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Thread: मायाजाल

  1. #1
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    Cool मायाजाल


  2. #2
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    मायाजाल.. क्या होता है मायाजाल? किसे कहते हैं मायाजाल? इसे समझने के लिए ऊपर का चित्र देखिए। चित्र में आपको खजुराहो की मूर्ति जैसी एक कलाकृति दिखाई दे रही होगी जिसमें यह स्पष्ट रूप से दृष्टिगोचर हो रहा होगा कि निर्वस्त्र स्त्री-पुरूष आलिंगनबद्ध होकर काम-क्रीड़ा में व्यस्त हैं, किन्तु यह एक मायाजाल है, दृष्टिभ्रम है क्योंकि चित्र में ऐसा कुछ भी नहीं है। चित्र में कुछ डाल्फिन मछलियाँ हैं जो आपस में मिलकर दृष्टिभ्रम उत्पन्न कर रही हैं।

  3. #3
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    अब यक्ष-प्रश्न यह है कि इस तरह के मायाजाल का निर्माण आखिर क्यों किया जाता है? तो इसका उत्तर यह है कि मायाजाल का निर्माण किसी को मूर्ख बनाने के लिए अथवा चुहल करने के लिए किया जाता है। इसके अतिरिक्त मायाजाल का निर्माण किसी को सबक सिखाने के लिए भी किया जाता है। कभी-कभी कुछ शातिर किस्म के सफ़ेदपोश अपराधी भी मायाजाल का निर्माण करके ह्वाइट कॉलर क्राइम को अंजाम देते हैं।

  4. #4
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    संक्षेप में कहें तो मायाजाल आँखों का धोखा है, भ्रम का जाल है, दृष्टि का भ्रम है। जो आँखों के सामने दिखाई देता है, वह सिर्फ़ झूठ होता है और उसमें सच का नामोनिशान तक नहीं होता। वैसे तो मायाजाल का वर्णन रामायण और महाभारत काल से ही मिलता है, किन्तु आज भी इसका उपयोग सर्वत्र देखने को मिलता है। आपको यह जानकर अत्यन्त आश्चर्य होगा कि 'स्टिंग ऑपरेशन' और 'हनी ट्रैप' मायाजाल का ही आधुनिक स्वरूप है। जब कोई शातिर किस्म का सफ़ेदपोश अपराधी ह्वाइट कॉलर क्राइम को अंजाम देने के लिए मायाजाल का निर्माण करता है तो उसे 'मॉडुस ऑपेराण्डी (Modus-Operandi)' कहा जाता है। प्रेम-प्रसंग में प्रेमी या प्रेमिका दूसरे को 'हॉं' या 'ना' में स्पष्ट जवाब देने के स्थान पर टालमटोल करने के उद्देश्य से जब मायाजाल का निर्माण करते हैं तो उसे 'बेंचिंग (Benching)' कहा जाता है।

  5. #5
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    आइए, अब जानते हैं- महाभारत काल में मायाजाल का प्रयोग कब और कहाँ हुआ था।

    महाभारत और श्रीमद् भागवत दोनों के अनुसार 'मय' नामक असुर एक शिल्पी तथा एक अत्यन्त कुशल वास्तुकार था। वह मायाजाल में अत्यन्त दक्ष माना जाता था। मायाजाल के प्रयोग से उसने पाँडवों के लिए एक मायावी महल का निर्माण किया था। इस महल का नाम इन्द्रप्रस्थ था। युधिष्ठिर द्वारा किए जा रहे राजसूय यज्ञ में कौरवों को आमंत्रित करने के लिए भीम को भेजा गया था। इस राजसूय यज्ञ में देश के कोने-कोने से राजा और महाराजा आए हुए थे तथा दुर्योधन भी अपने सभी भाइयों के साथ इन्द्रप्रस्थ में उपस्थित हुआ था।

  6. #6
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    इन्द्रप्रस्थ की मायावी संरचना देखकर दुर्योधन हैरान रह गया। उसने हस्तिनापुर में इतना अद्भुत वास्तुशिल्प कहीं नहीं देखा था। यह महल ‘मायाजाल’ से बना था इसलिए जगह-जगह पर भ्रम पैदा होता था। इसी कारण दुर्योधन कभी सूखे को गीला समझ बैठता था तो गीले को सूखा। यही नहीं, कभी वह बन्द दरवाजे को खुला मानकर दीवार से टकरा जाता था तो कभी खुले दरवाजे बन्द मानकर उसे खोलने का प्रयत्न करने लगता था। इस कारण वह हर बार उपहास का कारण बनता। एक बार तो दुर्योधन ने स्थल को जल समझ कर अपने वस्त्र समेत लिए और जल को स्थल समझकर वह उसमें गिर पड़ा। दुर्योधन को जल में गिरता देखकर वहाँ उपस्थित भीमसेन और दूसरे राजा-महाराजा हँसने लगे। दुर्योधन ने उस समय तो कुछ नहीं कहा, किन्तु अन्दर से वह आगबबूला हो गया। मायाजाल के भ्रम के कारण उसे कई बार लज्जित भी होना पड़ा, किन्तु उस महल की मायावी संरचना ऐसी थी कि बार-बार उसे भ्रमित होकर उपहास का पात्र बनना पड़ा।

  7. #7
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    युधिष्ठिर ने हमेशा से पाँडवों से वैर-भाव रखने वाले दुर्योधन को राजसूय यज्ञ का कोषाध्यक्ष बना दिया था। सभी राजाओं से दुर्योधन ने ही बहुमूल्य भेटें स्वीकार की थीं। इतना वैभव व धन देखकर वह जल उठा था।

    दुर्योधन को कोषाध्यक्ष बनाने की युधिष्ठिर की महान राजनीतिक भूल और पाँडवों की सारी सम्पत्ति को अनायास ही हथिया लेने की चाह तथा द्रोपदी से आसक्ति और मायावी महल के कारण राजाओं द्वारा उपहास का पात्र बनने के कारण ही दुर्योधन ने कपट द्यूत का आयोजन करके द्रोपदी का अपमान किया था जो आगे चलकर महाभारत युद्ध का कारण बना।

  8. #8
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    तो इस प्रकार आपने देखा कि महाभारत में मायाजाल का प्रयोग करके जिस मायावी महल 'इन्द्रप्रस्थ' का निर्माण किया गया था उसका एकमात्र उद्देश्य आगंतुक राजा-महाराजाओं को मूर्ख बनाकर उन्हें विस्मित करना ही था, न कि उन्हें अपमानित करना।

    आइए, अब जानते हैं- रामायण काल में मायाजाल का प्रयोग कब और कहाँ हुआ था।

    इस संदर्भ में रामचरित मानस में एक कथा है कि एक बार नारद मुनि को अभिमान हो गया था कि वह काम भाव से मुक्त हो गए हैं। विष्णु भगवान ने नारद का अभिमान भंग करने के लिए एक माया नगरी का निर्माण किया।

  9. #9
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    इस नगर में देवी लक्ष्मी राजकुमारी रूप में उत्पन्न हुईं। इन्हें देखकर नारद मुनि के मन में विवाह की इच्छा प्रबल हो उठी। वह विष्णु भगवान के पास हरि के समान सुन्दर रूप मांगने पहुंच गये। विष्णु भगवान ने नारद की इच्छा के अनुसार हरि रूप दे दिया।

    हरि रूप लेकर जब नारद राजकुमारी के स्वयंवर में पहुंचे तो उन्हें विश्वास था कि राजकुमारी उन्हें ही वरमाला पहनाएगी। लेकिन ऐसा नहीं हुआ, उस कन्या ने नारद को छोड़कर दीन हीन रूप में बैठे भगवान विष्णु के गले में वरमाला डाल दिया।

  10. #10
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    नारद वहां से उदास होकर लौट रहे थे तो रास्ते में एक जलाशय में अपना चेहरा देखा। अपने चेहरे को देखकर नारद हैरान रह गये क्योंकि उनका चेहरा बंदर जैसा लग रहा था। हरि का एक अर्थ विष्णु होता है और एक वानर होता है। भगवान विष्णु ने नारद को वानर रूप दे दिया था। नारद समझ गये कि भगवान विष्णु ने उनके साथ मजाक किया है। इन्हें भगवान पर बड़ा क्रोध आया।

    नारद सीधा बैकुण्ठ पहुंचे और आवेश में आकर भगवान को श्राप दे दिया कि आपको मनुष्य रूप में जन्म लेकर पृथ्वी पर जाना होगा। जिस तरह मुझे स्त्री का वियोग सहना पड़ा है उसी प्रकार आपको भी वियोग सहना होगा। इसलिए राम और सीता के रुप में जन्म लेकर विष्णु और देवी लक्ष्मी को वियोग सहना पड़ा।

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