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Thread: एक्ट्रा मैरिटल अफ़ेयर्स में सेक्स लाइफ़ कैसे मैनेज करें?

  1. #11
    कांस्य सदस्य superidiotonline's Avatar
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    अब सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि गर्लफ्रेंड या पत्नी के नाराज़ होने का कारण क्या होता है? परम्परागत विवाह अर्थात् अरेंज मैरिज में रिश्तों में दरार आना कोई बहुत बड़ी बात नहीं है, क्योंकि यह एक ब्लाइंड गेम होता है। लगा तो तीर, नहीं तो तुक्का! किन्तु लव मैरिज कोई ब्लाइंड गेम तो होता नहीं, फिर इसमें क्यों रिश्तों में दरार आ जाती है? दरअसल होता यह है कि लव मैरिज करना कोई आसान बात नहीं है, क्योंकि इसमें तमाम पेंच हुआ करते हैं और हर एक पेंच को खोलने में काफी जद्दोजहद का सामना करना पड़ता है। अरेंज मैरिज में लड़की देखना पड़ता है जो बहुत आसान काम होता है, किन्तु लव मैरिज में लड़की पटाना पड़ता है जो बहुत मुश्किल काम होता है। इसीलिए आलसी प्रवृत्ति के लोग अरेंज मैरिज करना पसन्द करते हैं और बहादुर किस्म के लोग लव मैरिज। लव मैरिज में लड़की पटाने से लेकर शादी करने तक की प्रक्रिया में कदम-कदम पर कई ख़तरों का सामना करना पड़ता है। इसलिए लव मैरिज में शादी के बाद पुरूषों को ऐसा लगता है जैसे कोई किला फ़तह कर लिया हो। प्रेमिका को पत्नी में परिवर्तित करने की खुशी में लोग यह सोचकर एकदम बेफ़िक्र हो जाते हैं कि अब तो गर्लफ्रेंड वाइफ़ बन गई और सारी समस्याएँ जड़ से ख़त्म! किन्तु सच्चाई यह होती है कि गर्लफ्रेंड के वाइफ़ बनने के बाद अचानक एक नई समस्या उभर कर सामने आती है और पता चलता है कि रिश्तों में दरार आने की शुरूआत हो गई है। ऐसा क्यों? आगे बताएँगे।

  2. #12
    कांस्य सदस्य superidiotonline's Avatar
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    याद करिए- लड़की पटाने से लेकर उसे अपनी गर्लफ्रेंड बनाने तक की प्रक्रिया में लड़की ने कितनी बार भाव खाया था? और आपने हर बार उसे बड़े ही संयम से भाव खिलाया भी था, क्योंकि आपको अच्छी तरह से पता था कि भाव न देने पर लड़की भड़क जाएगी और आपकी प्रेम-कहानी का दुःखद 'द एंड' हो जाएगा और वह भी 'ऑफ़ बीट'। बता दें कि इस 'भाव' को अँग्रेज़ी में 'ऐटिट्यूड' (Attitude) कहते हैं। वस्तुतः भाव खाना लड़कियों का नैसर्गिक प्राकृतिक गुण होता है। भाव खाकर लड़कियाँ यह पता लगाती हैं कि आपका प्रेम उनके प्रति कितना गम्भीर है? 'भाव खाना' एक तरह से प्रेम-परीक्षा है और इस परीक्षा को 'भाव खिलाकर' पास किया जाता है। जितना अधिक भाव खिलाएँगे, उतना ही अधिक अंकों से आप पास होंगे। यहाँ पर यह भी बता देना अत्यावश्यक है कि यदा-कदा कुछ मामलों में लड़कियाँ खुद लड़कों को पटा लेती हैं और वह भी काफी जद्दोजहद करके। ऐसे मामलों में यदि आप समझते हैं कि लड़की भाव नहीं खाएगी तो आप सिरे से गलत हैं। लड़की ने अगर काफी जद्दोजहद करके भी आपको पटाया है तो भी जैसे ही वह इस बात से निश्चिन्त हो जाएगी कि आप उसकी गिरफ़्त में पूरी तरह से आ चुके हैं तो फिर वह भी भाव खाना शुरू कर देगी। है न आश्चर्यजनक बात? अरे भाई, इतना भी नहीं समझे? इसमें आश्चर्य करने की क्या बात है? परीक्षा तो पास करनी ही पड़ेगी न! जो इतनी जद्दोजहद करके आपको पटाकर अपनी गिरफ़्त में लाई है वो कम से कम इतना तो जानने की कोशिश करेगी ही कि आप उसके प्रति कितने गम्भीर हैं और यह जानने का एकमात्र तरीका होता है- भाव खाना!

  3. #13
    कांस्य सदस्य superidiotonline's Avatar
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    प्रेम-परीक्षा अच्छे नम्बरों से पास करने के चक्कर में आप लड़की को खूब भाव खिलाकर अपनी गर्ल फ्रेंड बना लेते हैं। भाव खिलाने की इस प्रक्रिया में प्रेम, आत्मीयता, चाहत, देख-भाल (Care) और सम्मान को लड़की के दिल में स्थापित करना पड़ता है। यह सब देखकर ही एक लड़की गर्ल फ्रेंड बनने के लिए राजी होती है। गर्लफ्रेंड बनने के बाद भी यदि आपका प्रेम, आत्मीयता, चाहत, देख-भाल (Care) और सम्मान पूर्ववत् जारी रहता है तो वह पत्नी बनने के लिए भी तैयार हो जाती है। विवाह से पूर्व तक कपल एक-दूसरे को बहुत समय देते हैं। एक गर्लफ्रेंड इसी उम्मीद पर हमसफ़र बनने के लिए राजी होती है कि विवाह के बाद और अधिक समय मिलेगा, और अधिक प्रेम मिलेगा, और अधिक आत्मीयता मिलेगी, और अधिक चाहत मिलेगी, और अधिक देख-भाल मिलेगी, और अधिक सम्मान मिलेगा किन्तु प्रायः ऐसा होता नहीं है। लव मैरिज में विवाह के बाद पुरूष अपनी पत्नी की ओर से एकदम बेफ़िक्र हो जाते हैं तथा कपल के बीच सेक्स रोजाना का रूटीन बन जाता है। पत्नी को ऐसा लगने लगता है कि विवाह के बाद चीज़ें बदल गईं हैं और प्रेम, आत्मीयता, चाहत, देख-भाल (Care) और उसके सम्मान में कमी आ गई है। प्रायः पुरूष रूटीन सेक्स को ही प्रेम मान बैठते हैं, किन्तु यही उनकी सबसे बड़ी भूल होती है। उन्हें पता ही नहीं होता कि महिलाएँ सेक्स के लिए नहीं, अपितु प्रेम, आत्मीयता, चाहत, देख-भाल और सम्मान के लिए मरती हैं। यही कारण है कि महिलाओं के लिए सेक्स रोमांटिक भावनाओं से प्रेरित होता है। यदि उन्हें भरपूर प्रेम, आत्मीयता, चाहत, देख-भाल और सम्मान न मिले तो उनके लिए खाली-खूली सेक्स कोई मायने नहीं रखता।

  4. #14
    कांस्य सदस्य superidiotonline's Avatar
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    प्रायः भारतीय समाज में पुरूषों में पत्नी पर अधिकार करने और उसे दबाकर रखने की परम्परागत (Traditional) मानसिकता भी होती है। लव मैरिज भी इस बात से अछूता नहीं है। लव मैरिज के बाद गर्लफ्रेंड जब पत्नी बन जाती है तो बहुत से पुरूष उसे अपने दबाव में लेने लगते हैं। वे पत्नी पर कई तरह के प्रतिबन्ध लगाने लगते हैं। पत्नी को पसन्द आए, न आए- वे अपनी सभी इच्छाओं को उस पर थोपने लगते हैं। यह बात पत्नी को बिल्कुल रास नहीं आती। पति-पत्नी के बीच में भावनात्मक सम्बन्ध कमज़ोर पड़ने से रिश्तों में कड़वाहट आना शुरू हो जाती है और अन्त में पत्नी या तो उड़नछू हो जाती है या फिर मामला विवाह-विच्छेद तक जा पहुँचता है। बहुत से ज्ञानी लोग अन्तर्जाल में भाषण झाड़ते रहते हैं कि आज का समाज अत्याधुनिक हो गया है और लोगों की मानसिकता बदल चुकी है, किन्तु ऐसे ज्ञानियों की बातों पर कभी विश्वास न कीजिएगा। शहर में ढ़ाई लाख आशिक़ों वाली गर्लफ्रेंड अन्तर्जाल में जब भाषण देती है तो सुसाइड के खिलाफ़ बोलकर वाहवाही लूटती है, किन्तु एक बार जब वह मुझसे अपनी गलतफहमी की वजह से नाराज़ हो गई तो मुझे सुसाइड करने की सलाह देने लगी। इस तरह के तमाम उदाहरण मिल जाएँगे। अतः आज के अत्याधुनिक समाज में भी बहुत से पुरूषों की परम्परागत मानसिकता बिल्कुल नहीं बदली है। गाँवों की बात तो छोड़िए, शहरी पुरुषों की मानसिकता का हाल भी वही है जो हम पहले बता चुके हैं। हाँ, यह बात ज़रूर है कि आज के पुरूष दोहरी मानसिकता में जी रहे हैं। एक मानसिकता अत्याधुनिक है और दूसरी मानसिकता परम्परागत पुरातन है। आजकल के युवक अपनी अत्याधुनिक मानसिकता के अनुरूप चाहते तो ही यही हैं- रोज़ साथ में बैठकर दारू पीने वाली गर्लफ्रेंड मिल जाए, रात में उसके साथ कैज़ुअल रिलेशनशिप बन जाए, किन्तु जब शादी करने वाली बात आती है तो इन्हें अपनी परम्परागत पुरातन मानसिकता के अनुरूप कोई 'अच्छी सी फैमिली गर्ल' चाहिए! इस बात का प्रमाण 2017 में लोकार्पित फ़िल्म जॉली एल०एल०बी०2 में मिल जाएगा। साहित्य समाज का दर्पण होता है और फ़िल्में उनका सजीव चित्रण करती हैं। जॉली एल०एल०बी०2 के एक दृश्य में जगरीश्वर 'जॉली' मिश्रा (अक्षय कुमार) अपनी पत्नी पुष्पा पाण्डे (हुमा कुरैशी) को ह्विस्की की बोतल से पैग बनाकर देता है और कहता है- 'मैं.. मैं तुमसे प्यार नहीं करता? सच बताओ- प्यार नहीं करता? एक लड़का बता दो.. एक हस्बैंड बता दो लखनऊ में- जो अपनी बीबी को खुद अपने हाथों से पेग बनाकर पिलाता हो। मान जाऊँ तुम्हें। अरे, बाहर पता चल गया न- तो सामाजिक वहिष्कार हो जाएगा!' (https://youtu.be/PQQy6TlyLps?t=1095) इस छोटे से दृश्य में समाज का वही कटु सत्य छिपा हुआ है जिसका वर्णन हमने ऊपर किया है।

  5. #15
    कांस्य सदस्य superidiotonline's Avatar
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    प्रायः आजकल के युवक इसी दोहरी मानसिकता के चलते अपनी अत्याधुनिक मानसिकता की पूर्ति करने के लिए गर्लफ्रेंड की तलाश करते हैं और इसके लिए लड़कियों से 'दोस्ती' और 'प्यार' जैसे आवरण का सहारा लिया जाता है जिससे जल्दी से जल्दी गड्ढे में कूदने का आनन्द प्राप्त किया जा सके। न्यूयॉर्क टाइम्स की पत्रकार पेगी ऑरेंस्टाइन अपनी भड़ाभड़ बिकाऊ (Bestseller) पुस्तक 'गर्ल्स ऐंड सेक्स: नेविगेटिंग द कॉम्पलिकेटेड न्यू लैन्डस्केप' में लिखती हैं कि- '..महिलाओं का शरीर ऑक्सिटोसीन से परिपूर्ण होता है। उन्हें स्वयं को प्रेम और सेक्स से छुड़ाना असम्भव होता है। महिलाओं को हमेशा सेक्स से पहले प्यार होता है। उन्हें प्रकृति ने इस मामले में ख़ास बनाया है। इसीलिए एक स्त्री पुरुष नहीं होती है।' अतः यह बात स्पष्ट है कि लड़कों के प्यार के जाल में लड़कियाँ फँस ही जाती हैं और लड़के भी मौके का फायदा उठाते हुए गड्ढे में कूदने से ज़रा भी गुरेज नहीं करते, क्योंकि यही तो उनका एकमात्र उद्देश्य होता है। प्रायः ऐसे मामलों में ही लड़कियों की ओर से 'बेवफ़ाई' और 'प्यार में धोक़ा खाने' जैसी शिकायतें मिलती हैं। यहाँ पर मैं पाठकों को दो बातें बताना चाहूँगा। पहला यह कि 'धोखा' एक उर्दू का शब्द है और इसे हिन्दी में 'धोक़ा' लिखा जाना चाहिए, किन्तु हिन्दी में लिखने वालों ने इसे 'धोखा' बनाकर प्रचलित कर दिया है जो कि एकदम गलत है। उर्दू भाषा की वर्णमाला (Alphabet) में दो 'ख' होते हैं। एक 'ख' वह होता है जो उर्दू के दो अक्षर 'काफ' और 'दो चश्मी हे' से मिलकर बनता है। दूसरे 'ख' के लिए उर्दू का एक स्वतन्त्र अक्षर 'खे' होता है। नियम यह है कि उर्दू के जिस शब्द में भी 'काफ' और 'दो चश्मी हे' मिलकर बना हुआ 'ख' प्रयुक्त होगा, उसे हिन्दी में लिखते समय 'क़' ही लिखा जाएगा अर्थात् 'क' लिखकर उसके नीचे एक बिन्दी लगाई जाएगी, किन्तु इसका उच्चारण 'ख' ही होगा। बता दें कि मीनमेख निकालने वाले पाठकगणों के निमित्त उनके ज्ञानार्जन हेतु यह बात लिखी जा रही है। दूसरी बात ये कि दोहरी मानसिकता वाले इन युवकों की अत्याधुनिक मानसिकता का शिकार आम लड़कियाँ ही नहीं, उच्च शिक्षित और अत्यन्त समझदार लड़कियाँ भी बन जाती हैं और बाद में 'हाय-हाय' करती हैं। इन्हें पता ही नहीं होता कि दोहरी मानसिकता वाले ये युवक अपनी परम्परागत पुरातन मानसिकता के अनुरूप कोई 'अच्छी सी फैमिली गर्ल' से ही विवाह करेंगे। 'अच्छी सी फैमिली गर्ल' की परिभाषा क्या है? आगे बताएँगे।

  6. #16
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    दोहरी मानसिकता वाले इन युवकों की परम्परागत पुरातन मानसिकता के अनुरूप 'अच्छी सी फैमिली गर्ल' का अर्थ होता है- लड़की कुँआरी (Virgin) हो, सीधी-साधी हो, गर्म मिजाज़ न हो, पलटकर जवाब न देती हो, पति की गुलाम हो, जिसके ऊपर पूरी तरह से अधिकार जमाया जा सकता हो। शादी करने के मामले में ऐसे युवक महानगरों की युवतियों से दूर ही भागते हैं। इनका कहना होता है कि महानगरों की युवतियाँ दारू-शारू पीती हैं और भ्रष्ट होती हैं। इसलिए ये शादी करने के लिए छोटे शहरों की ओर भागते हैं जिससे उन्हें एक 'अच्छी सी फैमिली गर्ल' मिल सके। पाठकों के मन में यह यक्ष-प्रश्न ज़रूर उठ रहा होगा कि हम इतनी अन्दर की जानकारी आखिर कहाँ से निकालकर लाते हैं? तो बता दें कि लेखक दो तरह के होते हैं। एक ज़मीनी लेखक और दूसरे हवाई लेखक। हवाई लेखक वे होते हैं जिनका समाज से कोई लेना-देना नहीं होता और वे सिर्फ़ अपनी कल्पना के दम पर हवा-हवाई हाँकते रहते हैं। ज़मीनी लेखक वे होते हैं जो समाज के हर तबके के साथ बहुत गहराई से अपनी पैठ बनाकर अन्दर की गुप्त जानकारी सामने लाते हैं। हम न ज़मीनी हैं, न हवाई। हमारे अन्दर ईश्वरप्रदत्त एक 'अद्भुत हगीय गुण' है। जिससे एक बार जान-पहचान हो गई, उसका पेट खराब हो जाता है और वह अपनी सारी गुप्त बातें खुद-ब-खुद हग देता है। अपने इस 'अद्भुत हगीय गुण' के चलते हमारे पास लेखन का काफी माल दिमाग़ के गोदाम में इकट्ठा हो जाता है जिसे हम समय-समय पर इस्तेमाल करते रहते हैं।

  7. #17
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    सन्दर्भवश यहाँ पर यह भी बता दें कि हमारे इस 'अद्भुत हगीय गुण' का प्रभाव भयानक कब्ज़ का शिकार होने के कारण शहर में ढ़ाई लाख आशिक़ों वाली गर्लफ्रेंड के ऊपर बिल्कुल नहीं पड़ता। अपनी इस भयानक कब्ज़ की बीमारी के कारण ही शहर में ढ़ाई लाख आशिक़ों वाली गर्लफ्रेंड अन्तर्जाल में हर जगह पहचान ली जाती है। वैसे तो हम एक-दूसरे को अधिकृत रूप से अगस्त, 2013 से ही जानते-पहचानते हैं, किन्तु मुझे ऐसा प्रतीत होता है कि अन्तर्जाल में हमारी मुठभेड़ बहुत पहले भी हो चुकी है। यह वह दौर था जब भारत गणराज्य में अन्तर्जालीय मंचों (Forums) द्वारा गपाष्टक (Chat) करने की सुविधा उपलब्ध नहीं थी और गपाष्टक करने के लिए हमें युनाइट किंगडम, अमेरिका और आस्ट्रेलिया के विदेशी मंचों पर निर्भर रहना पड़ता था। अन्तर्जालीय गपाष्टक के शौकीन कीड़े हमेशा अन्तर्जाल में ही मंडराते मिल जाएँगे। उस दौर में वैसे तो कई विदेशी मंच थे, किन्तु उनमें से दो बड़े विदेशी मंच बहुत ही प्रसिद्ध थे। पहला युनाइट किंगडम का 'प्रोडिजिट्स' था और दूसरा अमेरिका का 'मोपाइलट' था। इन दोनों मंचों में 'प्रोडिजिट्स' सबसे बड़ा और बेहतरीन मंच था जिसमें लाखों की संख्या में लोग ऑनलाइन रहा करते थे। वैसे तो हम उस दौर के सभी मंचों पर पाए जाते थे, किन्तु हमारा अधिकतर समय 'प्रोडिजिट्स' पर ही गुजरता था। अपनी फ़नी प्रविष्टियों के जरिए हमने बहुत ही कम समय में वहाँ पर अपना झण्डा गाड़ दिया। अपने 'अद्भुत हगीय गुण' के चलते हमने 'प्रोडिजिट्स', 'मोपाइलट', 'वैपाक' और अन्य दूसरे छोटों मंचों के उपयोग द्वारा लगभग दो हजार से ऊपर लड़कियों से गपाष्टक करके सारी जानकारी हगा ली। इस मामले में हमारी दक्षता (Skills) सौ प्रतिशत थी, मतलब यदि हमने सौ लड़कियों को गपाष्टक के लिए मैसेज भेजा तो सभी का जवाब ज़रूर आएगा। लेकिन वो कहावत है न- शेर को सवा शेर ज़रूर मिलता है और ऊँट पहाड़ के नीचे ज़रूर आता है। हमें सवा शेर तो नहीं मिला, लेकिन एक अमेरिकन सवा शेरनी ज़रूर मिल गई। उस सवा शेरनी का यूज़रनेम बड़ा ही फ़नी था- 'breakup1'। यहाँ पर यूज़रनेम थोड़ा सा बदल दिया गया है। हमें तो बड़ी हँसी आई यह सोचकर कि ऐसा यूज़रनेम कोई रखता है क्या? हमने फटाक से अँग्रेज़ी में मैसेज दाग दिया- 'दूसरा और तीसरा ब्रेकअप होगा तो क्या अपना यूज़रनेम breakup2 और breakup3 रख लोगी?' पश्चिमी देशों में दूसरा और तीसरा ब्रेकअप होना बहुत ही मामूली बात है और वहाँ की लड़कियाँ इसे इतना बुरा नहीं मानतीं। हमारा प्रश्न पश्चिमी सभ्यता के अनुकूल था।

  8. #18
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    बहुत बढ़िया

    ऐसे ही पेले जाओ ज्ञान
    सभी उपस्थित मित्रो से निवेदन है फोरम पे कुछ न कुछ योगदान करे,अपनी रूचि के अनुसार किसी भी सूत्र में अपना योगदान दे सकते है,या फिर आप भी कोई नया सूत्र बना सकते है

  9. #19
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    Quote Originally Posted by anita View Post
    बहुत बढ़िया

    ऐसे ही पेले जाओ ज्ञान
    आज मूड कुछ नासाज लग रहा है। देखो, गुस्सा करने की कोई ज़रूरत नहीं है। हम आराम से eiffel tower के नीचे बैठकर dialogue और diplomacy से समस्या का हल निकालेंगे। ये नहीं कि तुम सीधे मिजाइल दाग दो। dialogue और diplomacy का समय और तारीख बाद में निर्धारित किया जाएगा।

  10. #20
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    हमें अच्छी तरह से पता था कि पश्चिमी लड़कियाँ यदि किसी बात पर क्रोध भी करती हैं तो हल्की-फुल्की अँग्रेज़ी गालियों से भरा मैसेज भेजकर जवाब ज़रूर देती हैं, लेकिन थोड़ी देर बाद अच्छी दोस्त भी बन जाती हैं। अँग्रेज़ी गालियों से हमें कोई परहेज भी नहीं था, क्योंकि नई-नई अँग्रेज़ी गालियाँ सीखने का सुनहरा मौका जो मिल रहा था। इससे भी हमारा ज्ञान ही बढ़ रहा था। लोग आपको साहित्य तो सिखा देंगे, लेकिन गालियाँ कोई नहीं सिखाएगा। सवा शेरनी को मैसेज भेजने के बाद हमें उम्मीद तो यही थी कि अधिक से अधिक हल्की-फुल्की अँग्रेज़ी गालियों से भरा मैसेज आएगा, किन्तु हुआ इसका उल्टा। सवा शेरनी ने तत्काल मंच एडमिन के पास हमारी शिकायत दर्ज कराकर हमें मंच से बैन करवा दिया। हमारे तो कान के साथ-साथ सिर के बाल भी खड़े हो गए। सवा शेरनी का यह कृत्य पश्चिमी सभ्यता के प्रतिकूल था। कहीं ऐसा तो नहीं कि अमेरिकन शेर की खाल में कोई इंडियन भेड़िया हो? वैसे हमें मंच से बैन होने का कोई मलाल बिल्कुल भी नहीं था, क्योंकि स्काटलैंड की रहने वाली हमारी एक दोस्त लड़की भी उस समय मंच का एडमिन हुआ करती थी। हमें पता था कि वह जैसे ही ऑनलाइन आएगी, हमें मुर्दा पाकर तुरन्त मंत्र पढ़कर ज़िन्दा कर देगी। और हुआ भी यही। ऑनलाइन आते ही उसने मंत्र पढ़कर हमें ज़िन्दा कर दिया। हमने भी कब्र से बाहर निकलते ही पश्चिमी सभ्यता के अनुरूप उसे भेजे गए अपने मैसेज में 'थैंक्यू' के आगे-पीछे चार-चार 'एक्स (X)' लगाकर उसका धन्यवाद अदा किया। सवा शेरनी हमारे रडार पर कैसे आई, यह भी जान लीजिए। हमने अपनी अन्तर्राष्ट्रीय लोकप्रियता (International Popularity) को परखने के लिए मंच पर एक सूत्र (Thread) प्रकाशित किया। अँग्रेज़ी भाषा में लिखे गए सूत्र में एक छोटा सा प्रश्न था- 'मुझे यहाँ पर कौन-कौन पसन्द करता है?' सभी ने 'मैं' कहकर अपना जवाब दिया, किन्तु सवा शेरनी ने टप से अँग्रेज़ी में जवाब दिया- 'मैं तो बिल्कुल पसन्द नहीं करती।' उसकी प्रविष्टि पर कुछ एडमिन हँसने भी लगे थे, जिससे शायद वह कुछ चिढ़ गई थी। बात यहीं पर आई-गई हो गई। वैसे भी हमें अन्तर्राष्ट्रीय मंचों पर उपस्थित भारतीय लड़कियों में कोई दिलचस्पी नहीं थी, क्योंकि ये हमें शुद्ध देशी ज्ञान बाँटतीं और हमें ज़रूरत थी शुद्ध विदेशी ज्ञान की।

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