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Thread: मायाजाल

  1. #11
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    तो इस प्रकार आपने देखा कि रामायण काल में वर्णित मायानगरी का निर्माण नारद को सबक सिखाने और उनके अहंकार को भंग करने के उद्देश्य से किया गया था। आज भी लोग मायाजाल का प्रयोग तरह-तरह के उद्देश्यों की पूर्ति के लिए किया करते हैं जिनका वर्णन पहले ही किया जा चुका है। मायाजाल के प्रयोग द्वारा मायानगरी का निर्माण करना बहुत बड़ी बात नहीं है, किन्तु एक बात का ध्यान रखना चाहिए कि जिसके लिए मायानगरी का निर्माण किया जा रहा हो, उसे ज़रा भी भनक न लगने पाए। नहीं तो मायाजाल का प्रभाव विलुप्त होने से मायानगरी का किला धराशायी हो जाएगा और सारी मेहनत बर्बाद हो जाएगी। कैसे? इसे जानिए ऐसे!

  2. #12
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    कल्पना करिए- नारद को सबक सिखाने और उनके अहंकार को भंग करने के उद्देश्य से जिस समय विष्णु भगवान मायानगरी का निर्माण कर रहे थे उस समय यदि भूले-भटके नारद जी उधर आ जाते और चुपके से विष्णु भगवान को मायानगरी का निर्माण करता हुआ देख लेते तो क्या फिर वे विष्णु भगवान द्वारा निर्मित मायानगरी के जाल में फँसते? नहीं न। इस परिस्थिति में जो परिदृश्य (Scenario) बनता, वह कुछ इस प्रकार होता।

  3. #13
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    नारद को सबक सिखाने और उनके अहंकार को भंग करने के उद्देश्य से विष्णु भगवान मायाजाल का प्रयोग करके मायानगरी का निर्माण करने में तन-मन से लगे हुए थे। उन्हें इस बात का बड़ा भय भी था कि समय से पहले नारद जी भूले-भटके उधर आकर यह सब देख न लें और उनका सारा किया कराया मिट्टी हो जाए। इसीलिए विष्णु भगवान अपना कार्य द्रुतगति से सम्पन्न करने के उपरान्त अपना पदचिह्न मिटाकर शीघ्रतापूर्वक वहाँ से चले जाना चाहते थे, किन्तु जिस बात का डर था वही हुआ। नारद जी कब चुपके से उधर पधारे, विष्णु भगवान को पता तक न चला और वे नारद जी के आगमन से अनभिज्ञ मायानगरी के निर्माण कार्य में तन-मन से लगे रहे। मायानगरी का निर्माण कार्य सम्पन्न करके मन ही मन में अति प्रसन्न होते हुए विष्णु भगवान वहाँ से वैकुण्ठ चले गए और नारद के आकर हरिरूप माँगने की प्रतीक्षा करने लगे, किन्तु नारद कहाँ आने वाले थे। वे यह राज तो जान ही चुके थे कि मायानगरी की निर्माण भगवान विष्णु ने किया है, किन्तु क्यों किया है- यह बात उनकी समझ में बिल्कुल नहीं आ रही थी। कुछ गड़बड़-घोटाला जानकर उन्होंने कुछ समय के लिए धरतीलोक से दूर ही रहने का निर्णय लिया।

  4. #14
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    जब बहुत दिन बीत गए और नारद जी नहीं पधारे तो विष्णु भगवान अत्यन्त विचलित हो गए। उधर नारद जी भी कम विचलित नहीं थे। वे भी यह जानने के लिए अत्यन्त इच्छुक थे कि आखिर भगवान विष्णु ने मायानगरी का निर्माण क्यों किया है? अन्ततः नारद जी ने निर्णय लिया कि वैकुण्ठ जाकर भगवान विष्णु के दर्शन किए जाएँ। हो सकता है- भगवान विष्णु अपने से कुछ राज़ उगल ही दें।

    फिर क्या था। नारद जी 'नारायण-नारायण' कहते हुए भगवान विष्णु के सामने उपस्थित हो गए। नारद जी को देखकर भगवान विष्णु अत्यन्त प्रसन्न हुए। प्रसन्नतापूर्वक बोले- 'बोलो नारद, क्या कुछ माँगने आए हो?' नारद ने कहा- 'नहीं भगवन्, मैं तो बस यूँ ही आपके दर्शन करने चला आया।' नारद का जवाब सुनकर भगवान विष्णु का मुँह लटक गया। निराश स्वर में बोले- 'मुनिवर, क्या आजकल आप धरतीलोक का भ्रमण नहीं कर रहे?' भगवान विष्णु का प्रश्न सुनकर नारद जी के कान खड़े हो गए। उनके मन में विचार आया- हो न हो, मायानगरी का निर्माण उन्हीं को किसी जाल में फँसाने के लिए किया गया हो! भगवान विष्णु को छकाने के उद्देश्य से नारद जी ने कहा- 'हाँ, भगवन्। धरतीलोक का भ्रमण करते-करते जी ऊब गया। कई महीने हो गए धरतीलोक का भ्रमण किए हुए।'

  5. #15
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    भगवान विष्णु इतनी जल्दी हार मानने वाले तो नहीं थे। मंद-मंद मुस्कुराते हुए बोले- 'मुझे भी धरतीलोक का भ्रमण किए हुए कई महीने बीत गए। आज धरतीलोक का भ्रमण करने का बहुत मन कर रहा है। चलिए, हम दोनों आज चलकर धरतीलोक का भ्रमण कर आते हैं। बड़ा आनन्द आएगा।'

    सुनकर नारद जी के कान एक बार फिर खड़े हो गए। फिर भी 'नारायण-नारायण' कहते हुए वे विष्णु भगवान के साथ चल दिए। धरतीलोक का भ्रमण करने के दौरान विष्णु भगवान नारद जी को अपनी बनाई हुई मायानगरी में ले गए। मायानगरी में उस समय राजकुमारी का स्वयंवर चल रहा था। नारद जी ने राजकुमारी को देखा और फिर मुँह फेर लिया। उन्हें यह बात तो पहले से पता थी कि राजकुमारी के भेष में स्वयं लक्ष्मी जी विराजमान हैं। राजकुमारी के सौंदर्य का नारद जी पर कोई प्रभाव न पड़ता देखकर विष्णु भगवान सकपका गए। उन्होंने नारद जी को प्रलोभन देते हुए कहा- 'मुनिवर, कब तक आप कुँवारे बैठे रहेंगे? मेरी मानिए तो आप राजकुमारी से विवाह कर लीजिए। मैं अपना हरि रूप आपको दे दूँगा। राजकुमारी आपको ही वरमाला पहनाएँगी।'

    नारद जी विष्णु भगवान की सारी चालबाजी समझ गए। बोले- 'नहीं, भगवन्। मैं कुँआरा ही ठीक हूँ। मैंने स्वयंवर का कॉम्प्टीशन छोड़कर कॉन्ट्रीब्यूशन करने में अपना ध्यान फ़ोकस करने का निर्णय लिया है। इससे मेरा दिल बहुत हल्का हो जाएगा।'

    विष्णु भगवान् ने घबड़ाकर पूछा- 'क्या मतलब?'

    नारद जी ने मुस्कुराते हुए कहा- 'मतलब ये कि राजकुमारी आपके ही उपयुक्त हैं। अतः आप राजकुमारी से विवाह कर लीजिए।'

    नारद की बात सुनकर भगवान विष्णु ने अपना माथा पीट लिया। मायानगरी का मायाजाल जो बेअसर हो गया था!

  6. #16
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    बहुत बढ़िया। ...........
    सभी उपस्थित मित्रो से निवेदन है फोरम पे कुछ न कुछ योगदान करे,अपनी रूचि के अनुसार किसी भी सूत्र में अपना योगदान दे सकते है,या फिर आप भी कोई नया सूत्र बना सकते है

  7. #17
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    Quote Originally Posted by anita View Post
    बहुत बढ़िया। ...........
    चलो, कुछ तो अच्छा लगा तुम्हें।

  8. #18
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    तो इस प्रकार आपने देखा कि मायाजाल का भण्डाफोड़ हो जाने के कारण पूरी कहानी ही बदल गई तथा नारद जी विष्णु भगवान के मायाजाल में नहीं फँसे और 'कॉम्प्टीशन छोड़कर कॉन्ट्रीब्यूशन करने में अपना ध्यान फ़ोकस करने तथा दिल हल्का करने की' बात इस प्रकार नादान बनकर करने लगे जैसे उन्हें कुछ पता ही न हो। अतः यह बात स्पष्ट है कि जिसके लिए मायाजाल का प्रयोग करके मायानगरी का निर्माण किया जा रहा हो, उसे इस बात की भनक ज़रा भी नहीं लगनी चाहिए। नहीं तो भण्डाफोड़ होने की दशा में मायाजाल की वॉट लग जाएगी। सब कुछ चौपट हो जाएगा। गुड़ गोबर हो जाएगा। किया-कराया मिट्टी में मिल जाएगा। इसलिए अत्यन्त सावथानी के साथ मायाजाल का प्रयोग करना चाहिए।

  9. #19
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    यहाँ पर यह भी उल्लेखनीय है कि मायाजाल की तरह एक और मायाजाल भी होता है जिसे उल्टा (Reverse) मायाजाल कहते हैं। वास्तविक जीवन में प्रायः ऐसा उल्टा मायाजाल देखने को नहीं मिलता, किन्तु फ़िल्मों और उपन्यासों में इस प्रकार का उल्टा मायाजाल देखने को बहुत मिल जाता है। कभी-कभार वास्तविक जीवन में भी इस उल्टे मायाजाल के दर्शन हो जाते हैं। फ़िल्मों और उपन्यासों में यह उल्टा मायाजाल कहानी को और अधिक रोचक बना देता है, किन्तु वास्तविक जीवन में यह उल्टा मायाजाल अत्यधिक खतरनाक और घातक सिद्ध होता है।

  10. #20
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    हिन्दी लुगदी साहित्य के महान जासूसी उपन्यासकार दिवंगत वेद प्रकाश शर्मा अपने उपन्यासों में इस प्रकार का उल्टा मायाजाल रचने में अत्यधिक माहिर थे। यही कारण था कि उनके उपन्यास अत्यधिक चर्चित हुआ करते थे। इस उल्टा मायाजाल को समझना या समझाना अत्यधिक टेढ़ी खीर है, किन्तु फिर भी इसे सरल शब्दों में समझाने का प्रयत्न करते हैं। फर्ज करिए कि आपने किसी को छकाने के लिए मायाजाल की रचना की, किन्तु आप अपने ही बनाए हुए मायाजाल में फँस गए। बाद में पता चला कि आपको मायाजाल रचने के लिए मजबूर करने वाला शख्स वही था, जिसके लिए आपने मायाजाल रचा था। संक्षेप में कहा जाए तो उस शख्स ने जानबूझकर आपके लिए पहले से इतना बड़ा मायाजाल रचा कि उसमें फँसकर आप उस शख्स के लिए एक छोटा मायाजाल रचने के लिए मजबूर हो गए। उस शख्स द्वारा रचा गया मायाजाल हमेशा गुप्त ही रहेगा, किन्तु आप अपने द्वारा रचे गए मायाजाल में बुरी तरह फँस जाएँगे। कभी-कभी यह भी हो सकता है कि आप किसी के लिए मायाजाल रचें और वह शख्स आपके मायाजाल को पहचानकर उससे बड़ा एक मायाजाल आपके लिए रच दे। नारद द्वारा विष्णु भगवान के मायाजाल में न फँसना भी उल्टा मायाजाल का एक उदाहरण है। यह भी हो सकता था कि नारद अपने आपको अहंकारी साबित करने के लिए जानबूझकर सर्वत्र प्रचार करते जिससे विष्णु भगवान मजबूर होकर उनके लिए एक मायानगरी का निर्माण करें और फिर नारद के मायाजाल में उलझकर रह जाएँ। यह भी उल्टा मायाजाल का एक अच्छा उदाहरण है। उल्टा मायाजाल का कोई एक निश्चित नियम नहीं है, क्योंकि परिस्थितियों के अनुसार उल्टा मायाजाल रचने की विधि भी परिवर्तित होती रहती है।

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