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Thread: क्या अतिज्ञानी चाणक्य आरम्भ में महामूर्ख था?

  1. #11
    कांस्य सदस्य superidiotonline's Avatar
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    वैसे भी इतिहास गवाह है कि जब सुग्रीव कमज़ोर पड़ा तो उसने बलशाली बालि को हराने के लिए श्रीराम जैसे महाबलशाली का सहारा लिया। बलशाली रावण से अपमानित होने के बाद कमज़ोर विभीषण ने भी श्रीराम का सहारा लिया। इसीलिए तिरुक्कुरल में कमज़ोर व्यक्ति के ऊपर क्रोध करने को अत्यधिक अनिष्टकारी बताया गया है। इसके पीछे एक सशक्त कारण है- बलशाली अपने से कमज़ोर व्यक्ति के ऊपर जब क्रोध करता है तो उसे दो प्रकार से प्रताड़ित कर सकता है- पहला मानसिक और दूसरा शारीरिक। अपने से कमज़ोर व्यक्ति को प्रताड़ित करने वाले को ही अत्याचारी कहा जाता है। वैसे तो झूठ बोलना हर धर्म में वर्जित है, किन्तु कुछ परिस्थितियों में अत्याचारी के सामने झूठ बोलने की अनुमति क़ुरान में भी दी गई है। अत्याचारी की सम्भावित प्रताड़ना से भयभीत होने के कारण ही कमज़ोर व्यक्ति अपने से बलशाली के ऊपर प्रत्यक्षतः क्रोध तो नहीं करता, किन्तु उसके अन्दर क्रोध की भयानक आग़ दावानल की तरह दहकती रहती है तथा मौका मिलते ही वह शक्तिशाली के ऊपर इतने ताबड़तोड़ हमले करता है कि बलशाली को सँभलने तक का मौका नहीं मिलता और वह चारों खाने चित हो जाता है। कमज़ोर का हमला हमेशा बहुत बड़ा और भयानक होता है, क्योंकि वह हार जाने के डर से बहुत बड़ी जबरदस्त तैयारी करके ही प्रतिशोध के मैदान में कूदता है। ज़रूरत पड़ने पर कमज़ोर अपने साथ किसी अति बलशाली को भी जोड़ लेता है।

  2. #12
    कांस्य सदस्य superidiotonline's Avatar
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    कुछ लोग यह तर्क दे सकते हैं कि आचार्य चाणक्य की ललकार सुनकर सम्राट धनानंद अत्यन्त स्तब्ध रह गया था जिसके कारण उसने चाणक्य को सुरक्षित जाने दिया। तो बता दें कि ये सब 'फ़िल्मी टोटके' हैं। फ़िल्मों में ही इस तरह के दृश्यों को दिखाया जाता है और दर्शक इसे खूब पसन्द भी करते हैं। अक्सर देखा होगा आपने फ़िल्मों में जब हीरो एक बाहुबली विलेन के घर जाकर उसे ललकार कर सुरक्षित वापस आ जाता है और बाहुबली स्तब्ध होकर देखता रह जाता है। इस तरह के 'फ़िल्मी टोटकों' का वास्तविक जीवन से कोई लेना-देना नहीं होता, क्योंकि वास्तविक जीवन में इस प्रकार किसी बाहुबली को ललकारने पर तत्काल लात-जूतों, लाठी-बल्लम से पूजा होगी और फिर मोक्ष-मार्ग दिखा दिया जाएगा! अतः इस तरह के 'फ़िल्मी टोटकों' को वास्तविक जीवन में नकल करने की कोशिश कदापि न करें, अन्यथा बुरी तरह पिटकर ही बाहर आएँगे।

  3. #13
    कांस्य सदस्य superidiotonline's Avatar
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    पाठकगण अब इस बात को भली-भाँति समझ गए होंगे कि 'अतिज्ञानी' कहलाने वाला चाणक्य आरम्भ में या तो महामूर्ख था या फिर उसने क्रोध के वशीभूत होकर महामूर्खों वाली हरकत की थी। हमारे विचार में अतिज्ञानी चाणक्य आरम्भ में महामूर्ख ही था, क्योंकि अतिज्ञानी कभी क्रोध नहीं करता और विकट परिस्थितियों में भी सदैव उन्हीं नीतियों का अनुसरण करता है जिससे उसे कोई हानि न हो और विजय प्राप्त होना सुनिश्चित हो। फ़िल्मों में भी आपने देखा होगा- उपसंहार (Denouement) के संवाद (Dialogues) फ़िल्मों के अन्त में ही बोले जाते हैं, उससे पहले नहीं। इसीलिए फ़िल्मों का उत्कर्ष (Climax) हमेशा चमत्कारपूर्ण प्रभाव उत्पन्न करता है। यही कारण है- फ़िल्मों में उत्कर्ष (Climax) पर विशेष ध्यान दिया जाता है। वास्तविक जीवन में भी यदि आप उपसंहार (Denouement) के संवाद (Dialogues) उत्कर्ष (Climax) से पूर्व ही बोल देंगे तो हमेशा गच्चा ही खाएँगे। अतः वास्तविक जीवन में भी उत्कर्ष (Climax) के इन फ़िल्मी नियमों का अक्षरशः (Literally) पालन किया जाना चाहिए। संक्षेप में- वास्तविक जीवन में 'फ़िल्मी टोटकों' से दूर रहें और 'फ़िल्मी नियमों' का अनुसरण करें।

  4. #14
    कांस्य सदस्य superidiotonline's Avatar
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    वैसे आचार्य चाणक्य के आरम्भकाल में उनके मूर्ख होने के प्रमाण में एक कहानी बहुत प्रचलित है जो कि निम्नवत् है-

    एक समय की बात है। चाणक्य अपमान भुला नहीं पा रहे थे। शिखा की खुली गांठ हर पल एहसास कराती कि धनानंद के राज्य को शीघ्रातिशीघ्र नष्ट करना है। चंद्रगुप्त के रूप में एक ऐसा होनहार शिष्य उन्हें मिला था जिसको उन्होंने बचपन से ही मनोयोगपूर्वक तैयार किया था।
    अगर चाणक्य प्रकांड विद्वान थे तो चंद्रगुप्त भी असाधारण और अद्भुत शिष्य था। चाणक्य बदले की आग से इतना भर चुके थे कि उनका विवेक भी कई बार ठीक से काम नहीं करता था।

    चंद्रगुप्त ने लगभग पांच हजार घोड़ों की छोटी-सी सेनाबना ली थी। सेना लेकर उन्होंने एक दिन भोर के समय ही मगध की राजधानी पाटलिपुत्र पर आक्रमण कर दिया। चाणक्य धनानंद की सेना और किलेबंदी का ठीक आकलन नहीं कर पाए और दोपहर से पहले ही धनानंद की सेना ने चंद्रगुप्त और उसके सहयोगियों को बुरी तरह मारा और खदेड़ दिया।

    चंद्रगुप्त बड़ी मुश्किल से जान बचाने में सफल हुए। चाणक्य भी एक घर में आकर छुप गए। वह रसोई के साथ ही कुछ मन अनाज रखने के लिए बने मिट्टी के निर्माण के पीछे छुपकर खड़े थे। पास ही चौके में एक दादी अपने पोते को खाना खिला रही थी।

    दादी ने उस रोज खिचड़ी बनाई थी। खिचड़ी गरमा-गरम थी। दादी ने खिचड़ी के बीच में छेद करके गरमा-गरम घी भी डाल दिया था और घड़े से पानी भरने गई थी। थोड़ी ही देर के बाद बच्चा जोर से चिल्ला रहा था और कह रहा था- जल गया, जल गया।

    दादी ने आकर देखा तो पाया कि बच्चे ने गरमा-गरम खिचड़ी के बीच में अंगुलियां डाल दी थीं।

    दादी बोली- ‘तू चाणक्य की तरह मूर्ख है। अरे गरम खिचड़ी का स्वाद लेना हो तो उसे पहले कोनों से खाया जाता है और तूने मूर्खों की तरह बीच में ही हाथ डाल दिया और अब रो रहा है!’

    चाणक्य बाहर निकल आए और बुढ़िया के पांव छूए और बोले- आप सही कहती हैं कि मैं मूर्ख ही था। तभी राज्य की राजधानी पर आक्रमण कर दिया और आज हम सबको जान के लाले पड़े हुए हैं।

    चाणक्य ने उसके बाद मगध को चारों तरफ से धीरे-धीरे कमजोर करना शुरू किया और एक दिन चंद्रगुप्त मौर्य को मगध का शासक बनाने में सफल हुए।

  5. #15
    कांस्य सदस्य superidiotonline's Avatar
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    संदर्भवश यहाँ पर बताते चलें कि दुश्मनी के मामले में निर्बल हमेशा भाग्यशाली सिद्ध होता है, क्योंकि बलशाली दुर्बल पर सीधा आक्रमण न करके पहले चेतावनी देकर या फिर डरा-धमकाकर अपना कार्य सिद्ध कर लिया करता है। बलशाली दुर्बल पर तभी आक्रमण करता है जब चेतावनी देने या डराने-धमकाने से उसका कार्य सिद्ध न हो और दुर्बल ढीठ बना रहे। अतः चेतावनी देने या डराने-धमकाने से दुर्बल को सतर्क होने का मौका मिल जाता है और उसके पास इतना समय रहता है कि वह आत्मरक्षा के लिए पर्याप्त कदम उठा सके। रूस-यूक्रेन युद्ध इसका एक सटीक उदाहरण है। रूस ने यूक्रैन पर आक्रमण से पूर्व यूक्रैन को चेतावनी दी और उसे डराया-धमकाया, किन्तु जब यूक्रैन ढीठ बना रहा और रूस का कार्य सिद्ध नहीं हुआ तब जाकर रूस ने यूक्रैन पर आक्रमण किया। ठीक इसके विपरीत दुश्मनी के मामले में बलशाली हमेशा अभागा सिद्ध होता है। दुर्बल द्वारा आक्रमण होने की दशा में बलशाली को रहम की भीख माँगने का भी मौका नहीं मिलता तथा रहम की भीख माँगने पर भी बुद्धिशाली दुर्बल बलशाली को रहम की भीख कभी नहीं देता, क्योंकि रहम की भीख देने पर बलशाली उस चोट खाए साँप की तरह होता है जो हमेशा बदला लेने के लिए आतुर रहता है और अपने अगले आक्रमण में दुर्बल शत्रु के परखच्चे उड़ा देता है। इस मामले में दुर्बल हमेशा भाग्यशाली सिद्ध होता है, क्योंकि उसे बलवान द्वारा हमेशा रहम की भीख मिल जाया करती है। इतिहास गवाह है कि वर्ष 1191 में मुहम्मद गौरी ने जब पृथ्वीराज चौहान पर आक्रमण किया तो उस युद्ध में मुहम्मद गौरी को बुरी तरह से पराजित होना पड़ा था। इस युद्ध में मुहम्मद गौरी को पृथ्वीराज चौहान द्वारा बंधक बना लिया गया था, किन्तु पृथ्वीराज चौहान ने मुहम्मद गौरी को रहम की भीख देकर छोड़ दिया। परास्त होने के बाद मुहम्मद गौरी की हालत उस चोट खाए साँप की भाँति हो गई जो बदला लेने के लिए सदैव आतुर रहता है। इसके बाद मुहम्मद गौरी ने और अधिक ताकत के साथ आक्रमण करके पृथ्वीराज चौहान को परास्त कर दिया और उसे बंधक बना लिया। मुहम्मद गौरी ने पृथ्वीराज चौहान को रहम की भीख नहीं दी और ऐसा माना जाता है कि बाद में पृथ्वीराज चौहान को गजनी ले जाकर मार दिया गया।

  6. #16
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    अतः दुर्भाग्यवश बलशाली को दुर्बल शत्रु के आक्रमण से बचने का कोई मौका नहीं मिलता, क्योंकि दुर्बल कभी भी बलशाली को न तो चेतावनी ही देता है और न ही डराने-धमकाने का दुःसाहस करता है। इसके पीछे का कारण यह है कि दुर्बल को पता होता है कि बलवान शत्रु को चेतावनी देने या डराने-धमकाने से कोई लाभ होने वाला नहीं है, क्योंकि बलवान शत्रु उसकी बात कभी नहीं मानेगा और तत्काल आक्रमण करके उसकी गर्दन मरोड़ देगा और बचना मुश्किल नहीं, नामुमकिन होगा। यदि यूक्रैन रूस को क्रीमिया खाली करने की चेतावनी देता तो क्या रूस मानता? कभी नहीं। अतः दुर्बल अपने से बलवान शत्रु पर बिना चेतावनी दिए अचानक बहुत बड़े पैमाने पर बहुत बड़ा भयानक आक्रमण किया करता है जिससे बलवान शत्रु का बचना नामुमकिन होता है और उसके परखच्चे उड़ जाते हैं। द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान जापान एक अत्यन्त शक्तिशाली राष्ट्र था। उसने अमेरिका तक को नाकों चने चबवाने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी। अमेरिका चुपचाप परमाणु-बम बनाने की प्रक्रिया में लगा रहा और जैसे ही परमाणु-बम बनकर तैयार हो गया, उसने अचानक हिरोशिमा और नागासाकी पर परमाणु-बम गिराकर जापान को घुटने टेकने पर मज़बूर कर दिया।

  7. #17
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    यहाँ पर यह भी बताना ज़रूरी है कि निर्बल का बुद्धिमान होना भी अत्यावश्यक है अन्यथा वह क्रोध के वशीभूत होकर बलवान शत्रु को ललकारने का दुःसाहस करके तत्काल जूता भी खाने का ख़तरा मोल ले सकता है तथा बलवान शत्रु को इस गलतफ़हमी में भी नहीं रहना चाहिए कि निर्बल शत्रु यदि उसे ललकार रहा है तो वह हमेशा महामूर्ख ही होता है, क्योंकि एक बुद्धिमान निर्बल शत्रु मजा लेने के उद्देश्य से अपने से बलवान शत्रु को ललकार भी सकता है। ऐसे समय में बलवान शत्रु को यह समझ लेना चाहिए कि उसकी जबरदस्त घेराबन्दी हो चुकी है और कुछ ही पलों में उस पर बड़ा भयानक आक्रमण होने वाला है। इस घेराबन्दी को अँग्रेज़ी में 'टार्गेट लॉक करना' कहते हैं। वैसे तो घेराबन्दी का समकक्ष शब्द एन्सर्कल्मन्ट (Encirclement) है, किन्तु यहाँ पर 'टार्गेट लॉक करना' ही उपयुक्त है, क्योंकि एन्सर्कल्मन्ट में शत्रु के बच निकलने की सम्भावना होती है, 'टार्गेट लॉक करने' में नहीं। अतः 'निर्बल शत्रु जब अचानक सामने आकर ललकारने लगे तो अत्यन्त सतर्क हो जाना चाहिए।' फ़िल्मों में ऐसा दृश्य दर्शकों को बहुत पसन्द आता है जब निर्बल हीरो ख़तरनाक विलेन की जबरदस्त घेराबन्दी करके उसे ललकारता है तथा अहंकारी विलेन अपने आपको बलवान समझते हुए अपनी अकड़ दिखाता है और फिर धड़ाधड़ जूते खाता है! यह घेराबन्दी कई प्रकार की होती है। कई बार तो इस घेराबन्दी का उद्देश्य निर्णायक हमले के लिए नहीं, अपितु उस सम्भावित शत्रु को जाँचने और परखने के लिए होता है जो बाहर से दिखता तो शरीफ़ है, किन्तु अन्दर से शत्रु हो सकता है। इस प्रकार की घेराबन्दी में ललकारने के स्थान पर बुद्धि का प्रयोग किया जाता है जिसमें कुछ युक्तियों के प्रयोग द्वारा कुछ ऐसी चालें चली जाती हैं जिससे गुप्त शत्रु बौखलाकर उल्टे-सीधे कदम उठाने लगे और निर्विवाद रूप से यह सिद्ध हो जाए कि बाहर से शरीफ़ दिखने वाला व्यक्ति अन्दर से शत्रु है। इस प्रकार की घेराबन्दी से जब शत्रु की पहचान सुनिश्चित हो जाती है तो शत्रु को परास्त करने की कार्यवाही शुरू की जाती है। इस प्रकार की घेराबन्दी में प्रयुक्त की जाने वाली चालें हर मामले में अलग-अलग होती हैं। जैसे- अफ़वाह फैलाकर शत्रु को इस प्रकार भ्रमित करना कि वह बौखलाकर उल्टे-सीधे कदम उठाए, झूठी बातों में उलझाकर शत्रु का इस प्रकार ब्रेनवाश करना कि वह सच को झूठ या झूठ को सच समझकर निष्क्रिय हो जाए, शत्रु को गलतफ़हमी अथवा खुशफ़हमी के जाल में उलझाकर उसे निष्क्रिय कर देना, इत्यादि। जैसे- रूस-यूक्रैन युद्ध के दौरान रूस ने अपने कथन- 'रूस नहीं तो दुनिया का क्या काम?' और 'हमारे मामले में दखल देने वाले देश को रूस ऐसा सबक सिखाएगा कि इतिहास याद रखेगा' में अमेरिका को उलझाकर उसे निष्क्रिय कर दिया। समयाभाव और स्थानाभाव के कारण यहाँ पर उन सभी चालों का वर्णन करना सम्भव न होगा। यहॉं पर यह भी बताते चलें कि कुछ सफ़ेदपोश (White collar) शत्रु इतने बुद्धिमान होते हैं कि वे घेराबन्दी की इन विशेष चालों को भी पहचानने की क्षमता रखते हैं और इन चालों से साफ बचकर निकल जाते हैं। इन परिस्थितियों में इन सफ़ेदपोश शत्रुओं के ऊपर नई-नई चालों का प्रयोग करके तब तक घेराबन्दी की जाती है जब तक सफ़ेदपोश की असलियत सामने न आ जाए। यहाँ पर यह उल्लेखनीय है कि दिवंगत महान जासूसी लुगदी उपन्यासकार वेद प्रकाश शर्मा के उपन्यासों में इन्हीं तमाम फण्डों का सटीक प्रयोग किया जाता था जिससे उनके उपन्यास पाठकों पर चमत्कारिक प्रभाव उत्पन्न करते थे। इस प्रकार ख्यातिप्राप्त तमिल भाषा के महान कवि और दार्शनिक तिरुवल्लूवर द्वारा लिखित तमिल दोहों (कुरल-குறள்) के संग्रह ग्रन्थ तिरुक्कुरल के कुरल-302 में लिखित अनमोल वचन का अंश- 'अपने से कमज़ोर के ऊपर क्रोध करने से अधिक हानिकारक और कुछ नहीं है', निर्विवाद रूप से सत्य प्रमाणित हुआ।

  8. #18
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  9. #19
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    उपर्युक्त चित्र में दिए 'क्वोट' को ध्यान से पढ़िए जिसमें चाणक्य को यह कहता हुआ दिखाया जा रहा है कि 'पापियों के वफ़ादारों का अन्त सबसे पहले होता है।' क्या इसे वाकई चाणक्य ने लिखा है? नहीं। इसे हमने लिखा है और चाणक्य का चित्र चिपका दिया है। यह हमने सिर्फ़ यह बताने के लिए किया है कि अन्तर्जाल में चाणक्य के नाम से इस प्रकार के तमाम फर्ज़ी 'क्वोट' मिल जाएँगे जिनका चाणक्य से कोई लेना-देना नहीं होता। वैसे हमने चाणक्य के नाम से लिखित अपने 'क्वोट' में जिन तथ्यों का समावेश किया है, वह अकाट्य सत्य है। चाणक्य यदि आज जीवित होते तो यह 'क्वोट' भी अवश्य लिखते, क्योंकि पापियों के वफ़ादारों पर सबसे पहले गाज गिरती है। रामायण में रावण बाद में मारा गया था, किन्तु उसके वफ़ादार मेघनाथ, कुम्भकर्ण, मारीच, खरदूषण और अहिरावण इत्यादि पहले मारे गए थे। इसी प्रकार महाभारत में भी दुर्योधन बाद में मारा गया था, किन्तु उसके वफ़ादार भीष्म, द्रोणाचार्य, कर्ण, दुःशासन और जयद्रथ इत्यादि पहले मारे गए थे।

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