेट की सूरत बनाए तैयार थे । एकाएक नाग ने बड़ी तेजी से धनुषटंकार पर अपने फन का वार किया किंतु धनुषटंकार उससे भी कही अधिक फुर्तीला निकला | वह अपनी बंदरानी हरकत दिखाकर उछला और नाग के पीछे कूदा । नाग का फन घास से टकराया I लेकिन तुरंत ही वह पुन: खड़ा हो गया ।
    अभी नाग धनुषटंकार पर वार करने ही वाला था कि धनुषटंकार ने झपटकर उसका फ़न थाम लिया । नाग ने अपने बाकी जिस्म को धनुषटंकार की बांह से लपेटना चाहा किंतु धनुषटंकार ने उसे इतना अवसर न देकर अपने हाथ में दबा हुआ फन घास के नीचे धरती पर रगड़ दिया । नाग बिलबिला उठा ।

    एक बार धनुषटंकार ने उसके रगड़े हुए फ़न को देखा और फन पर अपने मुंह से ढेर सारा थूक निकालकर थूक दिया । फिर उसका फ़न धरती पर रगड़ दिया । चांदनी रात में विजय को नाग ओर बंदर की यह लड़ाई काफी रोमांचक लग रही थी I कुछ देर बाद धनुषटंकार ने नाग को मारकर रस्सी की भांति एक तरफ फेंक दिया ।
    || प्रयास करने से ही सफलता मिलती है ||

  3. #103
    कांस्य सदस्य asr335704's Avatar
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    "जियो बेटा धनुषटंकार! बेड़ा कर दो आर पार I” विजय ने वहीँ से नारा लगाया और रिवॉल्वर जेब में रखकर किनारे पर आ गया I

    बड़ी शान के साथ धनुषटंकार ने अपनी जेब से सिगार निकाला I

    "नहीं बे, जानवर ।” उसका इरादा भांपते ही विजय बोलाअभी केवल मारा-मारी ही सीखे हो बेटे ।” जासूसी के पैंतरे अभी हमसे सीखने पड़ेगे, ये सिगार किसी को भी हमारी स्थिति का पता बताता रहेगा और हम किसी को देख भी नहीं सकेगे ।"

    धनुषटंकार को अपने स्वामी की बात एकदम उचित लगीं । उसने सिगार वापस रख लिया । धनुषटंकार फुदकता-सा विजय से आगे-आगे चल रहा था I लम्बी घास को पार करके वे वृक्षों की और घुस रहे थे I जैसे ही थनुषटंकार पहले वृक्ष के नीचे पहुंचा, एकदम अप्रत्याशित ढंग से वृक्ष की टहनियां झुकी और उन्होंने धनुषटंकार को अपने बीच में कसकर एकदम ऊपर उठा लिया । धनुषटकार की चीं-चीं से सारा जंगल गूंज उठा I

    विजय पेड़ से अभी थोड़ा पीछे था I उसने यह दृश्य देखा तो एक ही पल में भयानक खतरे को भांप गया I वह समझ गया कि ये वृक्ष मांसाहारी हैं I वह जानता था अगर उसने जल्दी ही कोई उपाय नहीं किया तो ये वृक्ष धनुषटंकार का सारा खून पी ड़ालेगा और अंत में उसकी हड्डियां पेड़ के नीचे पड़ी रह जाएंगी I
    वृक्ष की टहनियों में उलझा हुआ धनुषटंकार बराबर चीख रहा था । विजय ने गजब की फुर्ती का प्रदर्शन करते हुए जेब से कटार निकाली और गोरिल्ले की भांति सीधा उस टहनी पर झपटा जिसमें धनुषटंकार फंसा हुआ था । उसने कटार का वार अपनी पूरी शक्ति से उन टहनियों में से एक की जड़ पर किया । टहनी एकदम कटकर नीचे जा गिरी । इसके साथ ही धनुषटंकार नीचे गिरा I

    "'बंदर मियां, सागर की ओर भागो I” टहनियों से उलझा हुआ विजय चीखा | वृक्ष की टहनियां उसे अपनी गिरफ्त में लेना चाह रही थीं ।

    विजय का कटार वाला हाथ बिजली की गति से भी कहीँ अधिक तेजी के साथ चल रहा था, जो भी टहनी उसे जकड़ने की कोशिश करती, वह कटार से उसी को काट डालता I

    मांसाहारी वृक्ष से विजय का ये अजीबोगरीब युद्ध पांच मिनट तक चला I पांच मिनट पश्चात विजय को एक ऐसा क्षण मिला, जब वह किसी भी टहनी की पकड़ में नहीं था। विजय ने इसी क्षण का लाभ उठाया और एक जम्प के साथ हवा में तैरता हुआ सागर की ओर वृक्ष की रेंज के बाहर धरती पर जाकर गिरा ।
    || प्रयास करने से ही सफलता मिलती है ||

  4. #104
    कांस्य सदस्य asr335704's Avatar
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    वही पर खड़ा हुआ धनुषटंकार वृक्ष से अपने स्वामी का ये अजीब युद्ध देख रहा था । विजय तो मांसाहारी वृक्षों के बारे में पहले से जानता था किन्तु धनुषटंकार के लिए एक अजूबा था I आज से पूर्व उसने कभी ऐसा विचित्र वृक्ष नहीं देखा था I

    विजय उछलकर खड़ा हो चुका था किंतु धनुषटंकार अभी तक आंख फाड़-फाड़कर उस वृक्ष को देख रहा था ।

    "अब वहां कहां देख रहे हो मियां बजरबटटू?” विजय बोलाबच गए वरना तुम्हारी रामलीला ही खत्म थी ।”

    अब विजय को जंगल में घुसने के लिए रास्ते की तलाश थी I यह तो वह जानता था कि यहां सारे पेड़ मांसाहारी नही है । किंतु आगे बढने के लिए यह जानना बहुत आवश्यक था कि कौन-सा वृक्ष मांसाहारी है, कौन-सा नहीं । समस्या थी, यह पता लगाने की I अचानक उसके दिमाग में एक उपाय आया, वह धनुषटंकार से बोलाप्यारे घसीटा, सुन, ज़रा उस नाग को तो दूंढ़कर लाओ जिसे तुमने शहीद किया था I”

    धनुषटंक्रार की समझ में ये तो आया नहीं कि आखिर स्वामी अब उस मरे हुए नाग का करेंगे क्या, परंतु फिर भी आदेश का पालन करता हुआ वह उधर चल दिया जिधर उसने नाग फेंका था । चांदनी रात में उसे नाग को दूंढ़ने में अधिक देर नहीं लगी I रस्सी की भांति लटकाए उसे धनुषटंकार विजय के पास ले आया ।

    "अब घसीटाराम, एक रस्सी का प्रबंध करना होगा ।”

    जबाब में धनुषटंकार ने अपने कोट की जेब से रेशम की डोरी निकालकर विजय को थमा दी । विजय ने मरे हुए नाग को रेशम की डोरी से बांधा और उसे मांसाहारी पेड़ के नीचे फेंक दिया । बड़ी तेजी से वृक्ष की डालियां सर्प की ओर झपटीं किंतु विजय ने उनसे अधिक फुर्ती का प्रदर्शन करके रेशमी की डोरी को झटका देकर सर्प को अपनी ओर खींच लिया। धनुषटंकार कुछ समझा और कुछ नहीं समझा।

    विज़य सर्प को लेकर एक दूसरे वृक्ष की ओर बढा, इसी प्रकार सर्प को वृक्ष के नीचे फेंका, वृक्ष की ड़ाले उसी प्रकार सर्प पर झपटीं, विजय ने पुन: उसे खींच लिया । इस प्रकार अब विजय के लिए यह पता लगाना सरल हो गया कि कौन-सा वृक्ष मांसाहारी है और कौन-सा नहीं । जब उसने पांचवे वृक्ष के नीचे सांप डाला तो वृक्ष में किसी प्रकार की कोई हरकत नहीं हुई| विजय उसी पेड़ के नीचे से आगे बढा । धनुषटंकार उसके पीछे-पीछे था । इस समय धनुषटंकार वृक्षों से भयभीत-सा नजर आ रहा था ।
    || प्रयास करने से ही सफलता मिलती है ||

  5. #105
    कांस्य सदस्य asr335704's Avatar
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    अभी वे इस वृक्ष की सरहद को पार भी नही कर पाए थे कि अचानक वे दोनों बुरी तरह चौंक पड़े| परंतु इससे पूर्व कि कोई भी कुछ कर सके, उन्होंने खुद को एक मजबूत जाल में फंसा पाया । हुआ ये था कि चमत्कारिक ढंग से उनके ऊपर एक लाल सुर्ख जाल आकर गिरा और वे उसमें फंसते चले गए ।

    "आदरणीय झकझकिए महोदय, सत-सत प्रणाम ।” जंगल में ही टुम्बकटू की आवाज गूंजी ।

    विजय और धनुषटंकार ने देखा, उनके सामने खड़ा टुम्बकटू लहरा रहा था । उसके जिस्म पर अनेकों घाव थे किंतु होंठो पर वही मुस्कान थी जो हमेशा रहती थी । एक क्षण के लिए तो विजय चौंककर रह गया, फिर बोलाअबे कार्टून मियां, तुम यहां?"

    "क्यों मियां, हम यहां नहीं हो सकते?"

    "हो क्यों नहीं सकते हो यार, बिल्कुल हो सकते हो।” विजय बोला मगर मियां, हमसे इश्क लड़ाने का यह कौन-सा ढंग है?"

    "इश्क लड़ाने का भी अपना-अपना तरीका होता है, प्यारे झकझकिए ।” टुम्बकटू ने कहा "इश्क की बाते करने के लिए ये उचित स्थान नहीं है, आराम से बैठकर बाते करेंगे!कहते ही टुम्बकटू ने आवाज लगाई "झबरू ।”

    इसके बाद ।

    विजय ने जो कुछ देखा उसे कमाल की ही संज्ञा दी जा सकती थी ।

    उसने देखा उनके ऊपर वाले पेड़ से एक शेर उड़ता हुआ नीचे आया । विजय को लगा ये सब उसकी आंख का भ्रम है । उसने पूरे ध्यान से देखा किंतु जो वह देख रहा था वह सत्य था ।
    वास्तव में पेड़ के ऊपर से उड़ता हुआ जंगल की धरती पर एक शेर ही आया था । एकदम काला, भयानक और मोटा-ताजा लम्बा वह शेर ही था किंतु उसके बड़े-बड़े पंख भी थे | इन्हीं के सहारे उड़ता हुआ धरती पर आते ही वह गर्दन झुकाकर टुम्बकटू के सामने इस प्रकार खड़ा हो गया मानो उसका गुलाम हो ।

    "कार्टून भाई ।” विजय शेर की तरफ घूरता हुआ बोलाये क्या चमत्कार है?”
    || प्रयास करने से ही सफलता मिलती है ||

  6. #106
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    "चमत्कार केवल तुम्हारे लिए है, मेरे लिए नहीं, ।” टुम्बकटू ने कहा "तुम शायद इसे शेर समझ रहे हो किंतु असलियत ये है कि ये शेर नही है, चंद्रमा का एक जानवर है I ये ठीक है कि इसका ढांचा यहां के शेर से मिलता है ! अंतर केवल इतना है कि शेर के पंख नहीं होते और इसके पंख हैं । जैसे धरती पर ऐसे हुलिए के जानवर को शेर कहा जाता है, उसी तरह चंद्रमा पर इसे झबरू कहा जाता है । शेर की भांति ही इसके अंदर भी हमारी बात समझने का दिमाग नही है परंतु क्योंकि ये मेरा पालतू झबरू है इसलिए मेरी विशेष भाषा समझता है और उसका पालन करता है ।"

    “इसका मतलब आग के ऊपर यही महाराज उड़ रहे थे?” विजय ने कहा ।

    "केवल यही नहीं महोदय ! सुनिए, रोबिन और ब्लाउंड इत्यादि भी थे ।” टुम्बकटू ने बताया "अब तुम ये पूछोगे कि ये मैं क्या ऊटपटांग नाम ले रहा हूं। इसका जवाब ये है कि ये चंद्रमा के अन्य जानवरों के नाम हैं जिनका ढांचा यहाँ के कुत्ते, बिल्ली इत्यादि जानवरों से मिलता है । उनमें भी केवल इतना ही अंतर है कि इनके पंख हैं और यहां के जानवरों के पंख नहीं होते अत: ये उड़ सकते हैं और वे उड़ नहीं पाते I”

    “लेकिन मियां खां ! हमने तो ये देखा था कि वे सब आग कें ऊपर उड़ रहे थे और खुद भी जल रहे थे ।"

    “तुम फिर गलत समझे मि. झकझकिए | वह आग नहीं जान्द थी ।"

    "जान्द ।” विजय ने दोहराया "ये साली क्या वस्तु होती है, मियां?"

    "अब ये तो मैं तुम्हें क्या बताऊं कि क्या वस्तु होती है I” टुम्बकटू बोलाएक बात पहले तुम बताओ ।”

    "पूछो? "

    "तुम मुझे ये बता दो कि आग क्या वस्तु होती है?” टुम्बकटू ने बड़ा गहरा प्रश्न किया ।

    टुम्बकटू के इस प्रश्न पर थोड़ा उलझते हुए विजय ने ज़वाब दियामियां ये सवाल तो ऐसा है कि दिमाग चकरघिन्नी बनकर रह जाता है । दुनिया में हजारों वस्तु है जैसे कपड़ा रोटी, पानी, किताब ! लेकिन कोई ये पूछे कि किताब क्या वस्तु है तो इसका जवाब तो यही हो सकता है कि किताब एक ऐसी वस्तु है जो पढने के काम आती है | पानी ऐसी वस्तु है जो प्यास बुझाता है इत्यादि | इस प्रकार वस्तुओं के नाम लेते ही उसके गुणों का बोध होता है । आग शब्द कहते ही हर व्यक्ति समझ जाता है कि यह एक ऐसी वस्तु है जो किसी को भी जलाने की क्षमता रखती है ।"
    || प्रयास करने से ही सफलता मिलती है ||

  7. #107
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    “लेकिन आग का नाम रोटी क्यों नही रखा गया?” टुम्बकटू ने विचित्र-सा प्रश्न किया ।

    "लगता हैं कार्टून प्यारे कि तुम्हारे दिमाग का बैलेंस गड़बड़ा गया है ।” विजय बोलामियां ! रोटी और आग का क्या मेल ? रोटी पेट की आग बुझाती है और आग चाहे जहां आग लगा देती है I”

    "ये तुम केवल इसलिए कह रहे हो क्योंकि धरती पर पैदा होने के बाद तुम्हें रोटी और आग के गुण बताए गए हैं।” टुम्बकटू ने कहाजरा ये सोचो कि अगर धरती के हर मानव को पैदा होते ही ये शिक्षा दी जाती कि जो वस्तु खाने के काम आती है उसका नाम आग है और जो कही भी आग लगा देती है उसे रोटी कहते हैं । यानी अगर रोटी का नाम आग होता और आग का रोटी तो क्या अंतर पड़ता ?"

    "तुम्हारी ये ऊटपटांग बाते अपने भेजे में नहीं घुस रही हैं, मियां ।"

    "मैं तुम्हें ये बताना चाहता हूं कि किसी भी वस्तु का नाम बदलने से उसके गुण नहीं बदलते। नाम तो केवल अपनी सहूलियत के लिए रख दिए जाते हैं । जैसे जब मैं पहली बार आप लोगों के सामने आया तो मैंने अपना नाम टुम्बकटू बताया | अब अगर तुम किसी से मेरा नाम लेते हो तो मेरा ढांचा उसकी आंखों के सामने तैर जाता है । अगर मैं तुम्हें अपना कोई दूसरा नाम बताता तो भी मैं ही रहता, गुण तो नहीं बदल सकते ।"

    “मियां, ये बात तो शेक्सपियर महोदय ही कह गए ।” विजय बोला "लेकिन हमारी बुद्धिमानी में ये बात नहीं आईं कि तुम ये फिलॉसोफी क्यों झाड़ने लगे । मैंने तो तुमसे उस वस्तु के बारे में पूछा था जिसे हम आग कहते हैं और तुम जान्द I”

    "मैं तुम्हें उसी बात का जवाब दे रहा हूं । तुमने पूछा था कि जान्द क्या वस्तु होती है? इसका जवाब देने के लिए ही मैंने तुमसे पूछा था कि आग क्या वस्तु है? इसका जवाब तुमने ये दिया कि आग एक ऐसी वस्तु है जो किसी वस्तु को जलाने की क्षमता रखती है । यानी किसी वस्तु का नाम लेने से उसके गुणों का बोध होता है । मैं तुम्हें यही समझाना चाहता था कि अगर तुम चंद्रमा की भाषा जानते होते, जान्द कहते ही तुम समझ जाते कि यह क्या वस्तु होती है?”

    "तो भाई साहब, इस साली जान्द के गुण ही बता दो |”
    || प्रयास करने से ही सफलता मिलती है ||

  8. #108
    सदस्य anita's Avatar
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    अरे आज दिन में कोई अपडेट ही नहीं आया
    सभी उपस्थित मित्रो से निवेदन है फोरम पे कुछ न कुछ योगदान करे,अपनी रूचि के अनुसार किसी भी सूत्र में अपना योगदान दे सकते है,या फिर आप भी कोई नया सूत्र बना सकते है

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