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Thread: एक्ट्रा मैरिटल अफ़ेयर्स में सेक्स लाइफ़ कैसे मैनेज करें?

  1. #31
    कांस्य सदस्य superidiotonline's Avatar
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    वस्तुतः 'यूट्यूब' के कारण लोगों में सुनने की लत लग गई है। अब लोग पढ़ना कम, सुनना अधिक पसन्द कर रहे हैं। अँग्रेज़ी माध्यम से पढ़ाई करने और सुनने की लत होने के कारण हिन्दी लगातार गर्त में जा रही है। पढ़ना कोई नहीं चाहता जिसके कारण आज हिन्दी उपन्यासों और कहानियों की तो पूरी तरह से वॉट लग चुकी है। अपने हिन्दी प्रेम के चलते अँग्रेज़ी माध्यम से पढ़े-लिखे कुछ युवा अन्तर्जाल में गलत-सलत हिन्दी छाप रहे हैं। इस गलत-सलत हिन्दी को पढ़कर दूसरे लोग भी उसे सही समझ बैठते हैं। अपने हिन्दी प्रेम के कारण ही बेचारी 'शहर में ढ़ाई लाख आशिक़ों वाली गर्लफ्रेंड' अपनी अँग्रेज़ी की गाढ़ी कमाई को हिन्दी के विकास में फूँक रही है। हिन्दी में चन्द्रबिन्दु (ँ) को बड़े-बड़े हिन्दी समाचार-पत्र भी भूल चुके हैं। किसी शब्द के ऊपर बिन्दी लगाने के नियमों को भी लोग पूरी तरह से भूल चुके हैं। आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि 'पंचनामा को 'पञ्चनामा और 'कंगारू' को 'कङ्गारू' लिखा जाना चाहिए। हिन्दी उर्दू नहीं है जो इसमें मात्राओं को नज़रअन्दाज कर दिया जाए। उर्दू में इसकी मात्राओं ज़बर ('आ' की मात्रा), ज़ेर ('इ' की मात्रा) और पेश ('उ' की मात्रा) को लगाने का चलन नहीं है। इसीलिए उर्दू में 'किताब' को 'कताब' और 'गुलाब' को 'गलाब' लिखा जाता है, किन्तु व्यवहारिक अनुमान और ज्ञान के आधार पर उसका सही उच्चारण किया जाता है। हमारे उर्दू ज्ञान को देखते हुए पाठकगण हमें उर्दू का गुरू-घण्टाल समझने की भूल कदापि न करें। बस ज़रूरत भर का थोड़ा बहुत उर्दू ज्ञान है हमारे पास। हिन्दी में ऐसा नहीं है। केवल चन्द्रबिन्दु के हेर-फेर से हिन्दी शब्दों का उच्चारण और उसका अर्थ भी बदल जाता है। उदाहरण के लिए क्या आपको 'हंस' और 'हँस' में कोई फ़र्क नज़र नहीं आता? 'हंस' को अँग्रेज़ी में 'SWAN' कहते हैं और 'हँस' को अँग्रेज़ी में 'LAUGH' कहते हैं। अब इस वाक्य को पढ़िए- 'कौए को हंस की चाल चलता देखकर वह हँस पड़ा।' क्या इस वाक्य में दोनों 'Hans' का उच्चारण और अर्थ एक समान है? नहीं न। इसी प्रकार चन्द्रबिन्दु का सही उच्चारण न जानने के कारण लोग 'संकरी' और 'सँकरी' का उच्चारण करने में बहुत गलती करते हैं। 'संकरी' का अर्थ 'Cross-breed' होता है जबकि 'सँकरी' का अर्थ 'Narrow' होता है। जैसे- 'यह एक सँकरी गली है।'

  2. #32
    कांस्य सदस्य superidiotonline's Avatar
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    इधर-उधर की बातें बहुत हो गईं। अब आते हैं चर्चा के मुख्य विषय पर। दोहरी मानसिकता वाले युवकों की परम्परागत पुरातन मानसिकता के अनुरूप उन्हें 'अच्छी सी फैमिली गर्ल' मिले, न मिले किन्तु उनकी अत्याधुनिक मानसिकता के कारण कुछ लड़कियाँ अपने आप को ठगा सा महसूस ज़रूर करती हैं। इन युवकों के प्रेम के चक्रव्यूह में उलझकर 'वन नाइट स्टैंड' से शुरू हुआ सफ़र अन्त में 'मल्टिपल नाइट स्टैंड' में बदल जाता है। वैसे तो पश्चिमी देशों के अनुसार 'वन नाइट स्टैंड' की परिभाषा 'दो अनजान लोगों द्वारा एक रात के लिए शारीरिक सम्बन्ध बनाना' होती है, किन्तु यह परिभाषा भारतीय उपमहाद्वीप में कहीं से लागू नहीं होती। भारतीय उपमहाद्वीप की लड़कियाँ किसी अनजान व्यक्ति से बात करने से ही कतराती हैं, शारीरिक सम्बन्ध तो बहुत दूर की कौड़ी है। यदि कोई किसी से प्रेम करती भी है तो भी इतनी आसानी से उसके हत्थे नहीं चढ़ती। महानगरों में प्रायः युवक अपनी गर्लफ्रेंड को पहले दारू-पार्टी के जाल में उलझाते हैं और फिर जब लड़की को नशा चढ़ जाता है तो फिर उसे लेकर बेड पर कूद जाते हैं। दारू के नशे में लड़की सब कुछ भूल जाती है जिसका फ़ायदा उठाकर युवक हिमालय पर्वत की चोटियों पर चढ़कर खाई में छलॉंग लगाने में कामयाब हो जाते हैं। नशा उतरने पर युवक भोला-भाला चेहरा बनाकर दारू के नशे के ऊपर सारा ठीकरा फोड़ते हुए यह कह देते हैं कि 'अरे यार, नशे में ये क्या हो गया?' छोटे शहरों के युवकों का फण्डा भी समझाए देते हैं। छोटे शहरों के युवक अपनी गर्लफ्रेंड को सबसे पहले एक अदद 'किस' के लिए किसी तरह से राजी कर लेते हैं और फिर 'किस' की टाइमिंग को 'बैंग-बैंग' मूवी की तरह इतना अधिक बढ़ा देते हैं कि लड़की को पता ही नहीं चलता कि कब क्या से क्या हो गया! स्पष्ट है- पश्चिम में 'वन नाइट स्टैंड' आकस्मिक रूप से दो अनजान लोगों की सहमति से ही होता है, किन्तु भारतीय उपमहाद्वीप में 'वन नाइट स्टैंड' आकस्मिक न होकर पूरी तरह से सुनियोजित (Organized) और पूर्वनियोजित (Preplanned) ही होता है जिसमें दो लोग बिल्कुल अनजान नहीं होते। इस छद्म 'वन नाइट स्टैंड' की जानकारी शातिर युवकों को पहले से भली-भाँति होती है, किन्तु युवतियाँ इस बात से एकदम अनभिज्ञ रहती हैं। अब महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि ऐसे छद्म आशिक़ों से बचा कैसे जाए? तो इसका संक्षिप्त उत्तर यही है कि दारू-पार्टी से बचा जाए और 'किस' से परहेज रखा जाए।

  3. #33
    कांस्य सदस्य superidiotonline's Avatar
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    यह सब तो अतिरिक्त जानकारी थी जिसमें दोहरी मानसिकता के युवकों की चंट कार्य-प्रणाली (Modus Operandi) की सिर्फ़ एक झलक दिखाई गई। हम चाहते तो संवाद (Dialogues) के साथ इसका वर्णन विस्तार से कर सकते थे, किन्तु जनहित में हमने ऐसा करना उचित न समझा, क्योंकि हमने अपने शोध में यह पाया है कि बहुत से युवकों को चंट कार्य-प्रणाली (Modus Operandi) का पता तो होता है, किन्तु उनके पास वार्तालाप करने के लिए उपयुक्त (Appropriate) संवाद (Dialogues) नहीं होते, जिसके अभाव में वे हाथ मलते रह जाते हैं। अभी तक की चर्चा में यह स्पष्ट हो चुका है कि जब पुरूष अपनी परम्परागत पुरातन मानसिकता के अनुरूप पत्नी पर अधिकार करने का प्रयत्न करने लगते हैं तो रिश्तों में दरार आनी शुरू हो जाती है, चाहे वह 'लव मैरिज' ही क्यों न हो। यह दरार जब और बढ़ जाती है तो पत्नी का 'उड़नछू' हो जाना लगभग तय होता है। यह सब पढ़कर यदि आप पत्नी को घर में नजरबन्द करने की सोच रहे हैं तो हम यह भी बता दें कि आपके लिए तीसरी बुरी ख़बर यह है कि आपकी दाल बिल्कुल नहीं गलने वाली है। आपके इस कृत्य का कोई फ़ायदा आपको मिलने वाला नहीं है। नज़रबन्द किए जाने के बावजूद पत्नी के हाथ में एक अदद मोबाइल फ़ोन तो होगा ही। सोशल मीडिया में हज़ारों-लाखों आलसी किस्म के आशिक़ किसी को पटाने की फिराक़ में चौबीसों घंटा सतर्क होकर जमे रहते हैं। एक दिन आपकी पत्नी का अन्तर्जालीय आशिक़ पुलिस लेकर आएगा और आपकी ऑंखों के सामने ही आपकी पत्नी उसके साथ 'उड़नछू' हो जाएगी। आप सिर्फ़ 'मेरी बीबी.. मेरी बीबी..' ही चिल्लाते रह जाएँगे। इस मामले में कानून भी आपकी कोई मदद नहीं करने वाला। जिन लोगों को नहीं पता उन्हें हम बता दें कि सुप्रीम कोर्ट ने 158 साल पुरानी भारतीय दण्ड संहिता की धारा 497 को रद्द कर दिया है जिसमें विवाहेतर सम्बन्धों (Extra Marital Affairs) को अपराध माना गया है। देश के प्रधान न्यायाधीश ने एडल्टरी लॉ पर फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया कि पति महिला का मालिक नहीं है। यह कानून महिला के जीवन के अधिकार को प्रभावित कर सकता है। लेकिन इस दौरान उन्होंने यह भी कहा कि यह निस्संदेह तलाक का आधार हो सकता है। चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया दीपक मिश्रा, जस्टिस रोहिंगटन नरीमन, जस्टिस ए० एम० खानविलकर, जस्टिस डी० वाई० चन्द्रचूड़ और जस्टिस इन्दु मल्होत्रा की पीठ ने कहा- 'एडल्टरी कानून महिलाओं को पतियों की सम्पत्ति मानता है।' गौरतलब है कि संविधान पीठ ने एकमत से इस मामले में फैसला लिया। सुप्रीम कोर्ट ने कहा- 'यह कानून महिलाओं की चाहत और यौन इच्छा का असम्मान करता है।' सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि- एडल्टरी की वजह से शादी खराब नहीं होती, बल्कि खराब शादी की वजह से एडल्टरी होती है।'

  4. #34
    कांस्य सदस्य superidiotonline's Avatar
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    स्पष्ट है- आप अपनी पत्नी से तलाक़ तो ले सकते हैं, किन्तु कोई बकैती नहीं कर सकते। अब आपके सामने दो ही विकल्प बचते हैं। एक विकल्प 'अरेंज मैरिज' वालों के लिए है और दूसरा विकल्प 'लव मैरिज' वालों के लिए है। 'अरेंज मैरिज' वाले पव्वा चढ़ाकर वर्ष 1982 में लोकार्पित हिन्दी फ़ीचर फ़िल्म 'प्रेम रोग' का गीत 'ये गलियाँ ये चौबारा, यहाँ आना ना दोबारा.. हम तो भए परदेशी, के तेरा यहाँ कोई नहीं..' गीत गाकर अपने दिल की भड़ास मिटा सकते हैं। 'लव मैरिज' वाले अद्धा चढ़ाकर वर्ष 1977 में लोकार्पित हिन्दी फ़ीचर फ़िल्म 'परवरिश' का गीत 'ओ जाते हो जाने जाना.. आखिरी सलाम लेते जाना..' गीत गाकर अपने दिल की गुबार को शान्त कर सकते हैं। कुछ पियक्कड़ यहाँ पर हमारे ऊपर यह आक्षेप (Objection) भी लगा सकते हैं कि 'अरेंज मैरिज वालों को पव्वा और लव मैरिज वालों को अद्धा चढ़ाने की संस्तुति (Recommend) करके हमने सरासर भेदभाव किया है।' तो ऐसा बिल्कुल नहीं है। 'अरेंज मैरिज' में साथी का चयन पूर्णतः शारीरिक रंग-रूप (Physical Appearance) पर आधारित होता है। इस चयन के पीछे का एकमात्र कारक (Factor) सिर्फ़ काम-वासना होती है, न कि प्रेम। अतः अरेंज मैरिज में 'ठुँकाई' से प्रेम प्रकट किया जाता है। आरम्भ में यह एक कैजुअल सेक्स की तरह ही होता है। यहाँ पर प्रेम प्रकट होने की कोई गारंटी भी नहीं होती। जबकि 'लव मैरिज' में ऐसा बिल्कुल नहीं है। यहाँ पर 'ठुँकाई' से पहले प्रेम होता है। एक शोध के अनुसार एक-दूसरे से अधिक प्रेम करने वाले कपल सम्भोग भी अधिक करते हैं। अरेंज मैरिज टूटने पर सिर्फ़ शादी दूटने का ग़म होता है, जबकि लव मैरिज टूटने पर शादी के साथ-साथ प्रेम भी टूट जाता है। स्पष्ट है- लव मैरिज टूटने वालों का ग़म डबल होता है, इसीलिए उन्हें पव्वा की जगह अद्धा चढ़ाने का परामर्श दिया गया। 'अरे भाई, मज़ाक़बाज़ी छोड़कर कोई क़ायदे का कारगर उपाय हो तो बताइए।'--पूछने वालों को अपना जवाब देने से पहले हम उन लोगों को यह भी बता दें जो यह सब पढ़कर अपने मन में पत्नी का मोबाइल फ़ोन ज़ब्त करने का 'सुविचार(?)' बना रहे हैं और अपने मन में यह सोच रहे हैं कि 'न रहेगा बाँस, न बजेगी बाँसुरी', तो आप खुशफ़हमी में हैं। आपके लिए चौथी बुरी ख़बर यह है कि आपके ऊपर आइ०टी० ऐक्ट की धाराओं के तहत पत्नी की मोबाइल से डेटा चुराने का संगीन आरोप भी लग सकता है, चाहे भले ही वह मोबाइल आपने खुद ख़रीदकर पत्नी को गिफ़्ट में क्यों न दिया हो! चलिए, अब कारगर उपाय की बात करते हैं। सबसे पहले 'लव मैरिज' वालों के लिए। लड़कियाँ भाव खाने की बड़ी शौक़ीन होती हैं। याद करिए- आपने अपनी गर्लफ्रेंड को खूब ढ़ेर सारा भाव खिलाकर ही अपनी पत्नी बनाया था, किन्तु पत्नी बनने के बाद भाव खिलाना बन्द कर दिया, या कम कर दिया। यह गलत है। फिर से जबरदस्त ढंग से भाव खिलाना शुरू कर दीजिए। सारी समस्याओं का समाधान हो जाएगा। अब बात करते हैं 'अरेंज मैरिज' वालों की। आपने तो कभी भाव खिलाया ही नहीं। विवाह के बाद क़ायदे से भाव खिलाना शुरू कर करिए। आपकी भी समस्याओं का समाधान हो जाएगा। क्या वाकई भाव खिलाने का यह फ़ण्डा कारगर है या सिर्फ़ हवा-हवाई है? तो इसके लिए एक सत्य घटना का विवरण आगे दिया जा रहा है।

  5. #35
    कांस्य सदस्य superidiotonline's Avatar
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    गत वर्ष एक मित्र द्वारा हमें सूचना मिली कि पुणे निवासी एक शख़्स दोबारा शादी करना चाहते हैं और वे यह जानना चाहते हैं कि शादी कामयाब होगी या नहीं? इस सम्बन्ध में वे ज्योतिषीय परामर्श लेना चाहते थे। हमारे मित्र ने उन्हें हमसे परामर्श लेने का सुझाव दिया। उस शख़्स ने हमसे फ़ोन पर सम्पर्क किया और अपना जन्म-समय का विवरण हमें दे दिया। हमने जन्म-पत्री बनाकर उनके ग्रहों की जाँच-पड़ताल की और दो टूक शब्दों में फ़ोन पर कहा- 'आपकी तो लव मैरिज होनी चाहिए और अभी तक तो आपका डाइवोर्स भी हो जाना चाहिए।'

    हमारे ज्योतिषीय ज्ञान पर गहन आश्चर्य व्यक्त करते हुए उस शख़्स ने प्रसन्नतापूर्वक बताया कि उनकी पहली शादी लव मैरिज ही थी और डाइवोर्स भी हो गया। डाइवोर्स होने के बाद उन्होंने दूसरी लव मैरिज कर ली और दूसरी शादी भी अब खटाई में है। वे जानना चाहते थे कि तीसरी शादी कामयाब होगी या नहीं?

    अब चौंकने की बारी हमारी थी। तो वे दूसरी को डाइवोर्स देकर तीसरी शादी करने का पूरा मन बना चुके थे। उनकी जन्म-पत्री से साफ पता चल रहा था कि उनका व्यवहार ठीक नहीं है जिसके कारण यह समस्या उत्पन्न हुई है, किन्तु इस बात का खुलासा करने का मतलब था- अपने पेट पर लात मारना। उनसे परामर्श-शुल्क के रूप में जो भारी-भरकम रकम थोड़ी देर में हमारे अकाउण्ट में दौड़कर आने वाली थी, वह कभी न आती। लक्ष्मी जी को लात मारकर नाराज़ करने का मतलब था, विष्णु जी भी नाराज़ हो जाते और फिर वे देवी-देवताओं की बैठकी में हमारे खिलाफ़ गाते-बजाते रहते। इस प्रकार हम सभी देवी-देवताओं की वक्रदृष्टि के रडार पर आ जाते।

  6. #36
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    अतः इस 'खुलासे' को दरकिनार करते हुए हमने बताया- 'पहली वाली शादी से दूसरी वाली शादी तो आपकी बहुत अच्छी है।'

    एक बार फिर उन्होंने हमारे अथाह ज्योतिषीय ज्ञान पर गहन आश्चर्य व्यक्त करते हुए प्रसन्नतापूर्वक बताया- 'हॉं-हाँ.. बिल्कुल सही कहा आपने। अब ये बताइए- मेरी तीसरी शादी दूसरी वाली से अच्छी रहेगी या नहीं?'

    अब हमने उस शख़्स को मूर्ख बनाने का पूरा मन बना लिया था, क्योंकि यदि उसे छुट्टे साँड़ की तरह छोड़ दिया जाता तो वह तीसरी-चौथी-पाँचवीं से लेकर सौवीं तक पहुँचकर विश्व रिकार्ड बना सकता था और हमें यह किसी हालत में मंजूर नहीं था।

    हमने सफ़ेद झूठ बोलते हुए कहा- 'सुनिए, आपकी तीसरी शादी पहली से भी बेकार होगी.. और फिर दूसरी वाली का भाग्य बहुत प्रबल है जिसका फल आपको मिल रहा है। दूसरी वाली को यदि आपने छोड़ दिया तो आपकी किस्मत का सितारा भी फूट जाएगा।'

    किस्मत का सितारा फूटने की बात सुनकर उस शख़्स की रूह काँप गई। घबड़ाकर बोले- 'कोई उपाय हो तो बताइए। दूसरी वाली शादी बच जाए।'

  7. #37
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    अब कोई उपाय होता, तभी तो हम बताते। फ़ीस वसूली के लिए कोई न कोई उपाय तो बताना ही था। हमने एक बार फिर सफ़ेद झूठ बोलते हुए कहा- 'गधे की लीद में काला नमक और हल्दी मिलाकर ताबीज़ बना लीजिए और धूपबत्ती दिखाकर गले में पहन लीजिए। सब ठीक हो जाएगा।'

    थोड़ी ही देर में लक्ष्मी जी हमारे अकाउण्ट में आ गईं। कुछ दिनों बाद हमें सूचना मिली कि गधे के लीद से बना चमत्कारी ताबीज़ जबरदस्त तरीके से काम कर रहा है। वैसे हमें यह तो पहले से ही पता था कि किस्मत को दूसरी 'गर्लफ़्रेंड पत्नी' से जोड़कर हमने उस शख़्स को उसकी 'गर्लफ़्रेंड पत्नी' की अहमियत समझा दी थी। किस्मत का सितारा फूटने के डर से वह अपनी 'गर्लफ़्रेंड पत्नी' को भाव खिलाने लगता और समस्या का तत्काल समाधान हो जाता। जैसा हमने सोचा था वैसा ही हुआ, किन्तु मूर्ख लोग इसे चमत्कारी ताबीज़ का प्रभाव समझ रहे थे। हमने भी मौके पर चौका मारते हुए और अधिक कमाई करने की गर्ज से तुरन्त चेतावनी देते हुए बताया कि हर किसी के ऊपर यह चमत्कारी ताबीज़ काम नहीं करता। फ़ायदे की जगह नुकसान हो सकता है। ज्योतिषी की सलाह से ही इस चमत्कारी ताबीज़ को पहनना चाहिए। चेतावनी न देते तो कुछ दिनों में पता चलता कि मुम्बई में गधे की लीद का व्यापार होने लग गया है और एक ग्राम शुद्ध गधे की लीद का भाव एक हज़ार रूपया हो गया है!

  8. #38
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    उपरोक्त सत्य-कथा के आधार पर यह तथ्य निर्विवाद रूप से स्पष्ट हो गया है कि 'भाव खिलाने का फ़ण्डा' जबरदस्त तरीके से काम करता है। 'अरेंज मैरिज' वाले पुरूष जो अपनी परम्परागत पुरातन मानसिकता के शिकार हैं, इस तरह 'भाव खिलाने' को अपनी मर्दानगी के खिलाफ़ समझते हैं; तो हम बता दें कि महिलाएँ भी 'भाव न खाने' को अपनी 'औरतानगी' के खिलाफ़ समझतीं हैं! कुछ लोग 'भाव खिलाने' में शर्म महसूस करते हैं, किन्तु कपड़े उतारकर नदी में छलाँग लगाने में बिल्कुल शर्म महसूस नहीं करते। वस्तुतः 'भाव खिलाना' तो एक साधारण आधारभूत (Fundamental) प्रक्रिया है। गम्भीर मामलों में तो 'भाव खिलाने' से भी काम नहीं चलता और भाव खिलाने में अत्यन्त कुशल लोग भी हैरान और परेशान हो जाते हैं। ऐसे हैरान और परेशान लोग अन्तर्जाल में एक ही प्रश्न बार-बार पूछते रहते हैं- 'रूठी हुई प्रेमिका/पत्नी को कैसे मनाएँ?', किन्तु यह बात बिल्कुल नहीं बताते कि इन्होंने कारनामा क्या किया था? सच्चाई तो यह है कि इन्हें ऐसा प्रश्न पूछने की ज़रूरत भी न पड़ती यदि इन्होंने प्राचीन ग्रन्थों का अध्ययन किया होता। महर्षि वात्स्यायन रचित प्राचीन ग्रन्थ 'कामसूत्र' में रूठी हुई प्रेमिका/पत्नी को मनाने के फ़ण्डे के बारे में बहुत ही क़ायदे से समझा दिया गया है। 'कामसूत्र' के अनुसार-

    स्त्री-पुरुष सम्बन्धों को नूतन और रोचक बनाए रखने के लिए उनके बीच यदा-कदा लड़ाई-झगड़ा होना भी अत्यावश्यक है। यह लड़ाई तभी सफल होती है जब स्त्री-पुरुष के बीच गहन प्रेम सम्बन्ध और आपसी विश्वास हो, किन्तु यदि रिश्ते में पहले से ही दरार हो तो इस तरह की लड़ाई विकराल रूप धारण कर लेती है। यह झगड़ा सदैव पुरूष शुरू करता है। स्त्री कुपित होकर चिल्लाती है, अपने गहने फेंक देती है, वस्तुएँ तोड़ती है और पुरुष पर फेंक कर मारती है, किन्तु इस लड़ाई का एक नियम है। चाहे जो हो जाए, स्त्री को अपने घर के बाहर कदम नहीं रखना चाहिए। इसके पीछे दो कारण हैं- पहला कारण यह है कि यदि पुरुष स्त्री को मनाने उसके पीछे घर से बाहर नहीं जाएगा तो स्त्री का अपमान होगा। दूसरे कारण यह है कि इस लड़ाई का अन्त तभी होता है जब पुरुष स्त्री के पैर पर गिर कर उससे क्षमा माँगता है और यह काम पुरूष घर के बाहर नहीं कर सकता है।'
    Last edited by superidiotonline; 05-09-2022 at 10:53 PM.

  9. #39
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    महर्षि वात्स्यायन रचित प्राचीन ग्रन्थ 'कामसूत्र' के उपरोक्त सारांश का संक्षेप यह है कि 'रूठी हुई प्रेमिका/पत्नी को मनाने का एकमात्र अचूक उपाय उसके पैरों पर गिर कर क्षमा माँग लेना है'। यदि आपको इस एकमात्र अचूक उपाय को करने में शर्म आ रही है तो बता दें कि आजकल अनगिनत बेशर्म सुप्रीम कोर्ट का आर्डर जेब में रखकर किसी को भी पटाने की फिराक़ में चारों ओर घूम रहे हैं। इन बेशर्मों में से कुछ महाबेशर्म जैसे महारथी भी होते हैं। ये महाबेशर्म सैकड़ों लोगों के सामने भी इस अचूक उपाय को प्रयोग करने का महाकौशल रखते हैं। अतः शर्म करने वालों को अत्यन्त सावधान हो जाना चाहिए।

    अब बात करते हैं- इस लेख के शीर्षक की जिसमें 'एक्ट्रा मैरिटल अफ़ेयर्स में सेक्स लाइफ़ कैसे मैनेज करें?' जैसी धमाकेदार बात कही गई है। यह बात कुछ वैसी ही है जैसी वर्ष 2005 में लोकार्पित हिन्दी फ़ीचर फ़िल्म 'गरम मसाला' में दिखाई गई थी। वैसे इस फ़िल्म में एक्ट्रा मैरिटल अफ़ेयर्स का कोई चक्कर-वक्कर नहीं है, किन्तु कहानी का नायक मैक (अक्षय कुमार) तीन लड़कियों के साथ अदल-बदलकर सेक्स लाइफ़ मैनेज करता है। यदि आप 'भाव खिलाने' और 'अचूक उपाय' को प्रयोग करने की महाविद्या सीख गए हैं तो आपको एक्ट्रा मैरिटल अफ़ेयर की ज़रूरत ही नहीं पड़ेगी।

  10. #40
    कांस्य सदस्य superidiotonline's Avatar
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    अब बाकी बचे वे युगल (Couple) जो एक-दूसरे से पृथक (Separate) होकर रह रहे हैं और उनके पुनर्मिलन (Reconciliation) होने की कोई सम्भावना शेष नहीं है या फिर जो 'भारतीय विवाह विच्छेद अधिनियम (Indian Divorce Act)-1869' के अन्तर्गत वैधानिक पृथक्करण (Legal Separation) में हैं। यक्ष-प्रश्न यह है कि ऐसे पृथक्कृत (Separated) युगल यदि आपस में शारीरिक सम्बन्ध बना लें तो यह विवाहेतर सम्बन्ध (Extra Marital Affair) की श्रेणी में आएगा या नहीं? तो इसका उत्तर है कि कानून की दृष्टि में तो ज़रूर आएगा। प्रायः विवाहेतर सम्बन्धों के मामलों में अँग्रेज़ी का 'मैनेज' शब्द किसी से 'गोलमाल करने' या 'छ्ल-कपट करने' के अर्थ में प्रयुक्त होता है, किन्तु इस रिश्ते (Relationship) में प्रबन्धन (Manage) करने जैसी कोई बात तो दिखाई नहीं देती, क्योंकि पृथक्कृत (Separated) युगल किसी के प्रति जवाबदेह न होकर पूर्णतः स्वतन्त्र होते हैं। अतः वे बिना किसी रोक-टोक के एक-दूसरे को डेट कर सकते हैं, लिव-इन में कूद सकते हैं, मल्टिपल नाइट स्टैंड कर सकते हैं। इसमें 'मैनेज' क्या करना? जब 'मैनेज' करना ही नहीं है तो इस विषय पर परामर्श देने के लिए हम अपना दिमाग़ क्यों खाली करें?

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