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Thread: एक्ट्रा मैरिटल अफ़ेयर्स में सेक्स लाइफ़ कैसे मैनेज करें?

  1. #21
    कांस्य सदस्य superidiotonline's Avatar
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    उन दिनों अन्तर्राष्ट्रीय मंचों की संख्या बड़ी तेज़ी से कुकुरमुत्ते की तरह बढ़ने लगी थी। गपाष्टक के शौकीन कम्प्यूटर प्रोग्रामर कोडिंग करके खुद अपना मंच बना लेते थे। अन्तर्जालीय महत्ता को समझते हुए हमने वर्ष 2000 से ही खुद कोडिंग सीखना शुरू कर दिया था। खुद से सीखने के कारण हमारी सीखने की गति बहुत कम थी, किन्तु एक दिन हमने भी खुद कोडिंग करके अपना अन्तर्राष्ट्रीय मंच बनाकर खुद को 'वैपमास्टर (Wapmaster)' घोषित कर दिया। हमारी 'वैपमास्टरी' को देखकर अन्तर्जालीय जान-पहचान वाले लोग अत्यन्त अचम्भित हो गए। उनके अचम्भित होने के पीछे एक कारण था। दरअसल हमारा मंच सबसे अलग-थलग और विशेष दिख रहा था। दरअसल हमने जाने-अनजाने में आज के 'मेटावर्स' का लघु (Mini) प्रारूप (Prototype) मंच में उतार दिया था। हमारी अन्तर्जालीय ख़ास जान-पहचान के लोगों में अधिकतर मंच मॉडरेटर, एडमिन और ओनर हुआ करते थे। इनकी गणना विशिष्ट व्यक्तियों में हुआ करती थी। अतः इनके आगमन पर इनके स्वागत के लिए मंच पर इन्हें सलामी देने का विशेष इन्तेजाम किया गया था। दरअसल मंच में किसी विशिष्ट व्यक्ति के लॉगिन करते ही होमपेज पर सलामी देता हुआ एक गिफ़ (Gif) इमेज प्रकट हो जाता था और नीचे यह भी लिखकर आ जाता था कि किसे सलामी दी जा रही है। सलामी देखकर सभी सदस्य समझ जाते थे कोई विशिष्ट व्यक्ति मंच पर आया है। हमारे मंच का प्रतीक एक झण्डा भी था जो किसी सदस्य की मृत्यु पर झुका दिया जाता था और उसकी आइ०डी० को मंच के कब्रिस्तान में राजकीय सम्मान के साथ दफ़न कर दिया जाता था। इसके अतिरिक्त हमने उस समय के विख्यात टी०वी० शो 'डील ऑर नो डील' को गेम बनाकर मंच में उतार दिया था जिसे खेलने पर ढ़ेर सारा कॉइन मिलता था। मंच में एक शॉपिंग माल भी था जिसमें इन कॉइन के बदले हवाई जहाज़ से लेकर हथियार तक बिका करता था। मंच पर आज के गूगल कॉन्टेक्ट से बेहतरीन एक फ़ोन बुक भी था जिसमें अपने मोबाइल में किसी नम्बर को सेव किए बिना ही एन्क्रिप्ट करके सीधे ऑनलाइन सेव किया जा सकता था और वहीं से किसी नम्बर को डॉयल भी किया जा सकता था।

  2. #22
    कांस्य सदस्य superidiotonline's Avatar
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    हमारे मंच में 'मेटावर्स' का लघु (Mini) प्रारूप (Prototype) समाविष्ट (Included) होने के कारण मंच को दिन दूना रात चौगुना की गति से प्रगति करना चाहिए था, किन्तु ऐसा न हो सका। फ़ेसबुक की बढ़ती हुई लोकप्रियता के कारण अन्तर्राष्ट्रीय गपाष्टक मंचों के सदस्यों की संख्या तेज़ी से घटती जा रही थी जिसके कारण कई मंच बन्द हो चुके थे और कुछ बन्द होने की कगार में खड़े थे। सदस्यों की कमी के कारण 'मोपाइलट', 'वैपाक', 'लीकल्ट', 'फ़ीनिक्स फ़ायर' और 'मास्टरमाइंड' जैसे बड़े मंच भी आश्चर्यजनक रूप से बन्द हो गए। स्पष्ट है- फ़ेसबुक के भयानक तूफान में जब बड़े-बड़े दिग्गज बह गए तो हमारी क्या बिसात थी। सन्दर्भवश यह भी बता दें कि वैप मंचों की लोकप्रियता के उस दौर में सदस्यों में एडमिन या मॉडरेटर बनने का बड़ा ही जुनून (Craze) हुआ करता था। हमारी अन्तर्राष्ट्रीय लोकप्रियता को देखते हुए हमारे पास एडमिन बनने के तमाम प्रस्ताव आते रहते थे, लेकिन हम ऐसे प्रस्तावों को स्वीकार करने के स्थान पर अपनी किसी दोस्त लड़की को वहाँ का एडमिन बनवा दिया करते थे। हम ऐसा इसलिए करते थे क्योंकि हमें एडमिन या मॉडरेटर बनने का नहीं, 'गॉडफ़ादरी' करने का शौक़ था। एक समय तो ऐसा भी था कि जब हर मंच पर हमारी जान-पहचान वालियाँ ही एडमिन हुआ करती थीं। अपनी इस 'गॉडफ़ादरी' के कारण हम अप्रत्यक्ष रूप से अन्तर्राष्ट्रीय मंचों के एक ऐसे महासचिव बन गए थे जिसकी मर्ज़ी के बगैर कोई पत्ता भी नहीं खड़क सकता था। एडमिन या मॉडरेटर बनते तो एक ही मंच पर हमारा सिक्का चलता, किन्तु अपनी 'गॉडफ़ादरी' के कारण हर जगह चल रहा था। अपनी इस 'गॉडफ़ादरी' के शौक़ के चलते ही हमने मायानगरी की राजकुमारी को प्रकट किया, किन्तु शहर में ढ़ाई लाख आशिक़ों वाली गर्लफ्रेंड ने बीच में घुसकर सब माठा कर दिया। दूसरों का भला करना कोई गलत काम है क्या? अब तो इस बिन्दु पर भी जाँच-पड़ताल चल रही है कि कहीं इस मायानगरी को खुद शहर में ढ़ाई लाख आशिक़ों वाली गर्लफ्रेंड ने हमारे लिए न रचा हो, क्योंकि शहर में ढ़ाई लाख आशिक़ों वाली गर्लफ्रेंड को इस तरह की खुराफात करने में बहुत मज़ा आता है।

  3. #23
    कांस्य सदस्य superidiotonline's Avatar
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    बता दें कि सिर्फ़ मोबाइल फ़ोन पर चलने वाले इन गपाष्टक मंचों को वैप साइट (Wap Site) कहा जाता था, क्योंकि ये साइट एच०टी०एम०एल० कोडिंग पर नहीं, मोबाइल फ़ोन के लिए विशेष रूप से बनाई गई डब्ल्यू०ए०पी० (Wap Application Protocol- WAP) कोडिंग और बैक एंड में सी०जी०आई० (CGI) कोडिंग पर चलती थीं। कुछ वैप साइट्स बैक एंड में ए०एस०पी० और पी०एच०पी० पर भी चला करती थीं। इन वैप साइट्स को कम्प्यूटर में देखने के लिए एक विशेष एम्युलेटर (Emulator) का प्रयोग करना पड़ता था। उस समय किसी वैप साइट को कम्प्यूटर पर उपलब्ध कराने के लिए एकदम अलग से एच०टी०एम०एल० में कोडिंग करनी पड़ती थी, किन्तु आज कम्प्यूटर, मोबाइल और टैबलेट के लिए एक ही एच०टी०एम०एल० कोडिंग का उपयोग किया जाता है और सी०एस०एस० के फ्रेमवर्क 'बूटस्ट्रैप' या 'डब्ल्यू3सीएसएस' की सहायता से डिवाइस कम्पैटबल बना दिया जाता है। भारत गणराज्य के चुनिंदे महानगरों में वर्ष 2000 से ही मोबाइल से सर्फिंग करने की सुविधा सीधे जी०पी०आर०एस० (GPRS) के माध्यम दे दी गई थी। इस जी०पी०आर०एस० को ही 2G कहते हैं। मज़ेदार बात ये है कि भारत गणराज्य के लोगों ने कभी 1G देखा ही नहीं। तो आज हम आपको बता ही देते हैं कि 1G कैसा होता था। यह मोबाइल पर बहुत ही धीमी गति से चलने वाला इंटरनेट होता था जिसे डायलिंग पद्धति से कनेक्ट किया जाता था और इसका दाम भी कॉल करने से अधिक महँगा हुआ करता था।

  4. #24
    कांस्य सदस्य superidiotonline's Avatar
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    वैसे तो चुनिंदे महानगरों में वर्ष 2000 से ही मोबाइल पर 2G सेवा उपलब्ध थी, किन्तु रिलायंस मोबाइल के अत्यन्त द्रुत गति से चलने वाले इंटरनेट की नई तकनीक सी०डी०एम०ए० के साथ मैदान में कूदने के बाद मोबाइल इंटरनेट की दुनिया में एक नई क्रांति आ गई। यह क्रांति इतनी बड़ी थी कि युनाइटेड किंगडम से संचालित गपाष्टक मंचों- 'प्रोडिजिट्स' और 'वैपाक' के सर्वर ध्वस्त हो गए। 'वैपाक' के संचालक 'राब' ने तत्काल कार्यवाही करते हुए भारत गणराज्य के लिए साइन-अप की व्यवस्था को बन्द कर दिया। 'प्रोडिजिट्स' के संचालक 'अहमत' ने बार-बार सर्वर अपग्रेड करके व्यवस्था को दुरूस्त करने का प्रयत्न किया, किन्तु भारत गणराज्य के यूजर्स की संख्या दिन-दूनी रात चौगुनी बढ़ रही थी। लगभग डेढ़ वर्ष तक जूझने और दम पकड़ने के बाद 'अहमत' की हिम्मत जवाब दे गई और रिलायंस के सभी IPs और डिवाइस को बैन कर दिया गया, जिसके बाद भारतीय गपाष्टक प्रेमियों में हाहाकार मच गया। जिसे देखो वही 'अहमत' को अमेरिकन गपाष्टक मंच 'मोपाइलट' पर गाली दे रहा था। 'मोपाइलट' के हेड एडमिन 'आई०क्यू०' जो मुम्बई में रहते थे, इन गालीबाज़ों से अत्यन्त त्रस्त हो चुके थे। 'आई०क्यू०' का मुम्बई में घड़ी का एक शोरूम था। बेचारे कब तक बीच-बीच में घड़ियाँ बेचना बन्द करके इन गालीबाज़ों से निपटते? मामले को सुलझाने के लिए हमने सभी गालीबाज़ों को कुछ समय के लिए एक दूसरे ब्रिटिश गपाष्टक मंच 'लीकल्ट' पर जाने का परामर्श दिया और 'प्रोडिजिट्स' के संचालक 'अहमत' को भेजे गए अपने संदेश में नस्लीय भेदभाव (Racial Discrimination) का आरोप लगाते हुए कहा कि 'आई०पी० बैन करके आप देश के आधार पर नस्लीय भेदभाव करके अन्तर्जाल में नस्लीय भेदभाव को बढ़ावा दे रहे हैं।' नस्लीय भेदभाव का आरोप लगते ही 'अहमत' ने तिलमिला कर सफाई देते हुए कहा कि 'यह नस्लीय भेदभाव का मसला नहीं है। कोई बग है जिसे हम जल्दी ही ठीक कर देंगे। एक सी०डी०एम०ए० डिवाइस के अलावा बाकी सभी जगहों पर हमारी सेवाएँ पहले की तरह उपलब्ध हैं।' हमें पता था कि नस्लीय भेदभाव का आरोप लगने के बाद 'अहमत' को सफ़ेद झूठ तो बोलना ही था। बहरहाल हमने सभी गपाष्टक प्रेमियों को रिलायंस की जगह जी०एस०एम० मोबाइल का इस्तेमाल करने की सलाह दे दिया।

  5. #25
    कांस्य सदस्य superidiotonline's Avatar
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    फेसबुक की बढ़ती हुई लोकप्रियता के कारण एक-एक करके सारे गपाष्टक मंच तबाह हो गए जिसके कारण हमारी सारी 'गॉडफादरी' भी घुस गई। 'गॉडफादरी' का अन्तर्राष्ट्रीय धंधा बन्द हो जाने के कारण हमने निर्णय लिया कि 'चलो, फेसबुक में ही घुस कर देखा जाए। क्या है इसमें?' हमने आनन-फानन में झट-पट-चट फटाफट एक फेसबुक आई०डी० बनाई और अंदर घुस गए। अन्दर जाने पर पता चला कि यहॉं पर तो गुलामी की प्रथा है। गपाष्टक मंचों वाली स्वतन्त्रता फेसबुक में तो कतई नहीं है। गपाष्टक मंचों में पढ़ाकू मुर्गे पहले से इस इन्तेज़ार में बैठे रहते हैं कि कब कोई आकर पोस्ट का दाना फेंके और हम चुगकर निकल जाएँ। फेसबुक के वॉल पर कुछ लिखो भी तो उसे पढ़ेगा कौन? अपना लिखा पढ़वाने के लिए जाकर पढ़ाकू मुर्गा फाँसो। पढ़ाकू मुर्गा फँसाने की खोज में हम निकले तो पता चला कि फ़ेसबुक के लोग बहुत चंट हैं। कोई किसी का पढ़ाकू मुर्गा बनना ही नहीं चाहता। सभी चाहते हैं कि दूसरे उनका पढ़ाकू मुर्गा बन जाएँ और वो कभी न बनें। दूसरों को अपना पढ़ाकू मुर्ग़ा बनाने के लिए उनके फ़ेसबुक वाल पर 'गुलाम बनो' नामक एक बटन था जिसका नाम सभ्य भाषा में 'फॉलो' लिखा हुआ था। हमने सोचा कि 'चलो, गुलाम बनकर अगर दूसरे के वाल पर कुछ लिखने का सुनहरा मौका मिलता है तो क्यों छोड़ा जाए?' गुलाम बनने के बाद पता चला कि फेसबुक के गुलाम नाम के ही नहीं, काम के भी गुलाम थे। गुलामों को लिखने की अनुमति बिल्कुल भी नहीं थी। गुलामों को सिर्फ़ 'लाइक' बटन दबाकर जी-हुजूरी करने का अधिकार प्राप्त था। संक्षेप में- फ़ेसबुक के संचालक 'मार्क जुकरबर्ग' ने एक स्वतन्त्र अन्तर्जालीय समुदाय (Internet Community) को बड़ी ही चालाकी से गुलामी-प्रथा के अधीन लाकर गुलाम बना दिया था और भोला-भाला अन्तर्जालीय समुदाय इस चालाकी को समझे बिना गुलाम बनकर दूसरों की जी-हुजूरी करने में लग गया था। इस अत्याधुनिक ज़माने की अन्तर्जालीय गुलामी-प्रथा को देखकर हमारा तो खून खौल गया।

  6. #26
    कांस्य सदस्य superidiotonline's Avatar
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    और अधिक छानबीन करने पर पता चला कि फेसबुक पर कुछ दयालु-कृपालु प्रवृत्ति के लोग भी थे जिन्होंने अपने गुलामों को 'जी-हुजूरी' के साथ-साथ लिखने की सुविधा भी दे रखी थी, किन्तु अधिकतर लोग चंट स्वभाव के ही थे और उन्हें दूसरों को अपनी गुलामी करवाने में ही अधिक आनन्द आता था। जिसके गुलाम बहुत अधिक होते उसका क़द बहुत बड़ा माना जाता था। निरन्तर शोध करने के उपरान्त पता चला कि दूसरों को अपना पढ़ाकू मुर्ग़ा बनाने के लिए उन्हें अपना दोस्त बनाना पड़ता था, किन्तु इसमें भी एक पेंच था। दसरअसल किसी को अपना दोस्त बनाने के लिए 'पढ़ाकू मुर्ग़ा बनाएँ' नामक एक बटन होता था जिसका सभ्य भाषा में 'दोस्त बनाएँ' नामकरण कर दिया गया था। इस बटन को दबाने पर पूछा जाता था कि 'आप क्या इस शख्स को जानते हैं? कृपया अपने जान-पहचान वालों को ही पढ़ाकू मुर्ग़ा बनाएँ।' लो जी, अब हम इतने जान-पहचान वाले कहाँ से पकड़ कर लाएँ जिन्हें 'पढ़ाकू मुर्गा' बनाया जा सके? और फिर पढ़ाकू मुर्ग़ा बनने की काबिलियत हर किसी में नहीं होती। हमारे दोस्त-यार और जान-पहचान वाले ज्ञान कम होने की वजह से अन्तर्जाल के नाम पर ऐसा भड़कते थे जैसे लाल कपड़ा देखकर साँड भड़कता है। वैसे कुछ दोस्त-यार और जान-पहचान वाले अन्तर्जाल के प्रेमी थे तो भी उन्हें अपना 'पढ़ाकू मुर्गा' बनाने में हमें ख़तरा ही ख़तरा नज़र आ रहा था। हमारी अन्तर्राष्ट्रीय 'गॉडफ़ादरी' के ज़माने में इन कम्बख़्तों ने हमारी लुटिया डुबाने में कोई कसर न छोड़ी थी। एक बार जब हम ब्रिटिश गपाष्टक मंच 'लीकल्ट' में भारत गणराज्य की साख बनाए रखने के लिए एक सूत्र के जरिए अँग्रेजों को गर्व से ये बता रहे थे कि 'इस समय हम फाइव स्टार होटल में डिनर कर रहे हैं' तो उसी वक्त एक कम्बख़्त दोस्त ने 'अमें यार, आज रात ब्रेड-ऑमलेट से काम चला लेंगे' छापकर हमारी भद्द उड़ा दी! हमने भी तत्काल अपनी 'गॉडफ़ादरी' की शक्तियों का प्रयोग करते हुए एक अँग्रेज़ एडमिन 'ब्लेडरनर' को संदेश भेजकर 'लीकल्ट' से उसकी आई०डी० बैन करने के लिए कहा। 'ब्लेडरनर' ने भी तत्काल कार्यवाही करते हुए उस धूर्त दोस्त की आई०डी० को शहीद करके हमें 'डन एंड डस्टेड' जवाबी मैसेज भेज दिया। बता दें कि उस समय हमारी साख इतनी ज़्यादा थी कि किसी को बैन करने का उपयुक्त कारण भी हमसे नहीं पूछा जाता था। हमें सिर्फ़ 'बैन फलाने-ढ़िमाके' ही लिखना पर्याप्त होता था। वैसे हम भारत गणराज्य की साख बनाए रखने के लिए तमाम फ़र्ज़ी पोस्ट छापते रहते थे। जैसे- 'मैं अपने हैलीकॉप्टर का रंग बदलवाना चाहता हूँ। कौन सा रंग उपयुक्त रहेगा? कृपया सुझाव दें।', इत्यादि।

  7. #27
    कांस्य सदस्य superidiotonline's Avatar
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    तो इस प्रकार दोस्तों-यारों, जान-पहचान वालों और मोहल्ले वालों को अपना 'पढ़ाकू मुर्ग़ा' बनाना ख़तरे से खाली नहीं था। अन्तर्राष्ट्रीय गपाष्टक वैप मंचों के काल में सिर्फ छद्म नाम या उपनाम (Nick Name) रखने का चलन था और अपने असली नाम को उजागर करने की कोई बाध्यता भी नहीं थी। लोगों को अपना असली नाम बताना, न बताना- सब कुछ आपकी मर्ज़ी पर निर्भर करता था। उदाहरण के लिए आज भी इस मंच पर छद्म नाम की पुरानी परम्परा ही चली आ रही है। फ़ेसबुक के संचालक 'मार्क जुकरबर्ग' ने अपनी सड़ी खोपड़ी का प्रयोग करते हुए फ़ेसबुक में अपना असली नाम लिखना अनिवार्य कर दिया और छद्म नाम की परम्परा को ख़त्म कर दिया। इसके पीछे तर्क यह दिया गया कि असली नाम होगा तभी तो आपके दोस्त-यार और जान-पहचान वाले आपको पहचान कर आपके मित्र बनेंगे। इस नई व्यवस्था में सबसे बड़ा ख़तरा संभावित दुश्मनों द्वारा पहचान लिए जाने का था। इस खतरे से निपटने के लिए हमारे पास उपाय पहले से ही था। अमूमन लेखकों का एक पेन नेम भी हुआ करता है। हमने अपने पेन नेम को फ़ेसबुक का नाम बना दिया और संभावित ख़तरे से सुरक्षित हो गए। हमारे मुँह से 'ख़तरा-ख़तरा' सुनकर लोगों को हँसी-मज़ाक लग रहा होगा, किन्तु यह ख़तरा कितना बड़ा हो सकता है, वह भी आज हम बताए देते हैं ठोस सुबूतों के साथ। इस खतरे को सुनकर आपकी रूह काँप जाएगी। राजस्थान के उदयपुर शहर में कन्हैया लाल साहू पेशे से टेलर था। पूर्व बीजेपी प्रवक्ता नूपुर शर्मा द्वारा पैगम्बर मोहम्मद को लेकर एक विवादित टिप्पणी करने के बाद कन्हैयालाल ने नूपुर शर्मा के समर्थन में सोशल मीडिया पर एक पोस्ट किया था, जिसके बाद पुलिस ने उसे गिरफ्तार कर लिया था। 15 जून, 2022 को कन्हैयालाल को जमानत भी मिल गई थी, किन्तु कन्हैयालाल लोगों के निशाने पर आ गया था। इसी को लेकर कथित तौर पर दो लोगों ने मिलकर कन्हैयालाल की निर्मम हत्या कर दी। इसका जिम्मेदार कौन है? स्पष्ट रूप से इसका कारण फ़ेसबुक के संचालक 'मार्क जुकरबर्ग' द्वारा सोशल मीडिया में चलाई गई वह नूतन परम्परा है जिसमें लोगों से अपना नाम और पहचान उजागर करने की बात कही गई है। यदि सोशल मीडिया में उपनाम की पुरानी व्यवस्था कायम रहती तो कन्हैयालाल को पहचान पाना आम आदमी के बस का तो बिल्कुल नहीं था। केवल जाँच एजेंसियाँ ही उसे पहचान पातीं। वस्तुतः सोशल मीडिया में असली नाम और पहचान उजागर होने के कारण ही कन्हैयालाल की हत्या करना सम्भव हो सका। स्पष्ट है- कन्हैयालाल की हत्या का मुख्य कारण सोशल मीडिया ही है। सोशल मीडिया के सम्भावित ख़तरों को भाँपकर ही शहर में ढ़ाई लाख आशिकों वाली गर्लफ्रेंड अपनी टाइमलाइन में किसी गम्भीर मुद्दे पर कभी भी कोई टिप्पणी नहीं करती और सिर्फ़ चुटकुले तथा आर०आइ०पी० छापकर अपने 'सोशल मीडिया कर्तव्य' की इतिश्री कर लेती है और जब दिल की भड़ास निकालने का मन करता है तो अपनी आइ०डी० छिपाकर गपाष्टक मंचों पर जाकर अपने दिल की भड़ास जमकर निकालती है।

  8. #28
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    सोशल मीडिया में नाम और पहचान उजागर करने से होने वाले सम्भावित ख़तरों को अपनी दूरदृष्टि से भाँपकर हमने पहला कदम उठाते हुए सारे दोस्तों-यारों, जान-पहचान वालों, गली-मोहल्ले वालों को ढूँढ़-ढूँढ़कर फ़ेसबुक से ब्लॉक करके चैन की साँस लिया और फिर फ़ेसबुक के तथाकथित 'नियमानुसार(?)' उन 'पढ़ाकू मुर्गों' की तलाश में लग गए जिन्हें हम तो जानते हों, मगर वो हमें न जानते हों। फ़ेसबुक का नियम तो सिर्फ़ इतना ही कहता है कि 'क्या आप इन्हें जानते हैं?' ये थोड़े ही कहता है कि उनका भी आपको जानना ज़रूरी है। जल्दी ही हमारी वक्रदृष्टि उन तमाम लोगों पर केन्द्रित हो गई जिन्हें हम अच्छी तरह से जानते-पहचानते थे, किन्तु वे हमें बिल्कुल नहीं जानते थे। हमने फ़टाफट सारे लोगों की एक सूची बना ली। हमारी जान-पहचान वाली सूची में हॉलीवुड, बॉलीवुड, टॉलीवुड, कोलीवुड, मॉलीवुड और सैंडलवुड के तमाम अभिनेता, अभिनेत्रियाँ, निर्माता, निर्देशक, गीतकार और संगीतकार शामिल थे। भाग्यवश हम सभी को जानते थे और दुर्भाग्यवश उनमें से कोई भी हमें नहीं जानता था! इसके अतिरिक्त हमारी सूची में देश-विदेश के नेता भी शामिल थे जिन्हें हम खूब अच्छी तरह से जानते थे। हमारे द्वारा बनाई गई 'जान-पहचान सूची' पर हमें अत्यधिक गर्व हुआ, क्योंकि हम ब्रिटेन के प्रधानमंत्री से लेकर अमेरिका के राष्ट्रपति तक को जानते थे! पता नहीं कैसे हमारी इस महान योजना की भनक 'मार्क जुकरबर्ग' को लग गई और फ़ेसबुक के नियम रातों-रात बदल दिए गए। नए नियम के अनुसार अब आप उन्हीं लोगों को अपना 'पढ़ाकू मुर्ग़ा' बना सकते थे जो आपको भी जानते हों। हम तत्काल समझ गए कि फ़ेसबुक पर 'गॉडफ़ादरी' नहीं, सिर्फ़ 'चपरासीगीरी', 'गुलामी' और 'जी-हुजूरी' ही चलेगी। शोध करने पर पता चला कि कुछ चंट किस्म के लोग सोशल मीडिया का प्रयोग अपना धंधा चमकाने और अपना भौकाल बनाने के लिए करते हैं तथा बेचारे भोले-भाले सीधे-सादे लोग इनकी गुलामी में फँसकर ताउम्र जी-हुजूरी करते रहते हैं। इन बेचारे महामूर्ख जाहिल गुलामों को पता ही नहीं होता कि जिस चंट के जितने अधिक गुलाम होते हैं, उसका उतना ही बड़ा क़द और बड़ा नाम समझा जाता है। सच्चा वाला प्यार की तरह सच्ची वाली दोस्ती तो सिर्फ़ गपाष्टक मंचों में ही होती है, क्योंकि यहाँ पर कोई किसी का 'पढ़ाकू मुर्ग़ा' या ग़ुलाम नहीं होता। सभी 'पढ़ाकू मुर्ग़े' स्वतन्त्र होते हैं और एक ही थाली में बैठकर पोस्ट का दाना चुगकर ज्ञान की भूख शान्त करते हैं!

  9. #29
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    हम फ़ेसबुक की गुलामी-प्रथा से अत्यन्त निराश होकर थक-हारकर बैठे ही थे कि उसी समय 'शहर में ढ़ाई लाख आशिक़ों वाली गर्लफ्रेंड' हमसे टकरा गई। उस समय शहर में उसके एक लाख आशिक़ ही हुआ करते थे। वह एक मंच पर कॉमेडी में अँग्रेज़ी के कुछ वाक्यों का सूक्ष्म ज्ञान बाँट रही थी और एक लाख आशिक़ बड़े ध्यान से मन लगाकर सुन रहे थे। भाषण के अन्त में उसने सभी को फ़ेसबुक पर अपना ग़ुलाम बनने का आमंत्रण दिया। हमें भाषण बहुत पसन्द आया था। हमने सोचा यह तो बढ़िया है- यदि कॉमेडी में अँग्रेज़ी का सूक्ष्म ज्ञान निःशुल्क बँट रहा है तो गुलामी करने में क्या हर्ज है? और अधिक सूक्ष्म अँग्रेज़ी ज्ञान के लालच में हमने फटाफट 'गुलाम बनो' का बटन दबाया और कूदकर उसकी टाइमलाइन पर जा पहुँचे। उस समय टाइमलाइन पर जो कुछ चल रहा था उसे देखकर हम अवाक रह गए। टाइम लाइन पर कॉमेडी में अँग्रेज़ी का सूक्ष्म ज्ञान बँटने के स्थान पर गुलामी-प्रथा को प्रोत्साहित किया जा रहा था। 'शहर में ढ़ाई लाख आशिक़ों वाली गर्लफ्रेंड' ने अपनी टाइमलाइन पर लिखा था- 'जो लोग मुझे पसन्द करते हों वो अपने हाथ उठाएँ, नहीं तो हाथ काट दिए जाएँगे।' हम यह देखकर दंग रह गए कि बेचारे बेज़ुबान ग़ुलाम धड़ाधड़ लाइक ठोंककर गुलामी बजा रहे थे। चूँकि गुलामों को टाइमलाइन पर लिखने की अनुमति नहीं थी इसलिए हमने 'शहर में ढ़ाई लाख आशिक़ों वाली गर्लफ्रेंड' को भेजे गए अपने डी०एम० में कड़ा विरोध प्रकट करते हुए कहा कि 'बड़े क़द वालों को इस तरह की बातें टाइमलाइन पर लिखना बिल्कुल शोभा नहीं देता। लगता है कि मैं गलत जगह पर आ गया हूँ।' फिर क्या था? 'शहर में ढ़ाई लाख आशिक़ों वाली गर्लफ्रेंड' बड़ी समझदार थी और वह तुरन्त हमारी दमदार बात को समझ गई। उसे हमसे 'लव एट फ़र्स्ट डी०एम०' हो गया। उसने तत्काल अपना मोबाइल नम्बर न देकर अपनी चार सहेलियों का मोबाइल नम्बर हमें टिका दिया और उन्हें फ़ेसबुक पर हमारा फ्रेंड भी बनवा दिया। इतनी दिलदार गर्लफ्रेंड किसी की होगी क्या? किसी की हो तो ज़रूर बताइएगा। वैसे मोबाइल नम्बरों की हेरा-फेरी के पीछे का चक्कर हम तत्काल समझ गए थे। इसीलिए हम 'शहर में ढ़ाई लाख आशिक़ों वाली गर्लफ्रेंड' से उसके आफ़िस के लैंडलाइन पर सीधे बात कर लेते थे, किन्तु इसमें भी एक पेंच था। 'शहर में ढ़ाई लाख आशिक़ों वाली गर्लफ्रेंड' से बात करने के लिए उसके पी०ए० से काफी देर तक बहस करनी पड़ती थी। आगे क्या हुआ- ये तो हम नहीं बताएँगे, किन्तु मज़ेदार बात यह है कि कई साल पहले अपनी 'गॉडफ़ादरी' के ज़माने में हमने भी एक विदेशी गपाष्टक मंच में यही लिखा था कि 'मुझे यहाँ पर कौन-कौन पसन्द करता है?' अपनी लिखी हुई बात को भूलकर हम 'शहर में ढ़ाई लाख आशिक़ों वाली गर्लफ्रेंड' को उपदेश बाँटने लगे थे। इसी को कहते हैं- 'पर उपदेश कुशल बहुतेरे।'

  10. #30
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    अब तक पाठकगण यह बात अच्छी तरह से समझ गए होंगे कि हमारे अथाह ज्ञान का मुख्य स्रोत हमारे अन्दर उपस्थित ईश्वरप्रदत्त एक 'अद्भुत हगीय गुण' ही है। यह अलग बात है कि हम 'शहर में ढ़ाई लाख आशिक़ों वाली गर्लफ्रेंड' और उससे पहले अमेरिकन बनी 'सवा शेरनी' से कुछ नहीं हगा सके। हमें लगता तो यही है कि ये दोनों एक ही हैं, किन्तु हमारे पास इस बात का कोई अकाट्य प्रमाण नहीं है। तो इस प्रकार पाठकों को विश्व के मोबाइल गपाष्टक मंचों के इतिहास और उनके डूबने की दर्दनाक कहानी के बारे में भी थोड़ी बहुत जानकारी मिल गई। यह जानकारी आपको कहीं से मिलने वाली नहीं है, क्योंकि इस बारे में आज तक किसी ने कुछ लिखा ही नहीं है। इस इतिहास में एक जानकारी छूट गई है, वो भी बताए देते हैं। फ़ेसबुक से एक माह पहले ही वर्ष 2004 में गूगल ने एक सोशल नेटवर्किंग साइट लॉंच किया था जिसका नाम 'ऑर्कुट' था। फ़ेसबुक से कड़ी प्रतिस्पर्धा के चलते इसे वर्ष 2014 में बन्द कर दिया गया। 'ऑर्कुट' के बाद वर्ष 2011 में गूगल ने एक दूसरी सोशल नेटवर्किंग साइट भी लॉंच की थी जिसका नाम 'गूगल प्लस' था, किन्तु फ़ेसबुक के सामने यह भी टिक न सका और इसे वर्ष 2019 में बन्द कर दिया गया। ध्यान देने योग्य बात यह है कि 'गूगल प्लस' में फ़ेसबुक की तरह गुलामी-प्रथा बिल्कुल नहीं थी और इसमें 'सर्किल्स' हुआ करते थे। अब यक्ष-प्रश्न यह है कि क्या 'फ़ेसबुक' को वॉट लगाने वाला कोई नहीं है? तो इसका जवाब- है क्यों नहीं। एक ओर 'फ़ेसबुक' को 'ट्विटर' धड़ाधड़ वॉट लगा रहा है, क्योंकि इसमें गुलामी-प्रथा होते हुए भी, एक तरह से नहीं है। 'ट्विटर' में बिना किसी का ग़ुलाम बने किसी की भी टाइमलाइन पर लिखा जा सकता है। दूसरी ओर 'यूट्यूब' लगातार 'फ़ेसबुक' को चुनौती दे रहा है। 'यूट्यूब' की चर्चित 'नोट कमाऊ पद्धति- मोनेटाइजेशन' से घबड़ाकर 'फ़ेसबुक' ने भी यह सुविधा उपलब्ध करा दी है।

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