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Thread: " नए-नए भारतीय फिल्मों की संपूर्ण समीक्षा "

  1. #261
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    Re: " नए-नए भारतीय फिल्मों की संपूर्ण समीक्षा "

    फिल्म रिव्यूः सिंघम रिटर्न्स
    एक्टरः अजय देवगन, करीना कपूर, अमोल गुप्ते, जाकिर हुसैन, अनुपम खेर, महेश मांजरेकर
    डायरेक्टरः रोहित शेट्टी
    ड्यूरेशनः 2 घंटे 22 मिनट
    रेटिंगः 5 में 3 स्टार


    सिंघम और उसके साथी पुलिस वाले भ्रष्ट नेता और महाभ्रष्ट बाबा के पीछे हैं. नेता और बाबा भागकर एक घर के अंदर बंद हो जाते हैं. सिंघम गुस्से में दरवाजे तक पहुंचता है. फिर किनारे हो जाता है और पलटकर बोलता है, 'दया दरवाजा तोड़ दो'. पुलिस फोर्स दो कतारों में काई सी फट जाती है. और फिर आता है दया. हमारा दया. सीआईडी वाला दया. दुनिया में सबसे ज्यादा दरवाजे तोड़ने का रेकॉर्डधारी दया. और दरवाजा टूट जाता है. पब्लिक हंसी से लोट पोट हो जाती है. मगर ये मौके बार बार नहीं आते. और यहीं पर सिंघम रिटर्न्स अपनी पहली फिल्म के मुकाबले कुछ हल्की पड़ जाती है. सिंघम का मतलब है जबरदस्त एक्शन और कॉमेडी. सिंघम रिटर्न्स में एक्शन कमाल का है. पर कॉमेडी के नाम पर नाटकीय हरकतें करते बाबा हैं. 'जब वी मेट' की गीत की परछाईं बनने की कोशिश करती जबरन क्यूट दिखती करीना हैं.
    कॉमेडी का एंगल छोड़ दें तो फिल्म में एक और कमी स्पष्ट नजर आती है. वह कमी है समस्या के समाधान में दिखाए गए विजन की. उस पर बात बाद में, फिलहाल जनता को सलाह. 'सिंघम रिटर्न्स' रफ्तार भरा एक्शन ड्रामा है. इस बार विलेन ज्यादा हैं, ताकतवर हैं और समस्या भी विकराल है. काले धन की समस्या. फिल्म में अन्ना हजारे और आम आदमी पार्टी मूवमेंट की याद दिलाते प्रसंग भी हैं. अगर आप एक्शन के दीवाने हैं तो ये फिल्म आपके लिए है. फैमिली क्लास भी इसे देख सकती है क्योंकि रोहित शेट्टी अपनी फिल्मों में साफ सुथरा पारिवारिक रोमांस दिखाते हैं.


    फिल्म की कहानी रफ्तार से आगे बढ़ती है. गाने कुल तीन हैं. एक रोमैंटिक नंबर, एक आध्यात्मिक नंबर और आखिर में आइटम सॉन्ग आता है 'माझी सटकली'. ये तीनों ही फिल्म के ट्रैक को ज्यादा स्लो नहीं करते हैं. अजय देवगन की एक्टिंग दमदार है. मगर उम्र झलकने लगी है. करीना कपूर की अजय के साथ पेयरिंग फ्रेश लगती है. मगर अब डंब क्यूट रोल करने का उनका वक्त बीत गया. आलिया आ गई है न. इसके अलावा बाबा के रोल में अमोल गुप्ते हैं. वह बिलाशक बेहद काबिल एक्टर हैं. मगर यहां पर रोहित उनके किरदार को कई सतहें मुहैया कराने के बजाय बहुत प्रकट कर देते हैं. इस चक्कर में बाबा भौंडा बहरूपिया बनकर रह जाता है. उसकी कमीनगी कुछ कम उभर पाती है. करप्ट नेता के रोल में जाकिर हुसैन भी औसत ही नजर आते हैं. फिल्म के बाकी किरदार भी अपनी जगह ठीक हैं.अनुपम खेर अपने रोल में सरकार के नेता की याद दिलाते हैं और संयत रहते हैं. मुख्यमंत्री के रोल में महेश मांजरेकर नजर आते हैं. उन्होंने अपना रोल अच्छे से निभाया है और आखिर तक रहस्य की एक बारीक परत ओढ़े रखी है.


    'सिंघम रिटर्न्स' एक बार फिर बाजीराव सिंघम की पुलिसगीरी पर फोकस करती है. शिवगढ़ का यह जमीनी लड़का मुंबई पुलिस का डीसीपी है. वह अपराध के खात्मे और इसकी राह पर शुरुआती कदम रखने वालों में सुधार पर यकीन करता है. उसकी बचपन की दोस्त है अवनी, जिसका भाई प्रकाश एक नए आंदोलन से उभरी पार्टी की तरफ से चुनाव लड़ रहा है. इस पार्टी को आदर्शवादी गुरु जी का साया मिला हुआ है. फिर एक दिन सिंघम के दल का एक सिपाही करोडों रुपये के काले धन के साथ मरा मिलता है. यहां से जब जांच शुरू होती है, तो गुरु जी के विरोधी दल के नेता और बाबा लपेटे में आते हैं. जांच से बचने के लिए वह पलटवार करते हैं और इस तरह घात प्रतिघात का खेल शुरू होता है.


    'सिंघम रिटर्न्स' जो एक्शन ऑन स्पॉट वाला साल्यूशन देती है, वह प्रकट रूप में तो बहुत लुभाता है. मगर संविधान की तय लाइन छोड़कर कभी वर्दी उतारकर तो कभी सड़कों पर पुलिस मार्च कर अपराधियों को सजा देना एक गलत किस्म का संदेश देता है.


    इस फिल्म के जरिए हमें रोहित शेट्टी स्टाइल ऑफ सिनेमा की भी कुछ बारीकियां समझ आती हैं. सुभाष घई की शुरुआती फिल्मों 'कालीचरण' और 'विश्वनाथ' की तर्ज पर वह अपने लीड हीरो के साथ सिग्नेचर ट्यून का इस्तेमाल करते हैं. शेर की दहाड़ और सिंघम के गान वाली एंट्री फिल्म और दर्शकों, दोनों में जोश भर देती है. इसके अलावा सिंघम फ्रेंचाइजी हमारी खारी ग्रंथि को भी बखूबी सहलाती है. इस देश का नागरिक पुलिसवालों से डरता है. उनसे बचता है. प्यार तो कतई नहीं करता है. छुटपन से कहावत सुनाई सिखाई जाती है. पुलिस वालों की न दोस्ती भली, न दुश्मनी. ऐसे में सिंघम हमें सहलाता है. एक छद्म भरोसा भरता है. या सकारात्मक रहें तो कहें कि जरूरी हौसला देता है. सब पुलिस वाले एक से नहीं होते. उनके बीच कुछ माटी के लाल भी होते हैं .जो गलत को आंखों में आंखें डालकर गलत कहते हैं और उसे सही करने के लिए हर मुमकिन कोशिश करते हैं.


    सिंघम का अपने सहयोगियों के मान सम्मान के लिए लड़ना, लोगों की आस्था में अपनी आस्था रखना, मां-बाप के प्रति अगाध श्रद्धा रखना, प्रेम के ऊपर फर्ज को रखना, प्रेम में कुछ अटपटाहट बनाए रखना. मगर जब उसी प्रेम की आन पर आ जाए तो रौद्र रूप धारण कर लेना. ये सब हम भारतीयों को एक किस्म का दिमागी विस्थापन मुहैया कराता है. कह सकते हैं कि पूरा सिनेमा ही एक फंतासी में संतुष्टि पाने का जतन है. तो हम कह सकते हैं कि 'सिंघम रिटर्न्स' एक बार फिर यह सब जतन से करता है. बुरे नेता और अपराधी अपनी गति को प्राप्त होते हैं. प्यार को प्यार मिलता है. खोया हुआ सम्मान मिलता है और कुल जमा न्याय होता है.


    'सिंघम रिटर्न्स' रोहित शेट्टी की फिल्म है. इसके एक्शन में उनकी कल्पनाशीलता और नवाचार साफ नजर आता है. ये बिलाशक हॉलीवुड के टक्कर का है. फिल्म के दो गाने ठीकठाक हैं. लास्ट में आने वाला योयो हनी सिंह का आइटम नंबर मजेदार है और अगर आप फिल्म देखने जाएं तो अंत में इसे ठहरकर पूरा जरूर देखें. उस छोटे चीखते बच्चे की खातिर. एंटरटेनमेंट के डायरेक्टर साजिद फरहाद ने अपने मूल कर्म को उम्दा अंजाम दिया. उन्होंने कई कैची डायलॉग लिखे हैं. फिल्म में मराठी भाषा का जमकर इस्तेमाल है, पर ये कहीं से भी गैरमराठी दर्शकों को अखरेगा नहीं, ऐसा मेरा यकीन है. कुल मिलाकर फिल्म ठीक ठाक एंटरटेनमेंट पैकेज पेश कर लेती है.

  2. #262
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    Re: " नए-नए भारतीय फिल्मों की संपूर्ण समीक्षा "

    ई कानपुर का कटियाबाज है एइसी कटिया डाले कि मार आंधी में भी ना हिले

    कानपुर में रहने वालों के लिए कटियाबाज सिर्फ एक फिल्म नही है बल्कि एक जरिया है जिससे कानपुर में बिजली की समस्या के सभी पहलुओं को उन लोगों तक पहुंचाया जा सके जिनके हाथों से कुछ साल्*युशन निकल सकता है. बिजली चोरी की समस्या से लेकर उसके कारणों और इससे इफेक्*ट होने वाले लोगों की जिंदगियों पर प्रकाश डालती है.

    फिल्म शुरू होती है कानपुर के एक आम चौराहे से जहां लोहा सिंह एक बिजली के खंबे पर चढ़े हैं. अपनी जींस के पीछे प्लास लगाकर चलने वाले लोहा सिंह एक बैखोफ कटियाबाज हैं जो अपनी मजबूत कटिया के इलाके भर में मशहूर हैं. वह दावा करते हैं कि कितनी भी तेज आंधी आ जाए लेकिन उनकी कटिया नही हिल सकती. कानपुर के छोटे व्यापारियों के लिए लोहा सिंह एक तरह से रॉबिनहुड हैं जो अपनी जान जोखिम में डालकर गरीब कारीगरों के लिए बिजली की व्यवस्था करते हैं. बिजली चोरी के साथ कानपुराइट्स का जीवन जैसे तैसे चल रहा था कि तभी एंट्री होती है एक सख्त और पॉजिटिव केस्को ऑफीसर रितु महेश्वरी की. रितु केस्को के रेवेन्यू को बढ़ाने और कानपुर में बिजली चोरी रोकने के लिए अपने लेबल पर कोशिश स्*टार्ट करती है. इस जुगत में रितु अपने डिपार्टमेंट के लोगों को बिजली चोरी करने वालों के कनेक्शन काटने और उन पर सख्त से सख्त जुमार्ना लगाने का आदेश देती है. इससे बिना बिल दिए एसी और कटिया से पूरी की पूरी फैक्टरी चलाने वालों के लिए आफत आ जाती है. तब एंट्री लेते हैं सपा MLA इरफान सोलंकी जो अपने फॉलोअर्स की बात लेकर रितु से मिलने उनके दफ्तर पहुंचते हैं. जिसके बाद फीमेल ऑफीसर से मिसबिहेव के चलते उन पर केस रजिस्*टर हो जाता है.

    Proudcer: GlobalistanFilms

    Director: Deepti Kakkar, Fahad Mustafa

    Cast: Loha Singh, Ritu Maheshwari

    Rating: 4/5 star

    इस केस में बेल मिलने के साथ ही शुरू होता है एक कुचक्र जिसके चलते रितु का ट्रांसफर हो जाता है. स्*टेट में गवरमेंट बदल चुकी है और इरफान सोलंकी की ताकत पहले से काफी बढ़ चुकी है. चुनाव जीतने के साथ वह अपनी सर्पोटर पब्*लिक को याद दिलाते हैं कि कैसे उन्हों ने बुनकर समाज के बिजली जुर्माने के मामले में राहत दिलवाई. इसके साथ ही बिना बिजली के जी रही कानपुर की जनता इरफान सोलंकी की बढ़ते वोल्टेज को देखकर उनकी जयजयकार करने लगती हैं.

    क्यों देखें यह फिल्म
    बेशक टैक्निकल मायने में ये एक फीचर फिल्म नहीं बल्कि किसी स्टिंग आपरेशन की तरह रियल इंसीडेंटस को जोड़ जोड़ कर बनाया गया एक डाक्युमेंट्री नहीं बल्कि डाक्यु ड्रामा है. पर हिंदुस्तान के किसी भी शहर की टिपिकली पर्सनल प्राब्लम की कहानी कैसे बनती है ये उसका सटीक एग्जांपल है. फिल्म में स्टार पॉवर नहीं है पर इलेक्ट्रिक की पॉवर से जन्मी पॉवरफुल प्राब्लम्स को बताती कहानी इसकी सुपर स्टार है जिसमें डायरेक्टर फहद मुस्तफा का कनपुरिया होना एकदम परफेक्ट तड़का लगाता है.

    कानपुर में बिजली की प्राब्लम को तटस्थ रूप से दिखाते हुए यह फिल्म किसी को भी हीरो या विलेन नही बनाती है लेकिन केस्को ऑफिसर के शहर को बिजली देने के प्रयासों और सभी स्टेकहोल्डर्स के पक्षों को ईमानदारी से आपके सामने रखती है. फिल्म के डायरेक्टर्स द्वारा ढाई साल तक लगातार गर्मी और पसीने के बीच कानपुर की गलियों और मोहल्लों में शूटिंग करने के बाद यह फिल्म बन पाई है. फिल्म की एडिटिंग और परफेक्ट टाईमिंग इसे सिने*मैटिक मिरेकल बनाती है. इसलिए इस फिल्म को एक बार देखना तो बनता ही है

  3. #263
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    Re: " नए-नए भारतीय फिल्मों की संपूर्ण समीक्षा "

    'मर्दानी'




    स्टारः 3
    कलाकारः रानी मुखर्जी और ताहिर राज भसीन
    डायरेक्टरः प्रदीप सरकारकई फिल्में होती हैं जो किसी विषय को लेकर बनाई जाती हैं और कुछ होती हैं किसी विशेष कहानी को दिखाने के लिए बनाई जाती हैं और कई फिल्में ऐसी होती हैं, जो किसी ऐक्टर को स्थापित करने के लिए बनाई जाती हैं. 'मर्दानी' बिलकुल ऐसी ही फिल्म है, जिसे रानी मुखर्जी का बॉलीवुड में दोबारा जलवा कायम करने के लिए बनाया गया है. यानी फिल्म अपने इस काम में एकदम खरी उतरती है. फिल्म में शुरू से आखिर तक रानी मुखर्जी का जलवा है और वह बेशक 'सिंघम' या 'दबंग' के पुलिस अधिकारियों की तरह ऐक्शन और डायलॉग की अति नहीं करती हैं, लेकिन जो भी करती हैं, वह एक बार देखने लायक तो है ही. वैसे भी फिल्म को देखकर यही फील आता है कि 'मर्दानी' ऑफ द रानी, फॉर द रानी और बाय द रानी है.
    कहानी में कितना दम
    फिल्म मानव तस्करी को लेकर बनाई गई है. शिवानी शिवाजी रॉय (रानी मुखर्जी) मुंबई पुलिस की क्राइम ब्रांच में अधिकारी हैं. वे एक लड़की को बचाती है और अपने साथ रख लेती है. फिर एक दिन वह लड़की गुम हो जाती है. बस इसके बाद शुरू होता है चोर-पुलिस का खेल, जिसे शिवानी बड़े ही शातिर अंदाज में खेलती है. कहानी में कई दिलचस्प मोड़ हैं लेकिन कुल मिलाकर औसत ही है. कुछ एकदम नया नहीं कह सकते. लेकिन रानी पूरे टॉपिक को मजेदार बना देती हैं, और जिस तरह सिंघम और दबंग में बार-बार मन करता है कि अजय देवगन और सलमान नजर आते रहें, वैसा ही कुछ शिवानी के बारे में भी है.
    स्टार अपील
    काफी लंबे समय से रानी अपनी फिल्मों की बजाए आदित्य चोपड़ा के साथ अपनी शादी की वजह से सुर्खियों में थीं. उन्हें बॉलीवुड में कुछ सॉलिड चीज की तलाश थी. शायद उन्हें यह मौका 'मर्दानी' ने दे दिया है. रानी का बोलने का अंदाज मजेदार लगता है. ऐक्टर तो वे बेहतरीन हैं ही और अपने ही कंधों पर वे पूरी फिल्म को खींच रही हैं. फिल्म में विलेन के तौर पर ताहिर जबरदस्त है वह नए दौर का विलेन है और दिलचस्प है.
    कमाई की बात
    फिल्म को ए सर्टिफिकेट मिला है, इस वजह से इसकी रीच सीमित हो जाती है. यानी 18 से कम उम्र के दर्शक इससे कट जाएंगे. लेकिन मानव तस्करी और देह व्यापार पर फिल्म है तो इसमें वर्ड ऑफ माउथ काम कर सकता है. बेशक कहानी औऱ डायरेक्शन के मामले में फिल्म कोई चमत्कारिक चीज या पीस मुहैया नहीं कराती है, लेकिन रानी की वजह से यह फिल्म खास बन जाती है. इसलिए यह फिल्म वन टाइम वॉच तो है.

  4. #264
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    क्या कोई दिल धडकने दो की समीक्षा करने की कि्रपा करेगा

  5. #265
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    Quote Originally Posted by chulbuli View Post
    क्या कोई दिल धडकने दो की समीक्षा करने की कि्रपा करेगा
    हाय चुलबुली
    कैसी हो कहा हो
    मंच पे कब आओगी दुबारा
    मंच तुम आँखों की पलको से हो गए हो,
    के मिले बिना सुकून ही नहीं आता...!!!

  6. #266
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    नमस्कार जी कैसे हो सब
    सारा का सारा कसूर उन तेज बीहवाओं का है, यारो?उनकी जुल्फें सुलझाने की अदा में हम दिल‬ को उलझा बैठे

  7. #267
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    भुज मूवी देखि कल। बहुत मज़ाक बनाया हुआ ha। संजय दत्त पता नहीं कब छोड़ेगा मूवीज में काम करना। अजय देवगन की मूवी से जो एक्सपेक्टेड था वो कुछ भी नहीं था फिल्म में। सोनाक्षी सिन्हा को पता नहीं लेते क्यों हैं लोग फिल्म में।
    बहुत कुछ ऐसा दिखाया था जो बिलकुल भी प्रैक्टिकल नहीं लगता। एक सीन में तो संजय दत्त पाकिस्तानियों को जाके गलत इनफार्मेशन देके वापिस भी आ जाता है जबकि सारा खेल यही था की पाकिस्तानियों को आने में जितना टाइम लग्न था उसी से सब कुछ फैसला होना था।
    कुल मिलकर मजा नहीं आया फिल्म में।

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